Saturday, December 24, 2011

ہندستانی سپریم کورٹ کا تاریخی فیصلہ


ہندستان کثیر المذہب ملک ہے یہاں صدیوں سے مختلف قوم ونسل اور مذہب کے لوگ آپس بھائی چارگی کے ساتھ مل جل کر رہتے ہیں۔ ہندستان کی اسی خصوصیت کے سبب عالمی سطح پر یہ ملک کثرت میں وحدت کا بے مثل نمونہ سمجھا جاتا ہے۔ لیکن اس کے ساتھ ہی اس کا ایک تاریک پہلو یہ ہے کہ اس ملک میں کچھ ایسے شر پسند عناصر بھی ہیں جو کسی بھی قیمت پر ہندستان کی اس شناخت کو پسند نہیں کرتے اور ایک خاص شناخت کے ساتھ اس ملک کو نئی پہچان دینے کی فکر میں رہتے ہیں۔ اسی حوالے سے ایک تازہ ترین واقعہ سامنے آیا۔ 4 ستمبر کو جھارکھنڈ کے گورنر سید احمد نے بہ حیثیت گورنر حلف لیتے ہوئے اللہ کے نام سے حلف کی ابتدا کی او ر اللہ کے نام سے عہدے کے تقدس کا حلف لیا۔ اس کے بعد کچھ شر پسند عناصر نے اس کو اپنی انا کا مسئلہ بناتے ہوئے سید احمد کو آرے ہاتھوں لینے کی کوشش۔ جھارکھنڈ جہاں تقریباً 40 فیصد آبادی مسلمانوں کی ہے۔ لیکن یہ سوئے اتفاق ہے کہ اس صوبے میں بی جے پی کے اشتراک سے حکومت بنی ہے۔ اس حلف کے بعد کمل نرائین نامی ایک شخص نے جھارکھنڈ کے ہائی کورٹ میں ایک عرضی دائر کرتے ہوئے کہا کہ ان کا اللہ کے نام پر حلف لینا غیر آئینی ہے اس لیے فوری طور پر انھیں گورنر کے عہدے سے ہٹایا جائے۔ جھارکھنڈ کے ہائی کورٹ نے اس عرضی کو ناقابل سماعت سمجھتے ہوئے اسے خارج کردیا۔ اس کے بعد کمل نرائن نے سپریم کورٹ کا دروازہ کھٹکھٹایا۔ کمل نرائین بظاہر یاک شخص ہے لیکن اس کے پیچھے ایسے شر پسند عناصر موجد تھے جو یہ چاہتے تھے کہ ہندستان میں صرف ایشور کے نام سے ہی حلف لے سکتے ہیں۔ خیر سپریم کورٹ میں دو ججوں کے بینچ نے اس معاملے پر غور وخوض کیا اور فیصلہ سناتے ہوئے کہا کہ اس ملک میں اگر کوئی شخص اللہ کے نام پر کسی عہدے کا حلف لیتا ہے تو ہو غیر آئینی نہیں ہے۔ بلکہ آئین کے موافق ہے۔ کیونکہ خدا۔ اللہ ، ایشور ، گاڈ سب ایک ہی معنی میں استعمال ہوتا ہے۔سپریم کورٹ کا یہ فیصلہ ایسے شر پسند عناصر کے منہ پر ایک زبردست طمانچہ ہے جو ملک کو مذہب کے نام پر بانٹا چاہتے ہیں۔اور اس ملک کے سیکولر کردار کو داغدار کرنا چایتے ہیں۔اس فیصلے کے بعد ہم ایسے تمام اداروں سے بھی یہی توقع رکھتے ہیں کہ ایسی حرکتوں کا منہ توڑ جواب دیا جائے تاکہ ملک کا سیکولر کردار بحال رہے۔

Friday, December 23, 2011

کروڑوںکا ہوگالوک پال


200 کروڑ کا لوک پال ، 100 کروڑ کا ابتدائی خرچ اور 400 کروڑ کی عمارت۔ جی ہاں ، ملک کو بدعنوانی پر لگام لگانے والا لوک پال سستے میں نہیں ملے گا۔ حکومت نے لوک پال بل کے ساتھ جو دستاویزات پارلیمنٹ میں پیش کئے ہیں ان کے مطابق لوک پال پر ایک سال میں 200 کروڑ روپیہ کا خرچ آئے گا۔ لوک پال تنظیم کی شروعات میں ہی حکومت کو ایک بار کا 100 کروڑ کا خرچ اٹھانا پڑے گا۔
حالانکہ حکومت کا یہ بھی کہنا ہے کہ لوک پال پر خرچ کتنا آئے گا یہ ٹھیک ٹھیک بتانا ممکن نہیں ہے لیکن اگر لوک پال کے لیے عمارت بنانے کی ضرورت پڑتی ہے تو اس پر ہی حکومت کو 400 کروڑ روپے خرچ کرنے ہوں گے۔لوک پال کے اخراجات کا انتظام ملک کے کنسولڈےٹےڈ فنڈ یعنی جامع فنڈ سے ہوگا۔ اس فنڈ میں ہی سینٹرل ایکسائز ، کسٹم اور انکم ٹیکس سمیت تمام ٹیکس جمع ہوتے ہیں۔ حکومت بانڈ جاری کر کے جو قرض بٹورتی ہے وہ اس فنڈ میں جاتا ہے۔ وہیں حکومت دوسرے ممالک اور ورلڈ بینک یا آئی ایم ایف سے جو قرض لیتی ہے وہ بھی اسی فنڈ میں جاتا ہے لیکن مجموعی طور پر بات یہ ہے کہ لوک پال کے لیے پیسہ آپ کی جیب سے جائے گا۔

रुक गईं सांसें....................


 लगता है बॉलीवुड की ऊ ला ला ला गर्ल विद्या बालन को सुर्खियों में रहने का नुस्खा मिल गया है.लोगों के दिमाग से विद्या की डर्टी पिक्चर का नशा अभी उतरा भी नहीं है कि उनकी एक नई तस्वीर ने सनसनी पैदा कर दी है. इस फोटो में विद्या की पारदर्शी पोशाक कौतूहल का विषय बनी हुई है.विद्या हाल ही में एक प्रेस कान्फ्रेंस में आईं जिसमें उन्होंने काले रंग की शर्ट पहनी हुई थी. लेकिन उनकी शर्ट इतनी झीनी थी कि वहां मौजूद लोग देखते ही रह गए. विद्या को बिना ब्रा की शर्ट में देख प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद लोगों ने 'ऊ ला ला' गुनगुनाया और उन्होंने एक दूसरे को चुटकी भी काटी.डर्टी पिक्चर की इस हीरोइन ने इस फिल्म में जहां अपनी शोख अदाओं से करोड़ों दिलों को घायल किया था इस प्रेस कान्फ्रेंस में उनकी पारदर्शी पोशाक देख लोगों की सांसे रुक सी गईं.जब तक विद्या समझ पातीं कि जाने-अनजाने वो ब्रा पहनना भूल गई हैं प्रेस कान्फ्रेंस में मौजूद फोटोग्राफर्स के कैमरे चल पड़े. अब इन कैमरों में कैद हो गई विद्या की वह बेशकीमती तस्वीर जिसे देखने को उनके फैन्स में दीवानगी है.

Thursday, December 22, 2011

लीजिये जनाब हिंदुस्तान म एं मुसलमानों के एक और हमदर्द को मौलाना का लक़ब मिल गया अब तक तो लोग मुलायम सिंह यादव को ही ''मुल्ला मुलायम''कह कर पुकारते थे अब जिस तरह से पर्लिअमेंट में लोकपाल बिल committee में मुसलमानों के लिए reservation की वकालत की उस से परभावित होकर मीडिया के लोगों ने उन्हें ''मौलाना लालू ''कहने लगे


लीजिये जनाब एक और राजनीतिज्ञ आ गए मैदान में

लीजिये जनाब एक और राजनीतिज्ञ आ गए मैदान में  । ये हैं हमारे बर्बोले साहब दिग्विजय सिंह के साहबजादे  । अब देखिये ये जनाब क्या क्या पर्दाफाश करते हैं और किस किस का जवाब किस अंदाज़ में देते हैं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कांग्रेस की परिवार वाद परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने बेटे जयवर्धन के लिए राजनीति का रास्ता साफ कर रहे हैं। एक इंटरव्यू में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने माना कि वो बूढ़े ‌हो चुके हैं अब राजनीति में युवाओं को आगे आना चाहिए।गौरतलब हो कि दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन ने बुधवार को राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम कोलुआ से पदयात्रा का कर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की।बुधवार से शुरू हुई 7 दिवसीय पदयात्रा करीब 150 किमी का सफर तय कर जामनेर में समाप्त होगी। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने संकेत दिए कि 2013 के विधानसभा चुनाव में जयवर्धन राघौगढ़ से चुनाव लड़ेंगे।दिग्विजय सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे को समझा दिया है कि वह हवा-हवाई राजनीति न करें। जमीन पर आकर काम करे और लोगों की परेशानियों को समझें

Wednesday, December 21, 2011

ध्यान चन्द के लिए सरकार को पत्र


सरकार के खिलाड़ियों को देश का शीर्ष नागरिक सम्मान भारत रत्न दिए जाने का रास्ता साफ करने के बाद हाकी इंडिया [एचआई] ने बुधवार को खेल मंत्रालय से यह सम्मान दिवंगत मेजर ध्यानचंद को देने का आग्रह किया।खेल मंत्री अजय माकन को लिखे पत्र में हाकी इंडिया ने नियमों में संशोधन का स्वागत किया और सरकार से अपील की कि ध्यानचंद को भारतीय हाकी में उनके अतुल्य योगदान के लिए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा जाए। हाकी इंडिया की विज्ञप्ति के मुताबिक ध्यानचंद को खेल का सर्वकालिक महान खिलाड़ी माना जाता है और संभवत: वह एकमात्र भारतीय खिलाड़ी हैं जिनकी हाकी खिलाड़ी के रूप में क्षमता को लेकर कई तरह के मिथक थे। विज्ञप्ति में कहा गया कि ध्यानचंद की उपलब्धियों को देखते हुए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए कोई अन्य खिलाड़ी उनके जितना हकदार नहीं है। ध्यानचंद को 1926 में पदार्पण के बाद दो दशक के करियर में 1000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय गोल करने का श्रेय जाता है। वह 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लास एंजिल्स और 1936 में बर्लिन में लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा भी रहे। वह पहले भारतीय खिलाड़ी थे जिन्हें 1956 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

दिल्ली ही क्यूँ बनी राजधानी

इतिहासकार प्रो. रिजवान कैसर ने बताया कि दिल्ली हमेशा से संस्कृतियों का संगम रही है। यहां देश की ज्यादातर संस्कृतियां साथ रहीं हैं और कभी भी एक संस्कृति एक-दूसरे पर हावी नहीं हुई।इसके अलावा यह भौगोलिक रूप से भी हमेशा से शासकों की पसंदीदा जगह रही। यमुना नदी और अरावली पहाड़ियों के बीच बसी इस जगह का कई बड़े व्यापारिक शहरों से हमेशा से नाता रहा है।इस कारण से भी यह क्षेत्र राजधानी के रूप में पसंद किया गया। हालांकि अंग्रेजों द्वारा कलक त्ता से राजधानी को दिल्ली लाने की मूल वजह वह जनीतिक कारण बताते हैं।बंगाल विभाजन के निर्णय से बंगालियों के उपद्रव का लगातार निशाना बन रही ब्रिटिश हुकूमत के लिए अपने साम्राज्य को बचाने के लिए भी यह निर्णय लेना जरूरी हो गया था। इसके अलावा मुसलमानों को खुश करने के लिए उन्होंने राजधानी के रूप में दिल्ली को चुना।

' दुनिया के 10 चर्चित सेक्स स्कैंडल्स

टाइम पत्रिका' की एक नई सूची से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और एक समय में उनकी महिला मित्र रही मोनिका लेविंस्की के चर्चे एक बार खास ओ आम की जबान पर आ सकते हैं। टाइम पत्रिका ने दुनिया के 10 सबसे बड़े सेक्सबाज नेताओं की सूची तैयार की है, जिसमें सातवें स्थान पर क्लिंटन को रखा गया है।गौर करने वाली बात यह है कि आए दिन महिलाओं के साथ अपने संबंधों को लेकर सुखिर्यों में बने रहने वाले इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बलरुस्कोनी का नाम इस सूची में शामिल ही नहीं है, जबकि सूची जारी होने के दो दिन पहले ही मिस्र की जनक्रांति से प्रेरित होकर इटली की महिलाएँ रंगीनमिजाज बलरुस्कोनी के खिलाफ सड़कों पर उतर आईं थीं।‘टाइम’ की इस सूची में पहला स्थान साउथ कैरोलिना के पूर्व गवर्नर मार्क सैनफोर्ड को मिला है। 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में इस पद के प्रत्याशी माने जा रहे सैनफोर्ड के एक साल से अर्जेंटीना की एक महिला के साथ प्रेम संबंध थे।दूसरे नंबर पर सीनेटर जॉन एनसाइन हैं, जिनका एक साल तक अपनी एक प्रचार कर्मचारी से प्रेम संबंध चला। सूची में तीसरा स्थान लुईसियाना के सीनेटर डेविड विटर ने पाया है, जो प्रांत की हाईप्रोफाइल कॉलगर्ल्स के नेटवर्क में काफी लोकप्रिय थे।डेट्राइट के पूर्व मेयर क्वामे किलपैट्रिक ने इस सूची में चौथा स्थान बनाया है। मेयर के प्रांत की एक अधिकारी के साथ लंबे समय से संबंध थे।सीनेटर लैरी क्रेग को हवाईअड्डे के बाथरुम में एक महिला कर्मचारी के साथ अनुचित आचरण करने के लिए इस सूची में पाँचवे स्थान पर शामिल किया गया है। क्रेग ने अपना दोष स्वीकार कर लिया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।डेमोक्रेटिक सांसद बार्ने फ्रैंक के एक पुरुष सेक्सकर्मी के साथ संबंध उजागर होने के बाद उन्हें टाइम ने अपनी सूची में छठे स्थान पर रखा है। सूची में सातवाँ स्थान पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को मिला है, जिनके मोनिका लेविंस्की के साथ संबंध लिखित संदेशों के माध्यम से उजागर हुए थे।टाइम ने सबसे बड़े सेक्स स्कैंडलबाजों की सूची में आठवें स्थान पर पूर्व सीनेटर और राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी गैरी हार्ट को रखा है। इस खुलासे के बाद हार्ट ने राष्ट्रपति पद की दौड़ से हटने की घोषणा कर दी। सूची के नौवें स्थान पर न्यूयार्क के पूर्व गवर्नर एलियोट स्पिट्जर काबिज हुए हैं, जो वेश्यावृत्ति का हाईप्रोफाइल धंधा चलाते थे।टाइम की इस सूची में सबसे नीचे एक समय में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रहे जॉन एडवर्डस हैं, जिनके एक उभरती हुई अभिनेत्री से संबंधों का 2008 में खुलासा हुआ। एडवर्डस को ‘पीपुल’ पत्रिका ने 2000 में ‘सबसे सेक्सी नेता’ चुना था।

