Wednesday, February 29, 2012

चुनाव में भारी पोलिंग से किसका होगा कल्याण?


राजनीतिक पंडित भले ही उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में बढ़े मतदान को ‘सत्ता विरोधी रुझान’ और ‘जातीय गणित’ से जोड़कर नतीजों की भविष्यवाणी में जुटे हों, लेकिन इससे सही तसवीर उभरकर सामने नहीं आती। मतदान की असली कहानी तो पोलिंग बूथों और उन पर लगी लंबी लाइनों में छिपी हुई है। 
इस साल पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और अब उत्तर प्रदेश के अब तक के चुनावों में वोटरों के उत्साह को लेकर बहस का दौर जारी है। दरअसल चुनाव में मतदान बढ़ने का रुझान कोई नया नहीं है। वर्ष 2011 में असम, केरल, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु और पांडिचेरी विधानसभा चुनाव में 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 9 फीसदी तक ज्यादा वोट पड़े थे। सवाल उठ रहा है कि जिस समय राजनीतिज्ञों के खिलाफ जनभावनाएं दिख रही थीं, तब वोटर क्यों इतने जोश से चुनावी प्रक्रिया में विश्वास जता रहे हैं ? कुछ लोग इसे लोकतंत्र की जीत के रूप में देख रहे हैं। राजनीति विज्ञानी प्रो. एसके द्विवेदी इसे अच्छी पहल मानते हैं। वह कहते हैं बड़ी तादाद में लोगों का बूथों पर जाकर मतदान करना लोकतंत्र में भरोसे को दिखाता है। 
कुछ महीने पहली बात है। पूरा देश अन्ना हजारे की भष्टाचार विरोधी मुहिम से जुड़ा था। तब लोगों का नेताओं और राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठ रहा था, लेकिन अब पोलिंग बूथों पर लंबी लाइनें बताती हैं कि जनता अच्छे नेतृत्व को लेकर गंभीर है। सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी कहते हैं कि जनता वोट की ताकत के जरिये किसी भी सरकार को बदल सकती है। इसीलिए बड़ी तादाद में मतदान में शामिल हुई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों का राजनीतिज्ञों पर भरोसा बढ़ा है और वे जाति और समुदाय के नाम पर वोटिंग नहीं कर रहे हैं। पहली बार वोट डालने वाली लखनऊ के डॉलीबाग की ट्विंकल कहती हैं कि हमें ऐसे प्रतिनिधि चुनने चाहिएं, जो भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन दे सकें। 
देश में कोई पार्टी भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा नहीं कर सकती। सभी का दामन दागदार है। इसलिए वोटरों ने खुद मतदान की कला सीख ली है। युवा संदीप त्यागी नजीबाबाद में अंतिम चरण में मतदान करेंगे। कहते हैं कि कुछ लोगों के लिए जाति महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन मैं विकास के लिए वोट डालूंगा। इस बार यूपी ने वोटिंग ट्रेंड में दूसरे राज्यों की तरह दिखाया है। कुछ लोग इस बदलाव का श्रेय निर्वाचन आयोग को देते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता प्रेमनाथ राय कहते है 1990 की शुरुआत तक मिडिल और कमजोर तबके के बहुत सारे वोटर हिंसा और बूथों पर कब्जों की वजह से मतदान केंद्रों तक नहीं जाते थे। अब स्थिति बदल गई हैं। घरों पर मतदाता पर्चियां पहुंचने से युवा वोटरों का विश्वास बढ़ा हैं और वे पोलिंग बूथों पर जा रहे हैं। उन्होंने बदलाव की इच्छा के साथ मतदान किया है। 
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में बढ़ा मतदान लोगों की इच्छाओं से ही नहीं व्यवस्था से भी जुड़ा है। 2007 में मणिपुर विधानसभा के चुनाव में 84.83 प्रतिशत वोट पड़े, जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में केवल 67.86 मतदान हुआ था। छोटे राज्यों में लोग विधायक को कानून बनाने वाला नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में मदद करने वाला मानते हैं। उनसे नौकरी और विकास की उम्मीद रखते हैं। इसी कारण वे अपने प्रत्याशी को जिताने में जुटे रहते हैं। ज्यादा मतदान और एंटी इकंबेंसी में मामूली संबंध है। राजनीतिक दलों में स्पर्धा, मतदाताओं की लामबंदी और साधनों का अधिकता भी मतदान बढ़ने के कारण हैं। ज्यादा वोटर बूथों तक कैसे पहुंचे, इसका पता छह मार्च को पता लगेगा, लेकिन लोकतंत्र में मतदाताओं के विश्वास से हर कोई खुश हैं। (साभार अमर उजाला )

Tuesday, February 28, 2012

गुजरात: कहां तक पहुंची इंसाफ़ की लड़ाई?

