राजनीतिक पंडित भले ही उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में बढ़े मतदान को ‘सत्ता विरोधी रुझान’ और ‘जातीय गणित’ से जोड़कर नतीजों की भविष्यवाणी में जुटे हों, लेकिन इससे सही तसवीर उभरकर सामने नहीं आती। मतदान की असली कहानी तो पोलिंग बूथों और उन पर लगी लंबी लाइनों में छिपी हुई है।
इस साल पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और अब उत्तर प्रदेश के अब तक के चुनावों में वोटरों के उत्साह को लेकर बहस का दौर जारी है। दरअसल चुनाव में मतदान बढ़ने का रुझान कोई नया नहीं है। वर्ष 2011 में असम, केरल, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु और पांडिचेरी विधानसभा चुनाव में 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 9 फीसदी तक ज्यादा वोट पड़े थे। सवाल उठ रहा है कि जिस समय राजनीतिज्ञों के खिलाफ जनभावनाएं दिख रही थीं, तब वोटर क्यों इतने जोश से चुनावी प्रक्रिया में विश्वास जता रहे हैं ? कुछ लोग इसे लोकतंत्र की जीत के रूप में देख रहे हैं। राजनीति विज्ञानी प्रो. एसके द्विवेदी इसे अच्छी पहल मानते हैं। वह कहते हैं बड़ी तादाद में लोगों का बूथों पर जाकर मतदान करना लोकतंत्र में भरोसे को दिखाता है।
कुछ महीने पहली बात है। पूरा देश अन्ना हजारे की भष्टाचार विरोधी मुहिम से जुड़ा था। तब लोगों का नेताओं और राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठ रहा था, लेकिन अब पोलिंग बूथों पर लंबी लाइनें बताती हैं कि जनता अच्छे नेतृत्व को लेकर गंभीर है। सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी कहते हैं कि जनता वोट की ताकत के जरिये किसी भी सरकार को बदल सकती है। इसीलिए बड़ी तादाद में मतदान में शामिल हुई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों का राजनीतिज्ञों पर भरोसा बढ़ा है और वे जाति और समुदाय के नाम पर वोटिंग नहीं कर रहे हैं। पहली बार वोट डालने वाली लखनऊ के डॉलीबाग की ट्विंकल कहती हैं कि हमें ऐसे प्रतिनिधि चुनने चाहिएं, जो भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन दे सकें।
देश में कोई पार्टी भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा नहीं कर सकती। सभी का दामन दागदार है। इसलिए वोटरों ने खुद मतदान की कला सीख ली है। युवा संदीप त्यागी नजीबाबाद में अंतिम चरण में मतदान करेंगे। कहते हैं कि कुछ लोगों के लिए जाति महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन मैं विकास के लिए वोट डालूंगा। इस बार यूपी ने वोटिंग ट्रेंड में दूसरे राज्यों की तरह दिखाया है। कुछ लोग इस बदलाव का श्रेय निर्वाचन आयोग को देते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता प्रेमनाथ राय कहते है 1990 की शुरुआत तक मिडिल और कमजोर तबके के बहुत सारे वोटर हिंसा और बूथों पर कब्जों की वजह से मतदान केंद्रों तक नहीं जाते थे। अब स्थिति बदल गई हैं। घरों पर मतदाता पर्चियां पहुंचने से युवा वोटरों का विश्वास बढ़ा हैं और वे पोलिंग बूथों पर जा रहे हैं। उन्होंने बदलाव की इच्छा के साथ मतदान किया है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में बढ़ा मतदान लोगों की इच्छाओं से ही नहीं व्यवस्था से भी जुड़ा है। 2007 में मणिपुर विधानसभा के चुनाव में 84.83 प्रतिशत वोट पड़े, जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में केवल 67.86 मतदान हुआ था। छोटे राज्यों में लोग विधायक को कानून बनाने वाला नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में मदद करने वाला मानते हैं। उनसे नौकरी और विकास की उम्मीद रखते हैं। इसी कारण वे अपने प्रत्याशी को जिताने में जुटे रहते हैं। ज्यादा मतदान और एंटी इकंबेंसी में मामूली संबंध है। राजनीतिक दलों में स्पर्धा, मतदाताओं की लामबंदी और साधनों का अधिकता भी मतदान बढ़ने के कारण हैं। ज्यादा वोटर बूथों तक कैसे पहुंचे, इसका पता छह मार्च को पता लगेगा, लेकिन लोकतंत्र में मतदाताओं के विश्वास से हर कोई खुश हैं। (साभार अमर उजाला )

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