Monday, December 19, 2011

हॉलीवुड व बॉलीवुड में सनसनी मचाने के बाद हरियाणा के छोटे से गांव मोठ लुहारी की मल्लिका सहरावत उर्फ रीमा लांबा का दिल आज भी हरियाणा में ही है। वे विवाह में हरियाणावी छोरे को प्राथमिकता देगी,साथ ही हरियाणा में ही विवाह समारोह होगा। उनके अपने प्रदेश के प्रेम की गाथा का उदाहरण सुप्रसिद्ध फिल्म चंद्रावल के हीरो जगत जाखड़ मामले में भी मिला। इस मामले में उन्होंने राज्य सरकार को पत्र लिखा है।मल्लिका भले ही विश्वविख्यात हो गईं। वे विवाह अपने पिता मुकेश लांबा एवं मां संतोष लांबा की राय से करेंगी। मल्लिका का कहना है कि शादी-विवाह मां-बाप की मर्जी से होते हैं। उनकी राय महत्व रखेगी।


Wednesday, December 14, 2011

पाकिस्तान के मदरसों के सम्बन्ध में जिस तरह की खबरें आ रही हैं उस से ऐसा लगता है के लोग और दहशतगर्द अब मासूमों की ज़िन्दगी को भी तबाह व बर्बाद करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं

पाकिस्तान के कराची शहर में स्थित एक मदरसे के तहखाने में कैद 50 से अधिक बच्चों को मुक्त कराया गया है। सभी बच्चे 18 साल से कम उम्र के हैं। जियो न्यूज चैनल के अनुसार पुलिस ने मंगलवार को कराची के सोहराब इलाके में जामिया मस्जिद जकारिया मदरसे के तहखाने से बच्चों को आजाद कराया।इन सभी को जंजीरों से बांध कर रखा गया था। ज्यादातर बच्चे खैबर पखतूनख्वा प्रांत के रहने वाले है। मदरसे पर कथित रूप से बच्चों का यौन शोषण करने का आरोप है। मदरसे के अधिकारियां का कहना है कि मदरसा नशे की लत छुड़ाने की शाखा चला रहा था। कारी मोहम्मद उस्मान नामक मौलवी के अलावा दो और लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं मदरसे का संरक्षक मुफ्ती दाउद फरार है। गृहमंत्री रहमान मलिक ने मामले की सघन जांच करने को कहा है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक पाक में 15,148 मदरसे हैं जिनमें करीब 20 लाख से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं।पाक के 3 करोड़ 40 लाख बच्चों में से महज 5 फीसदी बच्चे ही औपचारिक (स्कूली) शिक्षा ग्रहण करते हैं।मदरसे में जब छापेमारी के बाद बच्चों को छुड़ाया गया तो बे दुबके हुए थे। उनके चेहरे पर आतंक का खौफ साफ दिख रहा था और पुलिस की टीम के लोगों ने जब एक बच्चे से पूछने की कोशिश की तो वो फफककर रोने लगा।खबरों के मुताबिक जिन लड़कों ने तालिबान का विरोध किया था, उन्हें उल्टा लटका दिया गया था। इन बच्चों में अधिकतर का संबंध खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत से है। एक बच्चे ने बताया कि तालिबान के कुछ सदस्य उनके स्कूल में आए थे और उन्हें युद्ध के लिए तैयार रहने को कह रहे थे।

Sunday, December 11, 2011

दोनों तरफ है दिल



[राकेश ओमप्रकाश मेहर, दिल्ली-6 फिल्म के निर्देशक]
दिल्ली हमेशा दौड़ती और बदलती रहती है। दिल्ली की कहानी दरअसल दीवारों से घिरे उस शहर की है, जिसे हम पुरानी दिल्ली या दिल्ली-6 भी कहते हैं। नेशनल ज्योग्राफिक ने इसे 'विश्व में प्रति वर्ग फीट क्षेत्र में फैला सर्वाधिक घनत्व आबादी' वाला इलाका बताया है। यह इलाका छोटा भारत है। जब आप चांदनी चौक में प्रवेश करते हैं तो आपके बाई ओर श्रीदिगंबर जैन लाल मंदिर, उसके बगल में गौरी शंकर मंदिर, सामने प्रसिद्ध मोती सिनेमा और उसके बगल में क्रिश्चियन सेंट्रल बापटिस्ट चर्च है। आगे बढ़ते ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया है, जिसके पड़ोस में मैकडोनल्ड्स और विपरीत दिशा में मुड़ने पर आपको गुरुद्वारा शीशगंज साहिब दिखाई देगा। आगे सड़क के छोर पर पहुंचकर आपको फतेहपुरी मस्जिद दिखाई देती है और वहां से जैसे ही आप मुड़ते हैं तो लाल किले पर तिरंगा लहराता नजर आता है। यही तो भारत है। अंत में मैं कहूंगा: ये दिल्ली है मेरे यार.. यहां इश्क मोहब्बत प्यार.. इसके दाई तरफ भी दिल है.. इसके बाई तरफ भी दिल है..

DILLI KI JAY HO


यह शायद ही कभी सोती है और जब सोती भी है तो इसकी आँखों में होते हैं करोड़ों सपने। इसका इतिहास हजारों साल पुराना है और यह हर क्षण लिखती है नया इतिहास..यह है दिल्ली..एक शहर, एक राज्य और एक राष्ट्रीय राजधानी..यह है वह 'कैपिटल सिटी' जिसे कोलकाता से स्थानांतरित किया गया था..आज से 100 साल पहले मीर निहाल ने 7 दिसंबर 1911 को अलसुबह चांदनी चौक का रुख किया। काफी लंबे इंतजार के बाद, तोपों की सलामी के साथ लाल किले से पाँच मील लंबा शाही जुलूस नमूदार हुआ। दूर से वह फिरंगी राजा को पहचान भी नहीं पा रहा था [दरअसल जार्ज पंचम ने हाथी पर बैठने से इन्कार कर दिया था]। यह दृश्य देखते हुए निहाल की आँखों के आगे दिल्ली का पुराना वैभव घूम गया। घर लौटते हुए उसे रास्ते में एक लंगड़ा भिखारी मिला, लोग कहते थे कि वह आखिरी शहंशाह बहादुर शाह जफर का सबसे छोटा बेटा था!..अहमद अली की मशहूर किताब ट्वायलाइट इन दिल्ली के यह शब्दचित्र भुलाए नहीं जा सकते। इस जुलूस के पाँच दिन बाद 12 दिसंबर को जार्ज पंचम का कोरोनेशन पार्क में भारत के नए सम्राट के रूप में राज्याभिषेक हुआ और समारोह के समापन के तुरंत बाद ही जार्ज ने इस घोषणा से सबको चौंका दिया, ''हमने निर्णय किया है कि भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की जाए।''1911 में दिल्ली एक ढहता हुआ पुराना शहर था। चारदीवारी से घिरे शहर के बाहर केवल गांव और कुतुब-निजामुद्दीन की दरगाह के पास कुछ बस्तियां थीं। 1930 में भी यहां सफदरजंग के मकबरे [लुटियन की दिल्ली की दक्षिणी सीमा] से लेकर कुतुब तक फसलें लहराया करती थीं। एडवर्ड लुटियन और हरबर्ट बेकर की देखरेख में 1911 से 1931 के मध्य नई राजधानी ने आकार लिया। लुटियन द्वारा डिजाइन किए गए वायसराय निवास [जो बाद में भारत का राष्ट्रपति भवन घोषित हुआ] के लिए रायसीना गांव की जमीन पसंद की गई। साउथ और नार्थ ब्लॉक का जिम्मा बेकर के पास था। इन आर्किटेक्ट्स ने वायसराय निवास से पुराना किला तक गुजरती एक सीधी सड़क बनाई। वार मेमोरियल [इंडिया गेट] से गुजरने वाली इस सड़क को अंग्रेजों ने किंग्सवे कहा और आजादी के बाद भारतीयों ने इसका नया नामकरण किया 'राजपथ'। ब्रिटिश काल में इस सड़क के दोनों तरफ तत्कालीन राजघरानों [मुख्यत: हैदराबाद, जयपुर, बीकानेर] के प्रतिनिधि महल बने और दक्षिण में 'बैंग्लो जोन' विकसित हुई।भारत की आजादी की घोषणा के बाद 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में अविस्मरणीय उत्सव हुए। अब यह आजाद भारत की राजधानी थी और यहीं प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लालकिले पर तिरंगा झंडा फहराया। आजादी अपने संग विभाजन की त्रासदी भी लाई। 3 लाख से अधिक मुस्लिम दिल्ली छोड़ गए जबकि 5 लाख हिंदू-सिख शरणार्थियों ने यहां पनाह ली। इसी दिल्ली में 30 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी को गोली मार दी गई। शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण महज एक दशक में दिल्ली की आबादी में 90 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। किंग्सवे कैंप के तंबुओं में टिके शरणार्थियों के लिए लाजपत नगर, मालवीय नगर, पटेल नगर जैसी रिहायशी बस्तियां और सरोजिनी नगर-कमला नगर जैसे बाजार बसाए गए। चारदीवारी में मुगलिया नजाकत का चिराग बुझ चुका था और पंजाबी मिजाज वाली एक बिंदास नई दिल्ली उभर रही थी।आजादी के बाद दिल्ली का पहला आधिकारिक विस्तार कूटनीतिक क्षेत्र चाणक्यपुरी के रूप में हुआ। इसके बाद एक तरफ तो डीडीए विभिन्न इलाकों में फ्लैट बना रहा था, दूसरी तरफ डीएलएफ जैसे प्राइवेट डेवलपर्स हौज खास जैसे इलाकों को विकसित कर रहे थे।राजनीतिक राजधानी तो दिल्ली अर्से से थी, वक्त के साथ इसका आर्थिक शक्ति और शिक्षा-संस्कृति के केंद्र के रूप में भी उदय हुआ। शरणार्थियों ने व्यवसायों में नई जान फूंकी। वक्त के साथ यह विशाल हुए और रैनबैक्सी जैसी सफलता की महान गाथाएं लिखी गईं। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और आईआईटी ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी साख बनाई। 1982 के एशियाई खेलों ने शहर के बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव किया और दिल्ली वालों ने पहला फ्लाईओवर देखा। इसके लगभग पौने तीन दशक बाद कॉमनवेल्थ गेम्स और मेट्रो कनेक्टिविटी की बदौलत दिल्ली व‌र्ल्ड क्लास हो गई।यही नहीं, हर संस्कृति और हर क्षेत्र के लोगों की उपस्थिति ने दिल्ली को भारत की राजधानी से कहीं बढ़कर 'छोटा भारत' बना दिया है। दरअसल आर्थिक उदारीकरण के बाद की दिल्ली इतनी पॉश हो चुकी है कि यूपी, बिहार ही नहीं..सुदूर दक्षिण और उत्तर-पूर्व तक की प्रतिभाएं इसके मोहपाश में खिंच आती हैं।हो भी क्यों न, दिल्ली में असर है, दिल्ली में अवसर है

DEVANAND KA AAKHRI SAFAR


 देव साहब की याद में विशेष प्रार्थना सभा भी आयोजित की ग
 देव आनंद की बहन बॉनी सरीन ने भी अपने भाई को अश्रुपूर्ण विदाई दी
 अपने पिता के शव को कांधा देते देव आनंद के बेटे सुनील
 लंदन में देव आनंद को अंतिम विदाई देने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुँचे थे.
हिंदी सिनेमा के सदाबहार हीरो देव आनंद का शनिवार को लंदन में अंतिम संस्कार कर दिया गया

Saturday, December 10, 2011

YE HAI DILLI SHAHARYA TO DEKH BABUA......

पिछले सौ सालों में दिल्ली की शहरी योजना का सफ़र जानने के लिए आपको ज़्यादा समय नहीं चाहिए. बस शहर की किसी भी सड़क को पकड़ लीजिए.अगर दिल्ली शहर का भ्रमण किया जाए, तो इस शहर के भीतर ही बहुत से छोटे-छोटे शहर दिखाई दे जाएंगे, जो कि एक-दूसरे से बिल्कुल अलग लगते हैं.सड़क की एक ओर झुग्गी-झोंपड़ियों में ज़िंदगी पनपती हुई दिखती है, तो दूसरी ओर चहल-पहल से भरा शीशे का डब्बानुमा शॉपिंग मॉल.एक ओर दिखाई देगा किसी मंत्री का विशालकाय बंगला, और उससे जुड़ी गली का रास्ता नापें, तो धोबी घाट दिखाई दे जाएगा.रेलवे स्टेशन का रुख़ करिए तो वहाँ रुकने वाली रेलगाड़ियों से उतरने वालों की तादाद ट्रेन में चढ़ने वाले लोगों से कहीं ज़्यादा दिखेगी.और इस बात में कोई हैरानी भी नहीं है. आख़िरकार तेज़ी से समृद्ध होते इस शहर में हर साल क़रीब पाँच लाख लोग एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने आते हैं.देखा जाए तो ये ही विभिन्नताएं दिल्ली को एक परिभाषा देती हैं. लेकिन जब बात आती है सभी के लिए बराबर जन-सुविधाओं की, तो दिल्ली शहर एक अविकसित बस्ती की तरह लगता है, जहाँ उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं जो इस शहर की जीवन-रेखा कहलाते हैं.ऐसा क्यों है कि तेज़ी से पड़ोसी राज्यों में पांव पसारता ये शहर कहीं-कहीं घुटन का आभास देता है?क्यों यहां की योजना की परिभाषा सभी वर्गों के लिए अलग-अलग सी नज़र आती है?