गुजरात के दंगा पीड़ित दस साल के बाद भी इंसाफ़ के लिए दर-बदर की ठोकरें खा रहें हैं.गुजरात में 2002 में हुए दंगों के पीड़ितों का इंसाफ़ के लिए संघर्ष दस वर्ष बाद भी जारी है. कुछ मामलों में लोगों को इंसाफ़ ज़रूर मिला है और दोषियों को सज़ा भी सुनाई गई है लेकिन वे दंगे इतने भयावह थे और पीड़ितों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि इंसाफ़ की ये लड़ाई कब तक चलती रहेगी, कुछ कहना मुश्किल है. लेकिन दंगों के दस साल बाद कहां तक पहुंची है इंसाफ़ की लड़ाई. यही जानने की कोशिश की गई है इस रिपोर्ट में.अयोध्या से गुजरात जा रही साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में गुजरात के गोधरा के पास हुए हादसे में 58 लोग मारे गए थे जिनमें ज्यादातर हिंदू कारसेवक थे. इसके बाद गुजरात में ड़के दंगों में आधिकारिक तौर पर लगभग 1200 लोग मारे गए थे और लगभग एक लाख 70 हज़ार लोग बेघर हो गए थे. इन दंगों में मरने वाले ज़्यादातर मुसलमान थे. भारत के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने 11 मई 2005 को गुजरात दंगों में मारे गए लोगों की संख्या के बारे में राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल का लिखित जवाब दिया था.उनके जवाब के अनुसार दंगों में कुल 790 मुसलमान और 254 हिंदू मारे गए थे और कुल 223 लोग उस समय तक लापता बताए गए थे जिन्हें बाद में मरा हुआ मान लिया गया था. इस तरह से भारत सरकार की ओर से दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ गुजरात दंगों में कुल 1267 लोग मारे गए थे. हालाकि कुछ ग़ैर-सरकारी गठन और स्थानीय लोगों के अनुसार दंगों में दो हज़ार से भी ज़्यादा लोग मारे गए थे. लेकिन अगर इंसाफ़ मिलने की बात की जाए तो इन दस वर्षो में अब तक केवल गोधरा कांड, बेस्ट बेकरी, बिल्क़ीस बानो और सरदारपुरा मामले में निचली अदालत ने फ़ैसला सुनाया है जिनमें कुल मिलाकर 83 लोगों को सज़ा सुनाई गई है.
बेस्ट बेकरी मामला
ज़ाहिरा शेख ने बार-बार अपना बयान बदला जिसके कारण अदालत ने उन्हें शपथ लेकर झूठ बोलने का दोषी क़रार दिया था,वडोदरा के निकट स्थित बेस्ट बेकरी में एक फ़रवरी 2002 को 14 लोगों को जलाकर मार दिया गया था. बेस्ट बेकरी ज़ाहिरा शेख़ के परिवार वालों का था और मरने वालों में उनके परिवार वाले और बेकरी में काम करने वाले कुछ कारीगर थे. ज़ाहिरा इस मुक़दमे की प्रमुख गवाह थी. इस मामले में सभी 21 अभियुक्तों को जून 2003 में आए फ़ैसले में निचली अदालत ने बरी कर दिया गया था. कारण ये था कि गवाहों ने अदालत में अपने बयान बदल डाले थे. निचली अदालत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ गुजरात सरकार हाई कोर्ट भी गई थी लेकिन हाई कोर्ट ने दिसंबर 2003 में दिए गए अपने फ़ैसले में निचली अदालत के फ़ैसले को सही ठहराया था. बाद में मानवाधिकार संगठनों की मदद से ज़ाहिरा शेख़ ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की और अप्रैल 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने बेस्ट बेकरी केस की दोबारा जांच और सुनवाई गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में कराने का आदेश दिया. मुंबई हाईकोर्ट की निगरानी में गठित मज़गांव सेशन कोर्ट ने फ़रवरी 2006 में फ़ैसला सुनाते हुए इस मामले के 21 अभियुक्तों में से नौ को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने आठ लोगों को बरी कर दिया था जबकि चार लोगों को अभी तक गिरफ़्तार नहीं किया जा सका है. तमाम नौ दोषी लोग इस समय कोल्हापुर सेंट्रल जेल में अपनी सज़ा काट रहें हैं लेकिन फ़रवरी 2012 में मुबंई हाई कोर्ट ने उनमें से एक मुजरिम जगदीश राजपूत को ख़राब स्वास्थ के कारण ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया है. उन तमाम लोगों ने निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुंबई हाई कोर्ट में अपील दायर की है जिसकी पांच मार्च 2012 से रोज़ाना सुनवाई होगी. लेकिन इस पूरे मामले में मुख्य गवाह ज़ाहिरा शेख़ को अदालत ने अपना बयान बार-बार बदलने का दोषी क़रार दिया था और उन्हें एक साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी और 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी अदा करने का कहा था.
बिल्क़ीस बानो मामला
बिल्क़ीस बानो की कहानी इंसाफ़ के लिए हर क़ीमत पर संघर्ष करते रहने की कहानी है.गुजरात दंगों से जुड़ा ये दूसरा मामला था जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात से बाहर कराने का आदेश दिया था. दाहोद ज़िले के राधिकपुर गावं की रहने वाली बिल्क़ीस बानो दंगों से बचने के लिए अपने परिवार समेत 17 लोगों के साथ तीन मार्च 2002 को भाग रहीं थीं तभी छापरवाड़ गांव के पास दंगाईयों ने उन्हें घेर लिया. बलवाईयों ने बिल्क़ीस के साथ सामूहिक बलात्कार किया और उनकी साढ़े तीन साल की बेटी समेत उनके परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी थी. बिल्क़ीस उस समय ख़ुद भी गर्भवती थीं. बिल्क़ीस बानो से बीबीसी की विशेष बातचीतगवाहों को डराने धमकाने और ठीक से जांच नहीं करने के कारण गुजरात की निचली अदालत से उन्हें इंसाफ़ नहीं मिल पाया था और फिर सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में उनके मामले की सुनवाई महाराष्ट्र में कराने का आदेश दिया था. मुंबई स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने जनवरी 2008 में अपना फ़ैसला सुनाते हुए इस मुक़दमे के कुल 20 अभियुक्तों में से 12 को बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने का दोषी क़रार दिया था. अदालत ने पर्याप्त सबूत ना होने के कारण सात लोगों को रिहा कर दिया था जबकि एक अभियुक्त की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई थी. दोषी पाए गए 12 लोगों में से 11 को उम्र क़ैद और एक पुलिसकर्मी, लीमखेड़ा पुलिस थाना के तत्कालीन हेड कॉंस्टेबल, सोमाभाई गोरी को तीन साल के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.
एसआईटी के तहत मामले
कई दंगा पीड़ित और मानवाधिकार कार्यकर्ता एसआईटी के काम-काज पर भी उंगलियां उठा रहें हैं.गुजरात सरकार, वहां की राज्य पुलिस और अभियोजन पक्ष के रवैये से वहां दंगा पीड़ितों को शायद पूरी तरह से इंसाफ़ नहीं मिल पा रहा था. मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने अपने कई फ़ैसलों या टिप्पणियों में दंगा पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने में राज्य की मोदी सरकार की विफलता की जम कर आलोचना की थी. बेस्ट बेकरी और बिल्क़ीस बानो के केस को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात से बाहर स्थानांतरण भी कर दिया था लेकिन दंगों से जुड़े सारे मामलों को गुजरात से बाहर भेजना शायद मुमकिन नहीं था. इसलिए मानवाधिकार आयोग, दंगा पीड़ित और उनको इंसाफ़ दिलाने के लिए लड़ रहे एक ग़ैर-सरकारी संगठन 'सिटिज़ेन्स फ़ॉर पीस एंड जस्टिस' की तरफ़ से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2008 के अपने फ़ैसले में दंगों से जुड़े कुछ ख़ास मामलों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल के गठन का आदेश दिया था और ख़ुद ही उनकी निगरानी करने का फ़ैसला किया था. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय एसआईटी के गठन का आदेश दिया था. एसआईटी जिन मामलों की जांच कर रही है, वे इस प्रकार हैं. गोधरा मामला- 27 फ़रवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एक डब्बे एस-6 में गुजरात के गोधरा के पास आग लगी जिसमें 58 लोग मारे गए थे. मरनेवालों में ज़्यादातर लोग अयोध्या से लौट रहे हिंदू कारसेवक थे. इस मामले की सुनवाई जून 2009 में शुरू हुई थी. इस मामले में अहमदाबाद की विशेष अदालत ने मार्च 2011 में अपना फ़ैसला सुनाते हुए 31 लोगों को दोषी क़रार दिया था. मुजरिम क़रार दिए गए 31 लोगों में से अदालत ने 11 लोगों को मौत और 20 को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी. सरदारपुरा हत्याकांड- एक मार्च 2002 को सरदारपुरा में हुए दंगों में 33 लोगों को ज़िंदा जला कर मार डाला गया था. गुजरात के मेहसाणा ज़िले की एक विशेष अदालत ने नवंबर 2011 में इस मामले में 31 लोगों को दोषी क़रार देते हुए उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने इस मामले में कुल 73 अभियुक्तों में से 42 को सबूत ना होने के कारण बरी कर दिया था. गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड- 28 फ़रवरी 2002 को अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी में भड़की हिंसा में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री समेत कुल 69 लोग मारे गए थे. एसआईटी ने इस मामले में अब तक कुल 84 लोगों को अभियुक्त बनाया है जिनमें 70 गिरफ़्तार किए जा चुके हैं, आठ की मौत हो चुकी है और छह अभी फ़रार है. फ़िलहाल 56 लोगों को ज़मानत मिल चुकी है और इस समय केवल 10 अभियुक्त जेल में हैं. एसआईटी ने निलंबित डीएसपी के जी एर्दा और दो स्थानीय भाजपा नेता समेत कुल आठ लोगों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर कर दिए हैं. एहसान जाफ़री की विधवा ज़किया जाफ़री इस मामले में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को षडयंत्र रचने और उनके पति की हत्या रोकने में असफल रहने के लिए ज़िम्मेदार ठहराने के लिए अदालत से अपील कर रहीं हैं. एसआईटी उनके आरोपों की अलग से जांच कर रही है. नरोदा पाटिया हत्याकांड- 28 फ़रवरी 2002 को नरोदा पाटिया में हुए दंगे में 95 लोग मारे गए थे. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की क़रीबी समझेजानी वाली पूर्व मंत्री माया कोडनानी समेत 67 लोगों को इस मामले में अभियुक्त बनाया गया है. इस मामले में 13 अभियुक्त जेल में हैं और 49 अभियुक्त ज़मानत पर रिहा हो चुके हैं. ओड मामला-गुजरात के आनंद ज़िले में स्थित ओड गांव और खमबोडज गांव के दो मामले एसआईटी को दिए गए थे. ओड में हुई हिंसा में 30 लोगों की मौत हो गई थी. फ़िलहाल सारे अभियुक्त ज़मानत पर रिहा हो चुके हैं. नरोदा गाम-नरोदा गाम में 11 लोग मारे गए थे. एसआईटी ने इस मामले में भारतीय जनता पार्टी की नेता और पूर्व मंत्री माया कोडनानी के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाख़िल किया है. लेकिन इस केस के सारे 85 अभियुक्तों को ज़मानत मिल चुकी है. दिपड़ा दरवाज़ा मामला- मेहसाणा ज़िले के दिपड़ा दरवाज़ा इलाक़े में गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा में 11 लोगों की मौत हो गई थी. एसआईटी ने इस मामले में सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी एमके पटेल के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल किए हैं. मेहसाणा के ही काडी शहर इलाक़े में हुए दंगे में 65 लोग मारे गए थे. ब्रितानी नागरिकों की हत्या- 2002 के गुजरात दंगों के दौरान तीन ब्रितानी नागरिक भी मारे गए थे. भारतीय मूल के ब्रितानी नागरिक इमरान दाऊद, सईद दाऊद, शकील दाऊद, और मोहम्मद असवत उसी समय गुजरात के अपने पुश्तैनी गांव लाजपुर में आए हुए थे. 28 फ़रवरी को जब वे सभी आगरा से गुजरात वापस जा रहे थे तभी साबरकंठा ज़िले के प्रांतिज इलाक़े के पास दंगाईयों ने उन्हें घेर लिया और उनके कार को आग लगा दी. सईद दाऊद, मोहम्मद असवत और कार के ड्राईवर स्थानीय नागरिक यूसुफ़ पिरागर की तुरंत मौत हो गई थी. शकील दाऊद का कुछ पता नहीं चल सका था जिस कारण उन्हें भी बाद में मरा हुआ मान लिया गया जबकि इमरान दाऊद इस हादसे में बुरी तरह घायल हो गए थे लेकिन पुलिस की मदद से उनकी जान बच गई थी. इस केस में छह लोग अभियुक्त हैं जिनपर मुक़दमा चल रहा है. इस मामले में एसआईटी ने ब्रिटेन में रह रहे प्रमुख गवाह इमरान दाऊद और दुबई में रह रहे एक दूसरे गवाह बिलाल दाऊद का बयान अप्रैल 2010 में वीडियो कॉंफ़्रेंसिंग के ज़रिए दर्ज कर किया था.
ज़किया जाफ़री केस
ज़किया जाफ़री गुजरात दंगों के पीडितों की लड़ाई की प्रतीक बन गई हैं.कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी में 28 फ़रवरी को हुए दंगों में मारे गए थे. दंगों से बचने के लिए कई मुसलमानों ने गुलबर्ग सोसायटी में रह रहे एहसान जाफ़री के घर इस उम्मीद पर शरण लिया था कि पूर्व सांसद होने के कारण दंगाई शायद वहां तक नहीं पहुंच सकें. लेकिन दंगाईयों ने गुलबर्ग सोसायटी को घेर लिया और कई लोगों को ज़िंदा जला दिया. इस दंगे में एहसान जाफ़री समेत कुल 69 लोग मारे गए थे. एहसान जाफ़री की विधवा ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया था कि उनके पति एहसान जाफरी ने पुलिस और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सभी को संपर्क करने की कोशिश की थी लेकिन किसी ने उनकी मदद की. ज़किया जाफ़री ने जून 2006 में गुजरात पुलिस के महानिदेशक से अपील की थी कि नरेंद्र मोदी समेत कुल 63 लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की जाए. ज़किया का आरोप है कि मोदी समेत उन सभी लोगों ने दंगों के दौरान पीड़ितों को जानबूझकर बचाने की कोशिश नहीं की. पुलिस महानिदेशक ने जब उनकी अपील ठुकरा दी तब ज़किया ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. लेकिन नवंबर 2007 में हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील ख़ारिज कर दी. उसके बाद मार्च 2008 में ज़ाकिया जाफ़री और ग़ैर-सरकारी संगठन 'सिटिज़ेन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस' संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोर्ट की मदद करने के लिए जाने माने वकील प्रशांत भूषण को एमाइकस क्योरि नियुक्त किया. अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों की जांच के लिए पहले से गठित एसआईटी को इस मामले की जांच के आदेश दिए. एसआईटी ने 2010 के शुरू में नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए बुलाया और मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी. इस बीच अक्तूबर 2010 में प्रशांत भूषण इस केस से अलग हो गए जिसके बाद अदालत ने राजू रामचंद्रन को एमाइकस क्यूरी नियुक्त किया. राजू रामचंद्रन ने जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी. मार्च 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को इस मामले में और जांच करने के निर्देश दिए क्योंकि अदालत के अनुसार एसआईटी ने जो सबूत पेश किए थे और जो नतीजे निकाले थे उन दोनों में तालमेल नहीं था. मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एमाइकस क्यूरी को गवाहों और एसआईटी के अफ़्सरों से मिलने के आदेश दिए. जूलाई 2011 में राजू रामचंद्रन ने एक बार फिर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी. सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने मोदी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश तो नहीं दिया लेकिन ये कहा कि एसआईटी निचली अदालत में अपनी रिपोर्ट पेश करे. ज़किया जाफ़री और नरेंद्र मोदी दोनों ने इसे अपनी-अपनी जीत की तरह देखा. नरेंद्र मोदी ने इसे अपने लिए क्लिन चिट क़रार दिया तो ज़किया ने इसे एक क़ानूनी-प्रक्रिया की तरह देखा. बहरहाल फ़रवरी 2012 में एसआईटी ने अहमदाबाद की निचली अदालत में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. मीडिया में सूत्रों के हवाले से ख़बरें आने लगीं कि एसआईटी ने नरेंद्र मोदी को ये कहते हुए क्लीन चिट दे दी है कि एसआईटी के पास मोदी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं. ज़किया जाफ़री ने निचली अदालत से एसआईटी की रिपोर्ट मांगी थी. अदालत ने 15 फ़रवरी को एसआईटी को रिपोर्ट की एक प्रति एक महीने के अंदर ज़किया जाफ़री को सौंपने के निर्देश दिए हैं.
दंगों के अन्य मामले
पुलिस और अभियोजन पक्ष के रवैये से तंग आकर कई लोगों ने अपने केस वापस ले लिए हैं.गुजरात दंगों के दौरान लगभग चार हज़ार मामले दर्ज हुए थे. लेकिन लगभग सारे मामले गुजरात पुलिस ने ये कहते हुए बंद कर दिए थे कि उसके पास केस को जारी रखने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं. अगस्त 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को उनमें से लगभग दो हज़ार मामलों को दोबारा खोलने के आदेश दिए थे. लेकिन मौजूदा जानकारी के अनुसार उनमें से भी ज़्य़ादातर मामले पुलिस ने या तो बंद कर दिए हैं या फिर ऐसे हालात पैदा हो गए हैं कि पीड़ितों ने मजबूर होकर अदालत के बाहर समझौता कर लिया.
मुआवज़े के लिए संघर्ष
दंगों में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कुल 687 करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई थी लेकिन कई लोगों को अभी तक मुआवज़ा नहीं मिल सका है.जिस तरह से गुजरात दंगा पीड़ितों की न्यायिक लड़ाई पिछले दस वर्षों से जारी है उसी तरह से मुआवज़ा के मामले में भी उनको कुछ ख़ास सफलता नहीं मिल पाई है. दस वर्षों के बाद भी ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें अभी तक या तो मुआवज़ा नहीं मिला है या फिर बहुत मामूली सी मदद मिली है. सरकार के अपने आंकड़ों के हिसाब से लगभग 1000 लोग इन दंगों में मारे गए थे और लगभग 223 लोग लापता थे. उनके अलावा लगभग 2100 लोग उन दंगों में घायल हुए थे. गुजरात सरकार ने मारे गए लोगों के लिए प्रत्येक के परिजन को एक लाख 50 हज़ार रूपए देने की घोषणा की थी. उनमें से भी 60 हज़ार रूपए के नर्मदा बॉंड देने की बात कही गई थी. ये रक़म बहुत कम है क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट ने 1996 में दिए गए अपने फ़ैसले में1984 के सिख विरोधी दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों को साढ़े तीन लाख रूपए मुआवज़ा देने का आदेश दिया था. गुजरात सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया और उनमें से भी कई लोगों को अभी तक मुआवज़ा नहीं मिला है. गुजरात सरकार ने ख़ुद माना है कि उन दंगों में लगभग पांच हज़ार घर पूरी तरह तबाह हो गए थे और 19 हज़ार घर आंशिक रूप से नष्ट हुए थे. राज्य सरकार ने क्षति ग्रस्त हुए घरों के लिए 50 हज़ार रूपए की अधिकतम राशी तय कर दी थी और वो भी कई लोगों को नहीं मिलें हैं. गुजरात सरकार ने पूरी तरह क्षति ग्रस्त हुए घरों के लिए सात करोड़ 62 लाख और आंशिक रूप से टूटे हुए घर के लिए 15 करोड़ 50 लाख रूपए का मुआवज़ा दिया है यानी लगभग 23 हज़ार टूटे हुए घरों के लिए सरकार ने सिर्फ़ 23 करोड़ रूपए मुआवज़े के तौर पर दिया है. 2002 दंगों के बाद केंद्र सरकार ने 150 करोड़ रूपए दंगा पीड़ितों के लिए राज्य सरकार को भेजे थे लेकिन फ़रवरी 2003 में राज्य सरकार ने लगभग 19 करोड़ रूपए केंद्र को ये कहते हुए लौटा दिए थे कि सभी पीड़ितों को मुआवज़ा मिल चुका है. अब तक गुजरात सरकार ने लगभग 186 करोड़ रूएए मुआवज़े के तौर पर दिए हैं जिनमें मारे गए लोगों के परिजन, घायल हुए लोग, दंगों में नष्ट हुए घर, राहत शिविरों को दिए गए राशन वग़ैरह के नाम पर दिए गए कुल मुआवज़े शामिल हैं. गुजरात सरकार के अनुसार उन दंगों में महिलाओं पर हमले के 185 मामले , बच्चों पर हमले के 57 मामले और बलात्कार के 11 मामले सामने आए थे लेकिन सरकार ने आज तक उन पीड़ितों को कोई मुआवज़ा नहीं दिया है. इसी सिलसिले में गुजरात हाई कोर्ट ने दंगों के दौरान जला दी गई 56 दुकानों के मुआवज़े के मामले में 15 फ़रवरी को नरेंद्र मोदी सरकार को अदालत की अवमानना का नोटिस जारी किया था. पीड़ित दुकानदारों की याचिका पर सुनवाई करते हुए अखिल कुरैशी और सीएल सोनी की एक पीठ ने अहमदाबाद के ज़िलाधीश को नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि क्यों न अदालत की अवमानना का मुक़दमा चलाया जाए. अदालत ने ज़िलाधीश को जवाब देने के लिए 14 मार्च तक का समय दिया है.(साभार दैनिक भास्कर और  बी बी सी )

