दबंग, सिंघम और अब फोर्स.... लगता है जैसे दक्षिण के रास्ते बॉलीवुड में एक्शन सिनेमा की वापसी हो चुकी है। एक ईमानदार पुलिस अफसर...एक दमदार विलेन....कानूनी हदों में उसे सबक सिखाने का जूनून...एक खूबसूरत सी लड़की, फर्ज औऱ प्यार की जंग। अंत में सब खुशनुमा। अस्सी के दशक में अमिताभ की ऐसी ही फिल्मों का क्रेज लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। दंबग औऱ सिंघम ने साबित किया है कि रियलिस्टिक फिल्मों से ऊबे लोग एक्शन का अतिरेक जबर्दस्त तरीके से पसंद कर रहे हैं। सलमान और अजय के बाद जॉन अब्राहम उसी तरह के सुपर कॉप के रोल में आ रहे हैं जिसे वे सर्वश्रेष्ठ तरीके से निभा सकते हैं। बस एक माइनस पाइंट है जॉन के पास सलमान जैसा फैन मेल नहीं है, तो एक्टिंग में अजय देवगन जैसी गहराई का भी अभाव है। लेकिन जॉन ने इस फिल्म में अपना सबकुछ झोंका है। जेनेलिया के साथ उनकी कैमिस्ट्री भी जोरदार लगी है। निर्देशक निशिकांत कामत की ‘फोर्स’ साउथ की सुपरहिट तमिल फिल्म ‘काखा काखा’ का हिंदी रीमेक है। कामत की सफलता है कि उन्होंने साधारण कहानी होने के बावजूद भी दर्शकों को कहीं बोर नहीं होने दिया है। 'फोर्स' कहानी है सीनियर नारकोटिक्स ऑफिसर यशवर्धन (जॉन अब्राहम) की। वह नशे के बेहद खिलाफ है और डिपार्टमेंट का सबसे सख्त ऑफिसर माना जाता है। उसका मानना है कि दुनिया से अपराध तभी मिट सकता है जब हर अपराधी को मार गिराया जाए। इसके लिए वह किसी भी रिश्ते में नहीं बंधना चाहता है लेकिन अपने खतरनाक मिशन के दौरान ही उसकी मुलाकात बबली गर्ल माया (जेनेलिया) से होती है और फिर उसकी दुनिया ही बदल जाती है। देश भर में फैले ड्रग कार्टेल का खात्मा करने के एक स्पेशल ऑपरेशन में यश की भिड़त एक खूंखार अपराधी से होती है। यह अपराधी नारकोटिक्स टीम से अपना बदला लेना चाहता है क्योंकि उनकी वजह से उसका भाई मारा जाता है। और अंततः हर फिल्म की तरह इसमें भी विलेन हीरो के हाथों अपनी जान गंवाता है और दर्शक ताली बजाते हुए सिनेमाहॉल से बाहर निकल जाते हैं।जॉन अब्राहम हमेशा की तरह एक जैसा चेहरा लिए हुए ही इस फिल्म में नजर आएं हैं। हालांकि जॉन ने इस कैरेक्टर के लिए जरूरी बॉडी बनाने में आठ महीने तक मेहनत की है। जॉन का एक नारकॉटिक्स ऑफिसर के तौर पर परफॉर्मेंस काबिलेतारीफ है। जेनेलिया डिसूजा ने अपनी बबली छवि को इस फिल्म में बरकरार रखा है। मोहनीश बहल बेहद प्रभावी हैं जबकि राज बब्बर बुरी तरह निराश करते हैं। संध्या मृदुल ने अपना बेस्ट दिया है। कमलेश सावंत अपनी एक्टिंग से प्रभाव छोड़ने में कामयाब हुए हैं। सबसे जबर्दस्त काम विद्युत जामवाल का है जिन्होंने एक बार फिर से फिल्मों में खलनायकों की मजबूत वापसी करवाई है। कई दृश्यों में जॉन पर भारी पड़े हैं। निशिकांत ने दो से तीन घटनाक्रमों को एक साथ चलाया है, जिससे कई बार देख चुके दृश्यों में भी ताजगी नजर आती है। निशिकांत की फिल्म माध्यम पर अच्छी पकड़ है इसके बावजूद भी इन्होंने यह स्क्रिप्ट चुनी, यदि वे और उम्दा स्क्रिप्ट चुनते तो फिल्म में और निखार आ सकता था। डायलॉग्स फिल्म के मूड और स्क्रिनप्ले को पूरी तरह जस्टीफाई करते हैं। सुनने में तो यह बहुत साधारण लेकिन काफी इम्पैक्टफुल हैं। सिनेमैटोग्राफी साधारण है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर सीन में एक्शन और सस्पेंस को और भी ज्यादा उभारने में सहायक हैं। गाना 'दिल की है तमन्ना' रोमांटिक अहसास कराता है।यह फिल्म उनके लिए है जो एक्शन के शौकीन हैं, जॉन के दीवाने हैं, जेनेलिया की मासूमियत को शिद्दत से पसंद करते हैं और एक सुपरकॉप को पूरी गैंग से भिड़ते देखना चाहते हैं।

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