हॉन्गकॉन्ग के उच्च न्यायालय ने फिलीपींस की एक घरेलू नौकरानी को शहर में स्थाई निवास देने के मामले में एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है.इवैंगलिन बानाओ वैलेजोस नाम की ये महिला 1986 से हॉन्गकॉन्ग में रह रही है.ग़ैर चीनी मूल के दूसरे लोग जहां हॉन्गकॉन्ग में सात साल काम करने के बाद स्थाई निवास के लिए आवेदन कर सकते हैं वहीं घरेलू नौकरानियों को क़ानूनन, स्थाई निवास के लिए आवेदन करने की छूट नहीं है.इस फ़ैसले के तहत हॉन्गकॉन्ग में स्थाई निवास और विदेशी नौकरानियों के अधिकारों से जुड़े क़ानूनों को नए सिरे से पारिभाषित किया गया है.यही वजह है कि माना जा रहा है कि इस फ़ैसले के असर के तौर पर लगभग एक लाख विदेशी नौकरानियों को हॉन्गकॉन्ग में स्थाई तौर पर रहने का अधिकार मिल जाएगा.इस मामले ने विदेशी घरेलू नौकरानियों को स्वदेशी नौकरानियों के समान अधिकार दिए जाने के मसले पर बहस छेड़ दी थी.इवैंगलिन वैलेजोस के वकील के मार्क डैली ने कोर्ट के फ़ैसले के बाद कहा कि इवैंगलिन को इस फ़ैसले से बेहद राहत मिली है. मुमकिन है कि इसके बाद कई घरेलू नौकरानियां हॉन्गकॉन्ग में स्थाई तौर पर रहने के लिए आवेदन करें.सरकार के पास इस मामले में दोबारा अपील करने के लिए 28 दिन हैं.हालांकि इस फ़ैसले के आलोचकों का मानना है कि घरेलू नौकरानियों को स्थाई तौर पर रहने का अधिकार, हॉन्गकॉन्ग में स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और सरकारी आवास का संकट पैदा कर देगा.हॉन्गकॉन्ग में तीन लाख से ज़्यादा घरेलू नौकर-नौकरानियां काम कर रहे हैं. इनमें से ज़्यादातर इंडोनेशिया और फिलीपींस के रहने वाले हैं. माना जाता है इनमें से कम से कम 1,20,000 लोग हॉन्गकॉन्ग में सात साल से ज़्यादा समय से रह रहे हैं.इन लोगों को अपने मालिकों के साथ रहना होता है और ये कोई दूसरी नौकरी नहीं कर सकते.
Friday, September 30, 2011
संजीव भट्ट पुलिस हिरासत में
धमकाने और झूठे हलफनामे पर हस्ताक्षर करवाने का आरोप लगाती एक कांस्टेबल की प्राथमिकी के आधार पर पुलिस ने शुक्रवार को गुजरात के निलंबित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को हिरासत में ले लिया।प्राथमिकी में भट्ट के खिलाफ आरोप लगाया गया है कि उन्होंने कांस्टेबल को धमकाते हुए 27 फरवरी 2002 को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुलायी गयी उच्च स्तरीय बैठक के बारे में गलत हलफनामे पर हस्ताक्षर करने को कहा।गुजरात के पुलिस महानिदेशक चितरंजन सिंह ने बताया कि घाटलोदिया पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी के संबंध में भट्ट को पूछताछ के लिये बुलाया गया था। उनका बयान दर्ज किया जायेगा। उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है।भट्ट ने आरोप लगाया है कि गोधराकांड के बाद गुजरात में हुए दंगों में मोदी की कथित तौर पर सहअपराधिता थी। पुलिस के अनुसार, भट्ट को अतिरिक्त पुलिस आयुक्त एन सी पटेल घाटलोदिया पुलिस थाने ले गये हैं।वर्ष 2002 के दंगों के दौरान भट्ट के अधीन काम कर चुके कांस्टेबल क़े डी़ पंत ने प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि भट्ट ने एक सरकारी कर्मचारी यानी उन्हें धमकाया, सबूतों को गढ़ा और गलत तरीके से उन पर दबाव बनाया।पंत ने अपनी प्राथमिकी में आरोप लगाया कि उन्हें भट्ट ने 16 जून को फोन किया और उनसे किसी काम के सिलसिले में घर पर आने को कहा। जब पंत भट्ट के आवास पर पहुंचे तो आईपीएस अधिकारी ने उन्हें बताया कि मुकदमे में मदद करने के लिये उच्चतम न्यायालय की ओर से नियुक्त वकील 18 जून को आयेंगे और उन्हें बयान दर्ज कराने के सिलसिले में उनसे मुलाकात करनी होगी।पंत का आरोप है कि भट्ट ने उनसे कहा कि वकील को बताया जाये कि विशेष जांच दल (एसआईटी) ने उनका बयान जबरदस्ती दर्ज किया था। जब पंत ने इस बात का विरोध किया तो भट्ट ने कथित तौर पर उन्हें धमकी दी। भट्ट ने पंत से कहा कि अगर वह उनके कहे अनुसार काम करते हैं तो इसमें कोई चिंता की बात नहीं है।पुलिस कांस्टेबल का दावा है कि भट्ट उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोधवाडिया के पास ले गये। कांग्रेस नेता ने भी पंत को आश्वासन दिया कि इसमें चिंता करने की बात नहीं है और उन्हें वही करना चाहिये जो भट्ट कह रहे हैं। मोधवाडिया से मिलने के बाद भट्ट पंत को गुजरात उच्च न्यायालय के निकट एक वकील और नोटरी के दफ्तर ले गये और उनसे दो हलफनामों पर हस्ताक्षर करवाये।भट्ट ने उच्चतम न्यायालय में दायर हलफनामे में आरोप लगाया है कि गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में मोदी की सहअपराधिता थी। उन्होंने कहा कि पंत मोदी की बैठक के बारे में जानते थे, लिहाजा उन्हें धमकाया गया और विशेष जांच दल द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
एक साल बाद भी नहीं बढ़ा अयोध्या मामला
अयोध्या के राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद धार्मिक स्थल के मालिकाना विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले को एक साल बीत गए हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुनवाई के लिए ज़रूरी क़ानूनी औपचारिकताएं अभी नहीं हो पाई हैं.अनुमान है कि अब अगले साल ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो पाएगी. जहां मुस्लिम पक्ष इस विवाद को केवल अदालत के दायरे में रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद ने हाईकोर्ट फैसले की वर्षगाँठ पर 30 सितम्बर को देश भर में धार्मिक अनुष्ठान और हुनमान चालीसा का पाठ कर जन भावनाओं को गरम रखने का काम किया है. विश्व हिंदू परिषद शनिवार से अयोध्या में पत्थर तराशने का कम फिर शुरू करने जा रही है.विवाद के तीसरे पक्ष निर्मोही अखाड़ा ने विश्व हिंदू परिषद के इस प्रयास को भाजपा को मदद पहुंचाने वाला एक राजनीतिक क़दम करार दिया है.हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित लगभग डेढ़ हजार वर्ग मीटर ज़मीन का तीन हिस्सों में बँटवारा किया था.हाईकोर्ट ने मस्जिद के मुख्य गुम्बद के नीचे की ज़मीन को रामजन्म भूमि मानते हुए उसे भगवान राम की संपत्ति माना. भगवान राम के मित्र के तौर पर यह मुकदमा विश्व हिंदू परिषद के नेता जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल ने दायर किया था.अदालत ने मस्जिद के बाहरी अहाते में स्थित राम चबूतरे, सीता रसोई और चरण पादुका के स्थान को सनातन हिंदुओं की संस्था निर्मोही अखाड़ा को दिया. इसके बाद मुस्लिम समुदाय को एक तिहाई हिस्सा लंबे अरसे से संयुक्त रूप से क़ाबिज़ होने के नाते दिया.हाईकोर्ट के इस फैसले को बीच का रास्ता मानते हुए देश भर के लोगों ने आम तौर पर स्वागत किया, लेकिन मुक़दमे के सभी पक्षकारों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.मुक़दमे के मुख्य पैरोकारों में से एक मोहम्मद हाशिम अंसारी ने हनुमान गढी के महंत ज्ञान दास के साथ मिलकर कहा था कि वह अदालत से बाहर समझौते से इस विवाद को सुलझा लेंगे, लेकिन उनकी इस कोशिश को मीडिया के अलावा और किसी ने गंभीरता से नही लिया. बाद में हाशिम अंसारी ने स्वयं भी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है.इस विवाद में कुल चार दीवानी मामले हैं. पहला गोपाल सिंह विशारद का जिनकी मृत्यु हो चुकी है. अब उनके बेटे राजेन्द्र सिंह वादी हैं. दूसरा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का, तीसरा निर्मोही अखाड़े का और चौथा राम लला विराजमान का. जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल की मृत्यु के बाद विश्व हिंदू परिषद के त्रिलोकी नाथ पाण्डेय राम लला के मित्र के तौर पर पैरोकार हैं.इन चार मुकदमों में वादी प्रतिवादी मिलाकर अनेक पक्षकार हैं. इनमें हिंदुओं की ओर जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है उनमे हिंदू महासभा, श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति और रामजन्म भूमि सेवा समिति प्रमुख हैं. मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अलावा जमीयते उलेमा ए हिंद, हाशिम अंसारी, मोहम्मद फारुख़, मोहम्मद महफ़ूज़ुर रहमान और मिस्बा उद्दीन प्रमुख हैं.हाईकोर्ट के तीनों जजों का फ़ैसला लगभग दस हज़ार पेज का था. वादियों को प्रमाणित प्रतिलिपि मिलने में ही कई महीने लग गए, इसलिए जुलाई तक अपीलें दाख़िल हुईं.सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन के तीन हिस्से में बंटवारे का फ़ैसला स्थगित कर दिया है. इसलिए फाइनल डिक्री बनाने की कार्रवाई भी स्थगित हो गई.सुप्रीम कोर्ट ने लगभग सभी अपीलों पर पक्षकारों को नोटिसें जारी कर दी हैं. लेकिन कई पक्षकारों की या तो मृत्यु हो चुकी है या पते बदल गए हैं. नियमानुसार सुनवाई से पहले सभी पक्षकारों को नोटिस जारी होना जरूरी है.वकीलों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने से पहले हाईकोर्ट से मुक़दमे का सारा रिकार्ड पहुँचना ज़रुरी है. यह लगभग पचास हज़ार पेज होगा. इनमें से जो रिकॉर्ड हिंदी में हैं उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद भी होना है.सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि मुक़दमे की सुनावाई अगले साल ही शुरू हो पाएगी, "मेरे ख़्याल से इस साल नवंबर- दिसंबर तक तो ये सब तैयारियाँ होंगी.. रिकॉर्ड का अनुवाद वगैरह होगा. टेक्नीकल जो चीजें हैं वह होंगी. ग़ालिबन जनवरी 2012 से ही असल मुक़दमे की सुनवाई हो पाएगी."जिलानी का अनुमान है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने में एक साल का समय लग जाएगा.जिलानी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपील में मुस्लिम समुदाय की ओर से मुख्य बिंदु यह उठाया गया है कि हाईकोर्ट ने सबूतों के बजाय आस्था की बुनियाद पर विवादित स्थल को रामजन्म भूमि माना है. जिलानी कहते हैं, "हमारा केस सबूतों से पूरी तरह साबित था. कोर्ट ने आस्था की बुनियाद पर उसको ग़ैर साबित कर दिया और जो चीज़ साबित नहीं थी, भगवान राम का जन्म स्थान, जबकि ख़ुद जजों ने कहा था कि यह सबूतों से साबित नही हो सकती थी, उसको उन्होंने आस्था की बुनियाद पर मान लिया."मुस्लिम समुदाय ने अपील में यह मुद्दा भी उठाया है कि पुरातत्त्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष नहीं निकाला गया था कि वहाँ पहले कोई मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.मुस्लिम पक्ष ख़ामोशी से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की तैयारी कर रहा है. जिलानी का कहना है कि मुस्लिम समुदाय इस मसले पर कोई सार्वजनिक आंदोलन या प्रदर्शन नहीं करना चाहता.लेकिन विश्व हिंदू परिषद ने 'राम मंदिर के निर्माण में न्यायिक बाधाएँ दूर करने के लिए' शुक्रवार को देश भर में धार्मिक अनुष्ठान और हनुमान चालीसा का पाठ किया.अयोध्या में इस कार्यक्रम में राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास और विश्व हिंदू परिषद नेता चम्पत राय उपस्थित थे. इस अवसर पर हुई सभा में वक्ताओं ने यह माँग भी दोहराई कि संसद में क़ानून बनाकर विवादित भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी जाए.विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा ने अयोध्या से फ़ोन पर बातचीत में कहा कि, "उच्च न्यायालय ने जो फ़ैसला दिया उसमें ज़मीन का बँटवारा कर दिया, जबकि मुक़दमा लड़ने वाले लोगों ने यह माँग नहीं की थी कि बँटवारा किया जाए. वहाँ तो यह मामला था कि संपत्ति किसकी है- हिंदू की या मुसलमान की. ऐसे में जो बँटवारा हुआ उसे लोग दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं. इसलिए न्यायिक बाधाएँ दूर करने के लिए हिंदू समाज विभिन्न कार्यक्रमों और अनुष्ठानों का आयोजन करता रहा है."शर्मा का कहना है, "एक साल पूरा होने पर हनुमान चालीसा का पाठ इसीलिए किया गया ताकि बाधाएं दूर हों और मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो."विश्व हिंदू परिषद शनिवार पहली अक्टूबर से अयोध्या में राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का कम फिर शुरू करवा रही है.
