पिछले सौ सालों में दिल्ली की शहरी योजना का सफ़र जानने के लिए आपको ज़्यादा समय नहीं चाहिए. बस शहर की किसी भी सड़क को पकड़ लीजिए.अगर दिल्ली शहर का भ्रमण किया जाए, तो इस शहर के भीतर ही बहुत से छोटे-छोटे शहर दिखाई दे जाएंगे, जो कि एक-दूसरे से बिल्कुल अलग लगते हैं.सड़क की एक ओर झुग्गी-झोंपड़ियों में ज़िंदगी पनपती हुई दिखती है, तो दूसरी ओर चहल-पहल से भरा शीशे का डब्बानुमा शॉपिंग मॉल.एक ओर दिखाई देगा किसी मंत्री का विशालकाय बंगला, और उससे जुड़ी गली का रास्ता नापें, तो धोबी घाट दिखाई दे जाएगा.रेलवे स्टेशन का रुख़ करिए तो वहाँ रुकने वाली रेलगाड़ियों से उतरने वालों की तादाद ट्रेन में चढ़ने वाले लोगों से कहीं ज़्यादा दिखेगी.और इस बात में कोई हैरानी भी नहीं है. आख़िरकार तेज़ी से समृद्ध होते इस शहर में हर साल क़रीब पाँच लाख लोग एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने आते हैं.देखा जाए तो ये ही विभिन्नताएं दिल्ली को एक परिभाषा देती हैं. लेकिन जब बात आती है सभी के लिए बराबर जन-सुविधाओं की, तो दिल्ली शहर एक अविकसित बस्ती की तरह लगता है, जहाँ उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं जो इस शहर की जीवन-रेखा कहलाते हैं.ऐसा क्यों है कि तेज़ी से पड़ोसी राज्यों में पांव पसारता ये शहर कहीं-कहीं घुटन का आभास देता है?क्यों यहां की योजना की परिभाषा सभी वर्गों के लिए अलग-अलग सी नज़र आती है?
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