Saturday, December 24, 2011

ہندستانی سپریم کورٹ کا تاریخی فیصلہ


ہندستان کثیر المذہب ملک ہے یہاں صدیوں سے مختلف قوم ونسل اور مذہب کے لوگ آپس بھائی چارگی کے ساتھ مل جل کر رہتے ہیں۔ ہندستان کی اسی خصوصیت کے سبب عالمی سطح پر یہ ملک کثرت میں وحدت کا بے مثل نمونہ سمجھا جاتا ہے۔ لیکن اس کے ساتھ ہی اس کا ایک تاریک پہلو یہ ہے کہ اس ملک میں کچھ ایسے شر پسند عناصر بھی ہیں جو کسی بھی قیمت پر ہندستان کی اس شناخت کو پسند نہیں کرتے اور ایک خاص شناخت کے ساتھ اس ملک کو نئی پہچان دینے کی فکر میں رہتے ہیں۔ اسی حوالے سے ایک تازہ ترین واقعہ سامنے آیا۔ 4 ستمبر کو جھارکھنڈ کے گورنر سید احمد نے بہ حیثیت گورنر حلف لیتے ہوئے اللہ کے نام سے حلف کی ابتدا کی او ر اللہ کے نام سے عہدے کے تقدس کا حلف لیا۔ اس کے بعد کچھ شر پسند عناصر نے اس کو اپنی انا کا مسئلہ بناتے ہوئے سید احمد کو آرے ہاتھوں لینے کی کوشش۔ جھارکھنڈ جہاں تقریباً 40 فیصد آبادی مسلمانوں کی ہے۔ لیکن یہ سوئے اتفاق ہے کہ اس صوبے میں بی جے پی کے اشتراک سے حکومت بنی ہے۔ اس حلف کے بعد کمل نرائین نامی ایک شخص نے جھارکھنڈ کے ہائی کورٹ میں ایک عرضی دائر کرتے ہوئے کہا کہ ان کا اللہ کے نام پر حلف لینا غیر آئینی ہے اس لیے فوری طور پر انھیں گورنر کے عہدے سے ہٹایا جائے۔ جھارکھنڈ کے ہائی کورٹ نے اس عرضی کو ناقابل سماعت سمجھتے ہوئے اسے خارج کردیا۔ اس کے بعد کمل نرائن نے سپریم کورٹ کا دروازہ کھٹکھٹایا۔ کمل نرائین بظاہر یاک شخص ہے لیکن اس کے پیچھے ایسے شر پسند عناصر موجد تھے جو یہ چاہتے تھے کہ ہندستان میں صرف ایشور کے نام سے ہی حلف لے سکتے ہیں۔ خیر سپریم کورٹ میں دو ججوں کے بینچ نے اس معاملے پر غور وخوض کیا اور فیصلہ سناتے ہوئے کہا کہ اس ملک میں اگر کوئی شخص اللہ کے نام پر کسی عہدے کا حلف لیتا ہے تو ہو غیر آئینی نہیں ہے۔ بلکہ آئین کے موافق ہے۔ کیونکہ خدا۔ اللہ ، ایشور ، گاڈ سب ایک ہی معنی میں استعمال ہوتا ہے۔سپریم کورٹ کا یہ فیصلہ ایسے شر پسند عناصر کے منہ پر ایک زبردست طمانچہ ہے جو ملک کو مذہب کے نام پر بانٹا چاہتے ہیں۔اور اس ملک کے سیکولر کردار کو داغدار کرنا چایتے ہیں۔اس فیصلے کے بعد ہم ایسے تمام اداروں سے بھی یہی توقع رکھتے ہیں کہ ایسی حرکتوں کا منہ توڑ جواب دیا جائے تاکہ ملک کا سیکولر کردار بحال رہے۔

Friday, December 23, 2011

کروڑوںکا ہوگالوک پال


200 کروڑ کا لوک پال ، 100 کروڑ کا ابتدائی خرچ اور 400 کروڑ کی عمارت۔ جی ہاں ، ملک کو بدعنوانی پر لگام لگانے والا لوک پال سستے میں نہیں ملے گا۔ حکومت نے لوک پال بل کے ساتھ جو دستاویزات پارلیمنٹ میں پیش کئے ہیں ان کے مطابق لوک پال پر ایک سال میں 200 کروڑ روپیہ کا خرچ آئے گا۔ لوک پال تنظیم کی شروعات میں ہی حکومت کو ایک بار کا 100 کروڑ کا خرچ اٹھانا پڑے گا۔
حالانکہ حکومت کا یہ بھی کہنا ہے کہ لوک پال پر خرچ کتنا آئے گا یہ ٹھیک ٹھیک بتانا ممکن نہیں ہے لیکن اگر لوک پال کے لیے عمارت بنانے کی ضرورت پڑتی ہے تو اس پر ہی حکومت کو 400 کروڑ روپے خرچ کرنے ہوں گے۔لوک پال کے اخراجات کا انتظام ملک کے کنسولڈےٹےڈ فنڈ یعنی جامع فنڈ سے ہوگا۔ اس فنڈ میں ہی سینٹرل ایکسائز ، کسٹم اور انکم ٹیکس سمیت تمام ٹیکس جمع ہوتے ہیں۔ حکومت بانڈ جاری کر کے جو قرض بٹورتی ہے وہ اس فنڈ میں جاتا ہے۔ وہیں حکومت دوسرے ممالک اور ورلڈ بینک یا آئی ایم ایف سے جو قرض لیتی ہے وہ بھی اسی فنڈ میں جاتا ہے لیکن مجموعی طور پر بات یہ ہے کہ لوک پال کے لیے پیسہ آپ کی جیب سے جائے گا۔

रुक गईं सांसें....................