جب خون سے بھیگی غریب کی روٹی
اس لڑکے کی آنکھیں سرخ ہیں ، بال پریشان اور چہرے پر دہشت کے سائے ہیں۔ ایک دن پہلے وہ دوسری بستی سے آیا ہے اور چڑھی چڑھی آنکھوں سے ادھر ادھر دیکھتا ہے۔ پھر کہتا ہے ،’میں نے اپنی آنکھوں سے اسے مرتا دیکھا ہے ، اپنی آنکھوں سے‘ ۔اس کی آوازکانپتی ہے۔ چند لمحوں کے لیے وہ خاموش ہو جاتا ہے۔ پھر کہتا ہے ،’'اس کا کوئی قصور نہیں تھا۔ وہ سائیکل پر جا رہا تھا۔ چند لڑکوں نے اسے بیچ سڑک پر روکا اور اس کا شناختتی کارڈ طلب کر لیا۔ وہ ہاتھ جوڑ کر کھڑا ہو گیا۔ اس کی آنکھوں میں آنسو آ گئے۔ کہنے لگا غریب آدمی ہوں۔ روزی روٹی کمانے آیا تھا ، اب واپس جا رہا ہوں۔ ان لوگوں نے شناختی کارڈ پیچھے کیا اور جب وہ اپنا کارڈ جیب میں رکھ رہا تھا تو ان میں سے دو نے پستول نکال لی۔ ایک نے اس کی ٹھوڑی کے نیچے نالی رکھ کر لبلبی دبا دی '’ وہ جھرجھری لیتا ہے اور پھر آگے کہتا ہے ،’دوسرے نے اس کے پیٹ میں گولی مار دی۔ وہ گرا ،اس کی سائیکل گری۔ کیریئر پر ایک تھےلا تھا ، وہ بھی گرا اور سڑک پر سارا آٹا بکھر گیا۔ وہ پھیلے ہوئے آٹے پر گرکر تڑپنے لگا۔ پھر مر گیا۔ جی ہاں ، مر گیا۔‘'اس کی آوازہسٹری ےارڈ ہو جاتی ہے۔ وہ اپنے دونوں ہاتھ دیکھنے لگتا ہے ، جیسے اپنے ہاتھوں پر خون کے دھبے ڈھونڈ رہا ہو۔ اس کا سر جھکا ہوا ہے۔ پھر وہ بڑبڑاتا ،’میں ان لوگوں کے ساتھ تھا۔ مگر آپ یقین کریں۔ میں قاتل نہیں ہوں۔ میں نے تو کبھی بقرعےد پر بکرے کی گردن پر بھی چھری نہیں چلائی۔‘پھر زور زور سے رونے لگتا ہے۔ لڑکے کی ماں بے قرار ہو کر اس کے الجھے بالوں میں انگلیاں پھیرنے لگتی ہے ،' جب سے آیا ہے یہی حال ہے۔ روٹی دیکھتے ہی اس پر ٹوٹ پڑتا ہے۔ کہتا ہے اس پر خون لگا ہے آپ ہی اسے سمجھائےے۔’لیکن سننے والے کس کوسمجھائیں ، کسے سلامتی دیں؟ ان کی آنکھوں میں وہی بچے گھوم رہے ہیں ، جو باپ اور باپ کی سائیکل کے کیریئر پر رکھے آٹے کی راہ دیکھتے ہوں گے ، ان کی روٹی خون میں بھیگ گئی ہے۔ یہ کسی افسانے کا ذکر نہیں ہے۔ کسی کہانی کا حصہ نہیں ہے۔ یہ واقعہ جیتا جاگتا واقعہ ہے ، جس کا ایک کردار مٹی میں مل گیا ہے اور جس کا دوسرا کردار زندہ ہے اور زندہ رہنے والے لوگوں میں اس لڑکے کے علاوہ کسی کے ضمےر پر کوئی بوجھ نہیں ہے ۔ یہ واقعہ اور اس جیسے دوسرے واقعات جو ہمارے یہاں ہو رہے ہیں ، ان کی بنیاد کیا ہے؟ جو لوگ ختم ہو گئے اور جنہوں نے بےگناہوں کو ختم کیا ، ان کے درمیان جھگڑے کی وجہ کیا تھی۔ وہ سب انسان تھے۔ سندھ میں آباد تھے۔ پاکستان کے شہری تھے۔ ایک مذہب کو ماننے والے اور ایک علاقے کے رہنے والے تھے۔ ان کے لباس بھی ایک تھے اور ان کے جینے مرنے کے طریقے بھی ایک سے تھے۔ یہی نہیں ان کے تو سکھ دکھ بھی ایک سے تھے۔ مرنے والے غریب تھے اور مارنے والے بھی سیٹھ ساہوکاروں کے بیٹے نہ تھے۔ تو پھر کیا چیز تھی جو انہیں ایک دوسرے سے الگ کرتی تھی؟ بہت سوچ وچار کے بعد یہ بات سامنے آئی۔ ان کے درمیان فرق صرف زبان کا تھا۔ یہ نہیں کہ ان کی زبان کی بناوٹ ، اس کے رےشے میں گردش کرتا ہوا خون اور اس کو حرکت دینے والے حصوں میں کہیں کوئی فرق نہیں تھا۔ نہیں مارنے والوں اور مرنے والوں کی زبان کی بناوٹ بھی ایک سی تھی۔ ان میں دوڑنے والا خون بھی ایک سا تھا۔ فرق تھا تو صرف ایک بات کا ، کہ ان میں سے ایک کی زبان جب حرکت کرتی تھی تو اس میں سے نکلنے والی آوازیں ایک الگ بولی سے تعلق رکھتی تھیں۔ میں اس فرق کے بارے میں سوچتی رہی اور میرے سامنے بہت سی روہےں ولاپ کرتی رہیں۔ موت نے ان کی بولیوں کا فرق مٹا دیا تھا۔ یہ روہےں بے بسی کی زبان میں رو رہی تھیں۔ یہ ان کی روہےں تھیں جو نسل اور بولی کے جھگڑوں میں مارے گئے۔ ان کا سوال درست تھا کہ میرے جیتے جاگتے بدن کا قصور کیا تھا؟ میں نے کیا خطا کی تھی؟ یہ کسی مزدور ، کسی کلرک ، کسی دوکاندار کی روہےں تھیں۔ ایک نے کہا کہ میں ٹی بی سے مر رہا تھا ، مجھےاےسے مارنے کی کیا ضرورت تھی۔ دوسرے کا کہنا تھا ، میرا بچہ پولےوزدہ ہے ، اس کی دوا کون لائے گا۔ تیسرا اپنے کھیتوں کو رو رہا تھا ، جن میں حل چلانے والا کوئی نہیں تھا۔ ان کا کہنا تھا ہماری محنت کے ایندھن سے ہمارے گھروں کا چولہا جلتا تھا اور ہماری ہی کمائی سے ہمارے بچوں کا پیٹ بھرتا تھا۔ ہمارے مارنے والوں کو ایک پل کو بھی یاد نہیں آیا کہ ہم بھی ان جیسے ہیں۔ انہی کی طرح غریب ، پریشان حال۔ ہم جو مر گئے اور جنہوں نے ہمیں مارا ، سب ایک ہی قبیلے سے تعلق رکھتے تھے۔ دونوں کا قبیلہ بھوک کا قبیلہ تھا۔ ان کی اور ہماری زبان غربت کی زبان تھی۔ اس سے بھلا کیا فرق پڑتا ہے کہ انہوں نے ہم سے ہمارا نام پوچھا تو ہم نے اس زبان میں جواب دیا جو وہ نہیں بولتے تھے۔ میں سر جھکائے بیٹھی رہی ، کیونکہ میرے پاس ان کے ان سوالوں کے جواب نہیں تھے اور کھوکھلی دلیلوں اور جھوٹی تسلےوں سے انہیں بہلانے کا حوصلہ مجھ میں نہیں تھا ، کیونکہ وہ جیتے جاگتے انسانوں کے کسی کام کی نہیں ، پھر بھلا روہوں کے کس کام کی؟
Thursday, September 29, 2011
کے اےل سہگل کی دےوانی لتا۔۔۔
عظیم فن کار کندن لال سہگل کی مقبولیت ہر کوئی خاص وعام میں تھی، لیکن منگیشکر خاندان میں ان کا مقام علیٰحدہ تھا۔ اس گھر میں صرف اور صرف سہگل کے نغمے گانے کی اجازت تھی اور بلبلِ ہند لتا منگیشکر نے اپنی جوانی میں کے ایل سہگل سے شادی کا خواب دیکھا تھا۔ لتا منگیشر نے یہ انکشاف اپنی کتاب میں کیا۔ ”لتا منگیشکر ان ہر اون وائس“ نامی باپنی کتاب کہتی ہیں:”بچپن ہی سے میں سہگل صاحب سے ملنا چاہتی تھی۔ میں جب لڑکپن میں تھی تو میں کہا کرتی تھی کہ میں بڑی ہوکر سہگل سے شادی کروں گی۔ میرے والد مذاق میں کہتے، لیکن اس وقت تک وہ (سہگل) بوڑھے ہوجائیں گے۔ اس پر میں جواب دیتی کہ کوئی بات نہیں، پھر بھی میں ان ہی سے شادی کروں گی۔“اس کتاب میں لندن میں مقیم دستاویزی فلم ساز نسرین نے لتا منگیشکر کی زندگی کے ایسے کئی پہلوو ¿ں کو اجاگر کیا ہے جو ابھی تک عوام سے مخفی تھے۔ کتاب کے مطابق کے ایل سہگل سے لتا منگیشکر کی عقیدت اس قدر تھی کہ وہ ان سے شادی کا خواب دیکھ رہی تھیں، لیکن دلچسپ بات یہ ہے کہ لتا کی کبھی بھی سہگل سے ملاقات نہیں ہو سکی۔لتا جنہوں نے چھ دہائیوں تک بالی ووڈ پر راج کیا ہے، کتاب میں آگے چل کر کہتی ہیں کہ مجھے اس بات کا دکھ ہے کہ میں کبھی بھی سہگل صاحب سے ملاقات نہ کر سکی۔ ان کے بھائی مہندر سہگل کی شکر گذار ہوں جنہوں نے سہگل صاحب کی اہلیہ اوشا رانی جی اور ان کے بچوں سے ملاقات کرائی۔ سہگل صاحب کے فرزند نے اپنے والد کی ایک انگوٹھی بطور یادگار مجھے پیش کی۔“لتا منگیشکر کے مطابق ان کے گھر میں فلمی موسیقی کو زیادہ پسند نہیں کیا جاتا تھا:”بابا ہمیشہ سہگل صاحب کو پسند کرتے تھے اور میں نے بھی یہی کیا۔ میں گھرمیں اکثر ان کا گانا ’اک بنگلہ بنے نیارا‘ گاتی تھی، جو فلم ’پریزیڈنٹ‘ کا ہے۔ مجھے گھر میں سہگل صاحب کے علاوہ کسی اور کے نغمے گانے کی اجازت نہیں تھی اور میں دوسروں کے نغموں پر توجہ بھی نہیں دیتی تھی۔“لتا منگیشکر کا کہنا ہے کہ میرے خاندان میں کلاسیکی موسیقی پسند کی جاتی تھی اور میرے والد خاصے قدامت پسند تھے۔ وہ ہمارے لباس کے بارے میں بھی کافی سخت تھے۔ ہم نے کبھی بھی چہرے پر پاو ¿ڈر نہیں لگایا اور نہ میک اپ کیا۔ بابا رات دیر گئے گھر سے باہر رہنے کو پسند نہیں کرتے تھے، بھلے ہی ہم ان کے تیار کردہ ڈرامے دیکھنے کے لیے ہی کیوں نہ جائیں۔“لتا منگیشکر کے والد فلموں کو پسند نہیں کرتے تھے اورانھیں فلمیں دیکھنے کی اجازت نہیں تھی۔ صرف مراٹھی فلم ساز بھالجی پنڈھارکر اور کلکتہ نیو تھیٹرز کی فلمیں دیکھنے کی اجازت تھی۔ ویسے تو 1949ءتک لتا کئی فلموں میں گیت گا چکی تھی، لیکن اس سال محل میں ان کے گانے ”آئے گا آنے والا“ نے ہندوستانی فلمی سنگیت کا رخ ہمیشہ کے لیے بدل کر رکھ دیا۔ لتا کو فلمی دنیا سے متعلق ہر اعزاز مل چکا ہے۔ 2001ءمیں حکومتِ ہند نے لتا کو ملک کے اعلیٰ ترین شہری اعزاز’ بھارت رتن‘ سے نوازا۔ تاہم اس قدر شہرت اور مقبولیت کے باوجود لتا منگیشکر شہرت اور گلیمر سے دور رہنا پسند کرتی ہیں۔اپنے متعلق لتا نے اےک اور دلچسپ اور ےادگار بات بھی اس کتاب مےں بتائی ہے وہ ےہ کہیہ بات شاید کم لوگوں کو معلوم ہوگی کہ مشہور پلے بیک سنگر لتا منگیشکر کو اردو میں مہارت پیدا کرنے کی جانب سب سے پہلے اداکار دلیپ کمار نے رغبت دلائی تھی۔ اس طرح وہ لتا کی رہنمائی کرنے والے واحد سرپرست رہے ہیں۔ دلیپ کمار نے ایک مرتبہ کہا تھا کہ لتا کو اردو الفاظ کا صحیح تلفظ اداکرنا چاہیئے، چنانچہ اس روز کے بعد سے لتا اردو زبان میں مہارت حاصل کرنے پر توجہ دینے لگیں۔ لتا منگیشکر نے اس واقعے کی یاد تازہ کرتے ہوئے بتایا:’ایک دن انل بسواس، یوسف بھائی (دلیپ کمار) اور میں ایک ٹرین میں سفر کررہے تھے۔ یہ بات 1947 یا 48 کی ہے۔ ان دنوں یوسف بھائی ٹرین کے ذریعہ سفر کیا کرتے تھے کیوں کہ انہیں کوئی پہچانتا نہیں تھا۔ ہم ایک کمپارٹمنٹ میں بیٹھے ہوئے تھے اور یوسف بھائی نے میرے بارے میں دریافت کیا کہ یہ کون ہے؟ انیل دا نے بتایا کہ یہ ایک نئی گلوکارہ ہیں اور اچھا گاتی ہیں۔ جب انیل دا نے بتایا کہ میرا تعلق مہاراشٹر سے ہے، تب یوسف بھائی نے کہا لیکن ان کا اردو کا تلفظ درست نہیں ہے اور ان کے گانے میں آپ ”دال بھات“ کی خوشبو سونگھ سکتے ہیں (ایسا مراٹھی لہجہ جو اردو الفاظ کے تلفظ کے وقت پیدا ہوتا ہو)۔‘لتا نے مزید بتایاکہ ’مجھے ان کے اس طرح کہنے سے واقعی کمتری کا احساس ہوا۔ میں کمپوزر محمد شفیع کو جانتی تھی جو انیل دا اور نوشاد صاحب کے اسسٹنٹ رہ چکے ہیں۔ میں نے ان سے کہا کہ میں اردو سیکھنا چاہتی ہوں تاکہ اس کے الفاظ کی درست طور پر ادائی کر سکوں۔ انہوں نے اردو سیکھنے کے لیے ایک مولانا کو بھیجا جن کا نام محبوب تھا۔ انہوں نے کچھ عرصہ تک مجھے اردو پڑھائی۔‘یہ واقعہ لتا کی اپنے فن سے لگن کا منھ بولتا ثبوت ہے۔ اور یہی وجہ ہے کہ اگرچہ لتا اردو زبان پر مہارت نہیں رکھتیں، لیکن گانوں میں ان کا شین قاف اچھے اچھے اردو دانوں سے بہتر ہے۔
Wednesday, September 28, 2011
HASSAN FARRUKH KI GHAZAL
غزل
حوصلہ اب کس میں ہے باقی نئی تدبیر کا
کھیل بچوں کا نہیں' ہے سامنا تقدیر کا
ہوگیا مفہوم کیوں سیدھی لکیروں کانہاں
رنگ کیوں دھندلا گیا یکلخت ہر تصویر کا
اور بھی بڑھنے لگا اس وقت لہجے کا جلال
تنگ جب ہونے لگا حلقہ مری زنجیر کا
گو دکھاوا ہی سہی پاس مروت کچھ تو ہو
کون سا انداز ہے ظالم تری تحریر کا
یا بتا کیا ہے خطاا یا پھرہدف تبدیل کر
بے سبب بنتا رہوں کب تک نشانہ تیر کا
اپنے پہلو میں حسن دیکھا تھاتجھ کو خواب میں
منتظر اس وقت سے ہوںخواب کی تعبیر کا
حسن فرخ
...जब महात्मा ने पत्नी को उठाकर फेंकने की चेतावनी दी
