पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक विदेशी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा कि तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना के खिलाफ जारी आंदोलन के पीछे अमेरिका एवं स्कैंडेनेवियन देशों से धन पाने वाले गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) का हाथ है।उसके बाद तीन ऐसे संगठनों की मान्यता रद्द कर दिए जाने की खबर आई। फिर रूस ने, जिसके सहयोग से कुडनकुलम में परमाणु प्लांट लगा है, यह कहने में देर नहीं लगाई कि उसे इसका शक पहले से ही था। अब अमेरिका ने इसकी जांच कराने की बात कही है। यानी मामला गंभीर है। क्या सचमुच भारत की परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को नाकाम करने की कोई सुनियोजित कोशिश की जा रही है? महाराष्ट्र में जैतापुर से लेकर हरियाणा में गोरखपुर और पश्चिम बंगाल के हरिपुर में प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को भी स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा है।क्या इन सभी जगहों पर ऐसे एनजीओ सक्रिय हैं? अगर सरकार के पास इस बारे में कोई ठोस सबूत हैं, तो उन्हें अब जरूर सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोग परमाणु ऊर्जा एवं इसके विरोध को लेकर तथ्य आधारित राय बना सकें। लेकिन अगर जनता के एक हिस्से में परमाणु ऊर्जा से लाभ-हानि और ऐसे संयंत्रों से सुरक्षा को लेकर वास्तविक चिंताएं मौजूद हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने बीटी बैंगन के हुए विरोध के पीछे भी गैरसरकारी संगठनों की भूमिका की चर्चा की। लेकिन जयराम रमेश ने, जिन्होंने बतौर पर्यावरण मंत्री बीटी बैंगन की खेती पर रोक लगाई थी, यह बयान देकर स्थिति अस्पष्ट कर दी है कि उन्होंने वह फैसला किसी एनजीओ के दबाव में नहीं लिया, बल्कि वो वैज्ञानिकों, कई मुख्यमंत्रियों और इस मुद्दे से संबंधित हित-समूहों से लंबे विचार-विमर्श का परिणाम था।प्रधानमंत्री देश का तीव्र गति से विकास चाहते हैं, यह प्रशंसनीय है। लेकिन देश में ऐसे लोग भी हैं, जो विकास की उस धारणा से सहमत नहीं हैं। आज आवश्यकता इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संवाद की है। ऐसा तभी हो सकता है, जब सारे तथ्य सबके सामने हों और सरकार इसकी पहल करे।(साभार दैनिक भास्कर)
No comments:
Post a Comment