 लगता है बॉलीवुड की ऊ ला ला ला गर्ल विद्या बालन को सुर्खियों में रहने का नुस्खा मिल गया है.लोगों के दिमाग से विद्या की डर्टी पिक्चर का नशा अभी उतरा भी नहीं है कि उनकी एक नई तस्वीर ने सनसनी पैदा कर दी है. इस फोटो में विद्या की पारदर्शी पोशाक कौतूहल का विषय बनी हुई है.विद्या हाल ही में एक प्रेस कान्फ्रेंस में आईं जिसमें उन्होंने काले रंग की शर्ट पहनी हुई थी. लेकिन उनकी शर्ट इतनी झीनी थी कि वहां मौजूद लोग देखते ही रह गए. विद्या को बिना ब्रा की शर्ट में देख प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद लोगों ने 'ऊ ला ला' गुनगुनाया और उन्होंने एक दूसरे को चुटकी भी काटी.डर्टी पिक्चर की इस हीरोइन ने इस फिल्म में जहां अपनी शोख अदाओं से करोड़ों दिलों को घायल किया था इस प्रेस कान्फ्रेंस में उनकी पारदर्शी पोशाक देख लोगों की सांसे रुक सी गईं.जब तक विद्या समझ पातीं कि जाने-अनजाने वो ब्रा पहनना भूल गई हैं प्रेस कान्फ्रेंस में मौजूद फोटोग्राफर्स के कैमरे चल पड़े. अब इन कैमरों में कैद हो गई विद्या की वह बेशकीमती तस्वीर जिसे देखने को उनके फैन्स में दीवानगी है.

Thursday, December 22, 2011

लीजिये जनाब हिंदुस्तान म एं मुसलमानों के एक और हमदर्द को मौलाना का लक़ब मिल गया अब तक तो लोग मुलायम सिंह यादव को ही ''मुल्ला मुलायम''कह कर पुकारते थे अब जिस तरह से पर्लिअमेंट में लोकपाल बिल committee में मुसलमानों के लिए reservation की वकालत की उस से परभावित होकर मीडिया के लोगों ने उन्हें ''मौलाना लालू ''कहने लगे


लीजिये जनाब एक और राजनीतिज्ञ आ गए मैदान में

लीजिये जनाब एक और राजनीतिज्ञ आ गए मैदान में  । ये हैं हमारे बर्बोले साहब दिग्विजय सिंह के साहबजादे  । अब देखिये ये जनाब क्या क्या पर्दाफाश करते हैं और किस किस का जवाब किस अंदाज़ में देते हैं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कांग्रेस की परिवार वाद परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने बेटे जयवर्धन के लिए राजनीति का रास्ता साफ कर रहे हैं। एक इंटरव्यू में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने माना कि वो बूढ़े ‌हो चुके हैं अब राजनीति में युवाओं को आगे आना चाहिए।गौरतलब हो कि दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन ने बुधवार को राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम कोलुआ से पदयात्रा का कर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की।बुधवार से शुरू हुई 7 दिवसीय पदयात्रा करीब 150 किमी का सफर तय कर जामनेर में समाप्त होगी। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने संकेत दिए कि 2013 के विधानसभा चुनाव में जयवर्धन राघौगढ़ से चुनाव लड़ेंगे।दिग्विजय सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे को समझा दिया है कि वह हवा-हवाई राजनीति न करें। जमीन पर आकर काम करे और लोगों की परेशानियों को समझें

Wednesday, December 21, 2011

ध्यान चन्द के लिए सरकार को पत्र


सरकार के खिलाड़ियों को देश का शीर्ष नागरिक सम्मान भारत रत्न दिए जाने का रास्ता साफ करने के बाद हाकी इंडिया [एचआई] ने बुधवार को खेल मंत्रालय से यह सम्मान दिवंगत मेजर ध्यानचंद को देने का आग्रह किया।खेल मंत्री अजय माकन को लिखे पत्र में हाकी इंडिया ने नियमों में संशोधन का स्वागत किया और सरकार से अपील की कि ध्यानचंद को भारतीय हाकी में उनके अतुल्य योगदान के लिए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा जाए। हाकी इंडिया की विज्ञप्ति के मुताबिक ध्यानचंद को खेल का सर्वकालिक महान खिलाड़ी माना जाता है और संभवत: वह एकमात्र भारतीय खिलाड़ी हैं जिनकी हाकी खिलाड़ी के रूप में क्षमता को लेकर कई तरह के मिथक थे। विज्ञप्ति में कहा गया कि ध्यानचंद की उपलब्धियों को देखते हुए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए कोई अन्य खिलाड़ी उनके जितना हकदार नहीं है। ध्यानचंद को 1926 में पदार्पण के बाद दो दशक के करियर में 1000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय गोल करने का श्रेय जाता है। वह 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लास एंजिल्स और 1936 में बर्लिन में लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा भी रहे। वह पहले भारतीय खिलाड़ी थे जिन्हें 1956 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

दिल्ली ही क्यूँ बनी राजधानी

इतिहासकार प्रो. रिजवान कैसर ने बताया कि दिल्ली हमेशा से संस्कृतियों का संगम रही है। यहां देश की ज्यादातर संस्कृतियां साथ रहीं हैं और कभी भी एक संस्कृति एक-दूसरे पर हावी नहीं हुई।इसके अलावा यह भौगोलिक रूप से भी हमेशा से शासकों की पसंदीदा जगह रही। यमुना नदी और अरावली पहाड़ियों के बीच बसी इस जगह का कई बड़े व्यापारिक शहरों से हमेशा से नाता रहा है।इस कारण से भी यह क्षेत्र राजधानी के रूप में पसंद किया गया। हालांकि अंग्रेजों द्वारा कलक त्ता से राजधानी को दिल्ली लाने की मूल वजह वह जनीतिक कारण बताते हैं।बंगाल विभाजन के निर्णय से बंगालियों के उपद्रव का लगातार निशाना बन रही ब्रिटिश हुकूमत के लिए अपने साम्राज्य को बचाने के लिए भी यह निर्णय लेना जरूरी हो गया था। इसके अलावा मुसलमानों को खुश करने के लिए उन्होंने राजधानी के रूप में दिल्ली को चुना।

