Monday, February 27, 2012

आज का गोधरा

गोधरा। 27 फरवरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर 59 कारसेवकों को साबरमती ट्रेन की दो बोगियों में जिंदा जला देने की घटना का समाचार जैसे-जैसे फैलता गया, गुजरात में हर तरफ हिंसा की ऐसी होली जलती चली गई कि जिसके दाग शायद अब कभी धोए न जा सकें। इस मामले में अदालत ने 31 आरोपियों को दोषी ठहराया, जिसमें से 11 को फांसी और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।आज गोधरा में रेलवे स्टेशन के पास झाड़-झंखाड़ में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन की एस-5 व एस-6 बोगियां पड़ी हुई हैं। अब ये खाली बोगियां इलाके के बच्चों के लिए उछल-कूद की जगह बन गई हैं। दृश्य ठीक वैसा ही है, जैसे हिंदी फिल्मों में बच्चे किसी भूत बंगले में दाखिल होने का साहस दिखाते हैं। बच्चों की उछल-कूद पर अब पुलिस दादा भी कोई आपत्ति नहीं उठाते, बस प्यार से इतना ही कह देते हैं कि बच्चों! शोर मत मचाओ।27 फरवरी 2002 की सुबह अब गोधरावासियों के जन-जीवन में एक धुंधली लेकिन न भुलाई जा सकने वाली छवि बनकर रह गई है। भले ही यहां के रेलवे कर्मचारी हों या फिर पोलन बाजार में चाय-नाश्ते के ठेले वाले। साबरमती की इन दो बोगियों में लगाई गई आग में सुलगे कारसेवकों और उसकी लपटों में झुलसे पूरे प्रदेश की याद लोगों की स्मृतिपटल पर गहरे घाव की तरह है। भले ही इस घटना को एक दशक का समय बीत गया हो, लेकिन मीडिया के आवन-जावन और खबरों के चलते गोधरा की यादें अक्सर जिंदा होती ही रहती हैं। हालांकि यहां के लोग अब पत्रकारों से बात करते हुए पहले की तरह उतने भावुक दिखाई नहीं देते।फरवरी 2002 की सुबह से लेकर अब तक के बदलते कई रंग गोधरावासियों ने देख लिए हैं। अपने-अपने शब्दों और अंदाज में.. भले ही ये लोग मुस्लिम हों, हिंदू हों, सिंधी हों या अन्य धर्म या जात-पात के.. सभी सिर्फ यही दुआ करते हैं कि ‘गोधरा’ अब फिर कभी ‘मोहरा’ न बने।मौलाना आजाद रोड, जो पोलन बाजार के नाम से विख्यात है, यहां एकता की जबर्दस्त मिसाल दिखाई देती है। भले ही मुस्लिम की दुकान में काम करने वाला हिंदू हो या किसी व्यवसाय में हिंदू-मुस्लिम पार्टनर हों। शहर में हिंदू देवी-देवताओं और मक्का की छवि एक साथ खोजना जरा भी मुश्किल नहीं।पोलन बाजार के केसरी चौक में भजिए का ठेला लगाने वाले युसुफ अल्लुभाई काजी (साबरमती एक्सप्रेस कांड के बाद पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए) कहते हैं.. ‘मैं जेल भी होकर आ चुका हूं। लेकिन मुझे दुख सिर्फ इसी बात का है कि शायद अब इसके पीछे की असल सच्चाई कभी बाहर नहीं आ पाएगी। गोधरा दंगों की जांच कर रही एसआईटी द्वारा जो जांच रिपोर्ट सौंपी गई है, कम से कम गोधरा के मुस्लिम तो जानते ही हैं कि उसमें कितनी सच्चाई है? जब मैं 1986-87 में गोधरा आया था तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे जेल जाना पड़ जाएगा।’इतना कुछ सहने के बाद भी युसुफ सबकुछ भुलाकर जीने की कोशिश कर रहे हैं। पहले की तरह वे अब भी यहीं सुबह से शाम तक भजिए का ठेला लगाते हैं। वैश्विक आर्थिक मंदी भले ही दूसरे शहरों में दिखाई देने लगी हो लेकिन गोधरा के पोलन बाजार में आज भी 2 रुपए की चाय और 12 रुपए में पावभाजी मिल जाती है। सुबह से लेकर शाम तक पोलन बाजार में पहले ही तरह चमक और चहल-पहल रहती है।जिस शहर से पूरे राज्य में दंगा शुरू हुआ था, आज वही शहर समझ गया है कि समय के साथ संबंधों में आ गई कड़वाहट को भूल जाने में ही सबकी भलाई है। आज हिंदू महिलाओं के लिए पोलन बाजार की यही गली सबसे सुरक्षित मानी जाती है, भले ही वह किसी भी समय यहां से गुजरें।मौलाना आजाद मार्ग का वह चौक, गोधरा कांड के बाद जहां जाने के नाम से भी लोग खौफ खाते थे, वहीं अब 15 अगस्त हो या 26 जनवरी, ईद हो या दीवाली, सभी धर्मो के लोग मिलजुलकर खुशियां मनाते दिखाई देते हैं।आईए हम भी दुआ करें कि गोधरा की यह एकता हमेशा कायम रहे और गोधरा की नई पीढ़ी गोधरा के सीने पर एक और नासूर का जन्म न होने दे।(साभार दैनिक भास्कर)

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