تنازعات کی بنیاد پر تشہیر پانے کی کوشش



 اتر پردیش میں اقتدار حاصل کرنے کی کانگریسی آرزو قانون نظام اور انتخابی ضابطہ اخلاق کو شدید چیلنج دے رہی ہے. ابھی رابرٹ واڈرا، سلمان خورشید اور بےنی پرساد ورما کا معاملہ ٹھنڈا بھی نہیں ہوا تھا کہ کانگریس جنرل سیکریٹری راہل گاندھی نے بھی قانون نظام کو ٹھینگا دکھا دیا. حالانکہ کانگریس اسے اتر پردیش کی وزیر اعلی مایاوتی کے اشارے پر انتظامیہ تعصب کا معاملہ بتاکر فائدہ اٹھانے کی کوشش کر رہی ہے، لیکن یہ سراسر قانون نظام اور جمہوری اقدار کے لیے قائم آئینی اداروں کو یوراجی انداز میں دھتا بتانے کا مسئلہ ہے. قانون - نظام کے خلاف ورزی کا یہ معاملہ کانپور میں راہل گاندھی کے روڈ شو کی وجہ سے درج ہوا ہے. پہلے سے طے راہل کے اس روڈ شو کے لئے انتظامیہ سے اجازت طلب کی گئی تھی اور انتظامیہ نے کچھ تبدیلی کے ساتھ روڈ شو کی اجازت دے بھی دی تھی. پر راہل گاندھی نے روڈ شو شروع کرتے ہوئے نہ تو انتظامیہ کی طرف سے بتائے گئے روٹ کا احترام کیا، نہ ہی اپنے کی طرف سے بتائے گئے روٹ کو ہی مانا، بلکہ من مانے طریقے سے روڈ شو اہروا ایئر پورٹ سے شروع کر دیا. اب اس ہٹھدھرمتا اور من مانے پن پر کانگریس کے ترجمانوں اور لیڈروں کے دلائل بھی عجیب ہیں. کانگریس کے ترجمان ابھیشیک منو سنگھوی اس میں جمہوریت کی مضبوطی دیکھتے ہوئے کہہ رہے ہیں کہ جائز تشہیر مہم منصفانہ جمہوری حق کا بنیادی حصہ ہے. اب سوال یہ اٹھتا ہے کہ قانون کا کیا مطلب ہے؟ کیا اپنے انتخابی مہم کے لئے انتظامی اجازت لینا اور انتظامیہ کے سمت - ہدایات کو ماننا قانونی کام ہے یا انتظامیہ کو ٹھینگا دکھاتے ہوئے من مانے طریقے سے من مرضی کرنا قانون س کے مطابق جمہوریت کو مضبوط کرنے والا کام ہے؟ اسی کانگریس کی مرکز میں بیٹھی حکومت نے بدعنوانی اور کالے دھن کے سوال پر ہو رہی تحریکوں کے ساتھ حالیہ دنوں میں جو سلوک کیا، وہ سب جانتے ہیں . لوک پال کے سوال پر ٹیم انا کو تحریک کی اجازت کے لئے سپریم کورٹ تک میں آواز اٹھا لگانی پڑی. لوک پال یا کالے دھن کے سوال پر تحریک کرنے والے لوگوں سے آپ کی رضامندی یا نا اتفاقی ہو سکتی ہے، لیکن مخالفت کرنے کے ان کے جمہوری حق کی خلاف ورزی کرنے کا کسی بھی حکومت کے پاس حق نہیں ہے. تمام گھوٹالوں میں گھری مرکزی حکومت کا جمہوری رویہ کم سے کم پچھلے دو سالوں سے تو پورا ملک دیکھ ہی رہا ہے. حکومت چلانے والی پارٹی سے ایسی افراتفری کوئی غیر فطری بھی نہیں ہے. حالانکہ یہ معاملہ اتر پردیش پردیش میں اقتدار کے لئے کانگریس کی سیاسی انتشار یا پارٹی کے نوجوان جنرل سکریٹری کی طرف سے موجودہ سیاست میں قائم اور مسلسل دوہرائے جا رہے ڈبل معیار کا ہی نہیں ہے، بلکہ یہ ایک مخصوص شخصیت کے تحفظ سے منسلک مسئلہ بھی ہے. راہل گاندھی ملک کے ان مخصوص حکمرانوں میں سے ہیں، جنہیں زیڈ پلس قسم کی سیکورٹی حاصل ہے. ایسے مخصوص شخصیت کے لئے روٹ اور پروگرام کی اجازت دینے سے پہلے مقامی انتظامیہ کو کئی اہم نکات کا خیال رکھنا ہوتا ہے. ایسے میں اگر کوئی سیاسی لیڈر انتظامیہ کی اجازت کو ٹھینگا کرتا ہے تو یقینا یہ ایک انتہائی غیر ذمہ دارانہ رویہ کہا جائے گا. اب ریاست کے کانگرےسی لیڈروں سے لے کر قومی ترجمانوں تک تمام اس معاملے کی سنجیدگی کو سمجھے بغیر راہل گاندھی کے اس کرتے کو قانونی بتانے پر تلے ہیں. دراصل، ریاست میں 21 سالوں سے اقتدار سے باہر رہی کانگریس کی کئی ایسی تمنائیں اور مجبوریاں ہیں، جو اسے کسی بھی حد تک جانے کی وجہ دے رہی ہیں. کانگریس جانتی ہے کہ مرکز میں اپنے دم پر اقتدار میں آنے کا کوئی بھی راستہ اتر پردیش میں فتح کے بغیر ممکن نہیں ہے. اس حقیقت کو سمجھ کر ہی راہل گاندھی اور ان کے سیاسی گرو نے اپنا مکمل توجہ اتر پردیش پر مرکوز کر د ی ہے اور راہل گاندھی اس سطح تک اس مہم میں ملوث ہو چکے ہیں کہ وہ اب خود ان کے اور پوری کانگریس کے لئے اعزاز کی بڑی لڑائی بن چکا ہے. راہل اور ٹیم تشہیر اور میڈیا کی اہمیت کو جانتی ہے. اس لئے خبروں اور خاص طور متنازعہ خبروں میں بنے رہنے کے لئے وقت - وقت پر کچھ الگ کرتے رہنا ان کے لیے ضروری ہے. اس کے لئے بے شک شبلی کالج کے گیسٹ ہاو ¿س میں رہنے سے لے کر سماج وادی پارٹی کے وعدوں کی لسٹ پھاڑنے اور ضابطہ اخلاق کی خلاف ورزی کا راستہ اپنانا پڑے.اس سے تو لھتا ہے کہ کوئلہ وزیر اور اس پہلے دگ وجے سنگھ کا بیان کہ کانگریس اگر اتر پر دیش میں نہیں جیتی تو صدر راج نافذ ہو گا بھی اسی کی کڑی ہے ۔


Monday, February 27, 2012

साइलेंट रोमांस ‘द आर्टिस्ट’


लॉस एंजेलिस। दो सितारों की प्रेम कहानी ‘द आर्टिस्ट’ को इस साल ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। ‘द आर्टिस्ट’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में यह खिताब मिला है।मूक पद्दति पर बनाई गई ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘द आर्टिस्ट’ को विभिन्न श्रेणियों में पांच ऑस्कर मिले हैं। इस फिल्म के लिए माइकल हजानविसियस को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, ज्यां दुजार्दिन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, लुडोविक बाउर्स सर्वश्रेष्ठ फिल्म धुन रचने के लिए और मार्क ब्रिजेस को आर्टिस्ट के लिए 30 के दशक की पोशाकें बनाने के लिये सर्वश्रेष्ठ कॉस्टयूम श्रेणी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।‘आयरन लेडी’ में निभाई गई भूमिका के लिए मैरिल स्ट्रीप को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब दिया गया है। ईरानी फिल्म ‘द सेपरेशन’ ने विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ऑस्कर हासिल किया है। रेंगो फिल्म को सर्वश्रेष्ठ एनिमेटिड फिल्म का ऑस्कर मिला है। अमेरिकी राजनेता साराह पालिन को लेकर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘अनडिफीटेड’ को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री और पाकिस्तान में एसिड हमलों की शिकार महिलाओं पर बनाई गई ‘सेविंग फेस’ को लघु विषय के सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।साल 2012 में बच्चों के लिए अद्भुत सौगात के तौर पर आई त्रिआयामी फिल्म ‘हयूगो’ ने भी फिल्म निर्माण की तकनीकी दक्षता के लिए कई श्रेणियों में पांच ऑस्कर हासिल किये हैं।हयूगो ने सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन, सर्वश्रेष्ठ विजुअल इफेक्ट्स, सर्वश्रेष्ठ संगीत संपादन और सर्वश्रेष्ठ संगीत मिश्रण के लिए ऑस्कर हासिल किया है। रॉबर्ट रिचर्डसन को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी के ऑस्कर से सम्मानित किया गया है।उल्लेखनीय है कि इस साल के ऑस्कर के लिए भी भारत की ओर से विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म श्रेणी में मलयाली फिल्म ‘अबूः सन ऑफ एडम’ को नामांकित किया गया था। यह फिल्म एक फेरी वाले की कहानी है जिसकी एकमात्र इच्छा जीवन में एक बार हज यात्रा पर जाने की होती है।

कुतुबुद्दीन अंसारी

2002 के गुजरात दंगों की भयावहता का ‘चेहरा’ बने कुतुबुद्दीन अंसारी अब इतिहास से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। वे यातनाओं के उन पलों और दंगों को भूलना चाहते हैं। पूर्वी अहमदाबाद के ओढ़व सोनी की चाल के पास कुतुबुद्दीन का तीन मंजिला मकान है। वहां वे तीन बेटियों, पत्नी और वृद्ध मां के साथ रहते हैं। दस साल पहले कपड़े काटने का काम करने वाले ‘कटर मास्टर’ की खुद की रेडीमेड फैक्टरी है।वे कहते हैं कि मेरी यह प्रगति सरकारी मदद के चलते नहीं हुई। हिंदू-मुस्लिम मित्रों ने सहयोग दिया। वह कहते हैं कि दंगों के बाद पश्चिम बंगाल ने मुझे आश्रय देने की पेशकश की थी। मैं गुजरात को भूल नहीं पाया। लौट आया। मकान की ऊपरी मंजिल पर कारखाना शुरू किया। पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज फैक्टरी में छह कारीगर है।

आज का गोधरा

गोधरा। 27 फरवरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर 59 कारसेवकों को साबरमती ट्रेन की दो बोगियों में जिंदा जला देने की घटना का समाचार जैसे-जैसे फैलता गया, गुजरात में हर तरफ हिंसा की ऐसी होली जलती चली गई कि जिसके दाग शायद अब कभी धोए न जा सकें। इस मामले में अदालत ने 31 आरोपियों को दोषी ठहराया, जिसमें से 11 को फांसी और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।आज गोधरा में रेलवे स्टेशन के पास झाड़-झंखाड़ में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन की एस-5 व एस-6 बोगियां पड़ी हुई हैं। अब ये खाली बोगियां इलाके के बच्चों के लिए उछल-कूद की जगह बन गई हैं। दृश्य ठीक वैसा ही है, जैसे हिंदी फिल्मों में बच्चे किसी भूत बंगले में दाखिल होने का साहस दिखाते हैं। बच्चों की उछल-कूद पर अब पुलिस दादा भी कोई आपत्ति नहीं उठाते, बस प्यार से इतना ही कह देते हैं कि बच्चों! शोर मत मचाओ।27 फरवरी 2002 की सुबह अब गोधरावासियों के जन-जीवन में एक धुंधली लेकिन न भुलाई जा सकने वाली छवि बनकर रह गई है। भले ही यहां के रेलवे कर्मचारी हों या फिर पोलन बाजार में चाय-नाश्ते के ठेले वाले। साबरमती की इन दो बोगियों में लगाई गई आग में सुलगे कारसेवकों और उसकी लपटों में झुलसे पूरे प्रदेश की याद लोगों की स्मृतिपटल पर गहरे घाव की तरह है। भले ही इस घटना को एक दशक का समय बीत गया हो, लेकिन मीडिया के आवन-जावन और खबरों के चलते गोधरा की यादें अक्सर जिंदा होती ही रहती हैं। हालांकि यहां के लोग अब पत्रकारों से बात करते हुए पहले की तरह उतने भावुक दिखाई नहीं देते।फरवरी 2002 की सुबह से लेकर अब तक के बदलते कई रंग गोधरावासियों ने देख लिए हैं। अपने-अपने शब्दों और अंदाज में.. भले ही ये लोग मुस्लिम हों, हिंदू हों, सिंधी हों या अन्य धर्म या जात-पात के.. सभी सिर्फ यही दुआ करते हैं कि ‘गोधरा’ अब फिर कभी ‘मोहरा’ न बने।मौलाना आजाद रोड, जो पोलन बाजार के नाम से विख्यात है, यहां एकता की जबर्दस्त मिसाल दिखाई देती है। भले ही मुस्लिम की दुकान में काम करने वाला हिंदू हो या किसी व्यवसाय में हिंदू-मुस्लिम पार्टनर हों। शहर में हिंदू देवी-देवताओं और मक्का की छवि एक साथ खोजना जरा भी मुश्किल नहीं।पोलन बाजार के केसरी चौक में भजिए का ठेला लगाने वाले युसुफ अल्लुभाई काजी (साबरमती एक्सप्रेस कांड के बाद पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए) कहते हैं.. ‘मैं जेल भी होकर आ चुका हूं। लेकिन मुझे दुख सिर्फ इसी बात का है कि शायद अब इसके पीछे की असल सच्चाई कभी बाहर नहीं आ पाएगी। गोधरा दंगों की जांच कर रही एसआईटी द्वारा जो जांच रिपोर्ट सौंपी गई है, कम से कम गोधरा के मुस्लिम तो जानते ही हैं कि उसमें कितनी सच्चाई है? जब मैं 1986-87 में गोधरा आया था तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे जेल जाना पड़ जाएगा।’इतना कुछ सहने के बाद भी युसुफ सबकुछ भुलाकर जीने की कोशिश कर रहे हैं। पहले की तरह वे अब भी यहीं सुबह से शाम तक भजिए का ठेला लगाते हैं। वैश्विक आर्थिक मंदी भले ही दूसरे शहरों में दिखाई देने लगी हो लेकिन गोधरा के पोलन बाजार में आज भी 2 रुपए की चाय और 12 रुपए में पावभाजी मिल जाती है। सुबह से लेकर शाम तक पोलन बाजार में पहले ही तरह चमक और चहल-पहल रहती है।जिस शहर से पूरे राज्य में दंगा शुरू हुआ था, आज वही शहर समझ गया है कि समय के साथ संबंधों में आ गई कड़वाहट को भूल जाने में ही सबकी भलाई है। आज हिंदू महिलाओं के लिए पोलन बाजार की यही गली सबसे सुरक्षित मानी जाती है, भले ही वह किसी भी समय यहां से गुजरें।मौलाना आजाद मार्ग का वह चौक, गोधरा कांड के बाद जहां जाने के नाम से भी लोग खौफ खाते थे, वहीं अब 15 अगस्त हो या 26 जनवरी, ईद हो या दीवाली, सभी धर्मो के लोग मिलजुलकर खुशियां मनाते दिखाई देते हैं।आईए हम भी दुआ करें कि गोधरा की यह एकता हमेशा कायम रहे और गोधरा की नई पीढ़ी गोधरा के सीने पर एक और नासूर का जन्म न होने दे।(साभार दैनिक भास्कर)

Sunday, February 26, 2012

meraj noorie

meraj noorie

‘किंग ऑफ गुड टाइम’


किंगफिशर एयरलाइंस को 2200 करोड़ रुपए की कार्यशील पूंजी चाहिए। ये पूंजी एअरलाइन का रुटीन खर्चो के लिए बेहद जरूरी है। अगले हफ्ते 18 बैंकों का समूह कर्ज की सीमा बढ़ाने पर फैसला लेगा।बैंक फिलहाल इसके लिए सहमत नहीं है। माल्या नवंबर में व्यक्तिगत गारंटी देने के लिए तैयार थे, लेकिन अब नहीं। बैंक चाहते हैं कि वे कम से कम 25 प्रतिशत कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराएं।विजय माल्या जिन्हें ‘किंग ऑफ गुड टाइम’कहा जा रहा है लेकिन आप निचे की पंक्तिओं पैर नज़र डालेंगे तो हंसी भी आएगी और दुःख भी होगा के एक तरफ जहाँ गाँव के गरीब दो वक़्त की रोटी और रहने के लिए मकान के लिए दर दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं और तो और गाँव के उन गरीबों को जब सर्कार की तरफ से इंदिरा आवास के लिए लोन पास करना होता है तो उन्हें क्या क्या परिशानी झेलनी पड़ती है इसका अंदाजा उसे होता है लेकिन ये साहब के इनको भारतीय बैंकों  ने तो एक मुश्त इतना क़र्ज़ दे रखा है कि अगर ये  इस पैसे को ही खर्च करना चाहें तो साड़ी ज़िन्दगी बीत जाएगी ''
 एसबीआई 150 करोड़,
 आईडीबीआई बैंक 720 करोड़,
 पीएनबी 435 करोड़,
 बैंक ऑफ इंडिया 575 करोड़, 
बैंक ऑफ बड़ोदा 530 करोड़, 
आईसीआईसीआई बैंक 420 करोड़,
 यूनियन बैंक ऑफ इंडिया 350 करोड़,
 कापरेरेशन बैंक 150 करोड़ और
 फेडरल बैंक का 80 करोड़ रुपए बकाया है।
अब तो आपको अच्छी तरह समझ में आगया होगा  हिंदुस्तान में अमीर और अमीर और ग़रीब और ग़रीब कैसे हो रहा है 

