भारतीय क्रिकेट टीम आज जिस निम्न बिंदु पर है, वहां से उसमें सुधार सिर्फ आमूल बदलावों से ही मुमकिन है। लेकिन प्रश्न है कि क्या कुछ सीनियर खिलाड़ियों की विदाई से परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी? मायूसी के पलों में उन खिलाड़ियों का खलनायक बन जाना अस्वाभाविक नहीं है, जिनसे प्रशंसक सबसे ज्यादा उम्मीदें पालते हों। मगर ऐसी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से अक्सर कुछ हासिल नहीं होता। अगर भारतीय टीम पहले इंग्लैंड और फिर ऑस्ट्रेलिया में पूरी तरह धुल गई, तो इसकी काफी जिम्मेदारी सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और वीरेंद्र सहवाग जैसे सीनियर खिलाड़ियों पर आती है, लेकिन उन्हें ही इसके लिए संपूर्ण दोषी ठहरा देना भारतीय क्रिकेट की ढांचागत समस्याओं से मुंह मोड़ना है। सवाल है कि इन सीनियर खिलाड़ियों को हटा दिया जाए, तो उनकी जगह लेने के लिए आज कौन तैयार है? क्या अनिल कुंबले की जगह भरी जा सकी है? इन खिलाड़ियों के चरमोत्कर्ष पर रहते समय उनके विकल्प तैयार करने की कोशिश नहीं की गई, तो उसके लिए कौन दोषी है? देश में स्पोर्टिग पिचें नहीं बनतीं या पैसा कमाने की धुन में विदेशी टीमों के भारत भ्रमण का कार्यक्रम तैयार करते समय टेस्ट क्रिकेट पर वनडे और टी-20 को तरजीह दी जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी किस पर है? क्या इन रुझानों ने ऐसे क्रिकेटरों के उदय को अवरुद्ध नहीं कर दिया है, जो हर परिस्थिति में सब्र, तकनीक की गहराई एवं पक्के इरादे के साथ विपक्षी टीमों को टक्कर दे सकें? जरूरत इन सभी सवालों के जवाब ढूंढ़ने की है। सिर्फ सीनियर खिलाड़ियों पर सारा ठीकरा फोड़ने की प्रवृत्ति क्रिकेट की हमारी समझ को संदिग्ध बनाती है। अगर सचमुच भारतीय टीम की सूरत बदलनी है, तो देश में क्रिकेट के पूरे ढांचे में परिवर्तन पर विचार करना होगा। ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज में 0-4 से हार का जिम्मा बीसीसीआई से लेकर चयनकर्ताओं तक को स्वीकार करना चाहिए। सीनियर खिलाड़ियों की विदाई अगर परिवर्तन का हिस्सा है, तो यह होना चाहिए, लेकिन बदलाव अगर वहीं ठहर गया, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
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