YE DILLI WO DILLI


شالو ےادو
جب دہلی کے بارے میں اپنے خیالات کاغذ پر اتارنے کا موقع ملا ، تو جمنا کنارے جانے سے خود کو روک نہیں پائی کیونکہ شاید جمنا ندی ہی سب سے بڑی گواہ ہے دہلی میں تیزی سے تبدیلیوں کی. مجنو کا ٹےلا گردوارے کے پاس اور تبتی کالونی کے ٹھیک پیچھے ، سڑک کی بھیڑ- بھاڑ سے دور ایک ٹھہراو ¿ ہے ، جو مجبور کرتا ہے اپنے ماضی کو پھر سے زندہ کرنے کو.کہنے کو تو میں 'حقیقی دہلی والی ہوں ، کیونکہ میری پیدائش اور پرورش یہیں ہوئی ، لیکن جس دہلی میں میں نے بچپن گزارا ، وہ آج کی دہلی سے بہت مختلف ہے.مجھے یاد ہے ، جب میں پانچ سال کی تھی ، تب اسی دہلی میں میرے دادا دادی کے پاس کھیت اور گائے بھےنسےں ہوا کرتی تھیں. شہر کا جو علاقہ آج روہنی کے نام سے جانا جاتا ہے ، وہ ایک وقت جنگل ہوا کرتا تھا. وہیں ہمارے کھیت تھے ، جو بعد میں حکومت نے جبرا خرید لئے تھے.یاد ہے مجھے ، میری ماں کھیت سے لوٹتے ہوئے اپنے سر پر گائے بھینسوں کے لئے چارہ لے کر آتی تھی. ہمارے’گھیر‘ (تبےلے) میں چار بھینسےں اور ایک گائے تھی. مجھے اور میرے بھائی بہنوں کو ہر سال بس نئے بچھڑے یا بچھڑےوں کو دیکھنے کی ہوس رہتی.اب نہ تو وہ’گھیر‘ اپنی جگہ ہے ، نہ ہی ہماری وہ دےہات نما زندگی... ہم اب’روہنی والے‘ جو ہو گئے ہیں.عجیب المیہ ہے کہ جس زمین پر کبھی ہمارے ہی کھیت ہوتے تھے ، اسی زمین کی ایک ٹکڑی ہمیں حکومت سے خرید کر اپنا آشےانہ بنانا پڑا.اس کی وجہ یہ ہے کہ اس وقت دہلی میں ہو رہی’ترقی‘ کی لہر نے میرے ماں باپ کے خوابوں کو بھی چھوا.اور پھر ایک دن انہوں نے ارادہ کیا کہ اپنے بچوں کو اچھی تعلیم اور ترقی پسند ماحول دینے کے لئے انہیں گاو ¿ں (سمے پور ، بادہلی) سے نکل کر کسی ماڈرن کالونی میں جا کر بس جانا چاہئے. اور پھر ہم روہنی آ گئے.یہاں آ کر ہمیں دہلی کی’شہری ہوا‘ لگی اور اس کے مطابق ہم نے اپنی زندگی کو ڈھال لیا.یہ لکھتے وقت میں یہ دعوے سے کہہ سکتی ہوں کہ دہلی میں ایسے سینکڑوں نوجوان ہوں گے ، جن کی زندگی نے بھی میری زندگی جیسا ہی موڑ لیا ہوگا.بالآخر ، ایسے کتنے ہی جنگلوں اور کھیتوں میں اس شہر کی توسیع ہوئی ہے گزشتہ کچھ دہائیوں میں.میری نظر میں دہلی اس عظیم درخت کا نام ہے ، جس کی شاخےں تیزی سے پھیل رہیں ہیں ، لیکن پھر بھی اس کاسایہ تمام پر یکساں نہیں پڑتا.اس درخت پر’خواب‘ نامی کروڑوں رنگ برنگے پھل لٹکتے ہیں. کسی کی چھلانگ ان پھلوں کو لپک لاتی ہے ، تو کسی کو صرف ان پھلوں کو دور سے دیکھ کر للچانے کا ہی موقع مل پاتا ہے.بڑا ہی عجیب و غریب شہر ہے دہلی.یہاں کی سڑکیں اور چوڑے فلائی اوور دن کے اجالے میں اس کی ترقی بیان کرتے ہیں ، تو راتوں کو وہی سڑکیں اور فلائی اوور چیخ چیخ کر یہاں کی غربت کا مذاق اڑاتے ہیں.آج تک یہ ’دہلی والی‘ بھی اس شہر کو سمجھ نہیں پائی ہے. آخر ہے کیا دہلی؟یہ سوال خود سے کرتے ہی ، میرے دماغ میں مختلف تصاویر ابھر آتی ہیں ۔دہلی اس گفتگو میں بستی ہے ، جو ڈی ٹی سی کی بسوں میں بیٹھے سرکاری’بابو‘ کے درمیان ہوتی ہے.دہلی اس میٹرو ٹرین میں بستی ہے ، جس میں امیر سے امیر اور غریب سے غریب لوگ ایک دوسرے سے چپک کر سفر کرتے ہیں.دہلی اس ننھے سے بچے میں بستی ہے ، جو چند روپے کمانے کے لئے سڑک کے بیچوں بیچ کرتبکھاتا ہے.دہلی اس مڈل کلاس انسان میں بستی ہے ، جو نوئیڈا ، گڑگاو ¿ں یا غازی آباد میں ایک گھر خریدنے کا خواب رکھتا ہے.دہلی اس بوڑھی اماں میں بستی ہے ، جو نظام الدین درگاہ آنے والوں کے جوتے چپل سنبھالنے کے لئے تین روپے چارج کرتی ہے لیکن دعا مفت دیتی ہے.دہلی اس رکشہ والے میں بستی ہے ، جو یہاں رہتے رہتے ، یہاں کے تیزی سے بھاگتی زندگی کا عادی ہو گیا ہے.ویسے دہلی اس مزاج میں بھی بستی ہے ، جس میں ہرقانون کا توڑ کسی نہ کسی طریقے سے نکال ہی لیا جاتا ہے.میرے دماغ میں گھوم رہی ان تمام تصویروں کے درمیان کا آپس میں ایک نایاب کنکشن ہے ، جو کئی خامےوں کے باوجود بھی اس شہر کو صحیح معنوں میں’خوابوں کا شہر‘ بناتا ہے.

विजय झोल ने किया एक और धमाका

इंदौर में वीरेंद्र सहवाग का तूफानी दोहरा शतक लगने के ठीक एक दिन बाद नाशिक में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। अनंत कन्हेरे मैदान पर 17 वर्षीय एक खिलाड़ी ने अंडर-19 कूच बिहार टूर्नामेंट में नाबाद 451 रन ठोक तहलका मचा दिया। यह करिश्मा करने वाले खिलाड़ी नाम विजय झोल है। महाराष्ट्र के इस खिलाड़ी की जानदार पारी ने युवराज सिंह द्वारा इसी टूर्नामेंट में बनाए गए 11 साल पुराने रिकॉर्ड को तहस-नहस कर दिया।युवराज सिंह ने 1999-2000 में पंजाब की तरफ से खेलते हुए बिहार के खिलाफ 358 रनों की पारी खेली थी। तब यह लगा था कि इस जानदार पारी का रिकॉर्ड भला कौन तोड़ पाएगा? लेकिन विजय जोल ने महाराष्ट्र की तरफ से खेलते हुए असम के खिलाफ यह कारनामा कर दिया और रिकॉर्ड के बेताज बादशाह बन गए।अपनी इस बेहतरीन पारी को जोल ने टीम इंडिया के विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग को समर्पित किया है। जोल ने अपनी इस बेहतरीन पारी के लिए 467 गेंदों का सामना किया और 55 चौके तथा दो गगनचुंबी छक्के लगाए।

Friday, December 9, 2011

'परमवीर' सहवाग ने कुछ यूं मनाया जश्न इंडियन टीम के स्वागत के लिए होटल की लॉबी में केक और फूलझड़ियों का इंतजाम किया गया था। बस से उतरते ही कप्तान वीरेंद्र सहवाग ने केक काटा। तुरंत बाद सभी खिलाड़ी सीधे अपने कमरों में चले गए। होटल रेडिसन के एफ एंड बी मैनेजर हाइग्रिव कैरी ने बताया सहवाग के शानदार 219 रनों को यादगार बनाने के लिए केक पर 219 भी लिखा गया था।कैरेबियन पहले लौटे होटल- मैच खत्म होने के बाद पहले कैरेबियन टीम होटल लौटी। कैरेबियन टीम के सदस्य बस से उतरते ही सीधे अपने कमरों में चले गए। उसके बाद आई दूसरी बस में चहेते इंडियन खिलाड़ियों को देखकर पूरा माहौल सेलिब्रेशन के मूड में आ गया।


Sunday, December 4, 2011

तू तो ना आए तेरी याद सताए





मुंबई। ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे जिन्होंने अंतिम सास तक अपने कर्म से मुंह नहीं फेरा। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नई ताजगी से भर देती थी।इस करिश्माई कलाकार ने 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया ़ ़ ़' के दर्शन के साथ जिंदगी को जिया। यह उनकी 1961 में आई फिल्म ' हम दोनों' का एक सदाबहार गीत है और इसी को उन्होंने जीवन में लफ्ज दर लफ्ज उतार लिया था।देव साहब ने बीती रात लंदन में दुनिया को गुडबॉय कह दिया। सुनते हैं कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। वैसे तो वह जिंदगी के 88 पड़ाव पार कर चुके थे लेकिन वो नाम जिसे देव आनंद कहा जाता है, उसका जिक्र आने पर अभी भी नजरों के सामने एक 20-25 साल के छैल छबीले नौजवान की शरारती मुस्कान वाली तस्वीर तैर जाती है, जिसकी आखों में पूरी कायनात के लिए मुहब्बत का सुरूर है।देव साहब के अभिनय और जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों ने फिल्मों में नायक की भूमिकाएं करना छोड़ दिया था उस समय भी देव आनंद के दिल में रूमानियत का तूफान हिलोरे ले रहा था और अपने से कहीं छोटी उम्र की नायिकाओं पर अपनी लहराती जुल्फों और हालीवुड अभिनेता ग्रेगोरी पैक मार्का इठलाती टेढ़ी चाल से वह भारी पड़ते रहे।'जिद्दी' से शुरू होकर देव साहब का फिल्मी सफर, 'जानी मेरा नाम', 'देस परदेस', 'हरे रामा हरे कृष्ण' जैसी फिल्मों से होते हुए एक लंबे दौर से गुजरा और अपने अंतिम सास तक वह काम करते रहे। उनकी नई फिल्म 'चार्जशीट' रिलीज होने के लिए तैयार है और वह अपनी फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' की अगली कड़ी पर भी काम कर रहे थे।लेकिन इस नई परियोजना पर काम करने के लिए देव साहब नहीं रहे। बीते सितंबर में अपने 88वें जन्मदिन पर उन्होंने कहा था कि मेरी जिंदगी में कुछ नहीं बदला है और 88वें साल में मैं अपनी जिंदगी के खूबसूरत पड़ाव पर हूं। मैं उसी तरह उत्साहित हूं जिस तरह 20 साल की उम्र में होता था। मेरे पास करने के लिए बहुत काम है और मुझे 'चार्जशीट' के रिलीज होने का इंतजार है।मैं दर्शकों की माग के अनुसार, 'हरे रामा हरे कृष्णा आज' की पटकथा पर काम कर रहा हूं। देव साहब की फिल्में न केवल उनकी आधुनिक संवेदनशीलता को बया करती थीं बल्कि साथ ही भविष्य की एक नई इबारत भी पेश करती थीं। वह हमेशा कहते थे कि उनकी फिल्में उनके दुनियावी नजरिए को पेश करती हैं और इसीलिए सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों पर ही आकर बात टिकती है।उनकी फिल्मों के शीर्षक अव्वल नंबर, 'सौ करोड़', 'सेंसर' , 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ' तथा 'चार्जशीट' इसी बात का उदाहरण है।वर्ष 2007 में देव साहब ने अपने संस्मरण 'रोमासिंग विद लाइफ' में स्वीकार किया था कि उन्होंने जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हमेशा भविष्य को आशावादी तथा विश्वास के नजरिए से देखा। अविभाजित पंजाब प्रात में 26 सितंबर 1923 को धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के नाम से पैदा हुए देव आनंद ने लाहौर के गवर्नमेंट लॉ कालेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की शिक्षा हासिल की थी।नामी गिरामी वकील किशोरीमल के वह दूसरे नंबर के बेटे थे। देव की छोटी बहन शीला काता कपूर है जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्माता शेखर कपूर की मा हैं। उनके बड़े भाई चेतन आनंद और छोटे भाई विजय आनंद थे।अभिनय के प्रति उनकी दीवानगी उन्हें अपने गृह नगर से मुंबई ले आई जहा उन्होंने 160 रुपये प्रति माह के वेतन पर चर्चगेट पर सेना के सेंसर आफिस में कामकाज संभाल लिया। उनका काम था सैनिकों द्वारा अपने परिजनों को लिखे जाने वाले पत्रों को पढ़ना।उन्हें पहली फिल्म 1946 में 'हम एक हैं' मिली। पुणे के प्रभात स्टूडियो की इस फिल्म ने उनके कैरियर को कोई रफ्तार नहीं दी। इसी दौर में उनकी दोस्ती साथी कलाकार गुरू दत्त से हुई और दोनों के बीच एक समझौता हुआ। समझौता यह था कि यदि गुरू दत्त ने फिल्म बनाई तो उसमें देव आनंद अभिनय करेंगे।देव आनंद को पहला बड़ा ब्रेक अशोक कुमार ने 'जिद्दी' में दिया। बाबे टाकीज की इस फिल्म में देव साहब के साथ कामिनी कौशल थी और 1948 में आई इस फिल्म ने सफलता के झडे गाड़ दिए।1949 में देव आनंद खुद निर्माता की भूमिका में आ गए और नवकेतन नाम से अपनी फिल्म कंपनी की शुरुआत की और अपने वादे के अनुसार उन्होंने गुरू दत्त को 'बाजी ' [1951] के निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी। दोनों की यह जोड़ी नए अवतार में बेहद सफल रही।40 के उत्तरार्ध में देव साहब को गायिका अभिनेत्री सुरैया के साथ कुछ फिल्मों में काम करने का मौका मिला जो उस जमाने की स्थापित अभिनेत्री थी। इन फिल्मों की शूटिंग के दौरान उनकी सुरैया से नजरें लड़ गईं और प्रेम की चिंगारी ऐसी भड़की कि इस जोड़ी को दर्शकों ने सिल्वर स्क्रीन पर हाथों हाथ लिया। इन्होंने एक के बाद एक सात सफल फिल्में दी जिनमें विद्या [1948], जीत [1949] , अफसर [1950], नीली [1950] , दो सितारे [1951] तथा सनम [1951] थीं।विद्या के गाने 'किनारे किनारे चले जाएंगे ' की शूटिंग के दौरान सुरैया और देव आनंद के बीच प्यार का पहला अंकुर फूटा था। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान नाव डूबने लगी तो देव साहब ने ही जान की बाजी लगाकर सुरैया को डूबने से बचाया था।बेचैन दिल को देव अधिक समय तक संभाल नहीं पाए और 'जीत' के सेट पर सुरैया के सामने प्यार का इजहार कर दिया लेकिन सुरैया की नानी ने हिंदू होने के कारण देव साहब के साथ उनके संबंधों का विरोध किया। इसी वजह से सुरैया तमाम उम्र कुंवारी बैठी रहीं।नवकेतन के बैनर तले देव साहब ने 2011 तक 31 फिल्में बनाईं। ग्रेगोरी पैक स्टाइल में उनका डायलाग बोलने का अंदाज, उनकी खूबसूरती पर चार चाद लगाते उनके हैट और एक तरफ झुककर, हाथों को ढीला छोड़कर हिलाते हुए चलने की अदा उस जमाने में लड़किया देव साहब के लिए पागल रहती थीं।'जाल', 'दुश्मन', 'काला बाजार' और 'बंबई का बाबू' फिल्मों में उन्होंने नायक की भूमिका को नए और नकारात्मक तरीके से पेश किया। अभी तक उनके अलोचक उन्हें कलाकार के बजाय शिल्पकार अधिक मानते थे लेकिन 'काला पानी' जैसी फिल्मों से उन्होंने अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी।उसके बाद 1961 में आई 'हम दोनों' और 1966 में आई 'गाइड' ने तो बालीवुड इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कर दिया। 1970 में उनकी सफलता की कहानी का सफर जारी रहा और 'जानी मेरा नाम' तथा 'ज्वैल थीफ ' ने उन्हें नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया जिनका निर्देशन उनके भाई विजय आनंद ने किया था।वर्ष 2002 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित देव साहब राजनीतिक रूप से भी सक्रिय रहे थे। उन्होंने फिल्मी हस्तियों का एक समूह बनाया जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाई थी।1977 के संसदीय चुनाव में उन्होंने इंदिरा गाधी के खिलाफ चुनाव प्रचार किया और 'नेशनल पार्टी आफ इंडिया' का भी गठन किया जिसे बाद में उन्होंने भग कर दिया। कुछ भी कहिए 1923 से शुरू हुआ देव साहब का सफर अब मंजिल पर पहुंच कर एक नई मंजिल की ओर निकल गया है। अभी ना जाओ छोड़कर ।

