उत्तर प्रदेश का चुनावी घमासान अपने चरम पर है। देश की क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियां जनता के बीच अपने आप को श्रेष्ठतम साबित करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही हैं। लेकिन इसी बीच एक खबर जो जनता के सामने आई वह है विधि एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद का मुसलमानों को रिझाने के लिए लगातार आदर्श चुनावी आचार संहिता विरोधी बयान देना। खुर्शीद ने अपने बयान में कहा था कि यदि कांग्रेस जीतती है तो पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में अल्पसंख्यकों का उप-कोटा 4.5 प्रतिशत से बढ़ाकर नौ प्रतिशत कर देगी।खुर्शीद के बयान ने राजनीति गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। उनकी बात पर सहमति जताने वाले मान रहे हैं कि मुसलमानों को दिया जाने वाला 9 प्रतिशत आरक्षण उनके विकास के लिए एक टॉनिक का काम करेगा। मुसलमानों को मुख्य धारा के साथ जोड़ना देश की बड़ी चुनौती है। इसलिए खुर्शीद के बयान को कुछ लोग सही मान रहे हैं।वहीं अधिकतर लोग इसे चुनाव में मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने वाला बयान बता रहे हैं। उनका मानना है कि खुर्शीद ने संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा और मर्यादा का तनिक भी ध्यान नहीं रखा और लगातार उसका अपमान करते रहे। इसके अलावा यह भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि उनके इस तरह के बयान से कांग्रेस पार्टी के आलाकमान और प्रधानमंत्री की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आना एक गंभीर मुद्दा है। ऐसे में इस बात को बिलकुल नकारा नहीं जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में बचे हुए चुनावी चरणों में खुर्शीद का मुद्दा का क्या रंग लेता है।उपरोक्त आधार पर कुछ बेहद गंभीर प्रश्न सामने आते हैं जिन पर विचार-विमर्श की महती आवश्यकता है, जैसे:
1. क्या सलमान खुर्शीद का बयान उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को राजनीतिक रूप से प्रभावित करेगा?
2. क्या खुर्शीद का बयान भविष्य में सांप्रदायिक रंग ले सकता है?
3. उनके बयान पर प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की चुप्पी क्या साबित करती है?
4. क्या उनका बयान चुनाव आयोग के महत्व को कम करता है.(साभार दैनिक जागरण )
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