' दुनिया के 10 चर्चित सेक्स स्कैंडल्स

टाइम पत्रिका' की एक नई सूची से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और एक समय में उनकी महिला मित्र रही मोनिका लेविंस्की के चर्चे एक बार खास ओ आम की जबान पर आ सकते हैं। टाइम पत्रिका ने दुनिया के 10 सबसे बड़े सेक्सबाज नेताओं की सूची तैयार की है, जिसमें सातवें स्थान पर क्लिंटन को रखा गया है।गौर करने वाली बात यह है कि आए दिन महिलाओं के साथ अपने संबंधों को लेकर सुखिर्यों में बने रहने वाले इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बलरुस्कोनी का नाम इस सूची में शामिल ही नहीं है, जबकि सूची जारी होने के दो दिन पहले ही मिस्र की जनक्रांति से प्रेरित होकर इटली की महिलाएँ रंगीनमिजाज बलरुस्कोनी के खिलाफ सड़कों पर उतर आईं थीं।‘टाइम’ की इस सूची में पहला स्थान साउथ कैरोलिना के पूर्व गवर्नर मार्क सैनफोर्ड को मिला है। 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में इस पद के प्रत्याशी माने जा रहे सैनफोर्ड के एक साल से अर्जेंटीना की एक महिला के साथ प्रेम संबंध थे।दूसरे नंबर पर सीनेटर जॉन एनसाइन हैं, जिनका एक साल तक अपनी एक प्रचार कर्मचारी से प्रेम संबंध चला। सूची में तीसरा स्थान लुईसियाना के सीनेटर डेविड विटर ने पाया है, जो प्रांत की हाईप्रोफाइल कॉलगर्ल्स के नेटवर्क में काफी लोकप्रिय थे।डेट्राइट के पूर्व मेयर क्वामे किलपैट्रिक ने इस सूची में चौथा स्थान बनाया है। मेयर के प्रांत की एक अधिकारी के साथ लंबे समय से संबंध थे।सीनेटर लैरी क्रेग को हवाईअड्डे के बाथरुम में एक महिला कर्मचारी के साथ अनुचित आचरण करने के लिए इस सूची में पाँचवे स्थान पर शामिल किया गया है। क्रेग ने अपना दोष स्वीकार कर लिया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।डेमोक्रेटिक सांसद बार्ने फ्रैंक के एक पुरुष सेक्सकर्मी के साथ संबंध उजागर होने के बाद उन्हें टाइम ने अपनी सूची में छठे स्थान पर रखा है। सूची में सातवाँ स्थान पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को मिला है, जिनके मोनिका लेविंस्की के साथ संबंध लिखित संदेशों के माध्यम से उजागर हुए थे।टाइम ने सबसे बड़े सेक्स स्कैंडलबाजों की सूची में आठवें स्थान पर पूर्व सीनेटर और राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी गैरी हार्ट को रखा है। इस खुलासे के बाद हार्ट ने राष्ट्रपति पद की दौड़ से हटने की घोषणा कर दी। सूची के नौवें स्थान पर न्यूयार्क के पूर्व गवर्नर एलियोट स्पिट्जर काबिज हुए हैं, जो वेश्यावृत्ति का हाईप्रोफाइल धंधा चलाते थे।टाइम की इस सूची में सबसे नीचे एक समय में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रहे जॉन एडवर्डस हैं, जिनके एक उभरती हुई अभिनेत्री से संबंधों का 2008 में खुलासा हुआ। एडवर्डस को ‘पीपुल’ पत्रिका ने 2000 में ‘सबसे सेक्सी नेता’ चुना था।

Monday, December 19, 2011

हॉलीवुड व बॉलीवुड में सनसनी मचाने के बाद हरियाणा के छोटे से गांव मोठ लुहारी की मल्लिका सहरावत उर्फ रीमा लांबा का दिल आज भी हरियाणा में ही है। वे विवाह में हरियाणावी छोरे को प्राथमिकता देगी,साथ ही हरियाणा में ही विवाह समारोह होगा। उनके अपने प्रदेश के प्रेम की गाथा का उदाहरण सुप्रसिद्ध फिल्म चंद्रावल के हीरो जगत जाखड़ मामले में भी मिला। इस मामले में उन्होंने राज्य सरकार को पत्र लिखा है।मल्लिका भले ही विश्वविख्यात हो गईं। वे विवाह अपने पिता मुकेश लांबा एवं मां संतोष लांबा की राय से करेंगी। मल्लिका का कहना है कि शादी-विवाह मां-बाप की मर्जी से होते हैं। उनकी राय महत्व रखेगी।


Wednesday, December 14, 2011

पाकिस्तान के मदरसों के सम्बन्ध में जिस तरह की खबरें आ रही हैं उस से ऐसा लगता है के लोग और दहशतगर्द अब मासूमों की ज़िन्दगी को भी तबाह व बर्बाद करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं

पाकिस्तान के कराची शहर में स्थित एक मदरसे के तहखाने में कैद 50 से अधिक बच्चों को मुक्त कराया गया है। सभी बच्चे 18 साल से कम उम्र के हैं। जियो न्यूज चैनल के अनुसार पुलिस ने मंगलवार को कराची के सोहराब इलाके में जामिया मस्जिद जकारिया मदरसे के तहखाने से बच्चों को आजाद कराया।इन सभी को जंजीरों से बांध कर रखा गया था। ज्यादातर बच्चे खैबर पखतूनख्वा प्रांत के रहने वाले है। मदरसे पर कथित रूप से बच्चों का यौन शोषण करने का आरोप है। मदरसे के अधिकारियां का कहना है कि मदरसा नशे की लत छुड़ाने की शाखा चला रहा था। कारी मोहम्मद उस्मान नामक मौलवी के अलावा दो और लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं मदरसे का संरक्षक मुफ्ती दाउद फरार है। गृहमंत्री रहमान मलिक ने मामले की सघन जांच करने को कहा है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक पाक में 15,148 मदरसे हैं जिनमें करीब 20 लाख से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं।पाक के 3 करोड़ 40 लाख बच्चों में से महज 5 फीसदी बच्चे ही औपचारिक (स्कूली) शिक्षा ग्रहण करते हैं।मदरसे में जब छापेमारी के बाद बच्चों को छुड़ाया गया तो बे दुबके हुए थे। उनके चेहरे पर आतंक का खौफ साफ दिख रहा था और पुलिस की टीम के लोगों ने जब एक बच्चे से पूछने की कोशिश की तो वो फफककर रोने लगा।खबरों के मुताबिक जिन लड़कों ने तालिबान का विरोध किया था, उन्हें उल्टा लटका दिया गया था। इन बच्चों में अधिकतर का संबंध खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत से है। एक बच्चे ने बताया कि तालिबान के कुछ सदस्य उनके स्कूल में आए थे और उन्हें युद्ध के लिए तैयार रहने को कह रहे थे।

Sunday, December 11, 2011

दोनों तरफ है दिल



[राकेश ओमप्रकाश मेहर, दिल्ली-6 फिल्म के निर्देशक]
दिल्ली हमेशा दौड़ती और बदलती रहती है। दिल्ली की कहानी दरअसल दीवारों से घिरे उस शहर की है, जिसे हम पुरानी दिल्ली या दिल्ली-6 भी कहते हैं। नेशनल ज्योग्राफिक ने इसे 'विश्व में प्रति वर्ग फीट क्षेत्र में फैला सर्वाधिक घनत्व आबादी' वाला इलाका बताया है। यह इलाका छोटा भारत है। जब आप चांदनी चौक में प्रवेश करते हैं तो आपके बाई ओर श्रीदिगंबर जैन लाल मंदिर, उसके बगल में गौरी शंकर मंदिर, सामने प्रसिद्ध मोती सिनेमा और उसके बगल में क्रिश्चियन सेंट्रल बापटिस्ट चर्च है। आगे बढ़ते ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया है, जिसके पड़ोस में मैकडोनल्ड्स और विपरीत दिशा में मुड़ने पर आपको गुरुद्वारा शीशगंज साहिब दिखाई देगा। आगे सड़क के छोर पर पहुंचकर आपको फतेहपुरी मस्जिद दिखाई देती है और वहां से जैसे ही आप मुड़ते हैं तो लाल किले पर तिरंगा लहराता नजर आता है। यही तो भारत है। अंत में मैं कहूंगा: ये दिल्ली है मेरे यार.. यहां इश्क मोहब्बत प्यार.. इसके दाई तरफ भी दिल है.. इसके बाई तरफ भी दिल है..