Saturday, February 25, 2012

UP election ke door ras ntayej


انتخابات کے بعد اتر پردیش میں صدر راج کی بات پر مچے ہنگامہ کے بعد مرکزی وزیر شری پرکاش جیسوال بھلے ہی پلٹ گئے ہوں، لیکن سماج وادی پارٹی کانگریس کی اس چال کو ہلکے میں نہیں لے رہی ہے۔ پارٹی نے کانگریس کی ایسی کسی بھی کوشش پر نہ صرف نظر رکھنا شروع کر دیاہے، بلکہ ہوشیار بھی ہے۔ پھر بھی وہ اسے طول نہیں دینا چاہتی۔ اسے انتظار ہے انتخابی نتائج کا، جسے دیکھنے کے بعد وہ پھر سے کانگریس کے ساتھ رشتے طے کرے گی۔ذرائع کے مطابق کانگریس کے اتر پردیش میں صدر راج والے رخ سے سماج وادی پارٹی حیرت میں ہے۔ اسے خدشہ ہے کہ کیا کانگریس نے کسی پارٹی کے پاس مکمل اکثریت نہیں ہونے پر ریاست میں واقعی صدر راج کے نفاذ کا من بنا لیا ہے۔بتاتے ہیں کہ اگر کانگریس نے ایسی کوئی منشا پال رکھی ہے، تو ایس پی اس کا بھی حل نکالے۔ ذرائع کی مانیں تو پارٹی مان کر چل رہی ہے کہ ریاست میں اس کی مکمل اکثریت نہیں آتی تو بھی انتخابات کے بعد وہی سب سے بڑی پارٹی بن کر ابھرے گی۔ وہ حکومت بنانے کے اعداد و شمار کے ارد گرد بھی خود کا تعین کر کے چل رہی ہے۔ ایسے میں ایس پی نتائج کو دیکھنے کے بعد ہی طے کرے گی کہ کانگریس کے ساتھ اس کے آگے کے رشتے کیا ہوں گے؟ سماج وادی پارٹی کے سپریمو ملائم سنگھ یادو نے جمعرات کو اٹاوا میں کہا کہ انتخابات کے بعد پارٹی کی حکمت عملی کے بارے میں 6 مارچ کو ہی بتایا جائے گا۔ سماج وادی پارٹی کے سربراہ کے اس بیان کو پارٹی کی مستقبل کی حکمت عملی سے جوڑ کر دیکھا جا رہا ہے۔ دراصل پارٹی اس بار اتر پردیش میں ہر حال میں اپنی حکومت بنانے کا تعین کر کے چل رہی ہے۔ لہذا انتخابات کے باقی دو مرحلوں کے درمیان کانگریس سے وہ صدر راج کے سوال پر نہیں الجھنا چاہتی۔ باوجود اس کے کہ اتر پردیش میں کانگریس کی ہر کوشش ایس پی کو زیادہ سے زیادہ نقصان پہنچانے اور 2014 کے لوک سبھا انتخابات سے جڑا ہوا ہے۔البتہ، سماج وادی پارٹی کو یہ بھی پتہ ہے کہ کئی مرکزی مسائل پر ترنمول کانگریس کے سربراہ ممتا بنرجی کے تلخ رخ کی وجہ سے کانگریس کی قیادت والی مرکز کی یو پی اے حکومت آسان نہیں ہے۔ وہاں کانگریس کو بھی کسی بڑے سہارے کی ضرورت ہے۔ لہذا ساری باتیں صحیح وقت پر ہی ہوں گی۔ حالانکہ، پارٹی کانگریس کے صدر راج کی بالواسطہ وارننگ کو اس کے الیکشن جیتنے کے ہتھکنڈے کے طور پر بھی دیکھ رہی ہے۔

KAVEETA SE NOOR FATMA TAK


سوال شناخت بچانے کا


ایک صبح آپ اٹھیں اور آپ کو پتہ چلے کہ آپ کی شناخت چوری ہو گئی ہے تو آپ کیا کریں گے؟ آپ کہیں گے کہ یہ کیا اٹپٹا سوال ہے، لیکن جناب ایسا بالکل ہو سکتا ہے۔ آپ کی شناخت کے ساتھ کوئی کھلواڑ کر رہا ہو اور آپ کو پتہ بھی نہ ہو۔ آن لائن آئیڈےنٹی تھےفٹ یعنی آن لائن شناخت کی چوری ایک نیا بحران ہے جس سے آج دنیا بھر میں سینکڑوں لوگ دو چار رہے ہیں۔ اسے کچھ اس طرح سمجھا جا سکتا ہے کہ انٹرنیٹ پر کئی طریقوں سے ہر ایک کی اپنی شناخت ہوتی ہے جیسے کہ اس کا ای - میل پتہ، ٹویٹر، فیس بک، لکڈن اور آرکٹ وغیرہ سوشل نےٹورکنگ سائٹس پر پروفائل وغیرہ۔ اگر کوئی شخص ان کا یا ان میں سے کسی بھی ایک سروس کا پاس ورڈ ہتھیا لے تو سائبر دنیا میں آپ کی شناخت پر اس کا قبضہ ہو جاتا ہے اور وہ اس کا غلط فائدہ اٹھا سکتا ہے۔ آپ کے نام سے فرضی پروفائل بنا کر آن لائن دنیا میں سرگرم ہونے پر آئیڈےنٹٹی تھےفٹ کا معاملہ بنتا ہے۔ اداکارہ پریٹی زینٹا اب بھلے ٹویٹر پر سرگرم ہیں، لیکن انہیں جب اپنے فرضی ٹویٹر اکاو ¿نٹ کا پتہ چلا اس وقت تک ان کے فالورس کی تعداد 1,40,000 تک پہنچ گئی تھی۔ فیس بک پر بھی فرضی پروفائل کی بھر مار ہے۔ حال میں ریسرچ فرم باراکوڈا لےبس نے فرضی فیس بک پروفائل ہونے والے ایک مطالعہ کی رپورٹ جاری کی ہے۔ اس کے مطابق 97 فیصد فرضی پروفائل خواتین کے نام سے بنائے جاتے ہیں۔ فرضی پروفائل پر دوستوں کی تعداد مزید ہوتی ہے۔ مطلب اوسطا ًایک شخص کے دوستوں کی تعداد 130 ہوتی ہے جبکہ فرضی پروفائل ہولڈرز کے دوستوں کی تعداد 730 کے لگ بھگ ہوتی ہے۔ فرضی پروفائل پر اصل پروفائل کے مقابلے میں 100 فیصد مزید تصویر ٹیگ کئے جاتے ہیں، لیکن یہ ریسرچ فرضی پروفائل کے بارے میں ہے نہ کہ شناختی چوری کے معاملے میں۔ ٹوئٹڑ پر پروفائیلو ںکو وےریفائی کیا جاتا ہے، لیکن کروڑوںصارفین میں ایسے محض مٹھی بھر لوگ ہی ہیں جن کی پروفائل وےریفائی کی گئی ہے۔ ان میں سے بھی زیادہ تر وےریفائڈ پروفائل جانی - مانی ہستیوں کی ہوتی ہے۔ ساتھ ہی زیادہ تر سوشل نےٹورکنگ سائٹس اس مسئلہ سے پلہ جھاڑنے کے لئے یہ ڈسکلےمر بھی لگا کر رکھتی ہیں کہ پروفائل پر دی گئی اطلاعات سے وقوع کا کوئی سروکار نہیں ہے۔ ٹےک کرنچ کے مطابق فیس بک بھی جلد ہی پروفائل کو وےریفائی کرنے کی شروعات کرنے والا ہے۔ جن لوگوں کے اکاو ¿نٹ وےریفائی کی جائیں گی وہ دوست بنانے والا مشورہ میں اہمیت سے دکھائے جائیں گے۔ فیس بک کا یہ فیچر کئی لوگوں کے لئے خاصا کارگر ثابت ہو سکتا ہے، لیکن دقت یہ ہے کہ فیس بک ابھی اس فیچر پر توجہ دینے کے موڈ میں نہیں ہے۔ مانا جا رہا ہے کہ وےریفائی کئے گئے اکاو ¿نٹس کے بارے میں عام لوگ نہیں جان پائیں گے۔ ایسا ہوگا تو اس فیچر کا عام لوگوں کے لئے کوئی فائدہ نہیں ہوگا۔ ممبئی کی رہائشی مےلوڈی لیلی کو کو اپریل 2008 میں پتہ لگا کہ وہ بھی اس آن لائن جعلسازی کا شکار ہو چکی ہیں، جب ان کے ایک دوست نے انہیں بتایا کہ کسی نے جوئی بنداس کے نام سے ان کی ایک پروفائل بنا رکھی ہے جس پر ان کی تصاویر بھی ہیں۔ بعد میں پتہ لگا کہ یہ تصاویر سائبر دھوکہ بازو نے ان کی فلکر پروفائل سے لی ہیں۔ فلکر ایک آن لائن سروس ہے، جہاں لوگ اپنی تصاویر کا آن لائن جمع کر سکتے ہیں۔ ایسے تمام مثال مسلسل سامنے آ رہے ہیں۔ مشکل تو یہ ہے کہ زیادہ تر آن لائن سوشل نےٹورکنگ کی خدمات اس بات کی پڑتال کرنے کی کوشش ہی نہیں کرتی ہیں کہ جس نام سے اکاو ¿نٹ بنایا گیا ہے اور اس پر جو تصاویر استعمال کی گئی ہیں کیا وہ واقعی میں اسی انسان کی ہیں۔ انٹرنیٹ کی پہنچ کا دائرہ اتنا بڑھ چکا ہے کہ اس طرح کی آن لائن جعلسازی نہ صرف آپ کی سماجی وقار تار - تار کر سکتی ہے، بلکہ اس کے سبب اقتصادی طور پر بھی آپ کو نقصان کا سامنا کرنا پڑ سکتا ہے۔

Friday, February 24, 2012

छह मार्च के बाद क्या होगा यूपी में?


पांचवें चरण के चुनाव के बाद अब चर्चा गर्म है कि आखिर चुनाव बाद यूपी में क्या होगा। श्रीप्रकाश जायसवाल के बयान ने आग में घी का काम किया कि कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला तो राष्ट्रपति शासन लगेगा। वोट रिकॉर्डतोड़ पड़ रहे हैं मगर हवा किस ओर बह रही है इसका अंदाजा किसी को नहीं। जैसे हालात हैं उससे इतना तो साफ है कि स्पष्ट बहुमत किसी को नहीं मिल रहा। जानकार मानते हैं कि एसपी सबसे बड़ी पार्टी हो सकती है। ऐसे में सवाल ये है कि यूपी में 6 मार्च के बाद क्या होगा?श्रीप्रकाश जायसवाल ने राष्ट्रपति शासन वाला बयान गलतफहमी में दिया या फिर उनसे अनजाने में कोई खुलासा हो गया? ये सवाल इसलिए भी पूछा जा रहा है क्योंकि कांग्रेस ने पहली बार अपने किसी मंत्री को उसकी बयानबाजी पर कड़ी फटकार लगाई। अब तक बेनी प्रसाद वर्मा और सलमान खुर्शीद का बचाव करती रही पार्टी ने जायसवाल को सोच-समझ कर बोलने की सलाह दी।दरअसल यूपी की सियासत के जानकार मानते हैं कि कांग्रेस के लिए इन विधानसभा चुनावों से ज्यादा 2014 के लोकसभा चुनाव अहम हैं। अपनी जमीनी हकीकत से वो अच्छी तरह वाकिफ है। अपने बूते सरकार बननी नहीं और पार्टी किसी और को समर्थन का रिस्क उठाना नहीं चाहती। केंद्र में ममता दीदी की दादागीरी बर्दाश्त की जा सकती है, मगर यूपी में माया और मुलायम का साथ मुश्किलें पैदा करेगा।लिहाजा पार्टी में एक राय ये है कि अगर मुलायम 150 से 155 सीटें ही हासिल कर पाते हैं तो पार्टी खुद को उनसे दूर रखे। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगे और अपने चहेते अफसरों के जरिए केंद्र सरकार यूपी में कांग्रेस की छवि सुधारे। इसका लाभ पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव में उठा सकती है।कयास तमाम तरह के लगाए जा रहे हैं लेकिन इस पर ज्यादातर की राय एक है कि सबसे बड़ी पार्टी समाजवादी ही होगी। ऐसे में ये दावा करने वाले भी कम नहीं हैं कि अगर मुलायम 170 सीटें जुटा लेते हैं तो फिर कुछ छोटे खिलाड़ियों और निर्दलीयों की मदद से सरकार बना लेंगे।लेकिन सवाल है कि अगर बीएसपी गिरते-पड़ते भी 140 सीटें कमा लेती है तो क्या होगा। ऐसे में अगर बीजेपी के पास 60 से 65 सीटें रहीं तो क्या होगा। क्या दोनों पार्टियां फिर हाथ मिला सकती हैं। बीजेपी के पिछले अनुभव तो खराब रहे हैं।सूबे को राष्ट्रपति शासन से रोकने के लिए बीजेपी एक बार फिर ये रिस्क ले सकती है। विकल्प और भी हैं कुछ जानकार ये कयास भी लगा रहे हैं कि कम सीटों के बाद भी कांग्रेस मुख्यमंत्री अपना बनाए और समाजवादी पार्टी सरकार में दूसरे नंबर की खिलाड़ी हो। बदले में केंद्र की सरकार में मुलायम सिंह यादव या अखिलेश को कुर्सी दी जाए।एक हवा-हवाई सोच ये भी है कि सरकार न बनने से नाराज मुलायम केंद्र से समर्थन वापस लेते हैं, ममता बनर्जी की धमकियां जारी रहती हैं तो कांग्रेस बड़ा दांव खेल सकती है। दोबारा आम चुनाव होंगे और कांग्रेस गठबंधन की मजबूरियों का रोना रोएगी। सारा ठीकरा सहयोगियों के सिर फोड़ अपने लिए पर्याप्त बहुमत मांगेगी। लेकिन अभी ये दूर की कौड़ी है।(साभार आई बी एन ७)

Thursday, February 23, 2012

चार शहर

अजब इंडिया, गजब इंडिया और सबसे बड़ी बात की कई मजहबों के बाद भी सहज है इंडिया। यही ताकत है इस देश की.. जी हां हम बात कर रहे है चर्चित शासक फिरोज शाह तुगलक की। जिन्होंने अपने 38 साल के शासनकाल में दिल्ली के आसपास 1200 बगीचे लगवाए। तुगलक द्वारा बसाया गया 'कुश्क-ए-फिरोज' शहर ही आज फरीदाबाद के नाम से जाना जाता है।तुगलक ने 13वीं शताब्दी में सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण कराया। जिसमें 'यमुना से लेकर हिसार', 'सतलुज से घग्गर', 'घग्गर से फिरोजाबाद', 'मांडवी और सिरमौर से हांसी हिल्स' तक कई नहरें शामिल हैं। इसकी वजह से आज राज्य की स्थिति विकसित और आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों में गिनी जाती है।तुगलक ने चार नए शहरों की भी स्थापना की। जिसमें फिरोजाबाद, फतेहाबाद, जौनपुर और हिसार शामिल हैं। हालांकि जौनपुर उत्तर प्रदेश में आता है।

डरपोक बिपाशा !

