दिल्ली नगर निगम चुनाव में शीला दीक्षित का करिश्मा काम नहीं आया। नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली है। उत्तर, दक्षिण और पूर्वी दिल्ली तीनों ही नगर निगम में बीजेपी का परचम लहरा रहा है। एमसीडी के तीनों निगमों के 272 वार्डों की अधिकतर सीटों पर बीजेपी ने कब्जा जमा लिया है।पूर्वी दिल्ली की कुल 64 सीटों में से बीजेपी ने 35 सीटें जीतीं तो कांग्रेस को मिलीं सिर्फ 19, बीएसपी ने यहां भी 3 सीटें जीतीं हैं तो अन्य के हाथ लगी हैं सात सीटें। उत्तरी दिल्ली में तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है। यहां की कुल 104 सीटों में से बीजेपी ने 59 सीटें जीत लीं, वहीं कांग्रेस के हाथ आईं सिर्फ 29, बीएसपी ने यहां सात सीटें तो अन्य ने 9 सीटें जीती हैं। वहीं पॉश दक्षिण दिल्ली की 104 सीटों में से बीजेपी ने 44 तो कांग्रेस ने 30 सीटें जीतीं। यहां बीजेपी को बहुमत के लिए चाहिए 14 और सीटें, वहीं बीएसपी ने यहां पांच सीट तो अन्य ने दस सीटें हासिल की हैं।एमसीडी चुनाव में प्रचार की कमान खुद शीला ने अपने हाथों में थामी हुई थी लेकिन वो वोटरों को नहीं लुभा पाईं। कांग्रेस के नेता दबी जुबान से ये मान रहे हैं कि महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे ने उनके विकास के नारे को चट कर लिया। सवाल ये कि क्या बीजेपी ये जानती थी कि महंगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस को धूल चटाएगा। बीजेपी की चुनावी रणनीति देखें तो शायद ये पहली बार हुआ है कि बीजेपी ने स्थानीय मुद्दों को छोड़ दिया। उसने एमसीडी चुनाव राष्ट्रीय मुद्दे पर लड़ा। चुनाव प्रचार की शुरुआत से ही बीजेपी ने सड़कों, नालों, प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा तरजीह महंगाई और भ्रष्टाचार को दी। अब नतीजे देखने के बाद कहा जा सकता है कि लोगों ने बीजेपी की इस सोच का साथ दिया।बीजेपी ये सोचकर खुश हो सकती है कि उसने 2013 में होने वाले दिल्ली विधानसभा का सेमीफाइनल जीत लिया है। अब वो दिल्ली की सत्ता के सपने देख सकती है। वहीं कांग्रेस ये सोच कर खुद को तसल्ली दे रही है कि एमसीडी की हार का खामियाजा विधानसभा चुनावों तक पूरा कर लिया जाएगा। साल भर में लोगों का गुस्सा वो अपने विकास के बल पर ठंडा कर देगी लेकिन सवाल ये है कि महंगाई और भ्रष्टाचार से नाराज जनता का गुस्सा वो कैसे ठंडा कर पाएगी।
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