Friday, November 25, 2011

ضمیر اور مفاد


ایک اعتبار سے دیکھاجائے تو زندگی کے دو قطبین یا دو Poles ہیں۔ایک ضمیر اور دوسرا مفاد۔ انسان کا مسئلہ یہ ہے کہ وہ گیت ضمیرکے گاتاہے مگر زندگی اپنے مفادات کے تحت بسرکرتاہے۔ اس کے ہاتھ میں پرچم ضمیرکا ہوتاہے لیکن پیش قدمی وہ مفادات کی جانب کرتاہے۔ اس کی آنکھوں میں خواب ضمیرکے ہوتے ہیں مگر اس کی زندگی پر حکومت مفادات کی ہوتی ہے۔ اس کی ایک اچھی مثال فیض احمدفیض ہیں۔ فیض احمد فیض آزادی کے شاعرتھے۔ مزاحمت کے شاعرتھے۔ انقلاب کے شاعرتھے۔ انہوں نے ویت نام میں امریکا کے خلاف مزاحمت کی حمایت کی۔ اس کے لیے نغمے لکھے۔ مضامین تحریرکیے ۔ بیانات جاری کیے۔ اس کی وجہ یہ تھی کہ ویت نام ایک کمیونسٹ ملک تھا اور امریکا نے ایک کمیونسٹ ملک کی حرمت پامال کی تھی۔ چنانچہ ان کے لیے ویت نام کی مزاحمت باطل کے خلاف حق کی مزاحمت تھی۔ غلامی کے خلاف آزادی کی معرکہ آرائی تھی۔ مفادات کے خلاف ضمیرکی جنگ تھی۔ فیض احمد فیض نے فلسطین کی تحریک مزاحمت کی حمایت کی اس کے لیے گیت لکھے۔ اس کی وجہ یہ تھی کہ فلسطین کی تحریک آزادی کے قائد یاسرعرفات سوشلسٹ تھے اور ان کی شہرت روس نواز رہنما کی تھی۔ لیکن سوویت یونین نے افغانستان میں مداخلت کی تو فیض کا یہ کردار قصہ پارینہ بن گیا۔ انہوں نے افغانستان کی جدوجہد آزادی کے لیے نہ کوئی نظم لکھی۔ نہ کوئی مضمون تحریرکیا نہ کوئی بیان جاری کیا۔ اس کی وجہ یہ تھی کہ افغانستان میں مداخلت کرنے والا سوویت یونین فیض کا نظریاتی کعبہ تھا اور اس کے خلاف آزادی کی جدوجہدکرنے والے اسلام کا پرچم لیے کھڑے تھے۔ فیض سے اس بارے میں کئی بار سوالات بھی کیے گئے مگر وہ ہربارگول مول جواب دے کر رہ گئے۔ افغانستان میں سوویت یونین کے خلاف مزاحمت کو پوری مغربی دنیاکی زبردست حمایت حاصل ہوئی۔ مغربی دنیا کے سیاست دان‘ دانشور اور صحافی سوویت یونین کے خلاف مزاحمت کرنے والوں کو مجاہدین کہتے۔ انہیں فریڈم فائٹرکہہ کر پکارتے۔ گلبدین حکمت یاراوراحمد شاہ مسعود امریکا اور یورپ کے پریس میں ہالی ووڈ کے سپراسٹارزکی طرح رپورٹ ہوتے۔ امریکا کے صدر رونلڈ ریگن نے ایک بار مجاہدین کی تعریف کرتے ہوئے فرمایا کہ مجاہدین کا اخلاقی مقام امریکا کے بانیان کے مساوی ہے۔ لیکن افغانستان میں سوویت یونین کی شکست کے ساتھ ہی امریکا اور یورپ کے رہنماوں ‘دانشوروں اور صحافیوں کے اذہان پر ان کے نام نہاد قومی مفادات نے قبضہ کرلیا۔ چنانچہ دیکھتے ہی دیکھتے مجاہدین دہشت گردبن گئے۔ حریت پسندرجعت پسند کہلانے لگے۔ امریکا کے بانیوں کے مساوی مقام کے حامل لوگ درندے بن گئے۔ انسانی تہذیب کی بقاءکی جنگ لڑنے والے تہذیب دشمن ٹھہرے۔ اس کا مطلب یہ ہے کہ ہزاروں بلکہ لاکھوں انسانوں کے قلوب اور اذہان پر ضمیرکے بجائے مفادات کا غلبہ ہوگیا۔ مفادات کا قطب ضمیر کے قطب کو نگل گیا۔ یہ مجموعی طورپر انسانیت کی ایک افسوسناک تصویرہے۔ لیکن زندگی کبھی استثنائی مثالوں سے خالی نہیں ہوتی۔ امریکا کی 30 کروڑ کی آبادی میں ایک نوم چومسکی بھی ہوتے ہیں۔ وہ امریکا کے چند ممتاز دانشوروں میں سے ایک ہیں۔ وہ نسلی اعتبارسے یہودی ہیں۔ لیکن اس کے باوجود ان کا کہناہے کہ امریکا دنیا کی سب سے بڑی بدمعاش ریاست ہے۔ ان کا اصرار ہے کہ امریکا کے توسیع پسندانہ عزائم نے دنیا کو ظلم اور جبرسے بھردیاہے۔ وہ نائن الیون کو شک وشبے کی نظرسے دیکھتے ہیں۔ ان کے نزدیک عراق اور افغانستان کے خلاف امریکا کی جارحیت کا کوئی جواز نہیں۔ وہ پاکستان کے خلاف امریکا کے عزائم کو تشویش کی نظرسے دیکھتے ہیں۔ ان کے پاس جتنے مذمتی الفاظ تھے انہوں نے امریکا کے خلاف استعمال کرلیے ہیں۔ یہ قومی مفادات کے قطب پر ضمیرکے قطب کے غلبے کا منظرہے۔ پاکستان میں امریکا کی سابق سفیر وینڈی چیمبرلن سے ایک بار صحافی نے سوال کیا کہ آپ امریکا پر نوم چومسکی کی تنقیدکے بارے میں کیا رائے رکھتی ہیں۔ وینڈی چیمبرلن نے اس سوال کے جواب میں کہاکہ نوم چومسکی ایک ایسے انسان ہیں جس کا کیریئر ختم ہوچکاہے۔ یعنی نوم چومسکی کا زندگی میں کوئی مفاد باقی نہیں رہا۔ چنانچہ وہ بے خوف ہیں اور ان کے جو جی میں آتاہے کہہ دیتے ہیں۔ تجزیہ کیاجائے تو یہ وہ طرز فکر ہے جو انسانوں کو مفادات کے دائرے کے باہرنہ دیکھ سکتاہے نہ سمجھ سکتاہے۔ لیکن نوم چومسکی سے زیادہ بڑی مثال ارون دھتی رائے کی ہے۔ ارون دھتی رائے ایک ارب 20 کروڑ کی آبادی کے ملک بھارت کی شہری ہیں اور اتنی بڑی آبادی کے ملک میں ضمیرکی سربلندی کی اب کوئی روایت موجود نہیں۔ بھارت پر اندھی قوم پرستی کا غلبہ ہے اور وہاں ضمیرکا ایک چراغ چلانے کا مطلب درجنوں سرخ آندھیوں کو دعوت دینا ہے۔ اس کے باوجود ارون دھتی رائے کشمیر میں بھارتی مظالم کے خلاف سب سے بڑی چشم دید گواہ بن کر ابھری ہیں۔ انہو نے حال ہی میں نیویارک میں ہونے والی ایک تقریب میں کشمیرکے حوالے سے بھارت ہی کو نہیں پوری مغربی دنیا کو بھی آئینے کے سامنے لاکھڑا کیاہے۔ انہوں نے کہاکہ حق خود ارادی کشمیریوں کا حق ہے اور بھارت 7 لاکھ فوجیوں کے ذریعے اہل کشمیر کی زندگی کو جہنم بنائے ہوئے ہے۔ انہوں نے کوئی لفظ چبائے بغیر کہاکہ مغربی دنیا کشمیرمیں بھارت کے مظالم سے صرف نظرکیے ہوئے ہے اور اس کے لیے انسانی حقوق نہیں بھارت کی منڈی اہم ہے۔ تقریب سے سید علی گیلانی خطاب کرتے تو وہ بھی اس سے زیادہ کچھ نہ کہتے جو ارون دھتی رائے نے کہا۔ اس تناظرمیں دیکھاجائے تو نوم چومسکی کی اخلاقی حیثیت 30 کروڑ امریکیوں سے زیادہ ہے اور ایک ارون دھتی رائے ایک ارب 30 کروڑ بھارتیوں پر فوقیت رکھتی ہیں۔ لیکن یہاں سوال یہ ہے کہ نوم چومسکی اور ارون دھتی رائے کے ضمیرکی آواز کا مفہوم کیاہی؟۔ یہ سوال اس لیے اہم ہے کہ نوم چومسکی اور ارون دھتی رائے سیکولر ذہنی سانچے کے حامل ہیں اور ضمیرکی آواز مذہبی تصور اورمذہبی احساس کے سوا کہیں سے ابھرہی نہیں سکتی۔ غورکیاجائے تو یہ حقیقت عیاں ہوکر سامنے آتی ہے کہ مذہب صرف چند تصورات کانام نہیں۔ مذہب انسان کی ساخت یا اس کے ڈیزائن کا حصہ ہے۔ انسان مذہب کو تصور کی سطح پر مستردکرسکتاہے مگر وہ اپنے وجود کی ساخت کو مستردنہیں کرسکتا۔ اس کا اندازہ اس بات سے کیاجاسکتاہے کہ ایک بار صحابہ کرام نے رسول اکرم کو کسی عرب شاعر کے ڈیڑھ سو دوسو اشعارسنائے۔ حضوراکرم نے اشعارسن کر فرمایا کہ یہ شاعر اسلام لانے کے قریب تھا۔ نوم چومسکی ارون دھتی رائے کا معاملہ بھی یہی ہے کہ وہ تصورکی سطح پر اسلام سے بہت دورکھڑے ہیں لیکن داخلی تجربے کی سطح پر وہ اسلام سے بے حد قریب ہیں۔

Thursday, November 24, 2011

الوداع بلاگنگ!


