Wednesday, April 18, 2012

गांव में चराता था गाय-भैंस, अब बनेगा टीम इंडिया का हिस्सा!


 इंदौर के पास स्थित जानापाव कुटी के जितेंद्र पाटीदार का चार साल पहले तक बास्केटबॉल से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था लेकिन अब वे टीम इंडिया के लिए आयोजित कैम्प में चार बार हिस्सा ले चुके हैं। वे अब भारतीय टीम में चुने जाने के तगड़े दावेदार हैं। बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया ने जितेंद्र के प्रदर्शन को देखते हुए उनसे पासपोर्ट तैयार रखने को कहा है।पत्थर रखकर किया अभ्यास : 11वीं के छात्र जितेंद्र ने बताया, ‘अकसर मैं एड़ी के नीचे जूतों में पत्थर रखकर दौड़ता था ताकि पंजों के बल दौड़ने का अधिक से अधिक अभ्यास हो सके। मैं पहले अनफिट था लेकिन फिर फिटनेस पर अधिक ध्यान दिया।’ जितेंद्र नेशनल में तीन बार मध्यप्रदेश जूनियर टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनके खाते में 1 रजत और 2 कांस्य पदक दर्ज हैं। अब वे राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनने को तैयार हैं।
 दिलचस्प है जितेंद्र की कहानी
 जितेंद्र के बास्केटबॉल से जुड़ने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। महू के रेलवे क्लब के बास्केटबॉल कोच अजय सिंह शेखावत ने चार साल पहले जितेंद्र को जानापाव जाते समय रास्ते में देखा था और वे उनकी 6 फीट 10 इंच की लंबाई से बेहद प्रभावित हुए थे। अजय ने भास्कर से बातचीत में कहा ‘जानापाव के रास्ते जाते समय मुझे एक लंबा लड़का गाय-भैंस चराते हुए दिखा। मैंने गाड़ी रोकी और उसके बारे में पूछताछ की और उसे अपने क्लब में खेलने के लिए आमंत्रित किया। उसके बाद वह हर दिन अभ्यास के लिए आया करता था।’ जितेंद्र ने बताया, ‘मेरी लंबाई सबसे ज्यादा होने की वजह से गांव में बच्चे लंबू कहकर चिढ़ाते थे और अब यह मेरे लिए प्लस प्वाइंट हो गया है।’
 कई जगह से हैं नौकरी के ऑफर 
 बाद में बेहतर एक्सपोजर के लिए जितेंद्र को नेशनल बास्केटबॉल एकेडमी (एनबीए) इंदौर भेज दिया गया। एनबीए के कोच रामराव नागले बताते हैं, ‘यहां आने के बाद हमने उनका स्कूल में एडमिशन कराया और बास्केटबॉल के लिए जरूरी ट्रेनिंग पर ध्यान दिया। जूनियर नेशनल में जितेंद्र ने मप्र के लिए बेहतरीन प्रदर्शन किया, उसे सभी ने नोटिस किया। जितेंद्र के पास अभी आर्मी सहित कई जगहों से नौकरी के ऑफर हैं लेकिन वे अभी पढ़ाई पूरी करना चाहते हैं।
 पढ़ाई के लिए भी मिला सहयोग
 पढ़ाई के साथ अन्य सहयोग के लिए एडवांस्ड एकेडमी के निदेशक अनिल राय आगे न आते तो जितेंद्र की राह मुश्किल होती। जितेंद्र कहते हैं, ‘राय सर ने हमेशा मेरी मदद की।’ राय भी कहते हैं, ‘जितेंद्र की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी लेकिन उनके परिणाम अच्छे आ रहे थे इसलिए मैंने हमेशा उनका सहयोग किया।’

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