आधुनिक भारत के नायकों पर लिखी जीवनियों के एक नए संग्रह के जरिये उनका मानव अवतार एक बार फिर जीवंत हो उठा। ये जीवनियां प्रसिद्ध लेखक एवं पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने लिखी हैं जो महात्मा गांधी के पौत्र हैं।जीवनियों के संग्रह 'ऑफ ए सर्टेन एज' में अपने योगदान से देश की किस्मत चमकाने वाली शख्सियतों जैसे महात्मा गांधी, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, ज्योति बसु, कमलादेवी चट्टोपाध्याय एवं दलाई लामा के जीवन-वृत्तांत संकलित हैं।यह संग्रह इन शख्सियतों की कमजोरियों, आशंकाओं, ताकतों और अल्पज्ञात उन विशिष्टताओं एवं गुणों की पड़ताल करता है, जिनकी बदौलत उन्हें ख्याति मिली।लेखक ने संग्रह की शुरुआत अपने दादा महात्मा गांधी पर लिखे लेख से की है जिसमें उन्होंने गांधीजी के घर के माहौल और व्यावहारिकता का वर्णन किया है। साथ ही उन्होंने मोहनदास और उनकी पत्नी कस्तूरबा के बीच घरेलू नोकझोंक का जिक्र भी किया है।गोपालकृष्ण गांधी ने कुछ उद्धरण महात्मा गांधी द्वारा लिखित आत्मकथा से लिए हैं। ये उद्धरण इस प्रकार हैं: "जब मैं डरबन में ठहरा हुआ था, मेरे दफ्तर का किरानी भी मेरे साथ रह रहा था..हमारे किरानियों में से एक ईसाई था जो 'पंचमा' (अछूत) माता-पिता से जन्मा था। घर पश्चिमी शैली में बना था और कमरों में गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं थी। हर कमरे में एक कटोरानुमा बर्तन रखा था।"महात्मा गांधी ने लिखा है कि नौकर या सफाईकर्मी के बजाय कमरों की सफाई मेरी पत्नी और मैं किया करते थे। सभी किरानी अपने बर्तन खुद साफ करते थे लेकिन ईसाई किरानी चूंकि नया-नया आया था, इसलिए महात्मा गांधी ने कहा कि उसका कमरा साफ करने का दायित्व हमारा है।एक दिन कस्तूरबा और मोहनदास में 'अछूत' का बर्तन साफ करने को लेकर कहा-सुनी हो गई। तब गांधी कस्तूरबा को खींचकर दरवाजे तक ले गए और उन्हें उठाकर बाहर फेंक देने की धमकी दी।कस्तूरबा ने चीखते हुए कहा कि मुझ में आप जैसी भावना नहीं है..। बाद में गांधी ने प्यार से कहा कि अगर मेरी पत्नी मुझे नहीं छोड़ सकती है तो मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूं।

سچن کا نےا بنگلہ
ممبئی میں اب جب بھی عالےشان آشےانوں کی بات ہوگی تو مکیش اور انیل امبانی کے ساتھ سچن تندولکر کے آشےانے کا بھی نام آئے گا۔ہندوستانی کرکٹ ٹیم کے تجربہ کار بلے باز سچن تندولکر ’شاردےہ نوراتر ‘کے پہلے دن بدھ کو باندرہ (مغرب) میں واقع اپنے نئے ’خوابوں کے گھر‘ میں داخل ہو گئے۔ سچن کا پورا خاندان پانچ منزلہ بنگلہ 19- اے ، پیری کراس روڈ میں مذہبی رسم ورواج کے ساتھ داخل ہوا۔ اس موقع پر تندولکر دھاری دار ٹی شرٹ اور ٹراو ¿زرس پہنے ہوئے تھے۔ نئے گھر میں داخل ہونے کی خوشی تندولکر کے چہرے پر صاف طور پر دیکھی جا سکتی تھی۔ سچن نے کہا ، واقعی میں آج نڈھال اور خوش ہوں۔ خاص طور پر ماں اور خاندان کے ارکان کے لئے’خوابوں کے گھر‘ میں داخل ہوتے ہی سچن کے خاندانی ارکان ، ماں ، بیوی اور بچوں نے خوشی سے ارد گردےکھنا شروع کر دیا۔ سچن تندولکر کا کرکٹ کیریئر جتنا بےجوڑ ہے اتنا ہی بےجوڑ ان کا یہ بنگلہ بھی ہے۔ ان کاےہ بنگلہ بہت ہی خوبصورت انٹےرےئر اوراےکسٹےرےئرسے ملا کر تیار کیا گیا ہے۔ دیکھنے میں یہ کسی راج محل سے کم نہیں ہے۔ 8900 مربع فٹ کے علاقے میں بنے اس بنگلے میں 5 منزلےں ہیں۔ ان میں دو منزلےں انڈر گراو ¿نڈ ہیں جبکہ تین زمین کے اوپر۔ گراو ¿نڈ فلور پرگنےش جی کا مندر ہے۔ دوسری منزل پر کنٹرول روم بنایا گیا ہے جہاں سے پورے بنگلے پر نظر رکھی جائے گی۔ اسے بنانے میں سچن کو کل 100 کروڑ کا خرچ بیٹھا ہے۔ دیکھنے میں تو یہ بنگلہ تین منزلہ لگتا ہے ، لیکن اصل میں یہ 5 منزلہ ہے۔سچن نے اپنے نئے بنگلے کو بچوں سے لے کر گھر پر آنے والے گیسٹ اور یہاں تک کہ اپنے شوق کو بھی ذہن میں رکھ کر تیار کرایا ہے۔ اصل میں سچن کو فلموں کا کافی شوق ہے ، اس لیے ان کے نئے بنگلے میں ایک چھوٹا سا تھیٹر ہے۔ جب سچن گھر پر ہوتے ہیں تب گھر پر مہمانوں کا تانتا لگا رہتا ہے۔ اسی بات کو ذہن میں رکھتے ہوئے سچن نے اپنے بنگلے میں 40-50 کاروں کے پارکنگ کاانتظام کےا ہے تاکہ مہمانوں کو اپنی کار پارک کرنے میں دقت نہ ہو۔ اس سے پہلے سچن نے 2008 میں دوراب ولا نام کا بنگلہ قریب 35 کروڑ روپے میں خریدا تھا ، جسے تڑواکر یہ نیاآشےانہ تیار کیا گیا ہے۔باندرہ میں ہی بالی ووڈ کی کئی بڑی ہستیوں کے بھی گھر ہیں۔ اس علاقے میں شاہ رخ خان ، سلمان خان ، عامر خان اور سنجے دت جیسے تمام ستارے رہتے ہیں۔جب ماسٹر بلاسٹر سچن تندولکر نے آج اپنے نئے گھر میں قدم رکھاتو ان کی ایک جھلک پانے اور تصاویر کیمرے میں قید کرنے کے لئے گھر کے باہر کافی بھیڑ جمع ہو گئی۔ دیکھتے ہی دیکھتے یہ بھیڑ بے قابو ہو گئی اور وہاں بھگدڑ مچ گئی۔ سچن نے کہا ، ’ہر کسی کا خواب ہوتا ہے کہ اس کا اپنا گھر ہو۔ میرا بھی یہی خواب تھا۔ مجھے اس بات سے خوشی ہے کہ میرا یہ خواب پورا ہو گیا۔ اس سے پہلے میں جہاں رہتا تھا وہ فلیٹ مجھے اسپورٹس کوٹہ کے تحت ملا تھا۔ اب میں نے اس گھر کو خالی کر دیا ہے۔ حالانکہ کچھ دیگر کھلاڑی اب بھی وہاں رہتے ہیں‘۔
بہار کی سےست پر اےک نظر
چلو گاو ں کی طرف
بہار کی سیاست فی الحال یاترا کے رنگ میں ہے۔ لیڈروں کی ٹولی گاو ¿ں کو مخاطب ہو رہی ہے۔ بی جے پی کے سینئر رہنما لال کرشن اڈوانی اور وزیر اعلی نتیش کمار یاترا پر نکل رہے ہیں۔ دونوں یاتراﺅں کا حوالہ کم و بیش ایک ہے - بدعنوانی کا خاتمہ۔ ایسے میں بھلا اپوزیشن راشٹریہ جنتا دل کیسے چپ رہتا! وہ پول کھول یاترا کی تیاری میں ہے۔ اڈوانی کی یاترا کے روانگی نقطہ - ستابدیارا (لوک جے پرکاش نارائن کی مقام پیدائش) کے کئی مطلب ہیں۔ اس میں جے ڈی یو کی بھی پوری شرکت ہو ، دونوں پارٹیوں میں اس پر غور اور اس کی جوڑ توڑ کی سیاست ہے۔ نتیش کمار کا سفر کا نام خدمت سفر ہے۔ یہ نومبر کے پہلے ہفتہ سے شروع ہونی ہے۔ ریاست میں 15 اگست سے خدمت کا حق قانون نافذ ہوا ہے۔ نتیش اس کے بارے میں عوام کا فیڈ بیک لیں گے اور لوگوں کو اس کے وسیع استعمال کے لئے حوصلہ افزائی کریں گے۔
شوٹ نہیں ، شوٹنگ
کسی مسئلے پر بورائی نہتھی عوام پر اپنا غصہ اتارنے کو بدنام بہار پولیس نے اب ویڈیوگرافی کو اپنا ہتھیار بنایا ہے۔ اب وہ لوگوں پر سیدھے گولی نہیں چلاےگی یعنی لوگوں کو شوٹ نہیں کرے گی ، بلکہ ہنگامہ مچا رہے لوگوں کی شوٹنگ کرے گی۔ اےویڈےنس کو لے کر قانون میں ترمیم ہوا ہے۔ اےویڈےنس کے طور پر سی ڈی کو تسلیم ہے۔ پولیس اس کا بھرپور استعمال کرے گی۔ سی ڈی کا استعمال ثبوت کے طور پر ہوگا۔ اس بنیاد پر متعلقہ افراد پر سپیڈی ٹرائل چلے گا ، انہیں سزا دلائی جائے گی۔ اسے کہتے ہیں آئیڈیا سانپ بھی مرے اور لاٹھی بھی نہ ٹوٹے۔
زلزلہ کی بھیانک نصیحت
زلزلہ کے حالیہ جھٹکے نے خاص طور پر بہار کے لیے کئی سوال چھوڑے ہیں۔ دارالحکومت پٹنہ میں تو لوگوں نے خود کے بچکر بھاگنے کا راستہ بھی نہیں چھوڑا ہوا ہے۔ شہر بے ترتیب بسا ہے ، پھیل رہا ہے۔ اب حکومت جاگی ہے۔ قائدہ سے کالونی شکل دینے کے ساتھ ساتھ زلزلہ مخالف رہائش کے لئے بھی قانون بن رہا ہے۔ دیکھنے والی بات ہوگی کہ اس میں کس قدر بد عنوانی کی گنجائش تلاشی جاتی ہے؟ یہاں نوٹ کے بل بوتے نقشہ پاس ہوتے رہے ہیں۔
سون اور گنگا کا تنازعہ
پٹنہ ہائی کورٹ نے سون ندی آبی تنازعہ کو سلجھانے کے لئے ٹریبونل تشکیل کرنے کو کہا ہے۔ اس تنازعہ سے بہار ، جھارکھنڈ ، چھتیس گڑھ ، اتر پردیش اور مرکزی حکومت جڑی ہے۔ دراصل ، بہار کو اس کے حصہ کا پانی نہیں مل رہا ہے۔ اتر پردیش میں بہار کے حصہ کا پانی پاور پلانٹ میں لگتا ہے۔ اس سے سون ندی علاقہ کے کسان تباہی کی نوبت جھےلتے ہیں۔ گنگاآبی تقسیم کا تنازعہ بھی نئے تناظر میں ابھرا ہوا ہے۔ وجے کمار چودھری (آبی وسائل کے وزیر) اور جگدانند (سابق آبی وسائل کے وزیر) بھڑے ہیں۔ مسئلہ بھارت - بنگلہ دیش کے درمیان کا سمجھوتہ ہے۔ اس کے لئے ذمہ دار لوگوں اور ان کے پالے (پارٹی) کی شناخت کر چھیچھالےدر کی نوبت ہے۔ اس میں یہ سوال کھلے میں آیا ہے کہ یہ معاہدہ 1996 میں ہوا تھا یا 1975 میں؟
حکومت کو جھٹکا
سپریم کورٹ نے پٹنہ ہائی کورٹ کی طرف سے ریاست کی یونیورسٹیوں میں نومنتخب چھ وائس چانسلروں اور چار قائم مقام وائس چانسلروں کے مالی حق میں کمی کرنے کے حکم کے عملدرآمد پر روک لگا دی۔ ہائی کورٹ نے کچھ دن پہلے ریاستی حکومت کے مشورہ کے بغیر وائس چانسلروں اور قائم مقام وائس چانسلروں کی تقرری کے مسئلہ پر عبوری حکم منظور کر نومنتخب وائس چانسلر اور قائم مقام وائس چانسلروں کے حقوق کی کمی کر دی تھی۔ تقرری رد کرنے کے مسئلہ گورنر دےبانند کنور کو بھی نوٹس دیا گیا تھا۔ بے شک ، سپریم کورٹ کا فیصلہ ریاستی حکومت کو جھٹکا ہے مگر اس سے راجبھون اور حکومت کے تعلقات میں شاید ہی نرمی آئے۔
نجی اسکولوں پر شکنجہ
ریاستی حکومت نے سی بی اےس ای و آئی سی اےس ای سے مبینہ منظوری حاصل نجی اسکولوں کے انتظام کو خبردار کیا ہے کہ وہ حکومت سے منظوری لینے خاطر 30 ستمبر تک درخواست دیں ، ورنہ ان پر کارروائی ہوگی۔ اس حکم کا عمل پرکھ کے دائرے میں ہے۔ اصل میں صوبہ میں نجی اسکولوں کے کارناموں کو روکنے میں حکومت پوری طرح ناکام رہی ہے۔ تعلیم کا حق قانون کے بعد بھی حکومت ، پتہ نہیں کیوں اپنی حیثیت کو ظاہر نہیں کر رہا ہے؟
بھٹکتی یونیورسٹی
جی ہاں ، یہی حقیقت ہے۔ یہاں دو یونیورسٹی بھٹک رہی ہیں۔ مرکزی یونیورسٹی کو زمین نہیں ملی ، اب چھت چھن جانے کا بھی خطرہ ہے۔ بی آئی ٹی منیجر نے یونیورسٹی کو تیس ستمبر تک جگہ خالی کرنے کو کہہ دیا ہے۔ مرکزی اور ریاستی حکومت خاموش ہے۔ عمارت تعمیر محکمہ نے مولانا مظہرالحق عربی - فارسی یونیورسٹی کو اپنی جگہ تلاش کرنے کا الٹی میٹم دیا ہے۔ گزشتہ کئی سال میں یہ یونیورسٹیاں کئی عمارتوں میں ٹہلا ہے۔
Sunday, September 25, 2011
راولپنڈی ایکسپریس پھرپٹری سے اتری
پاکستان کے سابق مایہ ناز اور تاریخ کے تیز ترین باﺅلر شعیب اختر کی آپ بیتی منظرعام پر آگئی، راولپنڈی ایکسپریس نے الزام عائد کیا ہے کہ وسیم اکرم نے ان کا کیریئر تباہ کرنے کی کوشش کی، سچن تندولکر اور راہل ڈراوڈ میچ وننگ پلیئر نہیں، شاہ رخ خان نے دھوکہ دیا۔ شعیب اختر کو کرکٹ کی 134 سالہ تاریخ میں تیز ترین گیند پھینکنے کا اعزاز حاصل ہے۔ انہوں نے 161.3 کلومیٹر فی گھنٹہ کی رفتار سے گیند پھینک کر عالمی ریکارڈ قائم کیا۔ شعیب اختر نے 2011ء کے ورلڈ کپ کے بعد کرکٹ سے ریٹائرمنٹ کا اعلان کیا۔ اس کے بعد سے شعیب کرکٹ سے دور تھے اس دوران انہوں نے ”آپ کا متنازع“ کا ”دھماکہ“ کر دیا۔ شعیب اختر کا کرکٹ کیرئیر اتار چڑھاﺅ کا شکار رہا ۔کبھی فٹنس پرابلم، کبھی ڈسپلن کی خلاف ورزی اور کبھی ڈوپ ٹیسٹ پازیٹو آنے پر قومی ٹیم سے باہر ہوئے۔ کرکٹ سے ریٹائرمنٹ کے بعد بہت سے کھلاڑی جن کی قسمت نے یاوری کی پاکستان کرکٹ بورڈ میں انتظامی عہدوں پر فائز ہونے میں کامیاب ہوئے اور بیشتر باﺅلنگ، بیٹنگ اور اسسٹنٹ کوچ کی”معراج“ ہی حاصل کر پائے۔ کچھ ملٹی نیشنل کمپنیوں کے سفیر بن گئے اور کچھ نے اپنا کاروبار چمکا لیا اور کچھ صرف تبصروں کے لئے ہی رہ گئے۔ چند ہفتے قبل شاہد آفریدی نے ایمبرائیڈڈ کپڑوں کی نمائش کا اہتمام کیا تھا ۔حال ہی میں خبر آئی ہے کہ انضمام الحق اور سعید انور نے دبئی میں گوشت کمپنی کی فرنچائز کھولنے کا فیصلہ کیا ہے۔شعیب اختر کے سامنے بھی کھلا میدان ہے۔ کرکٹ گراﺅنڈ سے باہر ہونے کے بعد وہ اپنے جوہر کسی بھی شعبہ ہائے زندگی میں دکھا سکتے ہیں۔کتاب کی رونمائی کرکے وہ ایک”دھماکہ“ تو کر ہی چکے ہیں اور تمام توپیں اپنی گھن گرج کے ساتھ شعیب پر”جوابی کارروائی“ میں مصروف ہیں۔راولپنڈی ایکسپریس کس جانب کا رخ کرتی ہے یہ تو وقت ہی بتائے گا۔پاک کرکٹ ٹیم کے سابق فاسٹ باﺅلر شعیب اختر کی متنازعہ آپ بیتی کی کتاب controversially yoursکی تقریب رونمائی ممبئی میں ہوگئی۔ کتاب کی تقریب رونمائی سے قبل ہی کتاب کے متنازعہ مندرجات منظر عام پر آنے کے بعد کتاب کی تقریب رونمائی کو منتظمین کی جانب سے منسوخ کر دیا گیا ہے۔ کتاب میں فلم اسٹار شاہ رخ خان، بلے بازتندولکر، سابق عظیم فاسٹ باﺅلر وسیم اکرم، وقار یونس اور دیگر کے خلاف الزامات عائد کئے گئے ہیں۔ یہ بات ضرور غور طلب ہے کہ کتاب کی تقریب رونمائی کیلئےہندوستان کا انتخاب کیونکر کیا گیا۔ شعیب اختر اپنے تمام کیرئیر میں متنازعہ کرکٹر رہے۔ اپنے کیرئیر کے دوران ان کے کئی اسکینڈلز منظر عام پر آئے اور ان کی آپ بیتی اپنے نام کی طرح انتہائی متنازع بن گئی۔ کسی بھی مصنف کو کتاب کی رونمائی سے قبل اس کی تشہیر کیلئے کچھ اہم چیزوں کی ضرورت ہوتی ہے جس میں اہم کردار میڈیا بھی ہے۔ شعیب اختر کے ممبئی میں کتاب کی رونمائی کرنے کے فیصلے کو اس تناظر میں دیکھا جائے تو بے جا نہ ہوگا کہ ممبئی ہندوستانی میڈیا کا گڑھ ہے اور ایشین میڈیا میںہندوستانی میڈیا کو جو مقام حاصل ہے وہ کسی اور ملک کے میڈیا کے پاس نہیں۔ ہندوستانی میڈیا کے دنیا بھر میں کروڑوں ناظرین ہیں اور بڑے بڑے کردارہندوستانی میڈیا سے تعلق قائم رکھنے کی خواہش رکھتے ہیں۔ اسی پس منظر میں شعیب اختر نے بھی کتاب کی ممبئی میں رونمائی کا فیصلہ کیا تاکہ میڈیا کے ذریعے کتاب کی بھرپور طریقے سے تشہیر کی جا سکے۔ دوسری بڑی وجہ ممبئی میں کتاب چھاپنے والے ناشرین کی جانب سے کاپی رائٹ کی مد میں اچھی رقم دینا بھی ہے۔ اس کی ایک جھلک گزشتہ چند دنوں میں ممبئی میں دیکھی جا سکتی ہے۔ کتاب کے اقتباسات منظر عام پر آتے ہی ان پر انگلیاں اٹھنا اور پھر کئی چینلز کی جانب سے ان کے انٹرویوز اس بات کا مظہر ہیں کہ وہ اپنے مقصد میں کسی حد تک کامیاب بھی رہے۔ کتاب کی ممبئی میں رونمائی کی دوسری وجہ وہاں فیشن اور فلم انڈسٹری کا گڑھ ہونا بھی ہے۔ شعیب اختر کا کرکٹ کیرئیر اختتام پذیر ہوچکا ہے اور وہ فیشن کے دلدادہ بھی ہیں۔ واضح رہے کہ وہ ایک بار ممبئی میں فیشن شو میں ماڈلنگ بھی کرچکے ہیں۔ شعیب اختر ریٹائرمنٹ کے بعد بوٹیک کھولنے کا ارادہ ظاہر کر چکے ہیں اور وہ ماڈلنگ کے ساتھ فلمی صنعت میں بھی قسمت آزمائی کرنا چاہتے ہیں ۔غالبا کتاب کی تقریب رونمائی اور اس سے حاصل ہونے والی شہرت کو وہہندوستانی فیشن انڈسٹری اور فلمی صنعت میں قدم رکھنے کیلئے استعمال کریں۔ اب شعیب اختر کو کاپی رائٹ کی مد میں کتنا معاوضہ ملتا ہے، وہ کتاب کی تقریب رونمائی سے اپنے مقررہ اہداف حاصل کرپاتے ہیں یا نہیں یہ فیصلہ تو وقت کرے گا۔ اس وقت دیکھنا یہ ہے کہ ہندوستانی عوام اور اسٹار کھلاڑیوں کی شدید تنقید کے بعد شعیب اختر ممبئی میں کتاب کی تقریب رونمائی کر پاتے ہیں یا انہیں اس کیلئے کسی اور ملک کا سہارا لینا پڑے گا۔
جموں - کشمیر کی سیاسی گپ شپ
نہ نگلتے بنے اور نہ ہی اگلتے
پارلیمنٹ حملہ کی سازش کے لیے پھانسی کی سزا پائے افضل گرو کو معافی دلانے کے لئے اسمبلی میں متعلقہ تجاویز پر بحث طے ہو چکی ہے۔ کانگریس ، حکمراں نیشنل کانفرنس ، پیپلز ڈیموکریٹک پارٹی اس تجویز کو لے کر بے چینی کی حالت میں آ چکی ہے۔ پی ڈی پی بھی اس تجویز کی حمایت کرنے کا اشارہ دے چکی ہے۔ حالانکہ نیشنل کانفرنس اور پی ڈی پی نے ابھی طے نہیں کیا ہے کہ وہ اس کی حمایت کریں گے یا مخالفت۔ لیکن اتنا طے ہے کہ پی ڈی پی اس تجویز کی حمایت ہی کرے گی ، جبکہ نیشنل کانفرینس بھی کشمیر کی سیاست میں بنے رہنے کے لئے اس بل کی مخالفت نہیں کرے گی ، بلکہ وہ کانگریس کے ساتھ اتحاد کو توڑنے کا اختیار اپنا سکتی ہے۔ ایسے میں سب سے بری حالت کانگریس کی ہے ، اس کے لئے نہ اس مسئلہ پر اب نہ نگلتے بن رہی ہے اور نہ اگلتے۔ دونوں ہی حالات میں وہ ریاست میں خسارے کی حالت میں ہے۔ اگر وہ مخالفت کرتی ہے تو نیشنل کانفرنس کے ساتھ اس کا اتحاد کھٹائی میں پڑ سکتا ہے اور اس کا ساتھ چھوڑ وہ پی ڈی پی کا دامن نہیں تھام سکتی ، کیونکہ پی ڈی پی بھی افضل گرو کی سزا معافی کی بات کر رہی ہے۔ اگر حمایت کرتی ہے اور نیشنل کانفرنس کے ساتھ اتحاد بنائے رکھتی ہے تو اسے اس کا خمیازہ جموں کشمیر سے باہر ملک کے دیگر صوبوں میں بھگتنا پڑ سکتا ہے۔ اس کے علاوہ جموں میں بھی اس کی حالت بری ہو جائے گی۔ بیچارے کانگریسی اب جہاں بھی جا رہے ہیں ، یہی دعا کر رہے ہیں کہ جب بھی اس تجویز پر بحث ہو ، ایوان میں خوب ہنگامہ ہو اور ا سپیکر کارروائی کو ملتوی کر دیں تاکہ وہ اس تجویز کو منظور کرانے کے الزام سے بچ جائے۔
بی جے پی کا وادی میں اپواس
پردیش بھارتیہ جنتا پارٹی کے لیڈروں نے نریندر مودی کے اپواس کی حمایت میں سرینگر میں بھی اپواس کیا۔ تمام حیران تھے کہ جس پارٹی کی کشمیر میں کوئی بنیاد نہیں اور جس کو ہمیشہ ریاست کی سیاست میں صرف جموں کی آواز سمجھا جاتا ہے ، اس کے لیڈر کشمیر میں اپواس کر رہے ہیں ، جبکہ جموں میں سب خاموش ہیں۔ تمام یہی سوال کر رہے تھے کہ آخر یہ کیا ہو گیا ہے ، بی جے پی نے جموں میں ایسا کوئی پروگرام کیوں نہیں کیا۔ مقامی سیاسی حلقوں سے لے کر عام لوگوں کے درمیان بھی یہی بحث چل رہی ہے ، لیکن کوئی صحیح جواب نہیں دے پا رہا ہے کہ جموں میں کوئی بھی بی جے پی والا نریندر مودی کے ساتھ کھڑا کیوں نظر نہیں آ رہا ہے۔ اس پر ایک بزرگ نے سمجھاتے ہوئے کہا کہ دیکھو بھائی ، گجرات میں نریندر مودی نے مبینہ طور پر ایماندار اور ترقی پذیر حکومت کی قیادت کی ہے۔ گجرات کو ترقی کی راہ پر آگے پہنچایا ہے۔ جموں میں اگر اپواس پر بیٹھتے تو وہاں عام لوگ ہی نہیں ، پارٹی کارکن بھی پارٹی میں پھیلی بدعنوانی ، اندرونی کلہ اور اےم اےلسی انتخابات میں کراس ووٹنگ جیسے سوال کرتے۔ اس سے وہاں ہنگامہ ہوتا اور اخباروں میں صرف پارٹی کی منفی تصویر کو لے کر ہی خبریں چھپتی۔ یہاں کشمیر میں کوئی جانتا نہیں ہے ، اس کے علاوہ یہاں اپواس پر بیٹھنے پر لوگوں کی بھیڑ بھی تجسس میں دیکھنے آتی اور اخباروں میں چھپتا دیکھو کتنی بھیڑ تھی۔ کشمیر میں بھی مودی کی حمایت میں لوگ ہیں۔ اس لئے جموں کے لوگوں سے جان بچانے اور اخباروں میں کشمیر میں اپنی بڑھتی بنیاد کو دیکھنے کا یہ اپواس یہاں ہوا ہے۔ اس سے زیادہ کچھ نہیں ہے۔ بزرگ کی بات سن سب چپ ہو گئے۔
جناب! یہ آپ کی مہربانی ہے
کشمیر میں ان دنوں غلام کشمیر کے سابق وزیر اعظم بیرسٹر سلطان محمود شادی کی دعوت کا مزہ لینے آئے ہوئے ہیں۔ گزشتہ ساٹھ سالوں میں کشمیر میں غلام کشمیر کے کسی خاص لیڈر یا بڑے نوکرشاہ کی یہ پہلی یاترا ہے۔ بیرسٹر سلطان محمود کو امید تھی کہ سرینگر پہنچتے ہی لوگ ان کے قدموں میں بچھ جائیں گے۔ جہاں جائیں گے وہیں انہیں اس پار بھی آزادی اور اس پار بھی آزادی سننے کو ملے گی ، لیکن جو ہوا انہیں بھی اس کی امید نہیں تھی۔ سرینگر پہنچنے کے بعد انہوں نے حضرت درگاہ بل میں نماز ادا کی اور پھر وہ مزار شہدا بھی گئے۔ ان کے ساتھ جے کے اےل اےف کے محمد یاسین ملک بھی تھے۔ مزار شہدا وہ جگہ ہے ، جہاں سرینگر اور اس کے آس پاس کے علاقوں میں مارے گئے دہشت گردوں اور علیحدگی پسند لیڈروں کو دفنایا گیا ہے۔ وہ وہاں بنی قبروں کو دیکھ حیران ہو گئے۔ اس کے بعد جب وہ شہر کے اندرونی علاقوں سے گزر رہے تھے تو انہیں وہاں بھی کئی ایسے قبرستان نظر آئے۔ انہوں نے پوچھا کہ یہاں اتنے لوگ کیسے مارے گئے ہیں تو بھیڑ میں موجود ایک شخص نے کہا کہ جناب یہ آپ کی مہربانی ہے۔ آپ لوگوں نے ہمارے معصوم بھائیوں کے ہاتھ میں مظفر آباد میں بندوقیں تھمائی ، انہیں ورغلایا اور آزادی کے نام پر ادھر بھیج دیا۔ اس کے بعد وہ یہیں اس دنیا کے اچھے برے سے آزاد ہوکر اب سو رہے ہیں۔ یہ سنتے ہی محمود سلطان چپ چاپ اپنی کار میں بیٹھ گئے اور وہاں سے فوری طور پر اپنے میزبان کے گھر لوٹ گئے۔
Saturday, September 24, 2011
مسئلہ فلسطےن اےک بار پھر سرگرم
ایک بار پھر مسئلہ فلسطین عالمی منظرنامہ پر ابھر کر سامنے آکھڑا ہوا ہے۔ جب سے فلسطینی اتھارٹی کے صدر محمود عباس نے یہ اعلان کیا ہے کہ وہ اقوام متحدہ میں ریاست فلسطین کے قیام کے لئے درخواست دینے والے ہیں تب سے امریکہ کی قیادت میںمغربی ممالک حیران و پریشان ہیں۔ اسرائیل کی نیند اڑی ہوئی ہے۔ وہ امریکی صدر براک اوباما جو فلسطینی ریاست کے نقیب تھے اب وہی براک اوباما اقوام متحدہ کو یہ پاٹھ پڑھارہے ہیں کہ ”اقوام متحدہ میں قرار داد پاس کرنے سے امن نہیں قائم ہو جاتا ہے“۔ ادھر اسرائیلی وزیر اعظم گھڑی گھڑی واشنگٹن فون کرکے اپنے تمام امریکی حلیفوں کو سمجھا رہے ہیں کہ فلسطینی ریاست کا قیام فوراً روکا جائے۔
الغرض ، فلسطینی ریاست کے قیام سے مغربی ممالک اور اسرائیل گھبرائے ہوئے ہیں۔ امریکہ کی قیادت میںمغربی دنیا کے سفارتکار عالمی برادری کو یہ سمجھانے کی کوشش کررہے ہےں کہ اقوام متحدہ کے ذریعہ فلسطینی ریاست کا قیام بے معنی ہے۔ یوں تو اس مسئلہ پر حتمی فیصلہ آچکا ہے۔ صدر براک اوباما یہ اعلان کرچکے ہیں کہ اگر اقوام متحدہ کی جنرل اسمبلی فلسطینی ریاست کے حق میں فیصلہ دے بھی دیتی ہے تو بھی امریکہ سیکورٹی کونسل (جہاں اقوام متحدہ جنرل باڈی کے تمام فیصلوں پر آخری فیصلہ ہوتا ہے) میں اس فیصلے کوا پنے ویٹو پاور کا استعمال کرکے رد کردے گا۔ محمود عباس سمیت سارے عالم کو اس بات کا اندازہ تھا کہ فلسطینی ریاست کا قیام ابھی بھی امریکہ کو منظور نہیں ہے اور آخر میں امریکہ ریاست فلسطین کے قیام پرروک لگادے گا۔ پھر بھی محمود عباس اس کوشش میں لگے تھے کہ یو این میں فلسطینی ریاست کے قیام کا معاملہ اٹھے۔آخر محمود عباس ایسا کیوں کررہے تھے؟ کیا اقوام متحدہ میںامریکہ کے ویٹو کرنے سے فلسطینی ریاست کا قیام پھر ممکن نہیںہوسکتا ہے؟محمود عباس کوئی فلسطینی بچہ تو ہیں نہیں؟ وہ فلسطینی اتھارٹی کے صدر ہیں اور عالمی سیاست سے بخوبی واقف ہیں۔ ظاہر ہے کہ ان کو امریکی سیاست کا پوری طرح اندازہ ہوگا۔ وہ یہ بات بخوبی سمجھ رہے ہیں کہ صدر اوباما اگر چاہیں تو بھی امریکی نظام اور امریکی سیاست اوباما کو فلسطینی ریاست کے قیام کی اجازت نہیں دے سکتی ہے۔ امریکی سیاست پر یہودی لابی کا جواثر ہے وہ دنیا پر عیاں ہے ۔ کوئی بھی امریکی صدر اس یہودی لابی کے خلاف نہیں ہوسکتاہے اور پھر امریکہ میں اگلے برس صدارتی چناﺅ ہونے ہیں۔ براک اوباما اس چناﺅ میںصدارت کے دوسری بار دعوےدار ہیں۔ اس لئے اس پس منظر میں اوباما کے لئے یہ ممکن ہی نہیں ہے کہ وہ امریکی یہودی لابی اور اسرائیل کو ناخوش کریں۔ان تمام باتوں کا اندازہ محمود عباس کو بخوبی ہے لیکن پھر بھی محمود عباس ریاست فلسطین کا قیام اقوام متحدہ کے ذریعہ کروانے پر بضد ہیں۔ آخر کیوں؟صدر محمود عباس اقوام متحدہ کے ذریعہ فلسطینی ریاست نہیں بنوارہے ہیں ۔ وہ توفلسطینی ریاست کے معاملے پر امریکہ اور اسرائیل کی پالیسی کا پردہ فاش کرکے عالمی برادری اور بالخصوص عرب عوام کے دلوں میں جذبہ فلسطین کو گرم کررہے ہیں۔ دراصل سن 1980کی دہائی میں سویت یونین کے خاتمے کے بعد سے مسئلہ فلسطین عالمی فوکس سے ہٹ گیا۔ سویت یونین کے زوال کے بعد امریکہ واحد عالمی سپر پاور کے طور پر ابھر کر آیا۔ سن 1990کی دہائی سے لے کر اور ابھی حال تک اسرائیل نے فلسطین اور فلسطینی عوام کے خلاف وہ ظلم ڈھائے کہ جس کی مثال دوسری جنگ عظیم کے بعد سے آج تک نہیں ملتی ہے۔ آئے دن فلسطینی عوام پر بم باری، ٹینکوں سے فلسطینیوں کے گھروں کو مسمار کرنا اور آخرش غزہ پٹی میںرہنے والے فلسطینیوں کی ناکہ بندی کر کے انکا آب و دانہ تک اسرائیل نے بند کردیا تھااور ان بیس برسوں میں عالمی سطح پر فلسطینیوں کی آواز اٹھانے والا بھی کوئی نہیں بچا تھا۔ نوبت یہاں تک پہنچ چکی تھی کہ اسرائیل بیت المقدس پر اپنا قبضہ کرنے کی سازش رچ رہا تھا۔ لیکن اللہ رے تاریخ کے اتار چڑھاﺅ! پچھلے چھ مہینوں کے اندر عالم عرب کی سیاست کا نقشہ ہی الٹ گیا اور اس نقشہ میں اسرائیل کی بقا ہی خطرے میںآگئی۔ یہ کیونکر اور کیسے ہوا؟