کیا آپ بلاگ لکھتے ہیں یا بلاگ لکھنے کے بارے میں سوچ رہے ہیں۔ بہت ممکن ہے کہ اس سوال کا جواب منفی ہو۔ ساری دنیا میں بلاگنگ کو لے کر ایک بے اعتنائی کا احساس دکھائی دے رہا ہے اور بھارتی بھی اس سے اچھوتے نہیں ہے۔ ابتدائی دور میں بلاگنگ کو بڑی پبلیسٹی کچھ سےلےبرٹی بلاگروں نے دلایا۔ اس کے علاوہ بلاگنگ کے تئیں وقف لوگوں نے اسے نئی سمت دی۔ مین اسٹریم کے میڈیا میں بلاگنگ نے اچانک ایک نظر بٹوری اور اچانک کرےز پیدا ہوا۔ گزشتہ دو سال میں حالات مکمل طور پر بدل گئے نظر آتے ہیں۔ زیادہ تر سےلےبرٹی بلاگر بلاگنگ کو الوداع کہہ گئے ہیں۔ بالی وڈ شخصیات میں امیتابھ بچن اور منوج باجپےئی کو چھوڑ دیں تو تقریباً باقی تمام سےلےبرٹی نے عرصہ سے بلاگ پوسٹ نہیں لکھے۔ مین اسٹریم کے میڈیا میں شائع ہونے والے بلاگ فہرست پر نظر ڈالیں تو وہاں بھی چند بلاگز کو ہی مستقل جگہ مل پا رہی ہے۔ یعنی باقاعدہ بتاریخ ہونے والے بلاگ کی تعداد سمٹی ہے۔ پوری دنیا میں گوگل پر تلاش جانے والے الفاظ کا مطالعہ کرنے والے گوگل انسائٹ کے مطابق سال 2010 میں بلاگ کی ورڈ کی تلاش میں 50 فیصد کی کمی آئی ہے۔ بلاگ کی تعداد میں بھی اضافہ کی رفتار سست ہوئی ہے۔ بلاگ کی تعداد پر نظر رکھنے والے بلاگ پلس کے مطابق سال 2010 میں بلاگ کی تعداد 152 ملین تھی جو 2009 میں 126 ملین تھی۔ یعنی ایک سال میں بلاگ کی تعداد میں 21 فیصد کا اضافہ ہوا۔ اب اس کے برعکس فیس بک ، ٹویٹر صارفین کی تعداد پر نظر ڈالیں تو حیرت انگیز اضافہ دکھائی دیتاہے۔ پوری دنیا میں فیس بک کے صارفین کی تعداد اب 80 کروڑ سے تجاوز کر گئی ہے جو جون 2009 میں محض 25 کروڑ تھی۔ بھارت میں ہی 2008 میں فیس بک کے صرف 16 لاکھ کھاتے تھے جو اب تین کروڑ 35 لاکھ سے تجاوز کر گئی ہے۔ 2009 سے 2010 تک ٹویٹس کی تعداد میں 160 فیصد کا اضافہ ہوا ہے ، لیکن مسئلہ اعداد و شمار کا نہیں بلاگنگ کے سمٹتے دنیا کا ہے۔ بلاگنگ کے تئیں وقف یا اسے مقبول بنانے والے لوگوں نے لکھنا نہیں چھوڑا ہے البتہ انہوں نے پلیٹ فارم بدل دیا ہے۔ وہ فیس بک جیسی سوشل نےٹورکنگ سائٹ یا ٹویٹر جیسے مائکروبلاگنگ سائٹ پر آ گئے ہیں۔ سوشل میڈیا کے نئے پلیٹ فارموں کی مقبولیت کا عالم یہ ہے کہ بڑی کمپنیوں نے بھی اپنے بلاگ اپ ڈیٹ کرنا بند کر دیا ہے اور ان کے مرکز میں فیس بک ، ٹویٹر ، گوگل پلس اور یو ٹیوب جیسے پلیٹ فارم آ گئے ہیں۔ اس میں کوئی شک نہیں کہ کم الفاظ میں اپنی بات رکھنے کے خواہش مند لوگوں کے لئے سوشل نےٹورکنگ سائٹ بلاگ سے بہتر متبادل ہے۔ یہاں انہیں لکھنے سے پہلے مزید ماتھاپچچی نہیں کرنی پڑتی۔ کئی بار لوگوں کے خیال الگ نظر آتے ہیں۔ اس کی انہیں کوئی فکر بھی نہیں ، کیونکہ وہ مصنف نہیں ، فکر مند نہیں ہے۔ وہ صرف اپنی بات رکھنا چاہتے ہیں اور سوشل نےٹورکنگ پر بات پر ملتی فوری ردعمل ان کا حوصلہ بڑھا دیتی ہیں۔ ویسے فیس بک یا ٹویٹر بھی بلاگنگ کی ہی چھوٹی شکل ہے ، لیکن جس بلاگنگ کی ہم بات کر رہے ہیں وہ مصنف کو بہتر طور پر خیال کو ظاہر کرنے کا مطالبہ کرتا ہے۔ وہاں تحریر میں کم از کم زبان سٹائل اور خیالات کی تشکیل کی توقع رہتی ہے۔ اب اس بات پر بحث ہونی چاہئے کہ کیا بلاگنگ کو بچانے کی کوشش ہونی چاہئے اور کیا بچانا ممکن ہے۔ یوں بلاگ کا وجود کبھی ختم نہیں ہو سکتا ، کیونکہ 140 حروف یا چند سطریں ایک مضمون کا متبادل نہیں ہو سکتی۔ بہت ممکن ہے کہ بلاگ کو مستقبل میں صرف ماہر ادیبوں کا پلیٹ فارم تصور کیا جائے۔ یعنی صحافی ، سائنسدان ، اساتذہ وغیرہ اس کا استعمال کریں۔ دراصل ، بلاگ کی اہمیت سے انکار نہیں کیا جا سکتا ، لیکن سچائی یہ ہے کہ اس کی اہمیت کو صحیح معنوں میں سمجھا ہی نہیں گیا۔ تقریبا ًایک دہائی کے سفر کے باوجود بلاگنگ کا کوئی اقتصادی ماڈل تیار نہیں ہو پایا ہے۔ صرف ایسا بھی ہو پاتا تو کئی بلاگروں کے لئے بلاگنگ میں ایک کشش رہتی۔ بلاگنگ کے فی گھٹتے کرےز کو لے کر اب مرثیہ پڑھنے کا کوئی مطلب نہیں ، لیکن اگر بلاگنگ کو لوگوں نے پوری طرح الوداع کہا تو ایک بے حد اہم پلیٹ فارم مکمل استعمال ہوئے بغیر ہی ختم ہو جائے گا جو ٹھیک نہیں ہوگا۔

Sunday, November 6, 2011

غسل کعبہ اور غلاف کعبہ

خانہ کعبہ کا غلاف کل 9ذی لحجہ کو ہفتے کے دن تبدیل کیا گیا۔ روایتی طور پر غلاف کعبہ ہر سال حج کے دن نو ذلحجہ کو تبدیل کیا جاتا ہے جبکہ غسل کعبہ کی تقریب 8ذی لحجہ کو ادا کی جاتی ہے ۔

اس سال نیا غلاف چھ سو سترکلوگرام خالص ریشم اور ڈیڑ ھ سوکلو گرام خالص سونے اور چاندی سے تیار کیا گیا ہے ۔غلاف کعبہ پر دو کروڑ ریال لاگت آئی ہے۔ غلاف کعبہ پربیت اللہ کی حرمت اور حج کی فرضیت اور فضیلت کے بارے میں قرآنی آیات کشیدہ کی گئی ہیں۔اس کا سائز چھ سو ستا و ن مربع میٹر ہے اور یہ سنتا لیس حصوں پر مشتمل ہے ۔زمین سے تین میٹر کی بلندی پر نصب کعبہ کے دروازے کی لمبائی چھ میٹر او رچوڑائی تین میٹر ہے ۔غلاف کعبہ چار دیواروں کے علاوہ دروازے پر بھی آویزاں کیا جاتا ہے۔اتارے جانے والے غلاف کے ٹکرے بیرونی ممالک سے آئے ہوئے سربراہان مملکت اور دیگر معززین کو بطور تحفہ پیش کر دئیے جاتے ہیں۔ 
نیا غلاف چڑھانے سے پہلے خانہ کعبہ کو عرق گلاب سے معطر آب زم زم سے غسل دینے کی مبارک تقریب ہر سال باقاعدگی سے ادا کی جاتی ہے۔ غسل کے اوقات کا تعین حکومت وقت کرتی ہے۔ اس رسم میں سعودی عرب کے حکام، اسلامی ممالک کے وفود اور ممتاز زائرین شریک ہوتے ہیں۔
غسل کعبہ کے موقع پر روایتی اعتبار سے سب سے پہلے خادم حرمین شریفین (سعودی عرب کے فرما ںروا) گورنر مکہ کے ساتھ خانہ کعبہ میں داخل ہوتے ہیں۔دو رکعت نماز ادا کرنے کے بعد وہ خانہ کعبہ کے فرش کو عرق گلاب سے معطر آب زم زم سے دھوتے ہیں۔ خانہ کعبہ کی دیواروں کو ایک خاص قسم کی جاروب (جھاڑو) سے دھویا جاتا ہے۔ یہ جھاڑو کھجور کے پتوں سے خصوصی انداز میں بنائی جاتی ہے۔
دھلائی کے عمل کے دوران گورنر مکہ ہر طرف عرق گلاب چھڑکتے رہتے ہیں۔ دھلائی والا پانی خانہ کعبہ کے دروازے کی دہلیزکے سوراخ سے باہر نکلتا رہتا ہے۔دھلائی کا عمل مکمل ہونے کے بعد خانہ کعبہ کی عمارت کے اندر قسم قسم کے بخورات (خوشبوﺅں) کی دھونی دی جاتی ہے۔
کعبہ کا تصور یا نام زبان پر آتے ہی ادب، احترام اور احساس کی ایسی کیفیت ابھرتی ہے کہ جس کا بیان الفاظ میں آسان نہیں۔تجلیات، عقیدت، روحانیت اور کیف و سرور کے اثرات سے مزین یہ عمارت بیت اللہ کہلاتی ہے ۔جس کا مطلب اللہ کا گھر ہے ۔ کعبہ ، اللہ کا گھر اور مسلمانوں کا قبلہ ہے ۔مکہ مکرمہ میں مسجد الحرام کے تقریباً عین وسط میں کعبة اللہ واقع ہے۔ لغت کے اعتبار ے کعبہ ہر بلند اور مربع عمارت کو کہتے ہیں ۔ یہ نام کعبہ کے مربع شکل ہونے کی وجہ سے پڑ گیا ہے ۔کعبے کی چاروں دیواریں ایک سیاہ پردے یا غلاف سے ڈھکی رہتی ہےں۔پورے کعبے کو اس غلاف نے ڈھانپ رکھا ہے۔ کعبے کو غلاف پہنانے کا رواج قدیم ترین زمانے سے چلا آ رہا ہے۔
خانہ کعبہ پر سب سے پہلے غلاف حضرت اسماعیل علیہ السلام نے چڑھایا تھا ابن ہشام اور دیگر مورخین نے لکھا ہے کہ حضرت اسماعیل علیہ السلام اور حضرت ابراہیم علیہ السلام نے تعمیر کعبہ کے ساتھ ساتھ غلاف کا اہتمام بھی کیا تھا۔
فتح مکہ کے بعد جب حضور ﷺنے خانہ کعبہ کو بتوں سے پاک کیا تو اس وقت آپ ﷺنے غلاف کعبہ کو تبدیل نہیں کیا تھا۔
اسلامی تاریخ میں پہلی بار حضور اکرم صلی اللہ علیہ وسلم نے یمن کا تیار کردہ سیاہ رنگ کا غلاف چڑھانے کا حکم دیا آپ صلی اللہ علیہ وسلم کے عہد میں دس محرم کو نیا غلاف چڑھایا جاتا تھا بعدمیں یہ غلاف عید الفطر کو اور دوسرا دس محرم کو چڑھایا جانے لگا بعد ازاں حج کے موقع پر غلاف کعبہ چڑھانے کا سلسلہ شروع ہو گیا ۔
دس ہجری میں آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے حجتہ الوداع فرمایا تو غلاف چڑھایا گیا اس زمانے سے آج تک ملت اسلامیہ کو یہ شرف حاصل ہے کہ وہ غلاف خوبصورت اور قیمتی کپڑے سے بنا کر اس پر چڑھاتے ہیں حضور اکرم صلی اللہ علیہ وسلم کے بعد حضرت ابوبکر صدیق ؓنے اپنے دور میں مصری کپڑے کا قباطی غلاف چڑھایا کرتے تھے۔ سیدنا عمر فاروق ؓ پہلے پرانا غلاف اتار کر زمین میں دفن کر دیا کرتے تھے لیکن بعد میں اسکے ٹکڑے حجاج اور غربا میں تقسیم کئے جانے لگے۔
حضرت عثمان غنی ؓ نے سال میں دو مرتبہ کعبہ پر غلاف چڑھانے کی رسم ڈالی۔خلافت راشدہ کے بعد سے اب تک خانہ کعبہ کا غلاف تواتر سے تبدیل کیا جا رہا ہے۔ 1927ءمیں شاہ عبد العزیز السعود نے اپنے بیٹے شہزادہ فیصل کو حکم دیا کہ وہ غلاف کعبہ کی تیاری کےلئے جلد ازجلد ایک کارخانہ قائم کریں۔ 
سعودی کارخانے میں تیار ہونے والا پہلا غلاف ہندوستان کے مسلمان کاریگروںنے تیار کیا ۔مکہ میں غلاف کعبہ کے لیے یہ فیکٹری ” دارالکسوہ “ کے نام سے قائم کی گئی ۔1962ءمیں غلاف کی تیاری کی سعادت پاکستان کے حصے میں بھی آئی۔
شاہ فہد کے زمانے میں 18جنوری1983کو اقوام متحدہ کی مرکزی عمارت میں رکھنے کے لیے ملت اسلامیہ کی جانب سے غلاف کعبہ کا پردہ عطیہ کے طور پر پیش کیا۔ یہ پردہ نیو یارک میں اقوام متحدہ کی مرکزی عمارت کے استقبالیہ میں نمایاں طور پر آویزاں کیا گیا ہے۔