DILLI KI JAY HO


यह शायद ही कभी सोती है और जब सोती भी है तो इसकी आँखों में होते हैं करोड़ों सपने। इसका इतिहास हजारों साल पुराना है और यह हर क्षण लिखती है नया इतिहास..यह है दिल्ली..एक शहर, एक राज्य और एक राष्ट्रीय राजधानी..यह है वह 'कैपिटल सिटी' जिसे कोलकाता से स्थानांतरित किया गया था..आज से 100 साल पहले मीर निहाल ने 7 दिसंबर 1911 को अलसुबह चांदनी चौक का रुख किया। काफी लंबे इंतजार के बाद, तोपों की सलामी के साथ लाल किले से पाँच मील लंबा शाही जुलूस नमूदार हुआ। दूर से वह फिरंगी राजा को पहचान भी नहीं पा रहा था [दरअसल जार्ज पंचम ने हाथी पर बैठने से इन्कार कर दिया था]। यह दृश्य देखते हुए निहाल की आँखों के आगे दिल्ली का पुराना वैभव घूम गया। घर लौटते हुए उसे रास्ते में एक लंगड़ा भिखारी मिला, लोग कहते थे कि वह आखिरी शहंशाह बहादुर शाह जफर का सबसे छोटा बेटा था!..अहमद अली की मशहूर किताब ट्वायलाइट इन दिल्ली के यह शब्दचित्र भुलाए नहीं जा सकते। इस जुलूस के पाँच दिन बाद 12 दिसंबर को जार्ज पंचम का कोरोनेशन पार्क में भारत के नए सम्राट के रूप में राज्याभिषेक हुआ और समारोह के समापन के तुरंत बाद ही जार्ज ने इस घोषणा से सबको चौंका दिया, ''हमने निर्णय किया है कि भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की जाए।''1911 में दिल्ली एक ढहता हुआ पुराना शहर था। चारदीवारी से घिरे शहर के बाहर केवल गांव और कुतुब-निजामुद्दीन की दरगाह के पास कुछ बस्तियां थीं। 1930 में भी यहां सफदरजंग के मकबरे [लुटियन की दिल्ली की दक्षिणी सीमा] से लेकर कुतुब तक फसलें लहराया करती थीं। एडवर्ड लुटियन और हरबर्ट बेकर की देखरेख में 1911 से 1931 के मध्य नई राजधानी ने आकार लिया। लुटियन द्वारा डिजाइन किए गए वायसराय निवास [जो बाद में भारत का राष्ट्रपति भवन घोषित हुआ] के लिए रायसीना गांव की जमीन पसंद की गई। साउथ और नार्थ ब्लॉक का जिम्मा बेकर के पास था। इन आर्किटेक्ट्स ने वायसराय निवास से पुराना किला तक गुजरती एक सीधी सड़क बनाई। वार मेमोरियल [इंडिया गेट] से गुजरने वाली इस सड़क को अंग्रेजों ने किंग्सवे कहा और आजादी के बाद भारतीयों ने इसका नया नामकरण किया 'राजपथ'। ब्रिटिश काल में इस सड़क के दोनों तरफ तत्कालीन राजघरानों [मुख्यत: हैदराबाद, जयपुर, बीकानेर] के प्रतिनिधि महल बने और दक्षिण में 'बैंग्लो जोन' विकसित हुई।भारत की आजादी की घोषणा के बाद 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में अविस्मरणीय उत्सव हुए। अब यह आजाद भारत की राजधानी थी और यहीं प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लालकिले पर तिरंगा झंडा फहराया। आजादी अपने संग विभाजन की त्रासदी भी लाई। 3 लाख से अधिक मुस्लिम दिल्ली छोड़ गए जबकि 5 लाख हिंदू-सिख शरणार्थियों ने यहां पनाह ली। इसी दिल्ली में 30 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी को गोली मार दी गई। शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण महज एक दशक में दिल्ली की आबादी में 90 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। किंग्सवे कैंप के तंबुओं में टिके शरणार्थियों के लिए लाजपत नगर, मालवीय नगर, पटेल नगर जैसी रिहायशी बस्तियां और सरोजिनी नगर-कमला नगर जैसे बाजार बसाए गए। चारदीवारी में मुगलिया नजाकत का चिराग बुझ चुका था और पंजाबी मिजाज वाली एक बिंदास नई दिल्ली उभर रही थी।आजादी के बाद दिल्ली का पहला आधिकारिक विस्तार कूटनीतिक क्षेत्र चाणक्यपुरी के रूप में हुआ। इसके बाद एक तरफ तो डीडीए विभिन्न इलाकों में फ्लैट बना रहा था, दूसरी तरफ डीएलएफ जैसे प्राइवेट डेवलपर्स हौज खास जैसे इलाकों को विकसित कर रहे थे।राजनीतिक राजधानी तो दिल्ली अर्से से थी, वक्त के साथ इसका आर्थिक शक्ति और शिक्षा-संस्कृति के केंद्र के रूप में भी उदय हुआ। शरणार्थियों ने व्यवसायों में नई जान फूंकी। वक्त के साथ यह विशाल हुए और रैनबैक्सी जैसी सफलता की महान गाथाएं लिखी गईं। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और आईआईटी ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी साख बनाई। 1982 के एशियाई खेलों ने शहर के बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव किया और दिल्ली वालों ने पहला फ्लाईओवर देखा। इसके लगभग पौने तीन दशक बाद कॉमनवेल्थ गेम्स और मेट्रो कनेक्टिविटी की बदौलत दिल्ली व‌र्ल्ड क्लास हो गई।यही नहीं, हर संस्कृति और हर क्षेत्र के लोगों की उपस्थिति ने दिल्ली को भारत की राजधानी से कहीं बढ़कर 'छोटा भारत' बना दिया है। दरअसल आर्थिक उदारीकरण के बाद की दिल्ली इतनी पॉश हो चुकी है कि यूपी, बिहार ही नहीं..सुदूर दक्षिण और उत्तर-पूर्व तक की प्रतिभाएं इसके मोहपाश में खिंच आती हैं।हो भी क्यों न, दिल्ली में असर है, दिल्ली में अवसर है

DEVANAND KA AAKHRI SAFAR


 देव साहब की याद में विशेष प्रार्थना सभा भी आयोजित की ग
 देव आनंद की बहन बॉनी सरीन ने भी अपने भाई को अश्रुपूर्ण विदाई दी
 अपने पिता के शव को कांधा देते देव आनंद के बेटे सुनील
 लंदन में देव आनंद को अंतिम विदाई देने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुँचे थे.
हिंदी सिनेमा के सदाबहार हीरो देव आनंद का शनिवार को लंदन में अंतिम संस्कार कर दिया गया

Saturday, December 10, 2011

YE HAI DILLI SHAHARYA TO DEKH BABUA......

पिछले सौ सालों में दिल्ली की शहरी योजना का सफ़र जानने के लिए आपको ज़्यादा समय नहीं चाहिए. बस शहर की किसी भी सड़क को पकड़ लीजिए.अगर दिल्ली शहर का भ्रमण किया जाए, तो इस शहर के भीतर ही बहुत से छोटे-छोटे शहर दिखाई दे जाएंगे, जो कि एक-दूसरे से बिल्कुल अलग लगते हैं.सड़क की एक ओर झुग्गी-झोंपड़ियों में ज़िंदगी पनपती हुई दिखती है, तो दूसरी ओर चहल-पहल से भरा शीशे का डब्बानुमा शॉपिंग मॉल.एक ओर दिखाई देगा किसी मंत्री का विशालकाय बंगला, और उससे जुड़ी गली का रास्ता नापें, तो धोबी घाट दिखाई दे जाएगा.रेलवे स्टेशन का रुख़ करिए तो वहाँ रुकने वाली रेलगाड़ियों से उतरने वालों की तादाद ट्रेन में चढ़ने वाले लोगों से कहीं ज़्यादा दिखेगी.और इस बात में कोई हैरानी भी नहीं है. आख़िरकार तेज़ी से समृद्ध होते इस शहर में हर साल क़रीब पाँच लाख लोग एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने आते हैं.देखा जाए तो ये ही विभिन्नताएं दिल्ली को एक परिभाषा देती हैं. लेकिन जब बात आती है सभी के लिए बराबर जन-सुविधाओं की, तो दिल्ली शहर एक अविकसित बस्ती की तरह लगता है, जहाँ उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं जो इस शहर की जीवन-रेखा कहलाते हैं.ऐसा क्यों है कि तेज़ी से पड़ोसी राज्यों में पांव पसारता ये शहर कहीं-कहीं घुटन का आभास देता है?क्यों यहां की योजना की परिभाषा सभी वर्गों के लिए अलग-अलग सी नज़र आती है?