تمام عالم عرب میں پچھلے چھ مہینوں کے اندر آزادی کا ایک طوفان اٹھ کھڑا ہوا۔ کبھی تیونس تو کبھی مصر، کبھی بحرین تو کبھی یمن، کبھی شام تو کبھی لیبیا۔ الغرض، تمام عرب دنیا میں لاکھوں نوجوان سڑکوں پر نکل پڑے اور ان کے لبوں پر بس ایک نعرہ تھا اور وہ تھا:” آزادی ،آزادی“۔آزادی کے جذبہ سے سرشار ان نوجوانوں نے چشم زدن میںتیونس اور مصر سے اسرائیل کے حامی حاکموں کو برطرف کردیا۔ بس دیکھتے دیکھتے تاریخ کی اس کروٹ نے پورے عالم عرب کی سیاست کا رخ ہی بدل دیا۔ عرب دنیا میں آزادی کا جو انقلاب بپا ہوا اس کے دو اہم نتائج نکلے۔ اولاً تو تمام عالم عرب میں بیٹھے امریکی اور اسرائیلی حامی عناصر و بادشاہ الگ تھلگ پڑ گئے ۔دوسری جانب عرب دنیا میںفلسطین کی آزادی کے لئے ہمدردی کاجو جذبہ دبا تھا وہ پھر سے پےدا ہوگےا۔اس کا نتیجہ یہ ہوا کہ اسرائیل پورے مشرق وسطیٰ میں یک و تنہا ہی نہیں بلکہ چاروں طرف سے گھر گیا۔ ابھی چند روز قبل قاہرہ میں مصری نوجوانوں نے اسرائیلی سفارت خانہ پر دھاوا بول دیا۔ چشم زدن میںاس عمارت سے اسرائیلی جھنڈا اتا ر کر فلسطینی پرچم بلند کردیا گیا۔ اسرائیلی سفارت کاروں کو بمشکل تمام ہیلی کاپٹر کے ذریعہ اسرائیل پہنچایا گیا۔ پھر کیمپ ڈیوڈ معاہدہ کے بعد پہلی بار مصری فوج پھر سے اسرائیل کی سرحدوں کے قریب صحرائے سینا میںتعینات ہو گئی اور اسرائیل خاموش رہا۔ یعنی اسرائیل کی مصری سرحد خطرے میںآگئی۔ ادھر دوسری جانب دہائیوں سے اسرائیل کے حلیف ترکی نے اسرائیل سے آنکھیں پھیر لیں۔ ابھی حال میں ترکی کے صدر نے اعلان کردیا کہ اب جو جہاز غزہ امداد لے کر جائیں گے ان کی حفاظت ترکی بحری بیڑا کرے گا۔ یعنی اگر اب اسرائیل نے ان جہازوں کو روکا تو ترکی اسرائیل کے ساتھ جنگ کرسکتا ہے۔ اس کے معنی ےہ کہ اسرائیل کو ترکی سے بھی خطرہ ہوگیا۔پھر لبنان میںحزب اللہ تو پہلے ہی اسرائیل سے جنگ لڑکر اسرائیلی فوج کو سبق سکھاچکی ہے۔ یعنی لبنان کی اسرائیلی سرحد پہلے سے ہی خطرے میں ہے۔ پھر شام میں ایک انقلاب بپا ہے اور صدر اسد کے جاتے ہی شام میں جو حکومت آئے گی وہ گولان پہاڑیوں سے اسرائیلی فوج کو چلتا کرے گی۔بیچارہ اسرائیل! فلسطینیوں کے خون سے ساٹھ برسوں سے خون کی ہولی کھیلنے والے اور قبلہ اول پر قبضہ کرنے کی تمنا کرنے والے اسرائیل کا اب یہ عالم ہے کہ وہ چاروں طرف سے گھر چکا ہے۔ فلسطےنی صدر محمود عباس اس عالمی پس منظر میںفلسطینی ریاست کے قیام کی کوشش اقوام متحدہ کے ذریعہ کررہے ہیں۔ ان کی اس چال سے فلسطینی ریاست کا قیام ابھی ہویا نہ ہو عالم عرب میںیہ بات تو عام ہوہی جائے گی کہ فلسطین کے دشمن کون ہیں اور دوست کون ہیں؟ آزادی کی جو لہر فی الحال عالم عرب میں چل رہی ہے اس لہر میں امریکہ فلسطینی ریاست کے خلاف ویٹو کرکے عرب عوام میںاور الگ تھلگ پڑجائے گا۔
الغرض ،بیسویں صدی اگر اسرائیل کی صدی تھی تو اکیسویں صدی ریاست فلسطین کی صدی ہے۔آج نہیں تو جلدیقینا ریاست فلسطین کا وقت آچکا ہے اور اس کے قیام کو امریکہ اور اسرائیل کی مشترکہ قوت بھی نہیں روک سکتی ہے۔
Friday, September 23, 2011
اللہ حافظ پٹودی۔۔۔
ہندوستانی کرکٹ ٹیم کے سابق کپتان منصور علی خان پٹودی شدید علالت کے بعد انتقال کر گئے ہیں۔پٹودی کی عمر ستر سال تھی اور وہ دہلی کے ایک اسپتال میں انتہائی نگہداشت والے یونٹ میں زیر علاج تھے۔دہلی کے رام منوہر لوہیا اسپتال کے ڈاکٹروں کا کہناتھا کہ پٹودی کے پھیپڑوں میں شدید انفےکشن تھا جس کی وجہ سے ان کے جسم کو وافر مقدار میں آکسیجن نہیں مل پا رہی تھی۔سابق کرکٹر منصور علی خان پٹودی کو گڑگاو ¿ں (ہریانہ) ضلع کے ان کے آبائی گاو ¿ں پٹودی میں سپرد خاک کر دیا گیا۔ پٹودی گاو ¿ں واقع منصور علی کے محل کے احاطے میں سابق کرکٹر کو آخری آرام گاہ مےں پہنچا دےا گےا۔ اس موقع پر’ٹائیگر‘ کی آخری جھلک پانے کے لئے لوگوں کاہجوم امڈ پڑا۔ ہزاروں لوگوں نے نم آنکھوں سے منصور علی خان کو الوداع کےا۔جمعہ دوپہر بعد منصور علی کو پٹودی محل کے احاطے میں واقع قبرستان میں جہاںدفناےا گیا ، وہاں پاس میں ہی ان کے دادا ،دادی اور والد کی قبر ہے۔ چھوٹے نواب کی لاش پر مٹی ڈالنے والوں کا تاتا لگ گیا۔ بالی ووڈ اور کرکٹ کی کئی ہستیاں بھی ےہاں پہنچےں۔پنی کلاسےکلبلے بازی سے زیادہ کپتانی کی وجہ سے کرکٹ کی دنیا میں امٹ نقوش چھوڑنے والے منصور علی خان پٹودی نے ہندوستانی کرکٹ میں قیادت کی نئی مثال اور نئے نظرےےکی اےجاد کی تھی۔ وہ پٹودی ہی تھے جنہوں نےہندوستانی کھلاڑیوں میں یہ اعتماد پےدا کےا تھا کہ وہ بھی جیت سکتے ہیں۔ پٹودی کی پیدائش بھلے ہی پانچ جنوری 1941 کو بھوپال کے نواب خاندان میں ہوئی تھی لیکن انہوں نے ہمیشہ نازک حالات کا سامنا کیا۔ چاہے وہ نجی زندگی ہو یا پھر کرکٹ۔ تب 11 سال کے جونیئر پٹودی نے کرکٹ کھےلنی شروع بھی نہیں کی تھی کہ ٹھیک ان کی یوم پیدائش پر ان کے والد اور سابقہندوستانی کرکٹ کپتان افتخار علی خان پٹودی کا انتقال ہو گیا۔ اس کے بعد جب پٹودی نے بین الاقوامی کرکٹ میں کھیلنا شروع کیا تو 1961 میں کار حادثے میں ان کی ایک آنکھ کی روشنی چلی گئی۔ جس سے انہیں ایک چیز دو دو دکھائی دیتی تھیں وہ بھی چھ چھ انچ کی دوری پر۔ اس کے باوجود نہ صرف انہوں نے اس وقت کے سب سے تیز گیند بازوں فریڈی ٹرومین، ویس حال، چارلی گرفتھ اور گراہم میکنزی کو بخوبی کھیلا بلکہ چھ سنچریاں بھی بنائیں۔انگلینڈ کے خلاف دہلی میں بنائے گئے دو سو تین ناٹ آو ¿ٹ رن ان کے کیرےئر کا بہترین اسکور تھا لیکن 1967 میں میلبورن کی ہری پچ پر انکی75 رنز کی اننگز کو ان کی سب سے بہترین اننگز مانا جاتا ہے۔پچیس رن پرہندوستان کے پانچ وکٹ گر چکے تھے۔ پٹودی کے گھٹنے کے نیچے کی نس ( ہیمسٹرنگ) میں چوٹ لگی ہوئی تھی اور وہ اجیت واڈیکر کے ساتھ رنرر کے طور پر میدان میں اترے۔وہ سامنے کی طرف نہیں جھک سکتے تھے اس لیے صرف ہک، کٹ اور گلانس شاٹس کے سہارے، انہوں نے75 رن بنائے۔ اس اننگ کے بارے میں مہیر باس نے ہسٹری آف انڈین کرکٹ میں لکھا تھا ’ایک آنکھ اور ایک پیر کے سہارے کھیلی گئی اننگز‘۔ایک اچھا بلے باز ہونے کے ساتھ ساتھ پٹودی ایک شاندار بالر بھی تھے۔ کور پر کھڑے ہوکر جس طرح سے وہ گیند کے پیچھے بھاگتے تھے لگتا تھا کہ ایک چیتے کی طرح وہ اپنے شکار کا پیچھا کر رہے ہیں۔شاید اسی وجہ سے ان کا نام ٹائیگر پڑا۔کالر اوپر کھڑا کر کے، کمزور ٹیم کے باوجود ، دنیا کی بہترین ٹیموں کے خلاف اعتماد کے ساتھ کھڑا ہونا پٹودی نے ہی ممکن کر دکھایا تھا۔ اس کے باوجود وہ پٹودی کا جذبہ اور کرکٹ کھےلنے کی صلاحیت ہی تھی کہ انہوں نےہندوستان کی طرف سے نہ صرف 46 ٹیسٹ میچ کھیل کر34.91کی اوسط سے 2793 رن بنائے بلکہ ان میں سے 40 میچ میں ٹیم کی کپتانی بھی کی۔ وہہندوستان کے پہلے کامیاب کپتان تھے۔ ان کی کپتانی میں ہیہندوستان نے بیرون ممالک میں پہلی جیت درج کی تھی۔ہندوستان نے ان کی قیادت میں نو ٹیسٹ میچ جیتے جبکہ 19 میں اسے شکست ہوئی لیکن یہ نہیں بھولنا چاہئے کہ پٹودی سے پہلےہندوستانی ٹیم نے جو 79 مےچ کھےلے تھے ان میں سے اسے صرف آٹھ میں کامیابی ملی تھی اور 31 میں شکست۔ یہی نہیں اس سے قبلہندوستان بیرون ملک میں 33 میں سے کوئی بھی ٹیسٹ میچ نہیں جیت سکا تھا۔ٹائیگر کے نام سے مشہور پٹودی کی کرکٹ کی کہانی دہرا دون کے وےلکم اسکول سے شروع ہوئی تھی لیکن ابھی انہوں نے کرکٹ کھیلنا شروع ہی کیا تھا کہ ان کے والد کا انتقال ہو گیا۔ اس کے بعد جونیئر پٹودی کو تمام لوگ بھول گئے۔ اس کے چار سال بعد ہی اخباروں میں ان کا نام چھپا جب ونچےسٹر کی طرف سے کھیلتے ہوئے انہوں نے اپنی بلے بازی سے سب کو متاثر کیا۔ اپنے والد کے انتقال کے کچھ دن بعد ہی پٹودی انگلینڈ آ گئے تھے۔ وہ جس جہاز میں سفر کر رہے تھے اس میں وےنو ماکنڈ ،فرینک وارےل ، اےورٹن وکس اورسنی رامدےن جیسے بڑے کرکٹر بھی تھے۔ وارےل کو اس وقت پتہ نہیں تھا کہ وہ جس بچے سے مل رہے ہیں دس سال بعد وہی ان کے ساتھ میدان پر ٹاس کے لئے اترے گا۔قائدانہ صلاحےت ان کی رگوں میں بسی تھی۔ ونچےسٹر کے خلاف ان کا کیریئر 1959 میں عروج پر تھا جب کہ وہ کپتان تھے۔ انہوں نے اس وقت اسکولی کرکٹ میں ڈگلس جارڈن کا ریکارڈ توڑا تھا۔ پٹودی نے اس کے بعد دہلی کی طرف سے دو رنجی مےچ کھےلے اور دسمبر 1961 میں انگلینڈ کے خلاف فےروز شاہ کوٹلہ میدان پر پہلا ٹیسٹ میچ کھیلنے کا انہےںموقع ملا۔ یہ میچ بارش سے متاثر رہا تھا۔اس میچ میں تو وہ اپنی موجودگی درج نہیں کرا پائے لیکن کلکتہ میں اگلے میچ میں انہوں نے 64 رن بنائے۔ ان کے جاندار شاٹ سے ناظرین تب جھومنے لگے تھے۔ہندوستان نے آخر میں یہ میچ 187 رنز سے جیتا تھا۔ چنئی میں پھر سے انہوں نے 103 رنز کی اننگز کھیل کر خود کو میچ ونر کھلاڑی ثابت کیا تھا۔ اس اننگز میں انہوں نے 14 چوکے اور دو چھکے لگائے تھے۔ ویسٹ انڈیز کے دورے میں وہجسممیںتکلےف کے مسئلے سے جوجھتے رہے لیکن تیسرے اور چوتھے ٹیسٹ میچ میں انہوں نے 48 اور 47 رنز کی دو بہترین اننگ کھیلی تھی۔ اس کے بعد 1964 میں انگلینڈ ٹیم کےہندوستان دورے کے شروع میں وہ اچھی کارکردگی کا مظاہرہ نہیں کر پائے لیکن دہلی میں انہوں نے ناٹ آو ¿ٹ 203 رن کی اننگز کھیل کر اس کی بھرپائی کر دی جو ان کا سب سے زیادہ اسکور بھی ہے۔ آسٹریلوی ٹیم جب تین میچ کے لیے ہندوستانی دورے پر آئی تو پٹودی نے اپنے والد کی طرح اس ٹیم کے خلاف اپنے پہلے ٹیسٹ میچ میں سنچری جڑنے کا انوکھا ریکارڈ بنایا۔ یہ بے حد ےادگار اننگز تھی۔ انہوں نے جس طرح سے وےوےرس اور مارٹن جیسے گےند بازوں کے خلاف دبدبے سے بلے بازی کی اس کی مثال آگے بھی نوجوان کھلاڑیوں کے سامنے دی جاتی رہی۔ اگلے ٹیسٹ میچ میں انہوں نے 86 اور 53 رنز کی دو جاندار بہترین اننگ کھیلی اور ہندوستان کو ڈرامائی جیت دلائی۔ان کے کیریئر کا سب سے یادگار دور 1968 میںہند کا نیوزی لینڈ دورہ تھا۔ہندوستان نے اس وقت پہلی بار غیر ملکی سرزمین پر ٹیسٹ میچ اور ٹیسٹ سیریز 3:1 جیتی تھی۔پٹودی 1969 تک ہندوستانی ٹیم کے کپتان رہے۔اس کے بعد وہ مختلف وجوہات کی بنا پر ٹیم کا حصہ نہیں بن پائے۔ انہیں اگرچہ پھر سے 1973 میں ٹیم میں واپسی کا موقع ملا اور پھر انہوں نے ویسٹ انڈیز کے خلاف پانچ ون ڈے میچوں میں کپتانی کی تھی۔ ان میچوں میں حالانکہ ان کی کارکردگی اچھی نہیں رہی اور انہیں ٹیم سے باہر کر دیا گیا۔ وہ اس کے بعد بھی ایک سال تک فرسٹ کلاس میچ کھیلتے رہے جس کے بعد انہوں نے ریٹائرمنٹ لے لیا۔ ریٹائرمنٹ کے بعد انہوں نے 1993 سے 1996 تک آئی سی سی میچ ریفری کا کردار بھی نبھاےا۔ وہ دو ٹیسٹ اور دس ون ڈے میں میچ ریفری رہے۔ انہیں 2008 میں انڈین پریمیئر لیگ کی انتظامی کونسل میں شامل کیا گیا تھا۔ انہوں نے 2010 میں یہ عہدہ چھوڑ دیا تھا۔ انہوں نے گزشتہ سال کے شروع میں بی سی سی آئی پر ادائیگی نہ کرنے کا معاملہ بھی درج کیا تھا۔ پٹودی کو 1964 میں ارجن ایوارڈ اور 1967 میں پدم شری سے نوازا گیا تھا۔ انہوں نے ہندوستانی سنے اسٹارا شرمےلا ٹیگور سے 1969 میں شادی کی تھی اور ان کے تین بچے سیف علی خان ، سوہا علی خان اور صبا علی خان ہیں۔
پٹودی :جس نے قائم کی۔۔۔