कई ब्लॉक बस्टर हॉरर फिल्म दे चुकीं अभिनेत्री बिपाशा बसु को असल जिंदगी में भूतों से बहुत डर लगता है। उनके करीबी दोस्तों के मुताबिक, बिपाशा अकेले में हॉरर फिल्म देखने से भी कतराती हैं। अगर वे ऐसी फिल्में देख लें, तो उन्हें अपने कमरे में भी रहने से डर लगने लगता है। लोग इस डर का कनेक्शन उनके बंगाली होने से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि बंगाल के कई इलाकों में आज भी लोग तंत्र-मंत्र और भूत-प्रेत पर बहुत यकीन करते हैं। शायद इसके चलते बिपाशा भी भूत-प्रेत और जादू-टोना में यकीन रखती हों और इन चीजों से उन्हें डर लगता हो। बिपाशा इन दिनों विक्रम भट्ट की हॉरर फिल्म राज-3 में काम कर रही हैं। फिल्म से जुड़े लोगों के मुताबिक, वे इस फिल्म को लेकर काफी संजीदा हैं और इसे अपने करियर की सबसे अहम फिल्म मानकर चल रही हैं। इसलिए अपना रोल करने से पहले वे हॉलीवुड की कई हॉरर फिल्में देख रही हैं। भूत-प्रेतों से जुड़े उपन्यास भी उनके पास देखे जा सकते हैं। इनके अलावा फिल्म में डरावने सीन फिल्माने और सेट पर भयावह माहौल होने के चलते मुमकिन है कि इन दिनों बिपाशा के दिलो-दिमाग पर भूत-प्रेत छाया हुआ हो। बिपाशा इससे पहले राज और जॉन अब्राहम के साथ ऐतबार जैसी हॉरर फिल्में कर चुकी हैं।(साभार दैनिक जागरण)

मुस्लिम हित का ख्याल या वोट बैंक की राजनीति?

उत्तर प्रदेश का चुनावी घमासान अपने चरम पर है। देश की क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियां जनता के बीच अपने आप को श्रेष्ठतम साबित करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही हैं। लेकिन इसी बीच एक खबर जो जनता के सामने आई वह है विधि एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद का मुसलमानों को रिझाने के लिए लगातार आदर्श चुनावी आचार संहिता विरोधी बयान देना। खुर्शीद ने अपने बयान में कहा था कि यदि कांग्रेस जीतती है तो पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में अल्पसंख्यकों का उप-कोटा 4.5 प्रतिशत से बढ़ाकर नौ प्रतिशत कर देगी।खुर्शीद के बयान ने राजनीति गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। उनकी बात पर सहमति जताने वाले मान रहे हैं कि मुसलमानों को दिया जाने वाला 9 प्रतिशत आरक्षण उनके विकास के लिए एक टॉनिक का काम करेगा। मुसलमानों को मुख्य धारा के साथ जोड़ना देश की बड़ी चुनौती है। इसलिए खुर्शीद के बयान को कुछ लोग सही मान रहे हैं।वहीं अधिकतर लोग इसे चुनाव में मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने वाला बयान बता रहे हैं। उनका मानना है कि खुर्शीद ने संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा और मर्यादा का तनिक भी ध्यान नहीं रखा और लगातार उसका अपमान करते रहे। इसके अलावा यह भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि उनके इस तरह के बयान से कांग्रेस पार्टी के आलाकमान और प्रधानमंत्री की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आना एक गंभीर मुद्दा है। ऐसे में इस बात को बिलकुल नकारा नहीं जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में बचे हुए चुनावी चरणों में खुर्शीद का मुद्दा का क्या रंग लेता है।उपरोक्त आधार पर कुछ बेहद गंभीर प्रश्न सामने आते हैं जिन पर विचार-विमर्श की महती आवश्यकता है, जैसे:
1. क्या सलमान खुर्शीद का बयान उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को राजनीतिक रूप से प्रभावित करेगा?
2. क्या खुर्शीद का बयान भविष्य में सांप्रदायिक रंग ले सकता है?
3. उनके बयान पर प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की चुप्पी क्या साबित करती है?
4. क्या उनका बयान चुनाव आयोग के महत्व को कम करता है.(साभार दैनिक जागरण )

टीम अहम या दिग्गज?


जिन महान क्रिकेटरों पर हम एक युग से फख्र करते रहे हैं, उनकी ढलती उम्र और गिरते फॉर्म ने हमें दुविधा में डाल दिया है कि उनके प्रति अब हमारा नजरिया क्या हो? कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने सचिन तेंडुलकर, वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर की फील्डिंग क्षमता पर टिप्पणी कर टीम में उनकी भूमिका पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।ऑस्ट्रेलिया में जारी त्रिकोणीय श्रंखला में अपनाई गई रोटेशन पॉलिसी के बचाव में धोनी ने कहा कि वे तीनों अच्छे फील्डर हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के बड़े मैदानों पर कुछ धीमे साबित होते हैं, इसलिए बतौर कप्तान उनकी प्राथमिकता है कि चुस्त सुरेश रैना या रोहित शर्मा को टीम में रखें। दिग्गज बल्लेबाज अगर अपनी शोहरत के मुताबिक बैटिंग करते, तो शायद सुस्त फील्डिंग का सवाल खड़ा नहीं होता। मगर हकीकत यही है कि पहले टेस्ट और फिर वन डे सीरीज में उनका योगदान निराशाजनक रहा है।धोनी अक्सर कहते रहे हैं कि भारतीय खिलाड़ी उस रूप में खेलते हैं, जो उन्हें रास आता है। विपक्षी टीम के मुताबिक वे अपने खेल को नहीं ढालते। यह कड़ा बयान है, लेकिन संभवत: एक यथार्थ है। इसी तरह भारत में अक्सर खिलाड़ियों से लगाव की भावना टीम की जरूरतों पर तरजीह पा जाती है। अगर सीनियर खिलाड़ी फॉर्म में नहीं हों, तब भी हर हाल में उन्हें अंतिम ग्यारह में क्यों रखा जाना चाहिए? इस सिलसिले में हम ऑस्ट्रेलिया से कुछ सीख जरूर ले सकते हैं।अंतत: वहां के चयनकर्ताओं ने फॉर्म से बाहर रिकी पोंटिंग को वन डे टीम से बाहर करने का साहस दिखाया है। इससे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में पोंटिंग के योगदान पर कोई आंच नहीं आती। इसी तरह अगर मुकाबले की जरूरत के मद्देनजर किसी भारतीय दिग्गज खिलाड़ी की टीम में जगह नहीं बनती या कप्तान को कोई युवा खिलाड़ी ज्यादा उपयोगी लगता हो, तो इस पर विवाद क्यों खड़ा होना चाहिए? अगर धोनी ने यह बात बेलाग कह दी है, तो उसे टीम में मतभेद या सीनियर खिलाड़ियों के प्रति अपमान भाव के रूप में नहीं, बल्कि टीम की आवश्यकताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।( साभार दैनिक भास्कर )

Wednesday, February 22, 2012

मन के रूप अनेक


मन के तीन रूप माने गए हैं-चेतन, अवचेतन और अचेतन, लेकिन मन की संख्या इतने तक ही सीमित नहीं है। कई बार ये तीन मन तीन हजार बन जाते हैं। कैसे और कब बनता है मन एक से अनेक..?जब हम कुछ सोचते हैं या किसी से बात करते हैं, तब हमारा एक ही मन सक्रिय रहता है। यहां तक कि जब हम निर्णय लेने के लिए द्वंद्व की स्थिति में रहते हैं, तब भी। हालांकि तब लगता है कि हमारे दो मन हो गए हैं, जिसमें से एक हां कह रहा है तो दूसरा नहीं। लेकिन यहां भी मन एक ही होता है, बस वही मन विभाजित होकर दो हो जाता है।सामान्यतया मन [चेतना] के तीन स्तर माने गए हैं- चेतन, अवचेतन और अचेतन मन। लेकिन मन की संख्या यहीं तक सीमित नहीं है। ये तीन मन परिवर्तन एवं सम्मिश्रणों द्वारा तीन हजार मन बन जाते हैं, लेकिन इनका उद्गम इन तीन स्तरों से ही होता है।चेतन मन वह है, जिसे हम जानते हैं। इसके आधार पर अपने सारे काम करते हैं। यह हमारे मन की जाग्रत अवस्था है। विचारों के स्तर पर जितने भी द्वंद्व, निर्णय या संदेह पैदा होते हैं, वे चेतन मन की ही देन हैं। यही मन सोचता-विचारता है।लेकिन चेतन मन संचालित होता है अवचेतन और अचेतन मन से। यानी हमारे विचारों और व्यवहार की बागडोर ऐसी अदृश्य शक्ति के हाथ में होती है, जो हमारे मन को कठपुतली की तरह नचाती है। हम जो भी बात कहते हैं, सोचते हैं, उसके मूल में अवचेतन मन होता है।अवचेतन आधा जाग रहा है और आधा सो रहा है। मूलत: यह स्वप्न की स्थिति है। जिस तरह स्वप्न पर नियंत्रण नहीं होता, उसी प्रकार अवचेतन पर भी नियंत्रण नहीं होता। हम जाग रहे हैं, तो हम फैसला कर सकते हैं कि हमें क्या देखना है, क्या नहीं।लेकिन सोते हुए हम स्वप्न में क्या देखेंगे, यह फैसला नहीं कर सकते। स्वप्न झूठे होकर भी सच से कम नहींलगते।मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जो इच्छाएं पूरी नहीं हो पातीं, वे अवचेतन मन में आ जाती हैं। फिर कुछ समय बाद वे अचेतन मन में चली जाती हैं। भले ही हम उन्हें भूल जाएं, वे नष्ट नहीं होतीं। फ्रायड का मानना था कि अचेतन मन कबाड़खाना है, जहां सिर्फ गंदी और बुरी बातें पड़ी होती हैं, पर भारतीय विचारकों का मानना है कि संस्कार के रूप में अच्छी बातें भी वहां जाती हैं।अचेतन एक प्रकार का निष्क्रिय मन है। यहां कुछ नहीं होता। यह भंडार गृह है। हमारा अवचेतन या चेतन मन जब इन वस्तुओं [विचारों] में से किसी की मांग करता है, तब अचेतन मन उसकी सप्लाई कर देता है।निष्क्रिय होकर भी अचेतन मन में कुछ न कुछ उबलता-उफनता रहता है, जो हमारे व्यक्तित्व के रूप में उभर कर सामने आता है। हम भले ही अचेतन मन की उपेक्षा करें, लेकिन चेतन मन और अवचेतन मन जो कुछ भी करते हैं, वे सब वही करते हैं, जो अचेतन मन उनसे कराता है।फ्रायड ने बिल्कुल सही कहा था कि मन एक हिमखंड की तरह होता है, जिसका 10 प्रतिशत हिस्सा ही ऊपर दिखाई देता है। 90 फीसदी भाग तो पानी के अंदर छिपा होता है। इसी तरह युंग ने भी कहा था - ज्ञात मन [चेतन] तो केवल छोटे से द्वीप के समान है, पर चारों तरफ फैला महासागर अज्ञात [अचेतन] मन है। यही अज्ञात मन सब कुछ है।
[डॉ. विजय अग्रवाल]

Monday, February 20, 2012

गोधरा में अभी भी बची हुई है इंसानियत


 गिरिजा शंकर और मीना बेन मुस्लिम बच्चों को पूरी लगन से पढ़ाते हैं.
कौसर कहती हैं कि उन्हें हिंदुओं ने ही दंगाईयों से बचाया.
गोधरा में हिंदू मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास का माहौल भले ही हो लेकिन इसी शहर में गिरिजा शंकर जैसे भी लोग हैं जो हिंदू होने के बावजूद दंगा पीड़ितों के बच्चों को पूरी लगन से पढ़ाने का काम करते हैं.गोधरा के आसपास के इलाक़ों में हुए दंगों में कई लोगों के घर बर्बाद हुए और वो खाली हाथ यहां पहुंचे. इन लोगों को अमन सोसायटी नामक जगह पर घर दिए गए हैं और यहीं बच्चों के लिए एक स्कूल भी है.इस स्कूल में दो ही शिक्षक हैं गिरिजा शंकर आर प्रजापति और मीना बेन.गोधरा में मुलाकातों के दौरान मुसलमानों के बारे में लोगों की राय अच्छी नहीं दिखती है लेकिन गिरिजा शंकर और मीना बेन से मिलने पर लगता है कि इंसानियत अभी मरी नहीं है.गिरिजा शंकर कहते हैं, ‘‘ खिए मैं तो ट्रांसफर लेकर आया था इस स्कूल में. मैं पहले जहां पढ़ाता था वहां सब हिंदू बच्चे थे. पैसे वाले थे. वो पढ़ते नहीं थे. यहां बच्चे गरीब हैं. मां बाप दूर से आए हैं. कुछ बच्चों के तो मां बाप भी नहीं है दंगों के कारण लेकिन ये बच्चे अच्छे हैं. सीखते हैं.’’स्कूल में बीसेक बच्चे हैं जिनके परिवार दंगों के कारण यहां आए. इनके अलावा आस पास के आदिवासी बच्चे भी यहां पढ़ने आते हैं.गिरिजा शंकर बताते हैं, ‘‘ छोटे बच्चे हैं. कुछ तो स्कूल आना नहीं चाहते तो हम उन्हें घर से लेकर आते हैं. बदमाशी भी करते हैं बच्चे लेकिन हमने कभी मारा नहीं किसी को. 2005 में ट्रांसफर का समय था तो मैंने खुद ही चुना यह स्कूल.’’लेकिन क्या उन्हें डर नहीं लगता मुस्लिम इलाके में नौकरी करने में, वो कहते हैं, ‘‘ किस्मत में लिखा होगा कि मुसलमान मार डालेगा तो वो कहीं भी हो सकता है. जैसे कर्म करेंगे वैसा ही भोगेंगे. लेकिन यहां डर नहीं लगता. क्यों लगेगा. हम तो अच्छे कर्म करने में यकीन रखते हैं.’’आस पास के लोग और दोनों ही शिक्षक कहते हैं कि स्कूल के लिए इमारत नहीं हैं.दंगा पीड़ितों के लिए बने दो कमरों के घर में ही स्कूल चलता है और ये एक बड़ी परेशानी है शिक्षकों के लिए.इसी सोसायटी में अज़रा हुसैन, ज़ाबिर भाई और जावेद भाई सब रहते हैं जिनकी शिकायतें सरकार से अभी भी बरकरार है लेकिन वो इस बात से खुश हैं कि उनके बच्चों को शिक्षा मिल रही है.जावेद भाई कहते हैं, ‘‘ अभी ये स्कूल है तो बच्चे पढ़ लेंगे. दिक्कतें तो कई हैं. हम अपना घर बार छोड़कर यहां आए. हमारे रिश्तेदार मारे गए. अब क्या कर सकते हैं. किसी तरह जीना तो है.’’गुजरात में दंगों के दौरान मुसलमान मारे तो गए लेकिन कई इलाक़ों में हिंदुओं ने मुसलमानों की जान भी बचाई.अमन सोसायटी में रह रहीं कौशर इब्राहिम मंसूरी कहती हैं, ‘‘ मैं साबरकांठा में थी. वहां मुझे लोगों ने भैंसों के तबेले में रखकर बचाया. मारने भी हिंदू आए थे और बचाया भी हिंदूओं ने. हमारा घर जला दिया गया. बर्तन लूट लिया गया. बगल के गांव के हिंदुओं ने हमें बचाया. उन्होंने हमें दस दिन तक छुपाए रखा.’’गुज़रात में भले ही बहुसंख्यक आबादी मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दिखती हो लेकिन अभी भी इंसानियत में यकीन रखने वाले लोग हैं और यह बात एक आस ज़रुर बंधाती है.(sabhar bbc hindi-20-02-2012)