Friday, October 28, 2011

فارمولا -ون رےس ےا رفتار کا۔۔۔۔

آخر کار جس لمحے کا انتظار طویل عرصے سے تھا وہ آ گیا ہے۔ ہندوستان میں فارمولا ون کا مکمل رومانچ شروع ہونے والا ہے۔ گریٹر نوئیڈا کے بدھ رےسنگ سرکٹ پر پہلی انڈین گراں پری سے پردہ اٹھنے والا ہے۔ اب سب کے سر چڑھ کر بولے گا رفتار کا رومانچ۔رفتار کے مہامقابلے کی ”رن بھومی“ ہے بدھ رےسنگ سرکٹ۔ ہندوستان کا پہلا ایف- ون ٹریک۔ اس سرکٹ کو دنیا کے سب سے تیز سرکٹ میں سے ایک مانا جاتا ہے۔ 5.15 کلو میٹر لمبے سرکٹ میں تقریبا ایک لاکھ لوگ رفتار کے نظارے دیکھ سکتے ہیں۔
آج کل ہندوستان اور فارمولا ون مترادف لگتے ہیں لیکن یہ اتنے طویل عرصے تک ایک دوسرے سے دور رہے ہیں ، اس پر یقین ہی نہیں ہوتا۔ فارمولا ون کی دوڑ میں گلیمر ، چمک دمک ، جشن اور رفتار کا جو تڑکا ہے ، ٹھیک ویسی ہی جھلک ہندوستان کی بالی ووڈ کے تئیں دلچسپی اور بین الاقوامی کھیلوں میں رجحان سے دکھائی دیتی ہے۔ بہرحال، دیر آئے ، درست آئے۔کل سے انڈین گراں پری دہلی سے ملحقہ گریٹر نوئیڈا میں ہونے والی ہے۔ دوڑ ٹریک کو بنانے والی کمپنی جے پی اسپورٹس انٹرنیشنل کا کہنا ہے کہ اسے بنانے میں چار کروڑ ڈالر کا خرچ آیا ہے اور قریب پانچ ہزار مزدوروں نے اسے تیار کیا ہے۔ یہ وہی جگہ ہے جہاں دنیا کے سب سے تےز رفتار24 ڈرائیور اپنی دوڑ کے کرتب دکھائیں گے لیکن اسی ریس سے ملنے والی ہے ہند کو بین الاقوامی سطح پر شہرت بھی۔قےاس لگ رہے ہیں کہ ہالی ووڈ اسٹار ٹام کروز جیسی نامور ہستیاں صرف اسی ریس کے لئے ہندوستان پہنچےں گے۔ دنیا بھر میں کسی بھی فارمولا ون ریس کے بعد ہونے والی ’امبر پارٹیاں‘ انتہائی مشہور رہی ہیں۔ ابھی تک یہ پارٹی صرف مونےکو ،ابوظہبی اور سنگاپور جیسے تین فارمولا ون کی دوڑ والے شہروں میں ہی منعقد ہوئے ہےں ، اب باری ہے ہندوستان کی! جہاں اس پارٹی میں مائک سنبھالیں گے ارجن رامپال وہیں پارٹی میں موجود رہنے کی امید ہے قریب قریب پورے بالی ووڈ کی۔ شاہ رخ خان ، عمران خان ، ثانیہ مرزا ، ابھیشیک بچن اور نہ جانے کتنے ستاروں نے اس ریس کو دیکھنے اور پارٹی میں شریک ہونے کی منشا ظاہر کی ہے۔ہندوستان کی اب تک کی سب سے مشہور خاتون ٹینس کھلاڑی ثانیہ مرزا نے کہا تھا ،”میں نے کبھی بھی ایسی دوڑ نہیں دیکھی ، میں خوش قسمت ہوں کہ مجھے اے دےکھنے کی دعوت دی گئی ہے۔ ضرورجاو ¿ں گی“۔ مشہور پاپ گلوکار لیڈی گاگا اس اہتمام کے لئے خاص طور پر مدعو کی گئی ہیں اور وہ افتتاحی گانا گائیں گی ، جسے دیکھنے کے لئے اسٹیڈیم میں ایک لاکھ لوگ اپنے دل تھام کر بیٹھے ہوں گے۔ ظاہر ہے ، جب ہندوستان میں ایک ساتھ اتنے بڑے ستارے ایک جگہ پر موجود ہوں گے تو میڈیا بھی ہوگی ، جو ان خبروں، تصویروں کو دنیا بھر کے گھروں تک پہنچائےںگے۔
تےن دنوں کے اس کھےل مےںجن ستاروں پر نظریں رہیں گی وہ ہےںسباسٹےن وےٹل- ریڈ بل۔ سال 2011 میں وےٹل اور ریڈ بل کے ٹکر میں کوئی کھڑا نہیں ہو پا رہا ہے اور انڈین گراں پری جیتنے کے سب سے بڑے دعویدار بھی و ہی ہیں۔ وےٹل گزشتہ دو سال سے ایف ون چمپئن ہیں لیکن بدھ رےسنگ سرکٹ پر کئی سابق چمپئن بھی رفتارمیں شامل ہوں گے جن مےں لوئس ہےملٹن - مےکلےرن مرسڈےز ، جےسن بٹن- مےکلےرن مرسڈےز ،فرنانڈو الونسو-فراری اور مائیکل شوماکر- مرسڈےز شامل ہےں۔ پہلی ہندوستانی گراں پری کو لے کر ہندوستان میں جوش و خروش تو بہت ہے لیکن ریس کے لحاظ سے ہندوستان کی دعوےداری بہت مضبوط نہیں ہے۔ ایف- ون میں ہندوستان کی دعوےداری کا بیڑا ہے سہارا فورس انڈیا کی ٹیم پر۔ وجے مالیا کی ٹیم میں سبرت رائے نے حصہ داری کر لی ہے لیکن جیت کی دعوےداری کمزور ہے۔ ٹیم میںاےنڈرےن سوتل کے طور پر قابل ڈرائیور بھی ہےں لیکن فورس انڈیا کی کار میں شاید اتنی فورس نہیں کہ وہ ریڈ بل اور باقی بڑی ٹیموں سے ٹکر لے سکے۔ اس کے علاوہ ہندوستان کے نارائن کارتےکےئن بھی اس ورلڈ کپ میں اےچ آرٹی سے ریس گے ۔
لےکن کیا واقعیہندوستان کو فارمولا ون جیسے ایک انعقاد کی ضرورت تھی؟ جانے مانے ایڈ گرو اور ہدایت کار پرہلادککڑ کہتے ہیں ،”دولت مشترکہ کھیلوں کے دوران دنیا بھر میں ہوئی بدنامی کے بعد ہندوستا ن کو ایسے ایک انعقاد کی سخت ضرورت تھی۔ پہلی فارمولا ون ریس سے ہندوستان کی شبیہبہترہونے کی امید ہے۔“لیکن ہندوستان بھی اب بدل رہا ہے۔ ایک ترقی پذیر ملک ہونے کے ساتھ ساتھ ہندوستان میں اب غیر ملکی سرمایہ کاری کی بھرمار ہے اور دنیا کی ہر بڑی کمپنی ہندوستان میں اپنا مقام بنانے کی یا تو فراق میں رہتی ہے یا پھر اپنے دفتر کھول چکی ہے۔ کروڑوں کی لاگت سے ہونے والی اس فارمولا ون ریس سے ہندوستان ایک ابھرتے ہوئے ملک کی چھاپ دوبارہ چھوڑنے میں کامیاب ہو سکتا ہے۔ ایسا ماننا ہے دلیپ چیرین کا۔ دلیپ چیرین بتاتے ہیں ،”یہی فرق ہے ہندوستان اور انڈیا میں۔ اب دنیا انڈیا کی طرف امید سے دیکھ رہی ہے۔ ایک ایسا انڈیا جس کے بازاروں اور معیشت پر دنیا بھر کی نگاہ ہے۔“کچھ ہی دیر اور ہے۔ دوڑ کا ایک انوکھا تماشہ ہندوستان میں ہونے کو بے قرار ہے۔ اخباروں اور ٹیلی ویژن چینلوں پر دوڑ ٹریک کی تصاویر ہی تصاوےر پڑی ہیں۔لےکن خاص بات یہ ہے کہ ایسا منظر صرف ہندوستان میں ہی نہیں ہے۔ دنیا بھر کی میڈیا میں اگر ان دنوں ہندوستان کا ذکر ہے تو وہ ہے فارمولا ون کی دوڑ کے اس اہتمام کی بدولت۔ دنیا کے عظیم ترین کار ڈرائیوروں میں شمار سات بار کے فارمولا ون (ایف -1) عالمی چمپئن جرمنی کے مائیکل شوماکر کا کہنا ہے کہ ہندوستان صحیح معنوں میں ایف -1 سرکٹ کا حقدار تھا۔ شوماکر نے کہا کہ وہ انڈین گراں پری میں کار چلانے کو لے کر خاصے بے تاب ہیں۔ شوماکر نے اپنے انٹرویو میں کہا ،”میں نے ہمیشہ سے چاہا ہے کہ اس کھیل میں نئے ملک شامل ہوں۔ میرا خیال ہے کہ عالمی چیمپئن شپ پوری دنیا میں وسعت لے۔ اس لحاظ سے ہندوستان صحیح معنوں میں ایف -1 سرکٹ کا حقدار تھا۔“سال 2010 میں تین سال کے معاہدے کے تحت ایف -1 سرکٹ میں واپس آنے والے شوماکر کا ماننا ہے کہ ایف -1 خطاب کے لئے پوری دنیا میں ریس منعقد ہونی چاہیے اور اس لحاظ سے ہندوستان کا اس نقشے میں جڑنا خوشی کی بات ہے۔

नताशा के हाथों में गंभीर के नाम की मेहंदी


 भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार क्रिकेटर गौतम गंभीर दिल्ली की नताशा जैन के साथ शुक्रवार को विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं। उम्‍मीद है, शादी में सचिन और शाहरुख भी शिरकत करेंगे।गुरुवार को नताशा के हाथों में मेहंदी रचाई गई। नताशा के चाचा श्रवण गर्ग के सेक्टर 15 पार्ट टू स्थित घर 697 और 698 नंबर में मेहंदी और गीतों की रस्म की पूरी की गई। गर्ग के घर मेहमानों का आना शाम छह बजे से ही शुरू हो गया था। व्यवस्था की सारी जिम्मेदारी दिल्ली की एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को सौंपी गई थी।पार्टी को पिंक कलर की थीम दी गई थी। पिंक नताशा का फेवरेट कलर है। इसलिए पार्टी में सभी चीजें उसी के हिसाब से अरेंज की गई थी। मेहमानों को ढोल की थाप नर नचाने के लिए दिल्ली के पटेल नगर से ढोल वालों को बुलाया गया था।पार्टी में जो फूल लगाए गए थे उसमें भी पिंक कलर के फूल ज्यादा थे। गंभीर और नतोश जिस स्‍टेज पर बैठे, उसे सजाने में पिंक कलर के फूलों का ही ज्‍यादा इस्‍तेमाल हुआ था। पार्टी में चर चीज को पिंक कलर में दिल की शेप की दी गई थी। इस अवसर पर सिर्फ घर के विशेष मेहमानों ने ही हिस्सा लिया। मेहंदी रस्म के बाद सभी डीजे और ढोल की थाप पर जमकर थिरके और उसके बाद सभी ने कॉकटेल पार्टी में शिरकत की।

Tuesday, October 25, 2011

لازوال جذبہ آزادی


ایک کے بدلے ہزار ! یہ وہ فارمولہ ہے جس نے فلسطینیوں کی زندگی میں قیام اسرا ئےل کے بعد پہلی بار خوشی کا رنگ بھردیا۔ تب ہی تو غزہ پٹی میں جشن کا ماحول ہے۔فلسطینی خوشی سے پھولے نہیں سمارہے ہیں۔ پہلی بار ایک اسرائلی فوجی قیدی کے عوض ایک ہزار فلسطینی قیدی رہا ہوئے ہیں۔ گو ابھی غزہ پٹی میں محض اسرائل477 فلسطینی اسرائےلی جیلوں سے رہا ہوکر پہونچے ہیں لیکن جلد ہی تقریباً 600فلسطینی قیدی اسرائلی قید وبندسے آزاد ہوکر غزہ پٹی پہونچ جائےں گے اور یہ اسلئے ممکن ہواکہ حماس نے سن 2006میں ایک نوجوان اسرائےلی قیدی کو گرفتار کرلیاتھا۔ اسکی رہائی کے لئے اسرائل کو حماس کے آگے گھٹنے ٹیکنے پڑے اور اسکو ایک ایسا قیدی آزاد کروانے کے بدلے ایک ہزار فلسطینی قیدیوں کو رہا کرنا پڑا۔ان فلسطینی قیدیوں میں جو اسرائےل کے قید وبندسے رہاہوکر غزہ پٹی واپس آئے ہیں ایسے افراد ہیں جو برسہابرس سے اسرائےل کی قید میں تھے۔ مثلاً، ان قیدیوں میں ایک 49برس کے یحیٰ منور ہیں جو پچھلے 25برس سے اسرائےل میں قید تھے۔ در اصل یحےیٰ حما س کی قاسم برےگیڈ کے ہاتھوں میں تھے۔ یہ حماس کا وہ دور تھا کہ جب اسکے پاس ڈھنگ سے اسلحے بھی نہ تھے۔ در اصل حماس کو قائم ہوئے محض ایک ماہ گزراتھا ۔ےحےٰی اسوقت چاقو اور اسی قسم کے معمولی ہتھیاروں سے اسرائےلےوں سے لڑنے کی ٹرےننگ لے رہے تھے کہ یکا یک ایک روز اسرائےل فوجی یحیٰ کو اٹھا کر لے گئے اور اسکو عمر قید کی سزاہوگئی۔ آج کوئی 25 برس بعد یحےیٰ جب واپس غزہ پٹی لوٹ کر آئے ہیں تو انکو یقین نہیں آرہا ہے کہ فلسطین اتنا بدل چکا ہوگا۔ اب حماس کے پاس نہ صرف بندوقیں ہیں بلکہ فلسطےن میزائل تک سے لےس ہے۔ آج کا غزہ ایک دوسرا ہی غزہ ہے۔ گو وہ ابھی بھی اسرائل کی غلامی کا شکار ہے لیکن اب غزہ کی دنیا ہی بدل چکی ہے۔ تب ہی تو یحےیٰ 25سال جیل میں رہنے کے بعد بھی بدلے نہیں ہیں۔ آج بھی آزادی کا جوش انکے دل میں ٹھاٹھیں مار رہاہے۔ ”وہ (اسرائےلی) سمجھتے تھے کہ وہ جیل کو ہماری قبرمیں تبدیل کر دیں گے لیکن ہمارے ساتھیوں نے اپنے ارادوں سے انکے ارادے ناکام کر دیئے “، یحےیٰ نے آزاد ہوکر غزہ میں ایک جشن کے دوران فلسطینیوں کو مخاطب کرتے ہوئے فرمایا۔ان چارسوسے زیادہ فلسطینی قید یوں میں سے جو’ ایک کے بدلے ایک ہزار‘ فارمولے کے تحت رہا ہوکر آئے ہیں،یحےیٰ اکیلے ایسے نہیں ہیں کہ جن کے حوصلے آج بھی بلند ہیں۔ اخبارنویسوں نے ان قیدیوں میں سے جن سے بھی بات کی ہر کا حوصلہ بلند تھا۔ مثلاً، وہ نوجوان لڑکی جو تقریباً دس برس اسرئےلی قید میں گزار نے کے بعد اب 26 برس کی ہے وہ بھی نہیں بدلی ہے۔ وفاالبعاث محض 16 برس کی تھی جب وہ اپنی کمر میں بارود کی ا یک بیلٹ باندھ کر اسرائل کی سرحد پار کرنے کی کوشش کر رہی تھی اور وہ اس وقت پکڑی گئی تھی۔آج 10 بر س بعد جب رہا ہو کر وہ غزہ واپس آئی ہے تو آج بھی وہ کہہ رہی ہے: ”میں اپنی آخری سانس تک ان سے (اسرائےلےوں) سے لڑوںگی۔جب تک ہمارے وطن پر انکا قبضہ ہے، تب تک ان سے ہماری لڑائی جاری رہے گی اور میں اس لڑائی میں برابر کی شریک رہوںگی۔جس قوم کی عورتیں دس برس جیل کاٹنے کے بعد بھی آزادی کے لئے پھر لڑنے کو تیارہوں کیا اس قوم کا جذبہ آزادی اسرائےل کچل سکتاہے! ہر گز نہیں۔ اسلئے آج فلسطینیوں نے ایک کے بدلے ہزار قیدی رہا کروائیں ہیں۔ کل کو فارمولہ ایک کے بد لے لاکھ، اور پھر کچھ برسوں میں مکمل فلسطینی آزادی میں بھی بدل سکتاہے جس کا سبب یہ ہے کہ فلسطینیوں کا جذبہ آزادی لازوال ہے، اسکو اسرائےل و امریکہ کیا، دنیا میں کوئی بھی کسی قسم کی قید و مشقت کے ذریعہ مٹا نہیں سکتاہے۔ ایسی قوم ہمیشہ غلام نہیں رہ سکتی ہے۔ اسلئے آج نہیں تو کل فلسطین آزاد ہو کر رہے گا۔