اپنی کلاسےکلبلے بازی سے زیادہ کپتانی کی وجہ سے کرکٹ کی دنیا میں امٹ نقوش چھوڑنے والے منصور علی خان پٹودی نے ہندوستانی کرکٹ میں قیادت کی نئی مثال اور نئے نظرےےکی اےجاد کی تھی۔ وہ پٹودی ہی تھے جنہوں نےہندوستانی کھلاڑیوں میں یہ اعتماد پےدا کےا تھا کہ وہ بھی جیت سکتے ہیں۔ پٹودی کی پیدائش بھلے ہی پانچ جنوری 1941 کو بھوپال کے نواب خاندان میں ہوئی تھی لیکن انہوں نے ہمیشہ نازک حالات کا سامنا کیا۔ چاہے وہ نجی زندگی ہو یا پھر کرکٹ۔ تب 11 سال کے جونیئر پٹودی نے کرکٹ کھےلنی شروع بھی نہیں کی تھی کہ ٹھیک ان کی یوم پیدائش پر ان کے والد اور سابقہندوستانی کرکٹ کپتان افتخار علی خان پٹودی کا انتقال ہو گیا۔ اس کے بعد جب پٹودی نے بین الاقوامی کرکٹ میں کھیلنا شروع کیا تو 1961 میں کار حادثے میں ان کی ایک آنکھ کی روشنی چلی گئی۔ جس سے انہیں ایک چیز دو دو دکھائی دیتی تھیں وہ بھی چھ چھ انچ کی دوری پر۔ اس کے باوجود نہ صرف انہوں نے اس وقت کے سب سے تیز گیند بازوں فریڈی ٹرومین، ویس حال، چارلی گرفتھ اور گراہم میکنزی کو بخوبی کھیلا بلکہ چھ سنچریاں بھی بنائیں۔انگلینڈ کے خلاف دہلی میں بنائے گئے دو سو تین ناٹ آو ¿ٹ رن ان کے کیرےئر کا بہترین اسکور تھا لیکن 1967 میں میلبورن کی ہری پچ پر انکی75 رنز کی اننگز کو ان کی سب سے بہترین اننگز مانا جاتا ہے۔پچیس رن پرہندوستان کے پانچ وکٹ گر چکے تھے۔ پٹودی کے گھٹنے کے نیچے کی نس ( ہیمسٹرنگ) میں چوٹ لگی ہوئی تھی اور وہ اجیت واڈیکر کے ساتھ رنرر کے طور پر میدان میں اترے۔وہ سامنے کی طرف نہیں جھک سکتے تھے اس لیے صرف ہک، کٹ اور گلانس شاٹس کے سہارے، انہوں نے75 رن بنائے۔ اس اننگ کے بارے میں مہیر باس نے ہسٹری آف انڈین کرکٹ میں لکھا تھا ’ایک آنکھ اور ایک پیر کے سہارے کھیلی گئی اننگز‘۔ایک اچھا بلے باز ہونے کے ساتھ ساتھ پٹودی ایک شاندار بالر بھی تھے۔ کور پر کھڑے ہوکر جس طرح سے وہ گیند کے پیچھے بھاگتے تھے لگتا تھا کہ ایک چیتے کی طرح وہ اپنے شکار کا پیچھا کر رہے ہیں۔شاید اسی وجہ سے ان کا نام ٹائیگر پڑا۔کالر اوپر کھڑا کر کے، کمزور ٹیم کے باوجود ، دنیا کی بہترین ٹیموں کے خلاف اعتماد کے ساتھ کھڑا ہونا پٹودی نے ہی ممکن کر دکھایا تھا۔ اس کے باوجود وہ پٹودی کا جذبہ اور کرکٹ کھےلنے کی صلاحیت ہی تھی کہ انہوں نےہندوستان کی طرف سے نہ صرف 46 ٹیسٹ میچ کھیل کر34.91کی اوسط سے 2793 رن بنائے بلکہ ان میں سے 40 میچ میں ٹیم کی کپتانی بھی کی۔ وہہندوستان کے پہلے کامیاب کپتان تھے۔ ان کی کپتانی میں ہیہندوستان نے بیرون ممالک میں پہلی جیت درج کی تھی۔ہندوستان نے ان کی قیادت میں نو ٹیسٹ میچ جیتے جبکہ 19 میں اسے شکست ہوئی لیکن یہ نہیں بھولنا چاہئے کہ پٹودی سے پہلےہندوستانی ٹیم نے جو 79 مےچ کھےلے تھے ان میں سے اسے صرف آٹھ میں کامیابی ملی تھی اور 31 میں شکست۔ یہی نہیں اس سے قبلہندوستان بیرون ملک میں 33 میں سے کوئی بھی ٹیسٹ میچ نہیں جیت سکا تھا۔ٹائیگر کے نام سے مشہور پٹودی کی کرکٹ کی کہانی دہرا دون کے وےلکم اسکول سے شروع ہوئی تھی لیکن ابھی انہوں نے کرکٹ کھیلنا شروع ہی کیا تھا کہ ان کے والد کا انتقال ہو گیا۔ اس کے بعد جونیئر پٹودی کو تمام لوگ بھول گئے۔ اس کے چار سال بعد ہی اخباروں میں ان کا نام چھپا جب ونچےسٹر کی طرف سے کھیلتے ہوئے انہوں نے اپنی بلے بازی سے سب کو متاثر کیا۔ اپنے والد کے انتقال کے کچھ دن بعد ہی پٹودی انگلینڈ آ گئے تھے۔ وہ جس جہاز میں سفر کر رہے تھے اس میں وےنو ماکنڈ ،فرینک وارےل ، اےورٹن وکس اورسنی رامدےن جیسے بڑے کرکٹر بھی تھے۔ وارےل کو اس وقت پتہ نہیں تھا کہ وہ جس بچے سے مل رہے ہیں دس سال بعد وہی ان کے ساتھ میدان پر ٹاس کے لئے اترے گا۔قائدانہ صلاحےت ان کی رگوں میں بسی تھی۔ ونچےسٹر کے خلاف ان کا کیریئر 1959 میں عروج پر تھا جب کہ وہ کپتان تھے۔ انہوں نے اس وقت اسکولی کرکٹ میں ڈگلس جارڈن کا ریکارڈ توڑا تھا۔ پٹودی نے اس کے بعد دہلی کی طرف سے دو رنجی مےچ کھےلے اور دسمبر 1961 میں انگلینڈ کے خلاف فےروز شاہ کوٹلہ میدان پر پہلا ٹیسٹ میچ کھیلنے کا انہےںموقع ملا۔ یہ میچ بارش سے متاثر رہا تھا۔اس میچ میں تو وہ اپنی موجودگی درج نہیں کرا پائے لیکن کلکتہ میں اگلے میچ میں انہوں نے 64 رن بنائے۔ ان کے جاندار شاٹ سے ناظرین تب جھومنے لگے تھے۔ہندوستان نے آخر میں یہ میچ 187 رنز سے جیتا تھا۔ چنئی میں پھر سے انہوں نے 103 رنز کی اننگز کھیل کر خود کو میچ ونر کھلاڑی ثابت کیا تھا۔ اس اننگز میں انہوں نے 14 چوکے اور دو چھکے لگائے تھے۔ ویسٹ انڈیز کے دورے میں وہجسممیںتکلےف کے مسئلے سے جوجھتے رہے لیکن تیسرے اور چوتھے ٹیسٹ میچ میں انہوں نے 48 اور 47 رنز کی دو بہترین اننگ کھیلی تھی۔ اس کے بعد 1964 میں انگلینڈ ٹیم کےہندوستان دورے کے شروع میں وہ اچھی کارکردگی کا مظاہرہ نہیں کر پائے لیکن دہلی میں انہوں نے ناٹ آو ¿ٹ 203 رن کی اننگز کھیل کر اس کی بھرپائی کر دی جو ان کا سب سے زیادہ اسکور بھی ہے۔ آسٹریلوی ٹیم جب تین میچ کے لیے ہندوستانی دورے پر آئی تو پٹودی نے اپنے والد کی طرح اس ٹیم کے خلاف اپنے پہلے ٹیسٹ میچ میں سنچری جڑنے کا انوکھا ریکارڈ بنایا۔ یہ بے حد ےادگار اننگز تھی۔ انہوں نے جس طرح سے وےوےرس اور مارٹن جیسے گےند بازوں کے خلاف دبدبے سے بلے بازی کی اس کی مثال آگے بھی نوجوان کھلاڑیوں کے سامنے دی جاتی رہی۔ اگلے ٹیسٹ میچ میں انہوں نے 86 اور 53 رنز کی دو جاندار بہترین اننگ کھیلی اور ہندوستان کو ڈرامائی جیت دلائی۔ان کے کیریئر کا سب سے یادگار دور 1968 میںہند کا نیوزی لینڈ دورہ تھا۔ہندوستان نے اس وقت پہلی بار غیر ملکی سرزمین پر ٹیسٹ میچ اور ٹیسٹ سیریز 3:1 جیتی تھی۔پٹودی 1969 تک ہندوستانی ٹیم کے کپتان رہے۔اس کے بعد وہ مختلف وجوہات کی بنا پر ٹیم کا حصہ نہیں بن پائے۔ انہیں اگرچہ پھر سے 1973 میں ٹیم میں واپسی کا موقع ملا اور پھر انہوں نے ویسٹ انڈیز کے خلاف پانچ ون ڈے میچوں میں کپتانی کی تھی۔ ان میچوں میں حالانکہ ان کی کارکردگی اچھی نہیں رہی اور انہیں ٹیم سے باہر کر دیا گیا۔ وہ اس کے بعد بھی ایک سال تک فرسٹ کلاس میچ کھیلتے رہے جس کے بعد انہوں نے ریٹائرمنٹ لے لیا۔ ریٹائرمنٹ کے بعد انہوں نے 1993 سے 1996 تک آئی سی سی میچ ریفری کا کردار بھی نبھاےا۔ وہ دو ٹیسٹ اور دس ون ڈے میں میچ ریفری رہے۔ انہیں 2008 میں انڈین پریمیئر لیگ کی انتظامی کونسل میں شامل کیا گیا تھا۔ انہوں نے 2010 میں یہ عہدہ چھوڑ دیا تھا۔ انہوں نے گزشتہ سال کے شروع میں بی سی سی آئی پر ادائیگی نہ کرنے کا معاملہ بھی درج کیا تھا۔ پٹودی کو 1964 میں ارجن ایوارڈ اور 1967 میں پدم شری سے نوازا گیا تھا۔ انہوں نے ہندوستانی سنے اسٹارا شرمےلا ٹیگور سے 1969 میں شادی کی تھی اور ان کے تین بچے سیف علی خان ، سوہا علی خان اور صبا علی خان ہیں۔
Thursday, September 22, 2011
منصور پٹودی انتقال کر گئے
ہندوستانی کرکٹ ٹیم کے سابق کپتان منصور علی خان پٹودی شدید علالت کے بعد انتقال کر گئے ہیں۔پٹودی کی عمر ستر سال تھی اور وہ دہلی کے ایک استپال میں انتہائی نگہداشت والے یونٹ میں زیر علاج تھے۔دہلی کے رام منوہر لوہیا اسپتال میں ڈاکٹروں کا کہنا ہے کہ پٹودی کے پھیپڑوں میں شدید انفےکشن تھا جس کی وجہ سے ان کے جسم کو وافر مقدار میں آکسیجن نہیں مل پا رہی تھی۔پٹودی، جو صرف ایک آنکھ میں بینائی ہونے کے باوجود اکیس سال کی عمر میں ہندوستانی کرکٹ ٹیم کے کپتان بن گئے تھے، حال ہی میں لندن سے لوٹے تھے جہاں انہوں نے ہند۔ انگلینڈ کے درمیان ٹیسٹ سیریز کے اختتام پر اپنے والد افتخار علی خان کے نام سے منصوب ٹرافی فاتح ٹیم کے کپتان کو پیش کی تھی۔ پٹودی کے والد بھیہندوستانی ٹیم کے کپتان تھے اور انہوں نے انگلینڈ کے لیے بھی ٹیسٹ کرکٹ کھیلی تھی۔اپنے زمانے میں پٹودی ایک جارحانہ بلے باز اور شاطر کپتان کے طور پر مشہور تھے۔ ان کی برق رفتار فیلڈنگ کے لیے انہیں ’ٹائےگر’ کا لقب دیا گیا تھا۔ انگلینڈ میں زمانہ طالب علمی میں ہی کار کے ایک حادثے میں ان کی ایک آنکھ خراب ہوگئی تھی۔پٹودی دہلی کے قریب ریاست ہریانہ میں جوان کی سابقہ ریاست کا نام ہے جس کے وہ نویں اور آخری نواب تھے۔ انیس سو اکہتر میں ہندوستان میں شاہی خطاب ختم کر دئے گئے تھے۔ ان کی والدہ بیگم ساجدہ سلطان بھوپال کے آخری نواب حمید اللہ خان کی بیٹی تھیں۔پٹودی کی اہلیہ شرمیلا ٹیگور ستر اور اسی کی دہائی میں بالی ووڈ کے مشہور ترین اداکاروں میں شمار کی جاتی تھیں۔ ان کے بیٹے سیف علی خان بھی بالی ووڈ کے بڑے اسٹارز میں شمار کیے جاتے ہیں۔پٹودی نے ہندوستان کے لیے چھےالیس ٹیسٹ کھیلے جن میں سے چالیس میں وہ کپتان رہے۔ آج تک انہیں ہندوستانی کرکٹ ٹیم کا سب سے کم عمر کا کپتان ہونے کا اعزاز حاصل ہے۔ تقریباً پینتیس کی اوسط سے انہوں نے دو ہزار سات سو ترانوے رن بنائے جس میں چھ سنچری اور سولہ نصف سنچریاں شامل تھیں۔ ٹیسٹ کرکٹ میں ان کا سب سے زیادہ انفرادی اسکور دو سو تین رن تھا۔
نتاشا نے کیا گمبھیر کو کلین بولڈ
گزشتہ کئی دنوں سے ہندوستانی کرکٹ ٹیم کے اسٹار بلے باز گوتم گمبھیرکرےز پر نہیں دکھائی دے رہے ہیں۔ لندن کے دورے کے ابتدائی مےچ مےں ہی سر پر لگی شدید چوٹ کی وجہ سے فوری طور پر گھر لوٹ آئے۔ اس کے علاوہ گمبھےر کے کے آر کی طرف سے چیمپئنز لیگ میچ میں بھی نہیں دکھائی دے رہے ہیں۔ تو آخر گمبھیر کر کیا رہے ہیں؟ اصل میں دہلی کے گوتم گمبھیر گھوڑی پر چڑھنے کی تیاری کر رہے ہیں۔ اسی سال گمبھےر اکتوبر نومبر میں شدید شادی کے بندھن میں بدھنے والے ہیں اور اس مےدان پر انہیں کلین بولڈ کرنے والی ہیں دہلی کی ہی نتاشا جین۔ خبروں کے مطابق اسی سال اکتوبر نومبر میں 29 سال کے گمبھیر 27 سال کی نتاشا جین کو اپناہم سفر بنائےںگے۔ گمبھےردہلی کے راجندر نگر میں رہتے ہیں جبکہ نتاشا دہلی کے ہی ماڈل ٹاو ¿ن میں رہتی ہیں۔ نتاشا دہلی کے ایکصنعتی گھرانے کی بیٹی ہے۔ مانا جا رہا ہے کہگمبھےر شادی کو کافی خفےہ رکھنا چاہتے ہیں۔ اس لئے شادی میں صرف 100-200 مہمانوں کو ہی دعوت دی جائے گی۔ کم لوگوں کے درمیان ہی سہی لیکن گوتم شادی کو یادگار ضرور بنانا چاہتے ہیں۔ کچھ خبروں کے مطابقگمبھےر کی شادی میں راحت فتح علی خان پرفارم کر سکتے ہیں۔ اس کے علاوہ شادی میں عاطف اسلم کے بھی اپنا پروگرام پیش کرنے کی امید ظاہر کی گئی ہے۔ ادھر گوتم نے ٹیم انڈیا سے ملی چھٹی کا بھی بھرپور استعمال کیا ہے۔ انہوں نے اپنی شیروانی کی ڈےزائننگ کی ذمہ داری مشہور فیشن ڈیزائنر شانتنو نکھل کو سونپی ہے۔ یہ دونوں صرف گمبھےر کی شیروانی ہی نہیں بلکہ نتاشا کے لہنگے کو بھی ڈیزائن کریں گے۔
Wednesday, September 21, 2011
غربت کا مذاق۔۔۔