Friday, February 17, 2012

’مسلمان ڈرا ہوا ہے، کچھ نہیں بولے گا‘


ریاست گجرات کے شہر گودھرا میں اگر کوئی شخص کچھ نہ کہے تو سمجھیے وہ بہت کچھ کہنا چاہتا ہے۔یہاں رپورٹنگ کے لیے بہت کچھ لوگوں کی آنکھوں میں پڑھنا پڑتا ہے۔ یہ بھی بات ہے کہ بہت سارے لوگ تو یہاں آپ سے بات ہی نہیں کرنا چاہتے ہیں۔گودھرا بٹا ہوا شہر ہے۔ ہندو اور مسلمانوں کے علاقے واضح طور پر بٹے ہوئے ہیں۔ میرے ڈرائیور کو جیسے ہی معلوم ہوا کہ میں ایک صحافی ہوں اور مسلمانوں سے ملنا چاہتا ہوں اس کا پہلا سوال تھا ’ آپ ہندو ہیں یا مسلمان؟‘دوسرا سوال تھا ’ آپ ڈبیشور مہاراج کو بھی دیکھیں گے؟‘ ڈبیشور مہاراج سے اسکا مطلب تھا سابرمتی ایکسپریس کا وہ ڈبا جس کو آگ لگائی گئی تھی اور اسی واقعے کے بعد گجرات میں سنہ دوہزار دو میں فرقہ وارانہ فسادات ہوئے تھے۔میں نے ڈرائیور سے کہا کہ میں پہلے لوگوں سے ملوں گا۔مسلمانوں کے علاقے میں داخل ہوتے ہی ڈرائیور کے دو الفاظ نے بہت کچھ کہہ دیا۔ ’ادھر ہندوستان اور آگے چھوٹا کراچی ہے یعنی مسلمانوں کا علاقہ‘مسلم آبادی والے پلون بازار علاقے میں کیسری چوک ہے جن سنہ 2005 کے بعد ہردن ترنگا پرچم لہرایا جاتا ہے۔ جھنڈا لہرانے کا کام فاروق کیسری کرتے ہیں جن کے بارے میں کہا جاتا ہے کہ وہ وزیر اعلی نریندر مودی کے زبردست حمایتی ہیں۔ان کا کہنا ہے ’ادھر لوگوں کا نام بہت بدنام تھا تو 2005 میں یہاں کے ضلع کلکٹر نے کہا یہاں ہر دن ترنگا پرچم لہراو ¿ تاکہ یہاں کے لوگوں کو یہ پیغام دے سکو کہ آپ بھی ہندوستانی ہیں‘۔جب ان سے پوچھا گیا کہ کیا پرچم لہرانا مسلمانوں سے ہندوستانی ہونے کا سرٹیفیکیٹ مانگنے کے برابر نہیں ہے تو ان کا کہنا تھا کہ ’نہیں! ایسا کر کے ہم یہ دکھانا چاہتے ہیں کہ ہم ہندوستان کی عزت کرتے ہیں، یہاں کے سب لوگ ہندوستانی ہیں اور مودی جی بہت اچھا کام کررہے ہیں‘۔فاروق کیسری بائیک کی دوکان چلاتے ہیں اور وہ فخر سے کہتے ہیں کہ ان کے نوّے فیصد خریدار ہندو ہیں۔فاروق کیسری سے بات چیت کے دوران وہاں بیٹھا ایک نوجوان مسکرا رہا تھا۔جیسے ہی میں نے اپنا ریکارڈر بند کیا اس نے کہا ’میری شناخت واضح مت کرنا۔ اصل بات یہ ہے کہ یہاں کا مسلمان بہت ڈرا ہوا ہے۔ اتنا ڈرا ہوا ہے کہ کچھ بولے گا نہیں۔ مودی ترقی کے کام کر رہے ہیں لیکن شروعات کیسے ہوئی یہ بھی سوچیے‘۔ادھر ہندو نظریاتی تنظیم وشو ہندو پریشد کے مقامی لیڈر کہتے ہیں کہ ’دونوں طبقوں کے درمیان رشتے معمول پر آتے نظر آ رہے ہیں لیکن ایک دوسرے سے یقین اٹھ چکا ہے۔ یہاں کا ہندو گودھرا کے مسلمانوں پر یقین نہیں کرتا۔ دو ماہ قبل ایک مسلمان لڑکا ایک ہندو لڑکی کو بھگا لے گیا تھا پھر ہم نے اس چھڑایا۔ سارے مسلمان ایسے نہیں ہیں لیکن ایسے لوگ بھی ہیں جو غلط کام کرتے ہیں۔ اس لیے یقین نہیں ہوتا ایک دوسرے پر۔ یہاں کا مسلمانوں کا گھانچی طبقہ ہندوستان مخالف ہے‘۔گودھرا ٹرین حادثے کے بعد نوّے لوگوں کو سابرمتی ایکسپریس کا ڈبا جلانے کی سازش میں گرفتار کیا گیا تھا جس میں سے تریسٹھ افراد کو رہا کردیا گیا ہے۔ اکتیس افراد ابھی بھی جیل میں ہیں جن میں بعض کو عمر قید کو بعض پھانسی کی سزاسنائی جاچکی ہے۔اس واقعے اور گجرات فسادات کو دس برس ہوگئے ہیں لیکن فسادات کے بھوت نے نہ تو یہاں کے عوام اور نہ ہی نریندر مودی کا پیچھا چھوڑا ہے۔فسادات کی تلخ یادیں لوگوں کو آج بھی ڈراتی (بشکرےہ بی بی سی)ہیں

Thursday, February 16, 2012

सियासत ने बनाया आजमगढ़ को 'आतंक की नर्सरी'

 उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले का नाम सुनते ही पूरे हिंदुस्तान की आवाम के सामने जो एक तस्वीर उभरती है, वह है आतंकवाद की खान की। जबकि सही मायने में ऐसा नहीं है। लेकिन पिछले कुछ बरसों में जिस प्रकार से दुनिया के नक्शे में आतंकवाद उभरा है और आतंकवादियों की गिरफ्तारी हुई है, उसमें से कुछ का कनेक्शन आजमगढ़ से भी है। बस यह आजमगढ़ को बदनाम करने के लिए काफी है। कैफी आजमी, राहुल सांकृत्यायन और मौलाना शिबली जैसी महान हस्तियों की कर्मस्थली आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले सैकड़ों लोगों की जन्मस्थली आजमगढ़ आतंकवाद की नर्सरी के रूप में बदनाम हो चुकी है।कैफी आजमी की बेटी और फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी बड़ी तकलीफ के साथ कहती हैं कि जब भी कोई आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी कहता है तो उन्हें बड़ा कोफ्त होता है। शबाना के शब्दों में कहें तो मैंने भले ही आजमगढ़ में जन्म नहीं लिया है, लेकिन पुरखों की जड़ें वहीं हैं। इसलिए मैं खुद को आजमगढ़ की बेटी मानती हूं।वर्ष 2008 में दिल्ली के बाटला इलाके में पुलिस की कथित मुठभेड़ में कई युवक भी मारे गए थे। इसमें से कुछ युवक आजमगढ़ के थे। बस इसके बाद से ही आजमगढ़ आतंकवाद की नर्सरी के नाम से बदनाम हो गया।आजमगढ़ के स्थानीय नागरिक भी अपने जिले को आतंकवाद की नर्सरी कहे जाने पर नाराज हैं। आजमगढ़ के स्थानीय व्यापारी विजय शर्मा कहते हैं कि हमारे शहर को जिस तरह से मीडिया ने बदनाम किया है, वह सरासर गलत है। किस जिले में गुंडे, बदमाश नहीं होते हैं। लेकिन मीडिया सिर्फ और सिर्फ आजमगढ़ को ही बदनाम करता है। साथ में हमारे नेताओं ने भी वोट बैंक की राजनीति के कारण आजमगढ़ को बदनाम कर दिया। विजय की बात में कुछ दम तब नजर आता है, जब दिल्ली में बैठे नेता अल्पसंख्यक समुदाय के वोट बैंक को पाने के लिए आजमगढ़ का नाम उछालते हैं।हिंदुस्तान की जेल में सड़ रहा डॉन अबू सलेम इसी जिले से आता है। आजमगढ़ जिला मुख्यालय से तीस किलोमीटर दूर सरायमीर में ही आजमी का जन्म हुआ था। इसके अलावा अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और हाजी मस्तान मिर्जा का भी इस शहर से पुराना नाता है। इन दोनों की ससुराल आजमगढ़ ही है। जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां मुस्लिम और यादवों की तादाद सबसे अधिक है। यहां के सैकड़ों युवा सुरक्षाबलों और भारतीय सेना में हैं।(साभार दैनिक भास्कर )