Wednesday, October 19, 2011

चांद पर बसेरे की उम्मीद


चाँद पर घर बसाने का सपना जल्द ही साकार हो सकता है..रूस के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने ये उम्मीद जताई है इन वैज्ञानिकों के अनुसार उपग्रह चित्रों में चांद पर दिखी गुफाओं से ये संभावना बढ़ गई है कि अगले बीस साल में वहां एक नई बस्ती बसाई जा सकती है रूस के 'कॉसमॉनॉट ट्रेनिंग सेंटर' के अध्यक्ष सर्गेई क्रिकाल्योव के अनुसार ये गुफाएं वहां होने वाले विकिरण और उल्का पिंडों की बरसात से रक्षा कर सकती हैं.हालांकि क्रिकाल्योव ये नहीं बता पाए कि इतनी बड़ी योजना के लिए धन कहां से आएगा.शोधकर्ताओं ने पहले ही ये आसार व्यक्त किए थे कि चांद के ज्वालामुखीय इतिहास के कारण वहां उससे निकले द्वव्य किसी ना किसी रूप में जमा होंगे जो अब इन गुफाओं के रूप में सामने आए हैं.सर्गेई क्रिकाल्योव के अनुसार अगर ये साबित हो जाता है कि चंद्रमा पर पाई गई इन गुफाओं की संख्या काफी ज़्यादा है तो निश्चित तौर पर चांद पर बसेरा बसाने की प्रक्रिया काफी दिलचस्प होगी.चांद पर बनी इन गुफाओं की वजह से ना तो वहां की मिट्टी की खुदाई करनी होगी ना ही दीवारों और छतों का निर्माण करना होगा.वहाँ सिर्फ़ एक हल्की पट्टी का निर्माण करना होगा जिसका बाहरी आवरण सख्त़ हो, जो इन गुफाओं को ढंकने के काम आ सके.रूसी कॉसमोनॉट ट्रेनिंग सेंटर के सहायक विज्ञान अध्यक्ष बोरिस क्रुशकोव का अंदाज़ा है कि 2030 तक चांद पर बस्ती बसाई जा सकेगी.दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां ये पता करने में लगी हैं कि पृथ्वी की निचली कक्षा के अलावा और कहाँ परिक्रमा कर सकते हैं.मंगल और अन्य ग्रहों पर जाने की योजना लंबे समय से की जा रही है, ऐसे में चंद्रमा के बारे में मिली ये जानकारी कहीं ना कहीं उसे और ज़्यादा आकर्षक बनाती है.मार्टिन ज़ेल ने समाचार एजेंसी रॉयटर को बताया कि ईएसए यानि यूरोपियन स्पेस एजेंसी के लिए चांद एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु है इसलिए अगर उनके मानव स्पेस फ्लाइट कार्यक्रम का अगला पड़ाव चंद्रमा होता है तो इस पर कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए.

Monday, October 10, 2011

جگجےت سنگھ:جانے وہ کون سا ملک ہے جہاں تم چلے گئے۔۔۔۔


جانے مانے غزل گلوکار جگجیت سنگھ کاانتقال ہو گیا ۔ وہ 70 سال کے تھے۔ جگجیت سنگھ کو برین ہےمرےج کی وجہ سے ممبئی کے لےلاوتی اسپتال میں داخل کرایا گیا تھا جہاں انہوں نے آخری سانس لی۔ہندوستان میں سالوں تک غزل گائیکی کا چہرہ بنے رہے جگجیت سنگھ کے چاہنے والے پوری دنیا میں پھیلے ہوئے تھے۔ جس دن سنگھ کو اسپتال میں بھرتی کرایا گیا اس دن شام کو وہ پاکستان کے نامور غزل گلوکار غلام علی کے ساتھ ایک مشترکہ پروگرام مےں حصہ لےنے والے تھے۔ ہندی ، اردو ، پنجابی ، بھوجپوری سمیت کئی زبانوں میں گانے والے جگجیت سنگھ کو سال 2003 میں حکومت ہندکے اعلی شہری اعزازوں میں سے ایک ’پدم بھوش‘ سے نوازا گیا ۔ جگجیت سنگھ کو عام طور پر ہندوستان میں غزل گائیکی دوبارہ رائج کرنے کا کریڈٹ دیا جاتا ہے۔ جگجیت سنگھ ان چند مخصوص لوگوں میں سے ایک تھے جنہوں نے 1857 میں ہندوستان میں انگریزوں کے خلاف ہوئے غدر کی 150 ویں سالگرہ پر آخری مغل بادشاہ بہادر شاہ ظفر کی غزل پارلیمنٹ میں پیش کی تھی۔ 
موسیقی کی کوئی سرحد نہیں ہوتی اور یہی بات جگجیت سنگھ پر بھی لاگو ہوتی ہے۔ ہندوستان کے علاوہ پاکستان میں بھی ان کے چہےتوں کی کوئی کمی نہیں تھی۔ یہ کیسا اتفاق ہے کہ جس دن جگجیت سنگھ کو اسپتال میں بھرتی کرایا گیا ، اس دن ممبئی میں پاکستان کے غزل گلوکار غلام علی کے ساتھ انہیں ایک کنسرٹ میں حصہ لینا تھا۔جگجیت نے غلام علی سمیت کئی دیگرغزل گلوکاروں کے ساتھ کنسرٹ میں حصہ لیا۔ بھلا کوئی کیسے بھول سکتا ہے جب جگجیت نے غزلوں کے شہنشاہ مہدی حسن کے علاج کے لئے تین لاکھ روپے کی مدد کی۔ ان دنوں مہدی حسن صاحب کو پاکستان کی حکومت تک نے نظر انداز کر رکھا تھا۔ہونٹوں پر سدا رہنے والی ایک مسکان ، درد سے لبریز آنکھیں اور ریشم سی ملائم آواز۔ ایکچہرہ جو یادوں کی فریم میں درج ہو چکاہے۔ 80-90 کی دہائی کی ایک پوری نسل نے ان کی غزلوںکے ساتھ اپنے جذبات کو محسوس کیا ، بات چاہے پہلے پیار کی ہو ، خط کی ہو ، جدائی کی ہو یا بے وفائی کی۔ بیگم اختر ، نور جہاں ،ملےکا پوکھراج ،طلعت محمود، مہندی حسن ، غلام علی کی غزل گائیکی اسٹائل کے دور میں جگجیت سنگھ کی گلوکاری کی طرز نے غزل کو نئے زاوےے دیئے۔ ایک ایسے دور میں جہاںغزل مرکی ، آلاپ ، تانوں کے ذریعہ پیش کی جاتی تھی وہاں جگجیت سنگھ نے غزل کے الفاظ لوگوں تک پہنچائے۔ آوازکی پےچےدگی سے بچتے ہوئے براہ راست دھڑکنوں کا گیت گایا۔ یہی وہ بات تھی جس نے انہیں ہر دل میں بسا دیا۔ کلاسیکل موسیقی سے بھاگنے والے نوجوانوں کے دلوں پر وہ چھا گئے اور ہر طبقے کی پسند بن گئے۔ جگجیت سنگھ نے اپنا پرچم ایسے وقت لہرایا جب 70 کی دہائی میں نور جہاں ، ملےکا پوکھراج ، بیگم اختر ،طلعت محمود ، مہندی حسن غزل کی دنیا میں چھائے ہوئے تھے۔ 8 فروری 1941 میں شری گنگانگر راجستھان میں پیدا ہوئے جگجیت سنگھ نے تقریبا 80 البم بنائے۔ چار بہنوں اور دو بھائیوں کے خاندان میں انہیں جیت بلایا جاتا تھا۔ پیدائش کے بعد ان کے خاندان والوں نے ان کا نام جگموہن رکھا تھا جو بعد میں خاندانی لوگوں کے مشورہ پر تبدیل کر کے جگجیت کر دیا گیا تھا۔
والد سردار امر سنگھ دھمانی حکومت ہند کے ملازم تھے۔ جگجیت کا خاندان بنیادی طور پر پنجاب کے روپڑ ضلع کے دلا ّگاو ¿ں کا رہنے والا ہے۔ ماں بچن کور پنجاب کے ہی سمرلاّ کے اٹالن گاو ¿ں کی رہنے والی تھیں۔جگجیت کا بچپن کا نام جیت تھا۔موسیقی کی تعلیم انہوں نے سےنےا گھرانے کے استاد جمال خان سے لی۔جگجیت سنگھ کی ابتدائی تعلیم گنگانگر کے خالصہ اسکول میں ہوئی اور بعد پڑھنے کے لئے جالندھر آ گئے۔ ڈی اے وی کالج سے گریجویشن کی ڈگری لی اور اس کے بعدکروکشےتر یونیورسٹی سے تاریخ میں پوسٹ گریجویشن بھی کیا۔والد کی خواہش تھی کہ ان کا بیٹاآئی اے ایسبنے لیکن جگجیت پر گلوکار بننے کی دھن سوار تھی۔بچپن میں اپنے جگجیت کو والد سے موسیقی وراثت میں ملا۔ گنگانگر میں ہی پنڈت چھگن لال شرما کی چھاےا میں دو سال تک کلاسیکی موسیقی سیکھنے کی شروعات کی۔ آگے جاکر سےنےا گھرانے کے استاد جمال خان صاحب سے خیال ، ٹھمرو اور دھروپد کی بارےکےاں سےکھےں۔ ان کی آواز دل کی گہرائیوں میں ایسے اترتی رہی گویا نغمے اور سننے والے دونوں کے دل ایک ہو گئے ہوں۔پاکستان کے دارالحکومت اسلام آباد کے ایک مقبول کیفے’چائے کھانا‘ میں جگجیت سنگھ کی غزلےں خوب مقبول ہے۔ برین ہےمرےج ہونے کے بعد کیفے میں آنے والے لوگوں نے جگجےت سنگھ کے جلد ٹھیک ہونے کی دعا کی تھی۔ ان کی بیماری کے بعد سے’چائے کھانا‘ کیفے کی ہر میز پر خصوصی پیپر میٹ رکھے گئے تھے۔ ان میں سنگھ کے لیے دعاکرنے سے متعلق سطریں لکھی تھیں۔ان پر سنگھ کی تصویر کے ساتھ ایک پیغام بھی لکھا تھا۔ اس کے مطابق ، ’تقریبا 80 البموں اور لا تعداد گانوں کے ساتھ ، سنگھ کوہندوستان کے تیسرے سب سے بڑے شہری اعزاز ’پدم بھوشن ‘سے نوازا گیا۔ ان کی حالت بہت نازک ہے۔ چائے کھانا ان کے جلد ٹھیک ہونے کی دعا کرتا ہے۔
‘جگجیت سنگھ سالوں تک اپنے بیوی چترا سنگھ کے ساتھ جوڑی بنا کر گاتے رہے۔ دونوں شوہر بیوی نے مل کر کئی بے مثال غزلےں پیش کی ہیں۔ جگجیت سنگھ نے لتا منگیشکر کے ساتھ ایک خاص البم’ سجدہ‘پیش کیا جو بہت ہی مقبول ہوا۔ اس کے علاوہ فلم ساز، مصنف ،شاعر گلزار کے ساتھ بھی جگجیت سنگھ نے خوب کام کیا۔ جگجیت سنگھ گلزار کی رہنمائی میں بنے ٹی وی سیریل’ مرزا غالب‘ میں مرزا غالب کی مخصوص غزلوں کو اپنی آواز دی۔ اس سیریل میں گائے گئے سنگھ کے نغمے بہت ہی مقبول ہوئے اور کئی دہائیوں بعد بھی ےہ البم شائقین کی پسند بنے رہے۔ گلزار کی طرح مشہور شاعر جاوید اختر کے ساتھ مل کر اپنے چاہنے والوں کو ایکخاص البم ’سوز‘ دیا۔ بعد کے سالوں میں سنگھ نے بھجن گانے ، نغمے شروع کئے جو کہ ان کی غزلوں ہی کی طرح ہاتھوں ہاتھ لئے گئے۔ جگجیت سنگھ کے بارے میں بہت ہی کم لوگوں کو یہ پتہ تھا کہ موسےقی کا یہ شہزادہ گھڑسواری کا بہت ہی شوقےن تھا۔ جگجیت نہ صرف گھوڑے پالتے تھے بلکہ ان کے گھوڑے دوڑوں میں حصہ بھی لیتے تھے۔ جگجیت سنگھ نے گھوڑوں کی دیکھ بھال اور ان کی تربیت کے لئے باقاعدہ کئی لوگوں کی خدمات لے رکھےں تھیں۔
1981 میں رمن کمارکی ہداےت مےں بنی فلم’پرےم گےت‘ اور 1982 میں مہیش بھٹ کی ہدایت مےں بنی فلم’'ارتھ‘ کو بھلا کون بھول سکتا ہے۔’ارتھ‘ میں جگجیت جی نے ہی موسیقی دی تھی۔ فلم کا ہر گانا لوگوں کی زبان پر چڑھ گیا تھا۔جگجیت سنگھ نے فلم دشمن میں دل کو چھو لینے والا بے حد جذباتی کر دینے والا گانا گایا تھا۔ اس نغمے کی دھن تھے ”خط نہ کوئی پیغام۔۔۔ جانے وہ کون سا ملک ہے جہاں تم چلے گئے.... آج جگجیت جی بھی ہم سب کو ہمیشہ کے لئے چھوڑ کر اسی جگہ چلے گئے ہیں جہاں سے وہ اب کبھی واپس نہیں آئیں گے۔ یاد آئیں گے وہ اور ان کی آواز میں گائے ہوئے سدا بہار نغمے۔ کروڑوں سننے والوں کے چلتے سنگھ صاحب کچھ ہی دہائیوں میں جگ کو جیتنے والے جگجیت بن گئے۔