ہندوستانی منصوبہ بندی کمیشن نے تسلیم کیا ہے ملک کی کل آبادی کا سینتیس فیصد خطِ غربت سے نیچے زندگی گزار رہا ہے۔ادھراین جی اوز نے صرف غربت کی لکیر کے نیچے جینے والے افراد کو اناج کی لازمی فراہمی کے منصوبے کو رد کرتے ہوئے حکومت سے تمام غرباءکے لیے یکساں اصول اپنانے کا مطالبہ کیا ہے۔منصوبہ بندی کمیشن نے اس سلسلے میں تندولکر کمیٹی کی اس رپورٹ کو بنیاد تسلیم کیا ہے جس میں کہا گیا ہے کہ ہندوستان میں خطِ غربت سے نیچے زندگی گزارنے والے افراد کی تعداد میں دس فیصد کا اضافہ ہوا ہے اور اب ملک کی ایک تہائی سے زائد آبادی غربت کی لکیر سے نیچے جی رہی ہے۔خوراک کے حق کے بل پر قانون سازی کرنے والے ’امپاورڈ گروپ آف منسٹرز‘ نے نیشنل فوڈ سکیورٹی ایکٹ پر عوامی حلقوں کی کڑی تنقید کے بعد منصوبہ بندی کمیشن سے کہا تھا کہ وہ ملک میں غریب افراد کی تعداد بتائے۔اس کے جواب مےںہندوستان کے منصوبہ بندی کمیشن نے سپریم کورٹ کو بتایا ہے کہ دہلی اور ممبئی جیسے شہروں میں بتیس روپے روزانہ سے زیادہ پرگزارہ کرنے والے لوگوں کو انتہائی غریب افراد کے زمرے میں شامل نہیں کیا جاسکتا۔کمیشن نے عدالت میں ایک حلفیہ بیان داخل کیا ہے جس میں کہا گیا ہے کہ شہروں میں رہنے والے جو لوگ نو سو پینسٹھ روپے ماہانہ خرچ کرنے کی صلاحیت رکھتے ہیں انہیں انتہائی غریب لوگوں کے زمرے سے باہر رکھا جائےگا۔اس کا مطلب یہ ہے کہ ایسے لوگوں کو سستے اناج کی شکل میں وہ امداد فراہم نہیں کی جائے گی جو انتہائی غریب لوگوں کومہیا کی جاتی ہے۔غریبوں کا تعین کرنے کے لیے تشکیل دی گئی تندولکر کمیٹی کی رپورٹ کا حوالہ دیتے ہوئے کمیشن نے کہا کہ شہروں میں آباد جن پانچ افراد پر مشتمل خاندانوں کی ماہانہ آمدنی چار ہزار آٹھ سو چوبیس روپے سے کم ہے، صرف وہی انتہائی غریب کے زمرے میں شامل کیے جائیں گے جبکہ دیہی علاقوں میں یہ حد تین ہزار نو سو پانچ روپے رکھی گئی ہے۔کمیشن کا موقف ہے کہ اس رقم میں چار لوگوں کے کنبے کی صحت، خوراک اور تعلیم سے متعلق تمام ضروریات پوری ہوسکتی ہیں۔ اس سے زیادہ خرچ کرنے والے کنبے غریبوں کے زمرے میں تو شامل ہوں گے لیکن انہیں بہت سی رعایتوں سے محروم کر دیا جائے گا۔حکمراں یو پی اے کی چیئر پرسن اور کانگریس پارٹی کی صدر سونیا گاندھی کی قیادت والی قومی مشاورتی کونسل کے رکن اور ماہر اقتصادیات ڑوں ڈریز نے کہا ہے کہ کمیشن کے حساب سے حفظان صحت کے لیے روزانہ ایک روپیہ کافی ہے حالانکہ اتنے میں سر کے درد کی ایک گولی بھی نہیں ملتی۔
یہ حلف نامہ سپریم کورٹ کی اس ہدایت کے بعد داخل کیا گیا ہے کہ کمیشن مہنگائی کی موجودہ صورتحال کو مد نظر رکھتے ہوئے اپنے اعداد و شمار پر نظر ثانی کرے۔قومی مشاورتی کونسل کی ایک اور رکن ارونا رائے نے کہا کہ ان اعداد و شمار سے معلوم ہوتا ہے کہ حکومت غریبوں کی کتنی ہمدرد ہے۔انہوں نے ایک بیان میں کہا کہ اس پوری کارروائی کا بظاہر مقصد یہ ہے کہ انتہائی غربت میں رہنے والوں کی تعداد کم کی جائے تاکہ غریبوں کے لیے چلائی جانے والی مختلف سکیموں پر اخراجات کم ہوجائیں۔اس سے پہلے کمیشن نے عدالت کو بتایاتھا کہ شہروں میں رہنے والا جو شخص پانچ سو اناسی روپے ماہانہ خرچ کرسکتا ہے، اسے انتہائی غربب نہیں مانا جاسکتا۔ دیہی علاقوں کےلئے یہ رقم چار سو سینتالیس روپے تھی۔تیندولکر کمیٹی نے اپنی سفارشات میں کہا تھا کہ شہری علاقوں میں بیس روپے اور دیہی علاقوں میں پندرہ روپے روزانہ خرچ کرنے والے لوگوں کو خطِ افلاس یا غریبی کی لائن سے نیچے تصور نہیں کیا جاسکتا۔ کمیٹی نے یہ سفارشات دو ہزار چار اور دو ہزار پانچ کی قیمتوں کی بنیاد پر دی تھیں۔ہندوستان میں اس وقت مہنگائی بے قابو ہے اور افراط زر تقریباً دس فیصد کے قریب ہے۔ مہنگائی پر قابو پانے کے لیے حکومت گزشتہ اٹھارہ مہینوں میں بارہ مرتبہ سود کی شرح بڑھا چکی ہے لیکن اس اقدام کا کوئی مثبت نتیجہ سامنے نہیں آیا ہے۔
Wednesday, September 14, 2011
LAILA NE RECORD KAR DIYA
xگوڈ کا شکریہ، جس طرح گوڈ نے مجھے بنایا ہے ، اس سے میں کافی خوش ہوں اور میں کچھ بھی تبدیل نہیں کرنا چاہوں گی۔ میں اپنے کو باطنی خوبصورت خاتون مانتی ہوں۔ مجھے خاندان سے کئی اچھے رسومات ملے ہیں ، جن پر میں اپنی زندگی میں عمل کرنا چاہوں گی“۔ےہ کلمات تھے انگولا سے تعلق رکھنے والی لیلٰی لوپس کے جنہوں نے 2011 کا مس یونیورس مقابلہ جیت لیا ہے۔جگمگاتی روشنی کے درمےان اتراتی،اٹھلاتی اور بل کھاتی حسےناو ¿ں کی آمد اور اپنے جلوے بکھےرنے کے ساتھ ہی جب مس ےونےورس مقابلہ شروع ہوا تو اس مےں شامل نواسی ممالک کی حسےناو ¿ں مےں سے اےک لےلٰی لوپس کو قطعی ےہ اندازہ نہ تھا کہ آج اس کے سر مس ےونےورس کا تاج سجنے والا ہے۔لےکن کہتے ہےں کہ خدا کب کس کو نواز دے اس کا وہم وگمان بھی اس کے دل مےں نہےں ہواکرتا ہے۔جےسا کہ انگولا کی لےلٰی کے ساتھ ہوا۔پچیس سالہ لیلٰی کا تعلق انگولا کے شہر بینگوئلا سے ہے اور وہ بزنس ایڈمنسٹریشن کی طالبہ ہیں۔لےلٰی کے لئے یہ خوشی اس لئے بھی اہم ہے کیونکہ وہ دنیا بھر کی ریکارڈ 89شرکاءکو شکست دے کر مس یونیورس 2011 بنی ہیں۔ جیسے ہی ججوں نے مس انگولا کے مس یونیورس 2011 کے طور پر نام کا اعلان کیا ، وہ خوشی سے جھوم اٹھےں اور مس ےوکرےن کے گلے لگ گئیں۔ مس یونیورس مقابلے کی روایت کو نبھاتے ہوئے مس یونیورس 2010 یعنی میکسیکو کی جمےنا نوارتے نے انہیں کراو ¿ن پہنایا۔ لیلٰی لوپس جیوری کی فیوریٹ نہیں تھیں ، لیکن جوں جوں مقابلہ آگے بڑھا لوپس کا جلوہ بڑھتا چلا گیا۔ لیلٰی لوپس کا مس ےونےورس بننا محض اےک اتفاق نہےں بلکہ اس کے لئے اس نے 14 سال کی عمر سے ہی خوبصوی کے مقابلوں میں حصہ لینا شروع کر دےا تھا۔ اس کی ابتدالیلٰی لوپس نے بچپن میں ہی اپنے پڑوسیوں کے ساتھ مل کر شروع کر دی تھی۔لیلٰی محلے کی لڑکیوں کے درمیان مقابلہ کا انعقاد کرواتی تھیں۔ دھیرے دھیرے انہوں نے اپنی نگاہیں مس انگولا ٹائٹل پر ٹکا دیں اور اس کے بعد انہوں نے کبھی پیچھے مڑ کر نہےں دےکھا۔برازیل کے شہر ساو ¿ پاو ¿لو میں منعقدہ ساٹھویں مس یونیورس مقابلے کے فائنل کو دنیا بھر میں تقریباً دو ارب افراد نے ٹی وی پر براہِ راست دیکھا۔اس مقابلے میں دنیا بھر سے نواسی حسینائیں شریک ہوئیں اور حتمی مرحلے تک رسائی پانے والی حسیناو ¿ں میں مس انگولا کے علاوہ، مس چین، مس برازیل، مس یوکرین اور مس فلپائن بھی شامل تھیں۔مقابلہ جیتنے کے بعد لیلٰی لوپس کا کہنا تھا کہ ان کے خیال میں ان کی مسکراہٹ ان کی فتح کی وجہ بنی۔انہوں نے کہا ’میں نے ہمیشہ بے حد خوش رہنے کی کوشش کی ہے اور مجھے لگتا ہے کہ آج میں اپنی شخصیت کا یہ پہلو سامنے لانے میں کامیاب رہی ہوں“۔لیلٰی لوپس کا یہ بھی کہنا تھا کہ مس یونیورس بننے کے بعد اب ان کی توجہ ان کے اپنے براعظم افریقہ اور باقی دنیا میں ایڈز اور غربت کے خلاف جنگ پر ہوگی۔واضح ہو کہ برازیل میں منعقد اس مقابلہ سے ہندوستانی دعوےدار واسوکی سنکابلی پہلے ہی باہر ہو گئی تھیں۔ واسوکی مقابلہ کی آخری 16 شرکاءمیں بھی اپنی جگہ نہیں بنا سکی تھیں۔ وہیں یوکرین کی آلسےا اسٹےفنکو مقابلہ میں پہلی رنراپ رہیں اور برازیل کی پرےسلا مےڈوکو دوسری رنر اپ رہیں۔ مقابلے کی گزشتہ سال کی فاتح میکسیکو کی جمےنا نوراتے نے لوپس کو تاج پہنایا۔ اس بار 89 ممالک کی شرکاءنے اس میں حصہ لیا جبکہ اب سے پہلے 86 ممالک کیشرکاء ہی اس میں شامل ہوتی تھیں۔جب 25 سالہ لیلی کو تاج پہنایا گیا اس وقت دنیا میں کئی جگہ منگل کی صبح آ چکی تھی۔اس وقت اپنے جذباتوں پر قابو رکھتے ہوئے لوپس نے کہا ، ”میں اپنے لوگوں کی مدد کے لئے پہلے ہی بہت کچھ کر چکی ہوں۔ میں نے بہت سے سماجی کاموں میں ہاتھ بٹاےا ہے۔ میں غریب بچوں کے ساتھ کام کرتی ہوں۔ ایچ آئی وی کے خلاف لڑائی میں مدد کرتی ہوں۔ بزرگوں کے لئے کام کرتی ہوں اور وہ سب کرتی ہوں جس کی میرے ملک کو ضرورت ہے۔ اب میں مس یونیورس ہوں تو مجھے امید ہے کہ میں اور مزید کر پاو ¿نگی “۔اپنی خوبصورتی کے راج سے اس نے پردہ کچھ ےوں اٹھاےا”خوب ساری نیند، دھوپ نہ ہو تب بھی سن اسکرین کا استعمال اور خوب سارا پانی کا استعمال کرتی ہوں تبھی تو ےہاں تک پہنچی ہوں“۔
Thursday, September 8, 2011
دس چیزیں چرا سکتی ہیں آپکی انرجی
معراج نوری
کیا کبھی آپ نے غور کیا ہے کہ کسی کسی دن ہم کچھ کام نہیں کرتے ، پھر بھی تھکان محسوس کرتے ہیں۔ اگر ہاں ، تو اس کا مطلب ہے کہ اس دن آپ کاانرجی لیول بہت لو ہوتا ہے۔ آپ کواحساس بھی نہےں ہو پاتا کہ کون کون سی چیزیں آپ کی انرجی چرا سکتی ہیں۔آئےے اےک نظر ڈالتے ہےں ان پر:
۔ آپ کا موبائل
موبائل ہماری زندگی کا ایسا اہم حصہ بن گیا ہے کہ اگر وہ کچھ دیر نہ بجے تو ہم بے چےن ہو جاتے ہیں اور چیک کرنے لگتے ہیں کہ کہی وہ سوئچ آف تو نہیں ہو گیا ہے۔ گھنٹوں ہم موبائل پر بات کرتے ہیں اور جب بات نہیں ہو رہی ہوتی ہے تو کان میںاےئر فون لگا کر گانے سننے لگتے ہیں۔ لیکن سچ تو یہ ہے کہ 15 منٹ بعد ہی آپ کا توازن گڑبڑانے لگتا ہے اور انرجی کم ہونے لگتی ہے۔ کام کرتے وقت آپ کو نیند آنے لگتی ہے۔ بہتر ہوگا کہ نوائس کنسےلنگ اےئر فون کا استعمال کریں۔ والےوم کو کم پر رکھنا نہ بھولیں۔
۔ منفی سوچ
یہ لوگ آپ کے ساتھی ، پڑوسی ، رشتہ دار یا واقف کاریا گھر کے رکن کوئی بھی ہو سکتے ہیں۔ آپ جب بھی ان سے ملتے ہیں ، آپ کو پتہ بھی نہےںچلتا اور یہ آپ کی انرجی چرا لیتے ہیں۔ آپ کے کنفےڈنس اور سیلف اسٹےم کو کم کر کے یہ آپ کو منفی سوچ کے ایک سائیکل میں پھنسا دیتے ہیں اور آپ کی زندگی میں اختلافات و غصہ پیدا کرتے ہیں۔ ایسے لوگوں سے پوری طرح نجات پانا تو ناممکن ہے ، لےکن جتنا ممکن ہو ، ان سے رابطہ کم ہی رکھیں۔ انہیں اپنی زندگی سے نکال کر پھینک سکتے ہیں تو بہت اچھا۔
۔ آپ کا کمپیوٹر
زمانہ کمپیوٹر کا ہے ، اس لئے اس کے استعمال سے بچنا ناممکن ہے۔ لیکن کمپیوٹر پر کام کرنے اور کرسی پر ایک ہی طرح بیٹھے رہنے سے بلڈ سرکولےشن متاثر ہوتا ہے۔ کمپیوٹر پر مسلسل کام کئے بغیر آپ کا گزارا نہیںہو تو ہر گھنٹے کے بعد 1 منٹکی ورزش۔ کرسی پر بیٹھے بیٹھے ہی پیروں کو جسم کی لائن میں لائیں اور کندھوں کو ڈھیلا چھوڑ دیں۔
۔ آپ کا ٹی وی
شاید آپ کو معلوم نہیں کہ ٹی وی بھی آپ کی انرجی چراکر سست بنا دیتا ہے۔ آپ گھر پہنچتے ہیں اور ٹی وی کے سامنے بیٹھنا چاہتے ہیں۔ آپ یہ بھول جاتے ہیں کہ ٹی وی آپ کو اور سست بنا رہا ہے۔ اگر آپ ہلکی سی جھپکی لے لیتے ہیں یا ورزش کر لیتے ہیں یا پھر خاندان اور بچوں کے ساتھ وقت گزار دیتے ہیں تو انرجی واپس آ جائے گی۔
۔ غےر صحتمند ماحول
ایک بکھرا ہوا یا گندا ڈیسک یا گھر آپ کی توانائی کو چرا سکتا ہے۔ ادھر ادھر پھیلا سامان ، کباڑ اور غیر ضروری چیزوں سے بھرا گھر ، آفس کاکےبن یا ٹیبل آپ کے کام کرنے کی خواہش کو کم کرتے ہیں۔ بے ترتیب چیزوں کو دیکھ کر دل میں ایک جھنجھلاہٹ پیدا ہوتی ہے اور آپ تھکاوٹ محسوس کرنے لگتے ہیں۔ جتنا ممکن ہو اپنے ارد گرد کے ماحول کو صاف رکھیں۔
۔ ان ہےلدی فوڈ
کئی لوگ یہ سمجھ ہی نہیں پاتے کہ تلا ،، انتہائی نمک والے ، مزید چینی والے کھانے کا کتنا برا اثر ان کے جسم پر پڑتا ہے۔ ان ہےلدی فوڈ متعدد بیماریوں اور موٹاپے کے علاوہ آپ کی توانائی بھی چرا لیتا ہے اور آپ ڈپرےشن میں بھی آ سکتے ہیں۔ اناج ، پھل ، سبزیاں ، میوے ، وغیرہ اپنے خوراک میں شامل کریں۔ آپ خود ہی اپنے اندر فرق محسوس کریں گے۔
۔ نیند کی کمی
سوتے وقت ہمارے تن اور من دونوں کی ایک طرح سے رےپےرنگ ہوتی ہے۔ یوں کہیں کہ نیند انرجی کے حصول کا اصلی وسیلہ ہے۔ انرجی کم ہونے کی سب سے بڑی وجہ ہے نیند پوری نہ ہو پانا۔ ایک رات بھی نیند پوری نہ ہونے پر اگلے 24-48 گھنٹے خراب ہو جاتے ہیں۔ نیند ہمارے کام کی کوالٹی اورکواٹٹی دونوں پر اثر ڈالتی ہے۔ جو لوگ رات بھر سو نہیں پاتے ، وہ اگلے دن سستی محسوس کرتے ہیں اور کسی کام میں ان کا دل نہیں لگتا۔ صحیح طریقے سے سو پائیں گے تو مزید سونے کی ضرورت بھی محسوس نہیں ہوگی۔
۔ ڈی ہائڈرےشن
آپ اتنےمشغول ہیں کہ کھانا تو کیا پانی پینے کا بھی وقتنہےں نکال پا رہے ہیں۔ کچھ وقت بعد آپ کاانرجی لیول گر جائے گا۔ تھکاوٹ محسوس کرنے لگیں گے۔ توانائی واپس پانے کے لیے پانی پےجئے اور اس کے لئے وقت نکالئے ، خاص طور پر تب جب آپ بہت دیر سے کسی سے بات کررہے ہوں۔
۔ غصہ
غصہ کچھ ہی منٹوں میں آپ کے انرجی لیول کو ڈاون کر دیتا ہے۔ اتنا ہی نہیں ، یہ آپ کے اندر منفی خیال بھی بھر دیتا ہے ، جس کی وجہ سے آپ مایوس رہنے لگتے ہیں۔ یہ آپ کی زندگی کی رفتار اور کام دونوں کو روک دیتا ہے اور جسمانی و ذہنی توانائی کو چرا لیتا ہے۔ جب بھی غصہ آئے ، ذہن کہیں اور لگانے کی کوشش کریں اور پانی پی لیں۔
۔ آمدنی سے زیادہ خرچ