سائنسی سچائیاں جو سچ نہیں


دنیا بھر میں ایسے بہت سے نظریات ہیں، جنہیں ایک سائنسی حقیقت سمجھتے ہوئے ان پر یقین اور عمل کیا جاتا ہے جب کہ ان کا عموماً سائنس سے کوئی تعلق نہیں ہوتا، اور اگر کچھ ہوتا بھی ہے تو اسے غلط سیاق و سباق میں پیش کیا گیا ہوتا ہے۔ہم اپنی روزمرہ کی زندگی میں بہت سی چیزوں پر انہیں سائنسی حقیقت یاطبی شعبے کی تحقیق سمجھ کر نہ صرف یقین کرلیتے ہیں بلکہ انہیں اپنے لیے فائدہ مند سمجھتے ہوئے عمل بھی کرتے رہتے ہیں جب کہ حقیقت اس سے بہت مختلف ہوتی ہے۔ دلچسپ بات یہ ہے کہ بہت سے ڈاکٹر اور اعلیٰ تعلیم یافتہ افراد بھی ایسی کئی سائنسی غلط فہمیوں کو سچ مان کر ان پر عمل کرنے کی تلقین کرتے ہیں۔اس مضمون میں ہم چند ایسی سائنسی غلط فہمیوں کا ذکرکررہے ہیں جو ہماری روزمرہ زندگی میں شامل ہوچکی ہیں جنہیں لوگوں کی اکثریت ایک سائنسی حقیقت کے طورپر قبول کرچکی ہے۔آپ نے اکثر یہ پڑھا اور سنا ہوگا کہ اچھی صحت کے لیے روزانہ پانی کے آٹھ گلاس پینے چاہئےں جب کہ اس کا حقیقت سے کوئی تعلق نہیں ہے۔ ایک انسان کو روزانہ کتنا پانی درکار ہوتا ہے ؟ اس کا انحصار کئی عوامل پر ہے۔ مثلاً اس کی رہائش سرد یا گرم علاقے میں ہے؟ اس کا عمر، وزن اور قدکاٹھ کتنا ہے؟ وغیرہ۔ آٹھ گلاس کے مفروضے کی بنیاد غالباً 1945ءمیں نیوٹریشن کونسل کے تحت کی جانے والی ایک سائنسی تحقیق ہے جس میں بتایا گیا تھا کہ ایک بالغ انسان روزانہ 64 اونس یا تقریباً آٹھ گلاس مائع استعمال کرتا ہے۔ مائع سے مراد پانی، چائے، شربت، کھانے، پھلوں، سبزیوں اورخوراک کی دیگر اشیاءمیں قدرتی طور پرموجود پانی ہے۔خیال یہ ہے کہ وقت گذرنے کے ساتھ ’مائع‘ کا لفظ پانی میں بدل گیا اور یہ جملہ کہ ایک بالغ انسان تقریباً آٹھ گلاس مائع روزانہ استعمال کرتا ہے، غلط العام ہوکریہ بن گیا کہ ایک بالغ انسان کو روزانہ آٹھ گلاس پانی پینا چاہیے۔عموماً ہر گھر میں بچوں کو کم روشنی میں پڑھنے سے روکا جاتا ہے۔ خیال عام یہ ہے کہ کم روشنی میں پڑھنے سے نظر کمزور ہوجاتی ہے۔ یہ مفروضہ اس لیے بھی حقیقت سے قریب لگتا ہے کہ اگرآپ کچھ دیر تک کم روشنی میں مطالعہ کریں تو آپ کو اپنی آنکھوں پر بوجھ محسوس ہوگا اور ممکن ہے کہ الفاظ کچھ دھندلے سے بھی لگیں۔طبی ماہرین اس مفروضے سے اتفاق نہیں کرتے۔ ان کا کہناہے کہ کم روشنی میں پڑھنے سے آنکھوں کے اعصاب پر دباو ¿ پڑسکتا ہے جس سے عارضی طور پر لفظ دھندلے دکھائی دے سکتے ہیں لیکن آنکھوں کو کچھ دیر آرام دینے سے اس کے اعصاب اپنی جگہ پر واپس چلے جاتے ہیں اور بینائی اپنی اصل حالت میں لوٹ آتی ہے۔ طبی ماہرین کے مطابق کم روشنی میں پڑھنے سے نظر پر کوئی مستقل اثر انہیں پڑتا۔ بینائی کی کمزوری کے اسباب کچھ اور ہوتے ہیں۔اکثر یہ کہا جاتا ہے کہ شیو کرنے سے بال نہ صرف تیزی سے نکلتے ہیں ، بلکہ وہ گھنے بھی ہوتے ہیں اور ان کی رنگت بھی گہری ہوتی ہے جب کہ اس نظریے کا حقیقت سے دور کا بھی واسطہ نہیں ہے۔ اس مفروضے کی سچائی جاننے کے لیے 1928ء میں ایک سائنسی تحقیق کی گئی تھی، جس سے پتا چلا تھا کہ شیو کا بالوں کے بڑھنے کی رفتار ، ان کی موٹائی اور رنگت کے گہرا ہونے سے کوئی تعلق نہیں ہے بلکہ حقیقت یہ ہے کہ یہ صرف نظر کا دھوکہ ہے۔ہوتا یوں ہے کہ شیو کرنے کے بعد بال ایک صاف جلد پر نکلتے ہیں جس کی وجہ سے وہ زیادہ نمایاں نظر آتے ہیں اور دیکھنے والے کو یہ لگتا ہے کہ بال پہلے سے گھنے ہوگئے ہیں۔ دوسرا یہ کہ شیو کے دوران بلیڈ عموماً بالوں کو ترچھا کاٹتا ہے اور اپنے نوکیلے سروں کی بنا پر بال گھنے نظر آتے ہیں۔ اسی طرح اگر جلد پر پہلے سے بال موجود ہوں تو ان کے بڑھنے کا احساس ذرا کم ہوتا ہے لیکن صاف جلد پر وہ نمایاں انداز میں بڑھتے ہوئے محسوس ہوتے ہیں۔ ماہرین نے جب شیو سے قبل اوراس کے بعد ایک مقررہ وقت کے دوران ان کی لمبائی میں اضافے کی پیمائش کی تو وہ برابر نکلی۔ بالوں کی رنگت کا بھی شیو سے کوئی تعلق نہیں ہے۔ حقیقت یہ ہے کہ کچھ عرصے تک دن کی روشنی میں رہنے سے بالوں کی رنگت قدرے کم پڑ جاتی ہے کیونکہ سورج کی روشنی میں رنگ کاٹنے کی صلاحیت موجود ہوتی ہے جب کہ صاف جلد پر نئے بال ہمیں اپنے اصلی رنگ میں دکھائی دیتے ہیں، اس لیے ان کا رنگ گہرا لگتا ہے۔عام طور یہ سمجھا جاتا ہے کہ ہم اپنے دماغ کا بہت ہی کم حصہ استعمال کرتے ہیں، یعنی زیادہ سے زیادہ دس فی صد اور عام حالات میں محض تین سے پانچ فی صد تک۔ ایک سائنسی تخمینے کے مطابق انسانی دماغ میں ایک کھرب سے زیادہ نیوران ہوتے ہیں۔ نیوران وہ خلیے ہیں جو یاداشت اور دوسرے افعال کی انجام دہی میں بنیادی کردار ادا کرتے ہیں۔دماغ کے سٹی اسکےن اور اس کی کارکردگی جانچنے کی جدید ٹیکنالوجی کی دستیابی سے قبل ماہرین کا خیال تھا کہ دماغ میں موجود نیوران کی تعداد ہماری ضرورت سے کئی گنا زیادہ ہے اس لیے دماغ کا ایک بڑا حصہ استعمال میں ہی نہیں آتا لیکن اب جدید تحقیق سے پتا چلا ہے کہ انسانی دماغ سو فی صد فعال ہے اور اس کا ہر حصہ مکمل طورپر کام کررہا ہے۔عام طورپر یہ سمجھا جاتا ہے کہ ایک مکمل انسان کے پاس پانچ قدرتی حواس ہوتے ہیں جن کے سہارے وہ اپنی زندگی گذارتا ہے۔ یعنی، دیکھنے، سننے، چھونے، چکھنے اورسونگھنے کی حس۔ پانچ حواس کا تصور قدیم یونانی مفکر ارسطو نے پیش کیا تھا، جسے ایک سائنسی حقیقت کے طورپر قبول کرلیا گیا۔ مگر سائنس دانوں کا کہناہے کہ خدا نے انسان کو پانچ سے زیادہ حواس دےئے ہیں اور مختلف جائزوں کے مطابق ان کی تعداد 9 سے 20 کے لگ بھگ ہے۔ دیگر حواس میں درد، بھوک، پیاس، دباو ¿، توازن، رفتار اورحرارت وغیرہ محسوس کرنے کی صلاحیتیں شامل ہیں۔ یہ وہ حواس ہیں جن کے بغیر زندگی گذارنے میں مشکلات پیش آسکتی ہیں۔

अयोध्या: तेरा दर्द न जाने कोय

अयोध्या: तेरा दर्द न जाने कोय

Wednesday, February 15, 2012


ندیوں کو بھی بچانا ہوگا


امریکہ کے ورلڈ ٹریڈ سینٹر میں ہوئے دہشت گردانہ حملے میں جتنے لوگ مارے گئے، اتنے انسان تو روز آلودہ پانی پینے سے مر جاتے ہیں۔ ہمارے ملک میں 20 کروڑ لوگ ایسے ہیں، جو آلودہ پانی پیتے ہیں۔ پانی کے لئے جھگڑے، فساد ہوتے رہے ہیں، پر اب جلد ہی جنگ بھی ہونے لگے گی۔ اس علاقے میں دبے پاو ¿ں کثیر ملکی کمپنیاں آ رہی ہیں، جس سے حالات اور بھی خراب ہونے والے ہیں۔ حکومت اس سمت میں ان ہی غیر ملکی کمپنیوں کے کنٹرول میں ہوتی جا رہی ہے۔ اس کام میں عالمی بینک کا اہم رول ہے۔ اتر پردیش میں یہ روایت ہے کہ لڑکی کی طرف سے جب کنوئیں کی پوجا کی جاتی ہے، تبھی شادی مکمل مانی جاتی ہے۔ اب تو کنوووں کی تعداد مسلسل کم ہو رہی ہے۔ اس لئے گاﺅں میں کنوئیں کے بدلے ٹینکر کی ہی پوجا کرواکر لگن مکمل کر لیا جاتا ہے۔ لوگوں نے وقت کی ضرورت کو سمجھا اور ایسا کرنا شروع کیا۔ پر پانی کی بچت کرنی چاہیے، اس طرح کا پیغام دینے کے لئے کوئی روایت ابھی تک شروع نہیں ہو پائی ہے۔ اگر شروع ہو بھی گئی ہو تو اسے عمل میں نہیں لایا گیا ہے۔ جب تک ہمیں پانی آسانی سے مل رہا ہے، تب تک ہم اس کی اہمیت نہیں سمجھ پائیں گے۔ ہمارے ملک میں پانی کی کمی دنوں - دن شدید شکل لیتی جا رہی ہے۔ ملک میں کل 20 کروڑ ایسے لوگ ہیں، جنہیں پینے کے لئے صاف پانی نہیں مل رہا ہے۔ پانی کے جتنے بھی ذرائع ہیں، اس میں سے 80 فیصد ذرائع صنعتوں کی طرف سے چھوڑا گیا کیمیکل ملا گندہ پانی مل جانے کی وجہ سے آلودہ ہو گئے ہیں۔ ملک کو جب آزادی ملی، تب ملک کی پانی کی تقسیم کے نظام پوری طرح سے قوم کے ہاتھ میں تھا۔ ہر ایک گاو ¿ں کی گرام پنچایت تالابوں اور کنویں کی دیکھ بھال کرتی تھی۔ دیہی ندیوں کو فطرت، قدرت کا بیش بہا عطیہ سمجھتے تھے۔ اس لئے اسے گندہ کرنے کی سوچتے بھی نہیں تھے۔ آزادی کیا ملی، تمام دریاو ¿ں پر ڈیم بنانے کا کام شروع ہو گیا۔ لوگوں نے اسے ترقی کی سمت میں قدم مانا، لیکن یہ قدم بے ضابطگیوں کی وجہ سے آمریت میں بدل گیا۔ ندیاں آلودہ ہوتی گئی۔ اب ان ندیوں کو آلودگی سے بچانے کی منصوبہ بندی کی جا رہی ہے۔ اس کی جوابداری کثیر ملکی کمپنیوں کو دی جا رہی ہے۔ ملک کی قوم کا اربوں روپیہ اب ان کمپنیوں کے پاس چلا جائے گا۔ کچھ ترقی یافتہ ممالک میں ندیوں کی دیکھ بھال نجی کمپنیاں کر رہی ہیں۔ دنیا کی دس بڑی کمپنیوں میں سے چار کمپنیاں تو پانی کا ہی کاروبار کر رہی ہیں۔ ان کمپنیوں میں جرمنی کی آرڈبلیوای، فرانس کی ووالڈو اور سوئز لیون اور امریکہ کی اےنران کارپوریشن شامل ہوتا ہے۔ اےنران تو اب دیوالیہ ہو چکی ہے، لیکن اس کے پہلے اس نے مختلف ممالک میں پانی کا ہی کاروبار کر تقریباً 80 ارب ڈالر کی کمائی کر چکی ہے۔ ہمارے ملک میں پانی کی تنگی ہوتی ہے۔ لوگ پانی کے لئے ترستے ہیں، اس میں بھی کثیر ملکی کمپنیوں کا مفاد ہے۔ دہلی اور ممبئی جیسے بڑے شہروں میں پانی کی تقسیم کے نظام کی ذمہ داری کثیر ملکی کمپنیوں کو دینے کی پوری تیاری ہو چکی ہے۔ ان کمپنیوں کے ایجنٹ کا کردار عالمی بینک ادا کر رہا ہے۔ کسی بھی شہر کی میونسپل اپنی آبی منصوبہ کے لئے عالمی بینک کے پاس قرض مانگنے جاتی ہے تو عالمی بینک کی یہی شرط ہوتی ہے کہ اس منصوبہ میں پانی کی تقسیم کے نظام کی جوابداری نجی کمپنیوں کو سونپنی ہوگی۔ مہاراشٹر حکومت نے 2003 میں ایک حکم کے تحت اپنی نئی آبی پالیسی کا اعلان کیا تھا۔ اس پالیسی کے مطابق تمام آبی منصوبوں نجی کمپنیوں کو دینے کا فیصلہ کیا گیا ہے۔ اسمبلی میں اس بل کو منظور بھی کر دیا گیا۔ اس بل کے مطابق مہاراشٹر اسٹیٹ پانی رےگولےٹری اتھارٹی کی تشکیل کی گئی، اس کا کام ندیوں کے فروخت جانے والے پانی کا بھاو ¿ طے کرنا ہے۔ اس طرح سے پچھلے 5 برسوں سے حکومت ریاست کی ندیاں فروخت کرنے کے معاملے میں قانونی طور پر کارروائی کر رہی ہے۔ آبی منصوبہ کے تحت ابھی کثیر ملکی کمپنیوں نے گنگا اور جمنا جیسی مقدس ندیوں پر اپنا قبضہ جما لیا ہے۔ ہماری حکومت پرائیویٹ رائزیشن کے لالچ میں بدحواس ہو گئی ہے۔ اب پانی کی تقسیم کے نظام کے تحت یہ کمپنیاں زیادہ کمائی کے چکر میں پانی کی قیمت اس قدر بڑھا دیں گی کہ غریبوں کی زندگی گزارنے سے ہی مشکل ہو جائے گا۔ وہ پھر گندہ پانی پینے لگے گا اور بیماری سے مریگا۔ کیونکہ یہ کمپنیاں عوام کو خالص پانی دینے کی کوئی ضمانت نہیں دیتی۔

‘हो मुबारक जन्नत जाहिदों को, मैं तो बस आपका सामना चाहता हू सर-ए-बज्म कह दी दिल की बात मैंने बड़ा बेअदब हूं सजा चाहता हूं तेरे इश्क की इंतिहा चाहता हूं मेरी सादगी देख क्या चाहता हूं’।


 महान उर्दू शायर इकबाल का यह शेर वेलेनटाइन डे के दिन मंगलवार को हकीकत में बदला।तमाम चेतावनियों, रुकावटों, बहिष्कारों और बंदिशों की परवाह किए बगैर शहर के लोगों ने अपने चाहने वालों, दोस्तों और परिवार के साथ प्रेम के इस दिन को यादगार बनाया। शहर में सुबह से ही चहलपहल रही और लोगों ने एक दूसरे को बधाईयां दी। शाम को शहर के अधिकांश बाजारों में लोग परिवार समेत निकले हुए थे।वेलेनटाइन डे के मौके पर एक-दूसरे को बधाई देने का सिलसिला सोमवार रात से ही शुरू हो गया था। मंगलवार सुबह से ही लोगों पर इस दिन का जादू छाना शुरू हो गया था। आम तौर पर सुबह नौ बजे के बाद खुलने वाली गिफ्ट गैलरियां सुबह आठ बजे से ही खुल गई थीं। वेलेनटाइन वीक के अंतिम दिन को किस प्रकार से यादगार बनाया जाए, इसके लिए युवाओं ने सोमवार शाम को ही अंतिम रूप दे दिया था। शहर के विभिन्न रेस्तराओं, सिनेमा घरों और पार्कों पर युवाओं ने इस दिन का मजा उठाया। ऐसे युवाओं की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने दोपहर या रात का खाना एक साथ खाया या लांग ड्राइव का मजा लिया।वेलेनटाइन डे का खुमार इस कदर हावी था कि शहर की कई गिफ्ट गैलरियां रात के बारह बजे तक खुली रहीं। लोगों ने देर रात को भी खरीददारी की और अपने चाहने वालों के लिए फूल खरीदे। केवल यही नहीं, गैलरी वालों ने पहले से ही गुलाब के कई प्रकार गुलदस्ते बना कर तैयार रखे थे ताकि खरीदने वालों को किसी प्रकार की समस्या न हो।जम्मू। वेलेनटाइन डे अब त्योहार बन गया है। जिस प्रकार से वेलेनटाइन डे के दिन शहरवासी घरों से बाहर निकले, उसने यह साबित कर दिया। गिफ्ट गैलरियों से लेकर फूलों की दुकानों तक लोगों का सुबह से ही तांता लगा हुआ था। एक मोटे अनुमान के अनुसार केवल शहर में ही इस दिन छह लाख रुपये के फूलों का कारोबार हुआ। इस दिन को मनाने के लिए युवाओं ने विशेष रूप से अपने दोस्तों के साथ लंच किया। गांधी नगर स्थित प्रसिद्ध दुकान पर एक साथ लंच कर रहे बलराम, अन्नु, विकास, अविनाश, तौसीफ आदि का कहना था कि वह एक साथ काम करते हैं और इस दिन एक साथ लंच करने की योजना उन्होंने सोमवार को ही बना ली थी। दोपहर को ब्रेक के समय वह सीधा लंच करने पहुंचे हैं। इस दिन का विरोध करने वाले लोगों के बारे में उक्त युवाओं का कहना था कि अगर कोई समाज को गलत संदेश दे रहा हो या अश्लीलता कर रहा हो तो उसका विरोध जायज है लेकिन आज के युग में हर कोई इतना समझदार है कि वह क्या कर रहा है जानता है। सभी को अपने तरीके से जीने की आजादी है।वेलेनटाइन डे ने एक बार फिर दिखा दिया कि आज भी गुलाब प्रेम जताने के लिए पहले पायदन पर है। शहर की विभिन्न दुकानों पर गुलाब की अलग-अलग कीमत थी। आम तौर पर दस से पंद्रह रुपये में बिकने वाली गुलाब की एक बड तीस से चालीस रुपये से बिकना शुरू हो गई। हालांकि इस दिन पीले गुलाब की मांग भी काफी रही।

