यह शायद ही कभी सोती है और जब सोती भी है तो इसकी आँखों में होते हैं करोड़ों सपने। इसका इतिहास हजारों साल पुराना है और यह हर क्षण लिखती है नया इतिहास..यह है दिल्ली..एक शहर, एक राज्य और एक राष्ट्रीय राजधानी..यह है वह 'कैपिटल सिटी' जिसे कोलकाता से स्थानांतरित किया गया था..आज से 100 साल पहले मीर निहाल ने 7 दिसंबर 1911 को अलसुबह चांदनी चौक का रुख किया। काफी लंबे इंतजार के बाद, तोपों की सलामी के साथ लाल किले से पाँच मील लंबा शाही जुलूस नमूदार हुआ। दूर से वह फिरंगी राजा को पहचान भी नहीं पा रहा था [दरअसल जार्ज पंचम ने हाथी पर बैठने से इन्कार कर दिया था]। यह दृश्य देखते हुए निहाल की आँखों के आगे दिल्ली का पुराना वैभव घूम गया। घर लौटते हुए उसे रास्ते में एक लंगड़ा भिखारी मिला, लोग कहते थे कि वह आखिरी शहंशाह बहादुर शाह जफर का सबसे छोटा बेटा था!..अहमद अली की मशहूर किताब ट्वायलाइट इन दिल्ली के यह शब्दचित्र भुलाए नहीं जा सकते। इस जुलूस के पाँच दिन बाद 12 दिसंबर को जार्ज पंचम का कोरोनेशन पार्क में भारत के नए सम्राट के रूप में राज्याभिषेक हुआ और समारोह के समापन के तुरंत बाद ही जार्ज ने इस घोषणा से सबको चौंका दिया, ''हमने निर्णय किया है कि भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की जाए।''1911 में दिल्ली एक ढहता हुआ पुराना शहर था। चारदीवारी से घिरे शहर के बाहर केवल गांव और कुतुब-निजामुद्दीन की दरगाह के पास कुछ बस्तियां थीं। 1930 में भी यहां सफदरजंग के मकबरे [लुटियन की दिल्ली की दक्षिणी सीमा] से लेकर कुतुब तक फसलें लहराया करती थीं। एडवर्ड लुटियन और हरबर्ट बेकर की देखरेख में 1911 से 1931 के मध्य नई राजधानी ने आकार लिया। लुटियन द्वारा डिजाइन किए गए वायसराय निवास [जो बाद में भारत का राष्ट्रपति भवन घोषित हुआ] के लिए रायसीना गांव की जमीन पसंद की गई। साउथ और नार्थ ब्लॉक का जिम्मा बेकर के पास था। इन आर्किटेक्ट्स ने वायसराय निवास से पुराना किला तक गुजरती एक सीधी सड़क बनाई। वार मेमोरियल [इंडिया गेट] से गुजरने वाली इस सड़क को अंग्रेजों ने किंग्सवे कहा और आजादी के बाद भारतीयों ने इसका नया नामकरण किया 'राजपथ'। ब्रिटिश काल में इस सड़क के दोनों तरफ तत्कालीन राजघरानों [मुख्यत: हैदराबाद, जयपुर, बीकानेर] के प्रतिनिधि महल बने और दक्षिण में 'बैंग्लो जोन' विकसित हुई।भारत की आजादी की घोषणा के बाद 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में अविस्मरणीय उत्सव हुए। अब यह आजाद भारत की राजधानी थी और यहीं प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लालकिले पर तिरंगा झंडा फहराया। आजादी अपने संग विभाजन की त्रासदी भी लाई। 3 लाख से अधिक मुस्लिम दिल्ली छोड़ गए जबकि 5 लाख हिंदू-सिख शरणार्थियों ने यहां पनाह ली। इसी दिल्ली में 30 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी को गोली मार दी गई। शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण महज एक दशक में दिल्ली की आबादी में 90 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। किंग्सवे कैंप के तंबुओं में टिके शरणार्थियों के लिए लाजपत नगर, मालवीय नगर, पटेल नगर जैसी रिहायशी बस्तियां और सरोजिनी नगर-कमला नगर जैसे बाजार बसाए गए। चारदीवारी में मुगलिया नजाकत का चिराग बुझ चुका था और पंजाबी मिजाज वाली एक बिंदास नई दिल्ली उभर रही थी।आजादी के बाद दिल्ली का पहला आधिकारिक विस्तार कूटनीतिक क्षेत्र चाणक्यपुरी के रूप में हुआ। इसके बाद एक तरफ तो डीडीए विभिन्न इलाकों में फ्लैट बना रहा था, दूसरी तरफ डीएलएफ जैसे प्राइवेट डेवलपर्स हौज खास जैसे इलाकों को विकसित कर रहे थे।राजनीतिक राजधानी तो दिल्ली अर्से से थी, वक्त के साथ इसका आर्थिक शक्ति और शिक्षा-संस्कृति के केंद्र के रूप में भी उदय हुआ। शरणार्थियों ने व्यवसायों में नई जान फूंकी। वक्त के साथ यह विशाल हुए और रैनबैक्सी जैसी सफलता की महान गाथाएं लिखी गईं। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और आईआईटी ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी साख बनाई। 1982 के एशियाई खेलों ने शहर के बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव किया और दिल्ली वालों ने पहला फ्लाईओवर देखा। इसके लगभग पौने तीन दशक बाद कॉमनवेल्थ गेम्स और मेट्रो कनेक्टिविटी की बदौलत दिल्ली वर्ल्ड क्लास हो गई।यही नहीं, हर संस्कृति और हर क्षेत्र के लोगों की उपस्थिति ने दिल्ली को भारत की राजधानी से कहीं बढ़कर 'छोटा भारत' बना दिया है। दरअसल आर्थिक उदारीकरण के बाद की दिल्ली इतनी पॉश हो चुकी है कि यूपी, बिहार ही नहीं..सुदूर दक्षिण और उत्तर-पूर्व तक की प्रतिभाएं इसके मोहपाश में खिंच आती हैं।हो भी क्यों न, दिल्ली में असर है, दिल्ली में अवसर है
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