YE DILLI WO DILLI


شالو ےادو
جب دہلی کے بارے میں اپنے خیالات کاغذ پر اتارنے کا موقع ملا ، تو جمنا کنارے جانے سے خود کو روک نہیں پائی کیونکہ شاید جمنا ندی ہی سب سے بڑی گواہ ہے دہلی میں تیزی سے تبدیلیوں کی. مجنو کا ٹےلا گردوارے کے پاس اور تبتی کالونی کے ٹھیک پیچھے ، سڑک کی بھیڑ- بھاڑ سے دور ایک ٹھہراو ¿ ہے ، جو مجبور کرتا ہے اپنے ماضی کو پھر سے زندہ کرنے کو.کہنے کو تو میں 'حقیقی دہلی والی ہوں ، کیونکہ میری پیدائش اور پرورش یہیں ہوئی ، لیکن جس دہلی میں میں نے بچپن گزارا ، وہ آج کی دہلی سے بہت مختلف ہے.مجھے یاد ہے ، جب میں پانچ سال کی تھی ، تب اسی دہلی میں میرے دادا دادی کے پاس کھیت اور گائے بھےنسےں ہوا کرتی تھیں. شہر کا جو علاقہ آج روہنی کے نام سے جانا جاتا ہے ، وہ ایک وقت جنگل ہوا کرتا تھا. وہیں ہمارے کھیت تھے ، جو بعد میں حکومت نے جبرا خرید لئے تھے.یاد ہے مجھے ، میری ماں کھیت سے لوٹتے ہوئے اپنے سر پر گائے بھینسوں کے لئے چارہ لے کر آتی تھی. ہمارے’گھیر‘ (تبےلے) میں چار بھینسےں اور ایک گائے تھی. مجھے اور میرے بھائی بہنوں کو ہر سال بس نئے بچھڑے یا بچھڑےوں کو دیکھنے کی ہوس رہتی.اب نہ تو وہ’گھیر‘ اپنی جگہ ہے ، نہ ہی ہماری وہ دےہات نما زندگی... ہم اب’روہنی والے‘ جو ہو گئے ہیں.عجیب المیہ ہے کہ جس زمین پر کبھی ہمارے ہی کھیت ہوتے تھے ، اسی زمین کی ایک ٹکڑی ہمیں حکومت سے خرید کر اپنا آشےانہ بنانا پڑا.اس کی وجہ یہ ہے کہ اس وقت دہلی میں ہو رہی’ترقی‘ کی لہر نے میرے ماں باپ کے خوابوں کو بھی چھوا.اور پھر ایک دن انہوں نے ارادہ کیا کہ اپنے بچوں کو اچھی تعلیم اور ترقی پسند ماحول دینے کے لئے انہیں گاو ¿ں (سمے پور ، بادہلی) سے نکل کر کسی ماڈرن کالونی میں جا کر بس جانا چاہئے. اور پھر ہم روہنی آ گئے.یہاں آ کر ہمیں دہلی کی’شہری ہوا‘ لگی اور اس کے مطابق ہم نے اپنی زندگی کو ڈھال لیا.یہ لکھتے وقت میں یہ دعوے سے کہہ سکتی ہوں کہ دہلی میں ایسے سینکڑوں نوجوان ہوں گے ، جن کی زندگی نے بھی میری زندگی جیسا ہی موڑ لیا ہوگا.بالآخر ، ایسے کتنے ہی جنگلوں اور کھیتوں میں اس شہر کی توسیع ہوئی ہے گزشتہ کچھ دہائیوں میں.میری نظر میں دہلی اس عظیم درخت کا نام ہے ، جس کی شاخےں تیزی سے پھیل رہیں ہیں ، لیکن پھر بھی اس کاسایہ تمام پر یکساں نہیں پڑتا.اس درخت پر’خواب‘ نامی کروڑوں رنگ برنگے پھل لٹکتے ہیں. کسی کی چھلانگ ان پھلوں کو لپک لاتی ہے ، تو کسی کو صرف ان پھلوں کو دور سے دیکھ کر للچانے کا ہی موقع مل پاتا ہے.بڑا ہی عجیب و غریب شہر ہے دہلی.یہاں کی سڑکیں اور چوڑے فلائی اوور دن کے اجالے میں اس کی ترقی بیان کرتے ہیں ، تو راتوں کو وہی سڑکیں اور فلائی اوور چیخ چیخ کر یہاں کی غربت کا مذاق اڑاتے ہیں.آج تک یہ ’دہلی والی‘ بھی اس شہر کو سمجھ نہیں پائی ہے. آخر ہے کیا دہلی؟یہ سوال خود سے کرتے ہی ، میرے دماغ میں مختلف تصاویر ابھر آتی ہیں ۔دہلی اس گفتگو میں بستی ہے ، جو ڈی ٹی سی کی بسوں میں بیٹھے سرکاری’بابو‘ کے درمیان ہوتی ہے.دہلی اس میٹرو ٹرین میں بستی ہے ، جس میں امیر سے امیر اور غریب سے غریب لوگ ایک دوسرے سے چپک کر سفر کرتے ہیں.دہلی اس ننھے سے بچے میں بستی ہے ، جو چند روپے کمانے کے لئے سڑک کے بیچوں بیچ کرتبکھاتا ہے.دہلی اس مڈل کلاس انسان میں بستی ہے ، جو نوئیڈا ، گڑگاو ¿ں یا غازی آباد میں ایک گھر خریدنے کا خواب رکھتا ہے.دہلی اس بوڑھی اماں میں بستی ہے ، جو نظام الدین درگاہ آنے والوں کے جوتے چپل سنبھالنے کے لئے تین روپے چارج کرتی ہے لیکن دعا مفت دیتی ہے.دہلی اس رکشہ والے میں بستی ہے ، جو یہاں رہتے رہتے ، یہاں کے تیزی سے بھاگتی زندگی کا عادی ہو گیا ہے.ویسے دہلی اس مزاج میں بھی بستی ہے ، جس میں ہرقانون کا توڑ کسی نہ کسی طریقے سے نکال ہی لیا جاتا ہے.میرے دماغ میں گھوم رہی ان تمام تصویروں کے درمیان کا آپس میں ایک نایاب کنکشن ہے ، جو کئی خامےوں کے باوجود بھی اس شہر کو صحیح معنوں میں’خوابوں کا شہر‘ بناتا ہے.