Saturday, October 8, 2011

’رتھ ‘کے دلدادہ اور’وزارت عظمی کی چاہت رکھنے والے‘ اڈوانی کی قسمت


کہتے ہےں وقت اور حالات کب کس کروٹ لے اس کا اندازہ ےا قےاس آرائی کرنا کسی کے بس کی بات نہےں اور اگر بات ہندوستانی سےاست کی ہو اور اس مےں بھی بھگوا پارٹی بی جے پی کی تو ےہ تو اور مشکل ہے۔آج کی بی جے پی جو کل تک ”جن سنگھ“کہلاتی تھی اس کی تو پہچان ہی ےہ ہے کہ وہ اور اس کی پالےسی ’گرگٹ‘کی طرح رنگ بدلتی ہے۔سیاست بھی بہت بے رحم شئے ہے۔ یہاں جو دکھتا ہے ، وہ ہوتا نہیں ہے اور جو ہوتا ہے ، وہ نظر نہیں آتاہے۔ یہاں باہر والوں سے لڑنا آسان ہوتا ہے جبکہ اندر والوں سے پار پانا مشکل۔ عرش اور فرش میں صرف ایک بالشت کا فرق ہوتا ہے۔ اپنے” رتھ ےاتری“ بزرگ اڈوانی جی بھی سیاست کی کچھ ان کہاوتوںسے آج کل دو چار ہو رہے ہیں۔ جس تنظیم اور پارٹی کو اڈوانی جی نے اپنی جوانی سے لے کر پوری زندگی دے دی آج اسی تنظیم میں اپنا وجود ثابت کرنے کے لئے اڈوانی جی کو 84 سال کی بزرگی میں رتھ یاترا پر نکلنا پڑ رہا ہے۔کسی بھی آدمی کی زندگی کی آخری خواہش ہوتی ہے کہ وہ بڑھاپے میں آرام سے بیٹھ کر زندگی کا لطف لے اور جن بچوں کو اس نے پالا پوسا ہے وہ بچے بڑھاپے میں اس کی خدمت کریں۔ لیکن اڈوانی جی اس معاملے میں تھوڑے بد قسمت نکلے۔ جن بچوں کو انہوں نے پال پوس کرر سیاست میں جوان کیا اب وہی بچے ان کے بڑھاپے میں انہیں ہی سیاست سے بے دخل کرنے کے لئے اتاولے ہورہے ہیں ورنہ جس دن اڈوانی جی کی پارلےمنٹ میں سخت بے عزتی ہوئی اور انہیں لوک سبھا میں بولنے نہیں دیا گیا اسی دن بی جے پی چاہتی تو اپنے لیڈر کی بے عزتی کی مخالفت میں پارلےمنٹ ٹھپ کر سکتی تھی ،پارلےمنٹ میں ہنگامہ مچا سکتی تھی ، جس میں اسے مہارت بھی حاصل ہے لیکن حیرت ہے کہ اڈوانی جی کی ان کی زندگی کے آخری دنوں میں توہین ہوتی رہی اور بی جے پی خاموش رہی! اپنی بے عزتی سے دل برداشتہ اڈوانی جی کو آخر’ رتھ یاترا ‘کرنے کا اعلان کرنا پڑاجس کا باضابطہ اعلان بھی ان کے چےلے چپاٹےوں نے ہی کےا ہے۔کل اےک پرےس کانفرنس مےں ارون جیٹلی نے دعوی کیا کہ 11 اکتوبر سے پارٹی کے بڑے لیڈر ایل کے اڈوانی کی قیادت میں 38 دن کی جو قومی ملک گیر ”جن چیتنا یاترا“ شروع ہورہی ہے، وہ ملک کے سیاسی ایجنڈے کا فیصلہ کرے گی۔مسٹر جیٹلی نے کہا کہ ترقی پسند اتحاد حکومت کے دور میں سرمنظر آنے والے مختلف گھوٹالوں نے سیاسی ایجنڈہ کو اچھی حکمرانی اور صاف ستھری سیاست کے امور میں یکجا کرکے سیاسی ایجنڈہ تیار کردیا ہے۔ ”جن چیتنا یاترا“ سروودیہ لیڈرجے پرکاش نارائن کی جائے پیدائش یعنی بہارکےچھپرہ ضلع کے ستاب دےارہ سے شروع ہوگی اور 20 نومبر کو دہلی میں ایک عظیم الشان ریلی کی صورت میں اختتام پذیر ہوگی۔بہار کے وزیر اعلی نتیش کمار 11 اکتوبر کو بی جے پی کے صدر نتن گڈکری اور دیگر سینئر لیڈروں کی موجودگی میں ستاب دیارا سے اس”جن چیتنا یاترا “کو ہری جھنڈی دکھائیں گے۔ بقول پارٹی لےڈران اس ’یاترا‘ کے دوران بدعنوانی ، اچھی حکمرانی اور صاف ستھری سیاست کے امور پر ساری توجہ مرکوز کی جائے گی۔کارکنوں سے اپیل کی گئی ہے کہ وہ عوام کو کانگریس کی قیادت والی ترقی پسند اتحاد حکومت کے بدعنوانی کے کیسوں اور گھوٹالوں سے واقف کرائیں۔اس کے علاوہ نوٹ کے عوض ووٹ گھوٹالہ کے لئے اور سنٹرل بیورو آف انوسٹی گیشن کے سیاسی غلط استعمال کے لئے مرکزی حکومت کو مورد الزام قرار دیاگےا ہے۔اپنے بزرگ لےڈر اور ”رتھ کی سواری کرنے اوروزےر اعظم بننے کا خواب پالے“اپنی زندگی کے آخری لمحات گزار رہے لال کرشن اڈوانی کی” جن چےتنا ےاترا“ کو لے کر بی جے پی کی پریشانیاں (جسے اگر ےہ کہا جائے کہ ےہ اےک چال ہے )ختم ہونے کا نام نہیں لے رہی ہےں۔ پارٹی کے سامنے اب نےا مسئلہ ےاترا کے اختتام پر دہلی میں ہونے والی ریلی ہے۔ اس فورم پر بی جے پی کے تمام سینئر مرکزی رہنما تو رہیں گے ، لیکن وزیر اعلی کو بلانے پر اتفاق نہیں بن پا رہا ہے۔ اس کے پیچھے ایک بڑی وجہ گجرات کے وزیر اعلی نریندر مودی کو مانا جا رہا ہے۔ کہا جا رہا ہے کہ اگر مودی کسی وجہ سے اس میں نہیں آ سکے ، تو ایک اور بکھےڑا کھڑا ہو سکتا ہے۔ےعنی کہ ےہاں بھیاڈوانیکے چےلا اور کبھی اپنے محبوب رہنما اڈوانی کو دےکھنے کےلئے گھنٹوں انتظار کرنے والے مودی کو فوقےت دی جا رہی ہے جس سے اس بات کو سمجھنے مےں دےر نہےں ہونی چاہئے کہ اڈوانی پارٹی کے لئے کون سی حےثےت رکھیے ہےں۔ےہاں بھی معمر لےڈر لال کرشن اڈوانی کو ان کے چےلے کے ذرےعہ ”سےاسی گرو“کو اوقات دکھانے مےں کوئی کور کسر نہےں چھوڑی گئی ہے ۔ےعنی کہ گجرات کے وزیر اعلی نریندر مودی کی ہری جھنڈی ملنے کے بعد ہی اس بارے میں پارٹی کوئی فیصلہ کرے گی۔ پارٹی کے ایک سینئر رہنما کے مطابق اگر تمام وزرائے اعلی کا آنا یقینی نہیں ہو پاتا ہے تو پارٹی اس ریلی میں این ڈی اے کے اپنے اتحادی جماعتوں کو بلانے پر غور کر سکتی ہے۔ اےسا اسلئے کےا جا رہا ہے تاکہ اس سے پارٹی کا اندرونی بحران تو دبا ہی رہے ساتھ ہی پارلیمنٹ سیشن سے پہلے این ڈی اے متحدہے ،اس کا پیغام بھی جائے ۔قابل ذکر ہے کہ بدعنوانی کے خلاف اڈوانی کی ملک گیر” جن چےتنا ےاترا“ کو لے کر پارٹی سے لے کر آر ایس ایس تک تنازعہ کھڑے ہوتے رہے ہےں۔ وزیراعظم کے عہدے کی دعوےداری کا مسئلہ کسی طرح سے سلجھاہی تھا کہ ےاترا کے گجرات کے بجائے بہار کے ستاب دےارا سے شروع ہونے و نتیش کمار کے اسے ہری جھنڈی دکھانے کی تجویز سے پارٹی(ےہاں ےہ کہنا بے جا نہےں ہوگا کہ اس سے لال کرشن اڈوانی کی مشکلات مےں اضافہ ہوگےا ہے کےونکہ وزےر اعظم بننے کے لئے محض بہار کے ممبران پارلےمنٹ کی ہی ضرورت نہےں ہوتی ہے بلکہ اس کے لئے تو ملک گےر سطح سے نمائندگی درکار ہوتی ہے) کی دقتیں بڑھ گئی۔ دوسری جانب بی جے پی جو ظاہری طورپر تو اڈوانی کو وزےر اعظم بنانا چاہتی ہے لےکن اندرونی طور پر مودی کےلئے پلےٹ فارم تےار کر رہی ہے جس کا اندازہ اس بات سے لگاےا جا سکتا ہے کہ مختلف مواقع پر اس کے لےڈران مختلف بےانات دےتے رہتے ہےں۔حالانکہ بی جے پی نے اپنے لیڈروں کے الگ الگ سر میں بات کرنے کی وجہ سے پارٹی کو ہونے والی شرمندگی سے بچنے کے لئے پارٹی کے تمام لوگوں کو آگاہ کیا ہے کہ وہ سینئر لیڈر لال کرشن اڈوانی کی ”جن چےتنا ےاترا“ کے دوران عام رخ سے ہٹ کر ’نجی رائے‘ظاہر نہ کریں۔ راجیہ سبھا میں حزب اختلاف کے رہنما ارون جیٹلی نے کہا ہے کہ اڈوانی کی 11 اکتوبر سے شروع ہو رہی ’جن چےتنا ےاترا‘ کے دوران پارٹی لیڈران اور کارکنوں کا ڈسپلن مےںرہنا بہت ضروری ہے۔ےہ اےسا بےان ہے جس کے پس پردہ اس بات کا اشارہ ہے کہ اڈوانی کی ”جن چےتنا ےاترا“صرف ےاترا ہی رہے ۔اڈوانی جی کی قسمت کتنی خراب ہے اس بات کا احساس خود اڈوانی کو دلانے کے لئے بی جے پی نے اےک سروے بھی کرا ڈالا ہے۔ےہ بات دےگر ہے کہ اس تعلق سے بی جے پی ظاہری طور پر ناخوش ہے۔نریندر مودی کو بی جے پی کی جانب سے وزیر اعظم کے عہدے کا بہترین امیدوار بتاتا ایک سروے سامنے آنے کے بعد پارٹی کے ایک دھڑے نے اسے سازش قرار دیا ، جبکہ دیگر طبقوں نے اس پر رضامندی ظاہر کی۔قابل ذکر ہے کہ ایک سروے میں 68 فیصد لوگوں نے مودی کی وزارت عظمی کی امیدواری کو اپنی حمایت دی ہے۔
لیکن اڈوانی جی کو ریٹائرمنٹ دلانے پر آمادہ ان کے شاگردوں کو اتنے بھر سے اطمینان نہیں ہوا اور شاگردوں کو لگا کہ ان کا گرو تو بڑا استاد ہے اور ابھی سے 2014 کے لئے تےاری کر رہا ہے سو شاگردوں نے گرو کو ”گرو دکشنا“دینے کے مقام پر داو ¿ دینا شروع کر دیا اور نریندر مودی جو کبھی اڈوانی جی کی ایک جھلک پانے کے لئے دھوپ بارش اور سردی میں گھنٹوں کھڑے ہوئے انتظار کرتے رہتے تھے انہوں نے ’اپواس‘ کااعلان کر دیا اور جو تھوڑا سا ماحول اڈوانی جی نے بنایا تھا اس پر پانی پھیر دیا۔ اب یہ اڈوانی جی کی مجبوری نہیں تو اور کیا ہے کہ جن مودی کے لئے کبھی اٹل جی نے کہا تھا کہ انہوں نے (مودی نے) ’راجدھرم‘ پر عمل نہیں کیا انہیں مودی کی تعرےف کرتے ہوئے اڈوانی جی کو کہنا پڑا کہ مودی نے بہترانتظامیہ دیا ہے! لگتا ہے اڈوانی جی اندرونی لڑائی میں نریندر مودی کے سامنے کمزور پڑنے لگے ہیں۔ ویسے بھی ہندو سخت گیروں کے لیے مودی کی درجہ بندی اڈوانی سے اوپر چل رہی ہے۔ ایسے میں اگر مودی کے دل میں لڈو پھوٹنے لگے ہیں تو اڈوانی کا نام خود بخود ویٹنگ لسٹ میں اور پیچھے چلا گیا ہے۔ ویسے بھی اس بار توسنگھ نے بھی اڈوانی جی کا نام ویٹنگ لسٹ سے کاٹا ہوا ہے اور بی جے پی صدر نتن گڈکری تو صاف کہہ چکے ہیں کہ اڈوانی جی اب بی جے پی کے پی ایم ان ویٹنگ نہیں ہیں۔ اب تو 2014 کے لئے سنگھ ”راہل بمقابلہ مودی“ چلّانے لگے ہیں۔ ایسے میں اڈوانی جی کی دھڑکنیں بڑھنا لازمی ہیں۔ویسے اس سارے دور میں اڈوانی جی کے ساتھ حساس لوگوں کی ہمدردی ہونی چاہئے۔ اندرونی طور پر بی جے پی میں آج سب سے
 زیادہ کوشاں شخصیت اڈوانی ہی ہیں۔ لوگوں کو یاد ہوگا کہ جب 1984 کے لوک سبھا انتخابات میں بی جے پی دو کے اعداد و شمار پر سمٹ گئی تھی تب آر ایس ایس کے چہیتے اور وفادارسنگھ کارکن لال کرشن اڈوانی کو بی جے پی کی کمان بہت ہی مایوسی اور غم کے ماحول میں سونپی گئی تھی۔ یہ وہ دور تھا جب اپنے قیام (تکنیکی طور پر ، حالانکہ بی جے پی کا پرانا روپ جن سنگھ ہے) کے ابتدائی دور میں ہی اس کا ریاضی گڑبڑانے لگا تھا۔ اٹل بہاری واجپئی یقینی طور سے اس وقت بھی بی جے پی کے بڑے لیڈر اور اسٹار پرچارک تھے ، لیکن جب کمان اڈوانی جی کے ہاتھ آئی تو انہوں نے کٹر ہندوتو کی راہ پکڑا اور’رام مندر- بابری مسجد‘ تنازعہ کو ہوا دی۔ مختصر اتنا ہی کہ بی جے پی کو دو کے اسکور سے اقتدار تک پہنچانے میں جس ایک شخص کا سب سے زیادہ تعاون ہے وہ شخص لال کرشن اڈوانی ہی ہیں۔لیکن قسمت کا کھیل دیکھئے کہ جب اڈوانی جی کی محنت کا پھل ملنے کا موقع آیا تو انہیں پیچھے دھکیل دیا گیا اور لڈو کھائے اٹل جی نے۔ بار بار اڈوانی جی کا یہی درد ان کی حرکتوں میں جھلک پڑتی ہے۔ اتنا ہی نہیں اب تو ان کے چیلے انہیں بڑھاپے میں بڑے بزرگ کا احترام بھی دینے کو تیار نہیں ہیں اور اڈوانی جی اگر وزیر اعظم نہ بن پائے تو کوئی بات نہیں کم سے کم انہیں دین دیال اپادھیائے یا نانا جی دیش مکھ کی طرح تصویر ٹاگنے کے قابل” مہاپروش“ بھی بنے دےنا ان کے چےلے پسند نہےں کر رہے ہےں۔

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...