Monday, February 13, 2012

گلابی رنگ لڑکیوں کی شناخت کیوں؟







رنگوں کے انتخاب کے معاملے میں دنیا بھر میں لڑکیاں زیادہ تر گلابی اور لڑکے نیلے رنگ کو ترجیح دیتے ہیں اوریہ رنگ ان دونوں جنسوں کی پہحان سمجھے جاتے ہیں۔ مگر دوسری جنگ عظیم تک پسند اور شناخت کا میعار بالکل الٹ تھا اور گلابی رنگ لڑکوں اور نیلا لڑکیوں سے منسوب کیا جاتا تھا۔ گلابی رنگ شاید تمام لڑکیوں کا پسندیدہ نہ ہو اوردوسرے رنگ بھی ان کے لیے کشش رکھتے ہوں مگر دنیا بھر عموماً گلابی رنگ کوخواتین بالخصوص لڑکیوں سے منسوب کیا جاتا ہے اوران کے ملبوسات اور عام استعمال کی اکثر اشیاءمیں گلابی رنگ کی جھلک نمایاں ہوتی ہے۔ریڈی میڈ گارمنٹس کی دکانوں پر آپ کو لڑکیوں کے ملبوسات میں گلابی رنگ واضح طورپر دکھائی دے گا۔ نوزائیدہ اور شیر خوار بچیوں کے زیادہ تر ملبوسات تو ہوتے ہی گلابی رنگ کے ہیں۔ اسی طرح لڑکیوں کے استعمال کی دوسری چیزیں، مثلاً ان کے اسکول بیگ، کاپیوں کے کور، پنسلیں ، قلم اور اسٹیشنری کی اکثر چیزوں میں گلابی رنگ زیاد ہ نظر آئے گا۔مغربی ممالک کے اکثر گھروں میں لڑکیوں کے کمروں میں گلابی پینٹ کیا جاتا ہے اور اس کمرے کا فرنیچر اور روزمرہ ضرورت کی دوسری اشیاءبھی گلابی یا اس کے ملتے جلتے شیڈز کی ہوتی ہیں۔ویلنٹائن ڈے کے موقع پردنیا بھر میں گلابی اور سرخ رنگ کے پھول اور کارڈ کروڑوں کی تعداد میں فروخت ہوتے ہیں۔ایسے والدین بھی ایک بڑی تعداد میں موجود ہیں جو اپنی بچیوں کو پیار سے پنکی یا روزی یا گلابو کہہ کر پکارتے ہیں۔جس کی ایک واضح مثال بے نظر بھٹو کی ہےجنہیں گھر میں پنکی کہا جاتاتھا۔رنگ کی شناخت صرف لڑکیوں اور خواتین تک ہی محدود نہیں ہے بلکہ اس دائرے میں لڑکے اور مرد بھی آتے ہیں اور نیلے رنگ کو ان سے منسوب کیا جاتا ہے۔ گارمنٹس کی دکانوں میں مردوں کے زیادہ تر لباس نیلے یا اس سے ملتے جلتے شیڈز میں ہوتے ہیں۔ آپ کو اچھے گرم مردانہ سوٹ زیادہ تر گہرے سے ہلکے اور سیاہی مائل نیلے رنگوں میں ہی ملیں گے۔ برانڈ کمپنیاں مردوں کی شیونگ کریمیں ،جل ، شیمپو اور روزہ مرہ استعمال کی دوسری اشیائ زیادہ تر نیلی پیکنگ میں ہی فروخت کے لیے پیش کرتی ہیں۔اکثر گھروں میں لڑکوں کے کمروں میں نیلا رنگ کیا جاتا ہے۔ ان کی اسٹیشنری کی زیادہ تر اشیائ بھی اسی رنگ کی ہوتی ہیں۔کیا جنس کے اعتبار سے رنگوں کی پسند انسان کے جین میں شامل ہے؟ اس کی وجہ نفسیاتی ہے یا اس کا تعلق ثقافتی روایات اور تاریخ سے ہے؟دلچسپ بات یہ ہے کہ ان سب باتوں کاجواب نفی میں ہے۔ زیادہ دور پرے کی بات نہیں ہے رنگوں کی یہ تخصیص بالکل الٹ تھی۔ آج سے صرف چھ عشرے پہلے تک یہ سمجھاجاتاتھا کہ گلابی اور سرخ رنگ لڑکوں اور مردوں کے لیے ہوتے ہیں جب کہ لڑکیوں کو نیلا رنگ پہننا چاہیے۔اس سوچ میں تبدیلی کا آغاز غالباً پچھلی صدی کے ابتدائی برسوں میں ہوا، جس کی بڑے پیمانے پر مخالفت کی گئی۔ خاص طور پر لڑکیوں کو گلابی رنگ کے کپڑے پہنانے کے خلاف اخبارات نے مہم چلائی۔ ایک امریکی اخبار’ سنڈے سینٹی نل‘مارچ 1914 کی ایک اشاعت میں لکھا کہ اگر آپ اپنے چھوٹے بچوں کو رنگوں کی شناخت دینا چاہتے ہیں تو لڑکوں کے لیے گلابی اور لڑکیوں کے لیے نیلے رنگ کاانتخاب کریں۔

اسی طرح ایک اور جریدے’ لیڈیز ہوم جرنل‘ نے جون 1918ءمیں اپنے ایک مضمون میں لکھا کہ اگرچہ رنگوں کے چناو ¿ کے مسئلے پر کافی تنوع پایا جاتا ہے مگر ایک تسلیم شدہ اصول یہ ہے کہ گلابی رنگ لڑکوں کے لیے ہے جب کہ نیلا لڑکیوں کے لیے ہے۔اس دور کے کئی ناولوں اور کہانیوں میں بھی جہاں کرداروں کے لباس کا ذکر کیا گیا ہے، وہاں زیادہ تر لڑکیاں نیلے اور لڑکے گلابی رنگوں میں ملبوس دکھائی دیتے ہیں۔

گلابی اور نیلے رنگ کی یہ بحث لگ بھگ چار عشرے تک چلی اور 1950 ءکے لگ بھگ رنگوں کی مروجہ ترتیب الٹ گئی۔ جس کے بعد یہ تسلیم کرلیا گیا کہ گلابی لڑکیوں اور نیلا لڑکوں کا رنگ ہے۔اس تبدیلی میں دو چیزوں نے اہم کردار ادا کیا۔ پہلا ہٹلر کی نازی حکومت اور دوسرا ریڈی میڈ گارمنٹس بنانے والی برانڈ کمپنیوں نے۔لیکن اس سے پہلے یہ جاننا ضروری ہے کہ کئی سوسال تک نیلے کو لڑکیوں اور گلابی کو لڑکوں کا رنگ کیوں سمجھا جاتا رہا۔ مغربی معاشرے میں اس کی کڑیاں قبل از مسیح کے دور سے ملتی ہیں۔ روایات کے مطابق حضرت مریم نیلالباس پہنتی تھی۔ ان سے عقیدت کے اظہار کے لیے عیسائی معاشروں میں لڑکیوں کو نیلالباس پہنایا جاتاتھا۔ ماضی میں یہ تصور بھی عام تھا کہ چونکہ آسمان نیلا ہوتا ہے اس لیے یہ رنگ تقدس اور پاکیزگی کی علامت ہے۔چنانچہ لوگ اپنی بچیوں کو نیلےلباس میں دیکھنا پسند کرتے تھے۔

ہمارے ہاں آج بھی لڑکیوں کے اکثر اسکولوں کا یونیفارم نیلا ہے اور دنیا کے اکثر ملکوں میں گرل کائیڈ ز نیلا لباس پہنتی ہیں جس کی بنا پر ہمارے ہاں انہیں نیلی چڑیا بھی کہاجاتا ہے۔ماضی میں گلابی رنگ کی کوئی اپنی علیحدہ حیثیت نہیں تھی اور اسے سرخ رنگ کے ایک شیڈ کے طورپر دیکھا جاتاتھا۔ چونکہ جنگوں میں مرد حصہ لیتے تھے اور اپنا خون بہاتےتھے جس کا اظہار وہ سرخ لباس پہن کرکرتے تھے۔ ماضی کی پینٹنگز میں اعلیٰ حکومتی عہدے داروں ، فوجیوں اور معززین کے ملبوسات میں سرخ رنگ کی جھلک نمایاں طورپر دکھائی دیتی ہے۔لیکن چین کا ماضی ایک مختلف تصویر پیش کرتا ہے۔ قدیم چین میں لڑکوں کو نیلے اور لڑکیوں کو سرخ کپڑے پہنائے جاتےتھے۔ اس کی وجہ خالصتاً معاشی تھی۔ ماضی میں کپڑے کو نیلا رنگ دینا خاصا مہنگا تھا جب کہ اس کے مقابلے میں سرخ رنگ پر سب سے کم خرچ آتاتھا۔اکثر مشرقی معاشروں کی طرح چین میں بھی لڑکوں کو لڑکیوں پر فوقیت دی جاتی تھی اس لیے لڑکوں کو نیلے اور لڑکی کو سرخ کپڑے پہنائے جاتے تھے۔اس قدیم روایت کو ماو ¿زئے تنگ نے توڑ کر پوری قوم کو نیلی یونیفارم پہنا دی۔

اس تبدیلی میں جرمن نازیوں نے غیر دانستہ طورپر اہم کردار ادا کیا۔ نازیوں نے اپنی جیلوں میں قیدیوں کے لیے مختلف رنگوں کے لباس مقرر کررکھے تھے تاکہ دور سے ہی پہچان لیا جائے کہ وہ کس جرم کی سزا کاٹ رہے ہیں۔ مثلاً وہ یہودیوں کو نیلا اور ہم جنس پرستوں کو گلابی یونیفارم پہناتےتھے۔ چنانچہ رفتہ رفتہ گلابی رنگ نسوانیت کی علامت بن گیا اور یورپ اورمغربی ممالک کے ہم جنس پرستوں نے اس رنگ کو اپنی شناخت کے طورپر تسلیم کرلیا۔اب ان کی تقریبات میں یہ رنگ نمایاں دکھائی دیتا ہے اور ان کی معاشی سرگرمیوں کو پنک برنس یعنی گلابی کاروبار کہاجاتا ہے۔غالباً 1950ءکے لگ بھگ ریڈی میڈ ملبوسات کی کمپنیوں نے لڑکیوں کے لباس ڈیزائن کرتے ہوئے گلابی رنگ کو ترجیح دینی شروع کردی، پھر گڑیاں ، کھلونے اور بچیوں کے استعمال کی چیزیں تیار کرنے والی کمپنیاں بھی اس جانب راغب ہونے لگیں اوراس کے بعد کے برسوں میں گلابی رنگ نے تقربیاً دو ہزار سال سے مروج نیلے رنگ کو نکال کر دنیا بھر میں قبولیت اور مقبولیت کی سند حاصل کرلی۔گلابی رنگ لڑکیوں کی شناخت کیوں؟


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Sunday, February 12, 2012

'चोली' के पीछे की कहानी


दुनिया भर में हॉट फैशन सिंबल के तौर पर मशहूर हो चुका महिलाओं का अंतः वस्त्र 'ब्रा' 21 सदी की देन नहीं है। चौंक गए ना आप ? जी हां यह सोलह आने सच है, हमारे देश भारत में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले अंतः वस्त्र 'ब्रा' के साक्ष्य पहली शताब्दी में राजा हर्षवर्धन के साम्राज्य (कश्मीर) में मिलते हैं।आपको बता दें कि पहली शताब्दी में भारत में महिलाओं द्वारा आधे बाजू की तंग चोली 'कंचुका' पहनने का चलन था। इस बात के साक्ष्य पहली शताब्दी के साहित्य में भी मिलते हैं। वहीं इतिहास (बसवापुराण) में इस बात के भी पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि 1237 एडी तक युवा लड़कियों में भी 'कंचुका' का चलन बढ़ गया था।भारत में महिलाओं के अंतः वस्त्र का इतिहास यहीं समाप्त नहीं होता बल्कि सोमनाथ चरित्र में तो एक वृद्ध वेश्या का वर्णन करते हुए यहां तक बताया गया है कि कैसे वह अपने वक्षों के लिए एक विशेष ब्लाउज (ब्रा) का इस्तेमाल करती थी। आज भले ही पूरे विश्व में हॉट ड्रेसिंग के तौर पर देखे जाने वाले अंतःवस्त्र असल में हमारे देश में कई सौ साल पहले से ना सिर्फ प्रचलित थे बल्कि महिलाओं के बीच भी इनका खासा आकर्षण था।बात यहीं खत्म नहीं होती, भारत के प्रख्यात कवि हरिहर ने भी ऐसे सफेद तंग पहनावे (बिगीडूडीसी) का वर्णन किया है जिसके ऊपर स्वर्ण से कढा गया शॉल पहना जाता था। आपको बताते चलें कि विजयनगर साम्राज्य के दौरान सिले हुए ब्रा और अन्य कसे हुए तंग कपड़ों का खासा चलन था|

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर और प्रोड्यूसर रितेश सिधवानी बर्लिन में आयोजित पहले यूरोपियन फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुए।इस फेस्टिवल में प्रियंका-शाहरूख स्टारर फिल्म डॉन 2 की स्क्रीनिंग की गई। 23 प्रोडक्शन हाउस की फिल्में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की जाएंगी।इस फैस्टिवल में शामिल होने आईं प्रियंका ने सभी का दिल जीत लिया। कार्यक्रम में शामिल प्रियंका ने ब्लू कलर की पार्टी गाउन पहन रखी थी जो उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी।तस्वीरों में देखिए प्रियंका चोपड़ा की हसीन अदाएं....














सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...