विजय झोल ने किया एक और धमाका

इंदौर में वीरेंद्र सहवाग का तूफानी दोहरा शतक लगने के ठीक एक दिन बाद नाशिक में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। अनंत कन्हेरे मैदान पर 17 वर्षीय एक खिलाड़ी ने अंडर-19 कूच बिहार टूर्नामेंट में नाबाद 451 रन ठोक तहलका मचा दिया। यह करिश्मा करने वाले खिलाड़ी नाम विजय झोल है। महाराष्ट्र के इस खिलाड़ी की जानदार पारी ने युवराज सिंह द्वारा इसी टूर्नामेंट में बनाए गए 11 साल पुराने रिकॉर्ड को तहस-नहस कर दिया।युवराज सिंह ने 1999-2000 में पंजाब की तरफ से खेलते हुए बिहार के खिलाफ 358 रनों की पारी खेली थी। तब यह लगा था कि इस जानदार पारी का रिकॉर्ड भला कौन तोड़ पाएगा? लेकिन विजय जोल ने महाराष्ट्र की तरफ से खेलते हुए असम के खिलाफ यह कारनामा कर दिया और रिकॉर्ड के बेताज बादशाह बन गए।अपनी इस बेहतरीन पारी को जोल ने टीम इंडिया के विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग को समर्पित किया है। जोल ने अपनी इस बेहतरीन पारी के लिए 467 गेंदों का सामना किया और 55 चौके तथा दो गगनचुंबी छक्के लगाए।

Friday, December 9, 2011

'परमवीर' सहवाग ने कुछ यूं मनाया जश्न इंडियन टीम के स्वागत के लिए होटल की लॉबी में केक और फूलझड़ियों का इंतजाम किया गया था। बस से उतरते ही कप्तान वीरेंद्र सहवाग ने केक काटा। तुरंत बाद सभी खिलाड़ी सीधे अपने कमरों में चले गए। होटल रेडिसन के एफ एंड बी मैनेजर हाइग्रिव कैरी ने बताया सहवाग के शानदार 219 रनों को यादगार बनाने के लिए केक पर 219 भी लिखा गया था।कैरेबियन पहले लौटे होटल- मैच खत्म होने के बाद पहले कैरेबियन टीम होटल लौटी। कैरेबियन टीम के सदस्य बस से उतरते ही सीधे अपने कमरों में चले गए। उसके बाद आई दूसरी बस में चहेते इंडियन खिलाड़ियों को देखकर पूरा माहौल सेलिब्रेशन के मूड में आ गया।