اپنی آمدنی سے زیادہ خرچ کرنا مسلسل آپ کی توانائی کمزور کرتا ہے۔ اپنا ایک بجٹ بنائیں اور اس پر قائم رہیں۔ اس سے آپ کو نہ تو بل پےمنٹ کرنے کی فکر ستائےگی اور نہ ہی کسی سے لون لینا پڑے گا۔ جب شاپنگ پر جائیں تو فہرست بنا کر لے جائیں تاکہ فضول خرچ کرنے کی نوبت نہ آئے۔ اس سے آپ کا انرجی لیول صحیح رہے گا۔
Sunday, September 4, 2011
yaume asataza ke haqiqi mane
ڈاکٹر رادھاکرشنن کسی تعارف کے محتاج نہ ہو کرہندوستان ہی نہیںبلکہ پوری دنیا میں اپنی الگ شہرت رکھتے تھے ۔وہ بہت بڑے فلاسفر تھے۔ یہ کہنا کہ وہ ہندوستان کی شناخت تھے تو کوئی غلط نہیں ہوگا۔ بنیادی طور پر استاد ہونے کی حیثیت سے ان کے جنم دن 5 ستمبر کو یوم اساتذہ کے طور پر مناکر ہم انہےں عقیدت پیش کرتے ہیں ۔ڈاکٹر سروپلی رادھاکرشنن ہندوستانی سماجی ثقافت کے دلدادہ ایک ماہرتعلیم، عظیم فلسفی اور عظیم مقرر تھے۔وہ آزادہندوستان کے دوسرے صدر تھے۔ ڈاکٹر رادھاکرشنن نے اپنی زندگی کے 40 اہم سال ٹیچر کے طور پرگزار دےئے۔ ان مےں ایک لائق ٹیچر کے سارے گن موجود تھے۔ سن 1962 میں جب وہ صدر بنے تھے ، اس وقت کچھ شاگرد اوران کے کچھ مداح ان کے پاس گئے تھے۔ اسی وفد سے بات چےت کے بعدانہوں نے اپنا جنم دن ےوم اساتذہ کے طورپر منانے کی خواہش ظاہر کی تھی جس کا ہی نتےجہ ہے کہ سارے ملک میں ڈاکٹر رادھاکرشنن کی پیدائش کے دن 5 ستمبر کوےوم اساتذہ کے طور پر منایا جاتا ہے۔ڈاکٹر رادھاکرشنن تمام دنیا کو ایک تعلےم گاہ مانتے تھے۔ ان کی سوچ تھی کہ تعلیم کے ذریعے ہی انسانی دماغ کابہتراستعمال کیا جانا ممکن ہے۔ اسی لیے تمام دنیا کو ایک اکائی سمجھ کر ہی تعلیم کا انتظام کیا جانا چاہئے۔ ایک بار تقریر کرتے ہوئے ڈاکٹر سروپلی رادھاکرشنن نے کہا تھا کہ انسان کو متحدہونا چاہئے۔ وہ طلبا کی حوصلہ افزائی کرتے تھے کہ وہ اخلاقی اقدار کو اپنی زندگی کا حصہ بنا لےں۔ وہ جس موضوع کو پڑھاتے تھے ، پڑھانے کے پہلے خود اس کا اچھی طرح مطالعہ کرتے تھے۔ فلسفہ جیسے سنجیدہ موضوع کو بھی وہ اپنی طرز سے آسان اور دلچسپ بنا دیتے تھے۔ان کی ےوم پےدائش ہر سال 5 ستمبر کو” یوم اساتذہ“ کے طور پر منائی جاتی ہے۔ ان دنوں جب استاداور شاگرد تعلقات کی پاکیزگی کو گرہن لگتا جا رہا ہے ، ان کے افکار ایک نئی بیداری پیدا کر سکتے ہےں۔
ہندوستان میں صدیوں سے کسی نہ کسی عہد ساز شخصےت کے پیدا ہونے کی روایت چلی آ رہی ہے۔اسی سیریز میں ڈاکٹر سروپلی رادھاکرشنن بھی ایک اہم کڑی ہیں۔ ایک استاد ہونے کے بعد بھی پوری دنیا مےں جلوہ،اسکے بعد بھی ایک استاد، شاید یہی ان کی پہچان تھی۔ زندگی کے بے شمار اتار چڑھاو¿ کو جھےلتے ہوئے ڈاکٹر رادھاکرشنن مسلسل آگے بڑھتے گئے۔ ایسے استاد کی شخصیت کو کتابی شکل میں سمےٹنا ناممکن کام ہے۔ پھر بھی بہت سے مصنفوںنے ان کی مکمل زندگی کو کتاب میں سمیٹنے کی قابل ستائش کی کوشش کی ہےںجس کے مطالعہ سے ہم اور آپ ان کے عمل ،کردار اور شخصےت کا بخوبی اندازہ لگا سکتے ہےں۔5 ستمبر کو ہر سال ملک بھر میںےوم اساتذہ منایا جاتا ہے۔ کیا آپ جانتے ہیں کہ یوم اساتذہ کا انعقاد کےوں کیا جاتا ہے؟ ےوم اساتذہ ملک کے عظیم فلسفی اور ماہر تعلیم ڈاکٹر سروپلی رادھاکرشنن کے یوم پیدائش کی یاد کے طور پر منایا جاتا ہے۔ڈاکٹر سروپلی رادھاکرشنن نہ صرف ماہر تعلےم تھے ، بلکہ وہ عظیم سیاسی لیڈر بھی تھے۔ وہ آزاد ہندوستان کے پہلے نائب صدر بنائے گئے۔ ڈاکٹر راجندر پرساد کے بعد 1962 میں انہیں ملک کا دوئم صدر ہونے کا اعزاز ملا۔5 ستمبر ، 1888 کو چنئی سے تقریبا 200کلومےٹر جنوب- مغرب میں واقع ایک چھوٹے سے قصبے ترو تانی میں ڈاکٹر رادھاکرشنن کی پیدائش ہوئی تھی۔ ان کے والد کا نام سروپلی وی راماسوامی اور ماں کا نام محترمہ سیتا جھا تھا۔ راماسوامی ایک غریب برہمن تھے اور تروتانی قصبے کے زمیندار کے یہاں ایک عام ملازم کی طرح کام کرتے تھے۔ڈاکٹر رادھاکرشنن اپنے والد کی دوسری اولاد تھے۔ ان کے چار بھائی اور ایک چھوٹی بہن تھی ۔چھ بہن- بھائیوں اور ماں- باپ کو ملا کر آٹھ ارکان کے اس خاندان کی آمدنی انتہائی محدود تھی۔ اس محدود آمدنی میں بھی کسی طرح تعلےم حاصل کرکے اور خود کو اس مقام پر لا کرڈاکٹر رادھاکرشنن نے ثابت کر دیا کہ صلاحےت کسی کی مرہون منت نہےں ہوا کرتی ہےں۔ انہوں نے نہ صرف ماہر تعلیم کے طور پر شہرت حاصل کی ، بلکہ ملک کے سپریم عہدے ’صدارت‘ کے عہدے پر فائز بھی ہوئے۔علم اور تعلیم کے تئےں ڈاکٹر رادھاکرشنن کے دل میں کافی جگہ تھی۔ یہی وجہ تھی کہ اے سے لے کر آخری کلاس تک انہوں نے فرسٹ کلاس ہی حاصل کیا۔ علم اور تعلیم سےان کے عشق کی وضاحت 23 جنوری ، 1957 کو کلکتہ یونیورسٹی کی صدی تقریب کے موقع پر دیئے گئے ڈاکٹر رادھاکرشنن کی تقریر سے واضح ہوتا ہے۔اگر ہم دنیا کی تاریخ کو دیکھےں ، تو پائیں گے کہ تہذیب کی تعمیر ان عظیم لوگوں اور سائنسدانوں کے ہاتھوں سے ہوئی ہے ، جو خود غور کرنے کی صلاحیت رکھتے ہیں ، جو ملک اور زمانہ کی گہرائیوں میں داخل ہوتے ہیں ، ان کے راز کا پتہ لگاتے ہیں اور اس طرح سے حاصل علم کا استعمال عالمی کریڈٹ یاعوامی بہبود کے لئے کرتے ہیں۔ کوئی بھی آزادی تب تک سچی نہیں ہوتی ، جب تک اسے اظہار رائے کی آزادی حاصل نہ ہو۔ کسی بھی مذہبی عقائد یا سیاست کو حق کی تلاش میں رکاوٹ نہیںڈالنا چاہئے۔لہذٰا آج ضرورت اس بات کی ہے کہ ہم ان کے افکار،تعلےمات اور خےالات سے استفادہ حاصل کرکے اپنی تعلےم اور طرز زندگی مےں اےک اےسا انقلاب لائےں کہ خود ہمےں فخر محسوس ہو اور اسی کے ساتھ سماجی اور تعلےمی مےدان مےں ہمارا ملک دنےا پر چھا جائے۔
Amjad Islam Amjad Ka Kalam
میرا فن، میری کاوش، مرا ریاض
اک نا تمام گیت کے مصرے ہیں جنکے بیچ
معنی کا ربط ہے نہ کسی قافیے کا میل
انجام جسکا طے نہ ہوا ہو ،اک ایسا کھیل
مری متاع بس یہی جادو ہے عشق کا
سیکھا ہے جسکو میں نے بڑی مشکلوں کے ساتھ
لیکن یہ سحرِ عشق کا تحفہ عجیب ہے
کھلتا نیہں ہے کچھ کہ حقیقت میں کیا ہے یہ
!تقدیر کی عطا ہے یا کوئی سزا ہے یہ
کس سے کہیں اے جاں کہ یہ قصہ عجیب ہے
کہنے کو یوں تو عشق کا جادو ہے میرے پاس
پر میرے دل کے واسطے اتنا ہے اسکا بوجھ
سینے سے اک پہاڑ سا ، ہٹتتا نیہں ہے یہ
لیکن اثر کے باب میں ہلکا ہے اسقدر
تجھ پر اگر چلاوں تو چلتا نیہں ہے یہ
اک نا تمام گیت کے مصرے ہیں جنکے بیچ
معنی کا ربط ہے نہ کسی قافیے کا میل
انجام جسکا طے نہ ہوا ہو ،اک ایسا کھیل
مری متاع بس یہی جادو ہے عشق کا
سیکھا ہے جسکو میں نے بڑی مشکلوں کے ساتھ
لیکن یہ سحرِ عشق کا تحفہ عجیب ہے
کھلتا نیہں ہے کچھ کہ حقیقت میں کیا ہے یہ
!تقدیر کی عطا ہے یا کوئی سزا ہے یہ
کس سے کہیں اے جاں کہ یہ قصہ عجیب ہے
کہنے کو یوں تو عشق کا جادو ہے میرے پاس
پر میرے دل کے واسطے اتنا ہے اسکا بوجھ
سینے سے اک پہاڑ سا ، ہٹتتا نیہں ہے یہ
لیکن اثر کے باب میں ہلکا ہے اسقدر
تجھ پر اگر چلاوں تو چلتا نیہں ہے یہ
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Friday, September 2, 2011
اردو کاقانونی موقف
اردو ہمارے ملک کی ایک مشترکہ زبان ہے۔جو ہماری تہذیب و تمدن کی علامت ہے۔ یہ ایک حقیقت ہے کہ تمدن اور زبان کوجدا نہیں کیا جاسکتا۔اردو زبان ہماری تمدنی تہذیب کا جز و لا ینفک ہے۔ہر زبان عوام سے وابستہ اور جڑی ہوئی ہوتی ہے اور اسے عوام سے جدا نہیں کیا جاسکتا۔ زبان کا زندگی سے بھی گہرا اربط ہوتا ہے اور زبان کے ذریعہ مواصلات (ادایئگی جذبات، احساسات و خیالات )زندگی کا ثبوت ہے۔قانون ، دستور اور زندگی ایک دوسرے سے مربوط اور ایک دوسرے کا اٹوٹ حصہ ہیں۔ اردو دستور ہند کے آٹھویں جدول کے تحت قومی زبانوں میں سے ایک ہے۔آزادءہند کے بعد اردو کو ریاست جموں و کشمیر کی زبان قرار دیا گیا۔ یہ ایک سیاسی فیصلہ تھا کیوں کہ اردو جموں و کشمیر کی زبان نہیں ہے۔ دستور کی دفعہ تین سو پینتالیس کے تحت ریاستی مقننہ قانون کی منظوری کے ذریعہ کسی ایک یا ایک سے زائد زبانوں کو ریاست کے کسی ایک یا تمام مقاصد کے لیے استعمال کرنے کا اعلان کر سکتی ہے۔اس دستوری گنجائش کے تحت کئی ریاستوں نے قانون کی منظوری کے ذریعہ اردو کوسرکاری موقف عطا کیا۔ان ریاستوں میں کرٹاٹک، اتر پردیش اور مغربی بنگال شامل ہیں۔ بہار میں قانون سرکاری زبان میں ترمیم کے ذریعہ اردو کودوسری سرکاری زبان بنایا گیا ،لیکن اردوکو واقعی دوسری سرکاری زبان کہنا یا سمجھنامحض ایک مذاق یا لطیفہ ہے۔ کیوں کہ جن اغراض کے لیے اردو کو دوسری سرکاری زبان بنایا گیا ،ان میں صرف ناموں کی تختیاں آویزاں کرنااور اردو درخواستوں کی قبولیت شامل ہے۔
آندھرا پردیش میںاردو کا موقف قانون کے مطابق بہت مضبوط و مستحکم ہے لیکن عمل آوری کی سطح پر صفر ہے۔ریاست میں قانون سرکاری زبان انیس سو چھیاسٹھ میں نافذ کیا گیا۔اس قانون کے نفاذ کا مقصد آندھرا پردیش میں سرکاری مقاصد کے لیے تلگو زبان کو مروج کرنا تھا،اس کے علاوہ ریاستی مقننہ کی کاروائی بھی تلگو میں چلانا تھا۔
قانون سرکاری زبان کی دفعہ سات کے تحت ، کسی اور زبان کی بھی، ان میں سے کسی ایک یا تمام مقاصد کے لیے استعمال کی گنجائش شامل ہے۔
دفعہ سات: اردو یا کسی اور زبان یا زبانوں کو تلگو کے علاوہ ریاست کے متعدد علاقوں میں ایسے سرکاری مقاصد کے لیے اور ایسی مدت کے لیے استعمال کیا جاسکے گا،جس کی صراحت آندھرا پریش گزٹ میں اعلامیہ کے اندراج کے ذدیعہکی جاے۔ یہ ہدایت دی جاے کہ اردو یا کسی اور زبان کو تلگو کے علاوہ ایسی زبان یا زبانوں کے بولنے والوں کےمفاد میں، ایسے علاقوں اور ایسے سرکاری مقاصد کے لیے استعمال کیا جاے، جن کی اعلامیہ میں صراحت کی جاے۔اس قانون کے نفاذ کے گیارہ سال کی طویل مدت کے بعد حکومت نے جی بو ایم ایس چار سو بہتر سال انیس سو ستہتر میں جاری کیا گیا جس میں انعلاقوں اور مقاصد کی صراحت کی گیء جن کے لےی اردو ایکسرکاری علاقاءزبان کے طور پر استعمال کی جاے :۔
تلگو کے علاوہ اردو کواضلاع اننت پور ،کڑپہ اورکرنول اور تلنگانہ کے تمام اضلاع میں حسب ذیل مقاصد کے لیے استعمال کر نے کی ہدائت دی :
الف)بطور علاقاءزبان سیکریٹیریئل ، مجسٹیرئیلاور جوڈیشئیل مجسٹیرئیل خدمات میں راست تقررات کے لیے
ب)گزیٹڈ اور نان گزیٹڈخدمات میںایک زبان کے طور پر دوسری زبان ٹسٹکے مقصد سے
ج)جہاں تک قابل عمل ہواردو درخواستوں کا جواب اردو ہی میں بھجا جاے۔
د)آندھرا پردیش ہاءکورٹ کی ماتحت عدالتوں میں دیوانی اور فوج داری مقدمات میں اضلای اننت پور،کڑپہ ، کرنول ،گنٹور ،عادل آباد۔ حیدرآباد، رنگا ریڈی ،، کریم نگر، کھمم ، محبوب نگر ، میدک ، نلگنڈہ، نظام آباد اور ورنگل بطمو زبان اردو استعمال کی جاسکے گی۔
ہ)جہاں کسی بھی عہدہ پرترقی کے لیے، تلگو ٹسٹ ایک اضافہ قابلیتمتصور ہوگی، کسی بھی اردو داںملازم کو جس نے تلگو ٹسٹ کامیاب نہ کیا ہو، اگر وہ بہ اعتبار دیگر استحقاق رکھتا ہو ، تو وہ ترقی کے لیے غور کے قابل ہوگا بشرطیکہ وہ مخصوص مدت میں تلگو ٹسٹ کامیاب کر لے۔
و) اگر دس طلبہ دستیاب رہیں تو اردو جماعت اور اگر پینتالیس طلبہ دستیاب رہیں توتو ایک اردو اسکول قائم کیا جاے گا۔
قانون سرکاری زبان کے نفاذ کے تیس سال بعد سال انیس سو چھیانوے مین اسمبلی ترمیمی قانون منظور کیا کیااور پھر تین سال بعدانیس سو ننانوے میںایک اور ترمیمی قانون منظور کیا گیا جس کے ذریعہ اردو کو حسب ذیل اضلاع میں دوسری سرکاری زبان بنایا گیا:
اننت پور ، کڑپہ ، کرنول ،گنٹور، عادل آباد، حیدرآباد ،رنگا ریڈی، کھمم ، محبوب نگر، میدک ، نلگنڈہ ، نظامآباد ورنگل اور کریم نگر
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