Sunday, December 4, 2011

तू तो ना आए तेरी याद सताए





मुंबई। ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे जिन्होंने अंतिम सास तक अपने कर्म से मुंह नहीं फेरा। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नई ताजगी से भर देती थी।इस करिश्माई कलाकार ने 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया ़ ़ ़' के दर्शन के साथ जिंदगी को जिया। यह उनकी 1961 में आई फिल्म ' हम दोनों' का एक सदाबहार गीत है और इसी को उन्होंने जीवन में लफ्ज दर लफ्ज उतार लिया था।देव साहब ने बीती रात लंदन में दुनिया को गुडबॉय कह दिया। सुनते हैं कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। वैसे तो वह जिंदगी के 88 पड़ाव पार कर चुके थे लेकिन वो नाम जिसे देव आनंद कहा जाता है, उसका जिक्र आने पर अभी भी नजरों के सामने एक 20-25 साल के छैल छबीले नौजवान की शरारती मुस्कान वाली तस्वीर तैर जाती है, जिसकी आखों में पूरी कायनात के लिए मुहब्बत का सुरूर है।देव साहब के अभिनय और जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों ने फिल्मों में नायक की भूमिकाएं करना छोड़ दिया था उस समय भी देव आनंद के दिल में रूमानियत का तूफान हिलोरे ले रहा था और अपने से कहीं छोटी उम्र की नायिकाओं पर अपनी लहराती जुल्फों और हालीवुड अभिनेता ग्रेगोरी पैक मार्का इठलाती टेढ़ी चाल से वह भारी पड़ते रहे।'जिद्दी' से शुरू होकर देव साहब का फिल्मी सफर, 'जानी मेरा नाम', 'देस परदेस', 'हरे रामा हरे कृष्ण' जैसी फिल्मों से होते हुए एक लंबे दौर से गुजरा और अपने अंतिम सास तक वह काम करते रहे। उनकी नई फिल्म 'चार्जशीट' रिलीज होने के लिए तैयार है और वह अपनी फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' की अगली कड़ी पर भी काम कर रहे थे।लेकिन इस नई परियोजना पर काम करने के लिए देव साहब नहीं रहे। बीते सितंबर में अपने 88वें जन्मदिन पर उन्होंने कहा था कि मेरी जिंदगी में कुछ नहीं बदला है और 88वें साल में मैं अपनी जिंदगी के खूबसूरत पड़ाव पर हूं। मैं उसी तरह उत्साहित हूं जिस तरह 20 साल की उम्र में होता था। मेरे पास करने के लिए बहुत काम है और मुझे 'चार्जशीट' के रिलीज होने का इंतजार है।मैं दर्शकों की माग के अनुसार, 'हरे रामा हरे कृष्णा आज' की पटकथा पर काम कर रहा हूं। देव साहब की फिल्में न केवल उनकी आधुनिक संवेदनशीलता को बया करती थीं बल्कि साथ ही भविष्य की एक नई इबारत भी पेश करती थीं। वह हमेशा कहते थे कि उनकी फिल्में उनके दुनियावी नजरिए को पेश करती हैं और इसीलिए सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों पर ही आकर बात टिकती है।उनकी फिल्मों के शीर्षक अव्वल नंबर, 'सौ करोड़', 'सेंसर' , 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ' तथा 'चार्जशीट' इसी बात का उदाहरण है।वर्ष 2007 में देव साहब ने अपने संस्मरण 'रोमासिंग विद लाइफ' में स्वीकार किया था कि उन्होंने जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हमेशा भविष्य को आशावादी तथा विश्वास के नजरिए से देखा। अविभाजित पंजाब प्रात में 26 सितंबर 1923 को धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के नाम से पैदा हुए देव आनंद ने लाहौर के गवर्नमेंट लॉ कालेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की शिक्षा हासिल की थी।नामी गिरामी वकील किशोरीमल के वह दूसरे नंबर के बेटे थे। देव की छोटी बहन शीला काता कपूर है जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्माता शेखर कपूर की मा हैं। उनके बड़े भाई चेतन आनंद और छोटे भाई विजय आनंद थे।अभिनय के प्रति उनकी दीवानगी उन्हें अपने गृह नगर से मुंबई ले आई जहा उन्होंने 160 रुपये प्रति माह के वेतन पर चर्चगेट पर सेना के सेंसर आफिस में कामकाज संभाल लिया। उनका काम था सैनिकों द्वारा अपने परिजनों को लिखे जाने वाले पत्रों को पढ़ना।उन्हें पहली फिल्म 1946 में 'हम एक हैं' मिली। पुणे के प्रभात स्टूडियो की इस फिल्म ने उनके कैरियर को कोई रफ्तार नहीं दी। इसी दौर में उनकी दोस्ती साथी कलाकार गुरू दत्त से हुई और दोनों के बीच एक समझौता हुआ। समझौता यह था कि यदि गुरू दत्त ने फिल्म बनाई तो उसमें देव आनंद अभिनय करेंगे।देव आनंद को पहला बड़ा ब्रेक अशोक कुमार ने 'जिद्दी' में दिया। बाबे टाकीज की इस फिल्म में देव साहब के साथ कामिनी कौशल थी और 1948 में आई इस फिल्म ने सफलता के झडे गाड़ दिए।1949 में देव आनंद खुद निर्माता की भूमिका में आ गए और नवकेतन नाम से अपनी फिल्म कंपनी की शुरुआत की और अपने वादे के अनुसार उन्होंने गुरू दत्त को 'बाजी ' [1951] के निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी। दोनों की यह जोड़ी नए अवतार में बेहद सफल रही।40 के उत्तरार्ध में देव साहब को गायिका अभिनेत्री सुरैया के साथ कुछ फिल्मों में काम करने का मौका मिला जो उस जमाने की स्थापित अभिनेत्री थी। इन फिल्मों की शूटिंग के दौरान उनकी सुरैया से नजरें लड़ गईं और प्रेम की चिंगारी ऐसी भड़की कि इस जोड़ी को दर्शकों ने सिल्वर स्क्रीन पर हाथों हाथ लिया। इन्होंने एक के बाद एक सात सफल फिल्में दी जिनमें विद्या [1948], जीत [1949] , अफसर [1950], नीली [1950] , दो सितारे [1951] तथा सनम [1951] थीं।विद्या के गाने 'किनारे किनारे चले जाएंगे ' की शूटिंग के दौरान सुरैया और देव आनंद के बीच प्यार का पहला अंकुर फूटा था। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान नाव डूबने लगी तो देव साहब ने ही जान की बाजी लगाकर सुरैया को डूबने से बचाया था।बेचैन दिल को देव अधिक समय तक संभाल नहीं पाए और 'जीत' के सेट पर सुरैया के सामने प्यार का इजहार कर दिया लेकिन सुरैया की नानी ने हिंदू होने के कारण देव साहब के साथ उनके संबंधों का विरोध किया। इसी वजह से सुरैया तमाम उम्र कुंवारी बैठी रहीं।नवकेतन के बैनर तले देव साहब ने 2011 तक 31 फिल्में बनाईं। ग्रेगोरी पैक स्टाइल में उनका डायलाग बोलने का अंदाज, उनकी खूबसूरती पर चार चाद लगाते उनके हैट और एक तरफ झुककर, हाथों को ढीला छोड़कर हिलाते हुए चलने की अदा उस जमाने में लड़किया देव साहब के लिए पागल रहती थीं।'जाल', 'दुश्मन', 'काला बाजार' और 'बंबई का बाबू' फिल्मों में उन्होंने नायक की भूमिका को नए और नकारात्मक तरीके से पेश किया। अभी तक उनके अलोचक उन्हें कलाकार के बजाय शिल्पकार अधिक मानते थे लेकिन 'काला पानी' जैसी फिल्मों से उन्होंने अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी।उसके बाद 1961 में आई 'हम दोनों' और 1966 में आई 'गाइड' ने तो बालीवुड इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कर दिया। 1970 में उनकी सफलता की कहानी का सफर जारी रहा और 'जानी मेरा नाम' तथा 'ज्वैल थीफ ' ने उन्हें नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया जिनका निर्देशन उनके भाई विजय आनंद ने किया था।वर्ष 2002 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित देव साहब राजनीतिक रूप से भी सक्रिय रहे थे। उन्होंने फिल्मी हस्तियों का एक समूह बनाया जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाई थी।1977 के संसदीय चुनाव में उन्होंने इंदिरा गाधी के खिलाफ चुनाव प्रचार किया और 'नेशनल पार्टी आफ इंडिया' का भी गठन किया जिसे बाद में उन्होंने भग कर दिया। कुछ भी कहिए 1923 से शुरू हुआ देव साहब का सफर अब मंजिल पर पहुंच कर एक नई मंजिल की ओर निकल गया है। अभी ना जाओ छोड़कर ।

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...