Sunday, April 29, 2012

सियासत की पिच पर सचिन


 सचिन तेंदुलकर राज्यसभा के जरिए राजनीति के मैदान में कदम बढ़ा चुके हैं। यूपीए सरकार ने उन्हें विशिष्ट श्रेणी के लिए आरक्षित सीटों के जरिए संसद में मनोनीत कर देश को चौंकाने वाली खबर दी। खबरों के मुताबिक, उन्हें राज्यसभा में भेजे जाने की बुनियाद बीते एक दो महीने पहले ही तैयार की गई थी जिस पर मास्टर ब्लास्टर ने शुरुआती हिचक के बाद आखिरकार हामी भर दी। उम्र के 39 वें पड़ाव और अपने आध्यात्मिक गुरु श्री सत्यसाई की महासमाधि की पहली बरसी पर इससे अच्छी सौगात और क्या हो सकती थी?  इधर प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें राज्यसभा में नामित करने की सिफारिश गृहमंत्रालय को भेजी, उधर 10 जनपथ में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से मुलाक़ात कर सचिन ने भी सीधा संकेत कर दिया कि वो जिंदगी की अगली पारी के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
 सचिन उपलब्धियों के जिस मुक़ाम पर पहुंच चुके हैं, जाहिर तौर पर उस कड़ी में राज्यसभा की सदस्यता मिलना कोई बड़ी बात नहीं। हालांकि आलोचकों में नाराजगी इस बात को लेकर है कि जिसे भारत रत्न देकर सियासी चकल्लस से दूर रखा जाना चाहिए था, उसे राज्यसभा नवाज कर कांग्रेस के रणनीतिकारों ने विवाद और अनावश्यक बहस का मुद्दा बना दिया। बेशक, भारत ही नहीं दुनिया भर में अपने बेजोड़, उम्दा खेल की बदौलत सचिन ने न सिर्फ महान ख्याति बटोरी बल्कि दुनियाभर में भारत की प्रतिभा का डंका बजाया। उसमें भी बड़ी बात ये है कि वो देश के एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में पले बढ़े, क्रिकेट को जीवन का मिशन बनाया, बगैर आगे-पीछे सोचे वो अपनी ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा को निखारते निखारते वो असाधारण बन गए। साधारण से असाधारण बनने की उनकी जीवनयात्रा उन करोड़ों लोगों के लिए बेहद दिलचस्प और प्रेरक किंवदंती बन चुकी है, जिन्हें विरासत में धन्य होने का गौरव हासिल नहीं है। लेकिन राज्यसभा की दहलीज लांघते वक्त सचिन को क्या ये मालूम है कि वो आखिर किन लोगों के बीच और क्या करने जा रहे हैं? आखिर ऐसा कौन सा रुतबा है जो उनके पास नहीं है और अब हासिल हो जाएगा।
 सचिन को राज्यसभा में जाने की जरूरत क्या है, ये सवाल उठना भी लाजिमी है? सचिन के राज्यसभा में जाने का सीधा फायदा आखिर किसे मिलेगा? सियासी नफे-नुक़सान के सौदागरों में खलबली साफ तौर पर दिखने लगी है । खुद सचिन ने इसका मौका मनोनीत होने के पहले 10 जनपथ में हाजिरी लगाकर दे दिया। होना तो ये चाहिए था कि वो विपक्ष के नेताओं के घर भी जाते, लेकिन वो सिर्फ 10 जनपथ गए, जाहिर तौर पर विपक्ष ने मनोनयन पर कहीं कहीं तल्खी दिखाई तो एक वजह ये भी है। सचिन देश के करोड़ों नौजवानों के दिलों पर राज करते हैं, उनके ख्यालों और सोचने के तरीके को प्रभावित करते हैं, लिहाज़ा वो बतौर सांसद क्या बोलेंगे और क्या करेंगे, उस पर सियासी क्रिया-प्रतिक्रिया होना भी तय है। बड़ा सवाल इस बात पर है कि सियासत की मुश्किल पिच पर वो बैटिंग किसके पक्ष में करेंगे। उनकी मेहनत किस पार्टी के स्कोर में उछाल लाएगी? या फिर वो चतुराई से राजनीतिज्ञों की भीड़ में अपनी मोहिनी मुस्कान बिखेरते हुए चुपचाप कार्यकाल पूरा करेंगे, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर की तर्ज पर सियासी भीड़ में रहते हुए भी सियासत का मोहरा नहीं बनेंगे? मराठी अस्मिता की सियासत करने वाले धुरंधरों से लगायत दक्षिणपंथ की राजनीति के दिग्गज सचिन की नई पारी को किस रुप में आंकते हैं, देखना दिलचस्प होगा।
 इन सबके बीच बड़ा सवाल ये भी है कि सचिन राज्यसभा में सिर्फ सदन की रौनक ही बढ़ाएंगे या फिर कुछ सार्थक करेंगे भी? बतौर सांसद वो जो भी बोलेंगे, जो भी करेंगे, उसका सुर्खियों में रहना तय है। राजनीतिक तौर पर सचिन वामपंथ और दक्षिणपंथ के बारे में क्या सोच रखते हैं, अभी तक साफ नहीं है। उनकी विचारधारा अभी तक खेल के रोमांच में देशभक्ति के रंग में ही देखी जाती रही है लेकिन दिल से सचिन किस रंग में रंगे हैं, इस पर अभी तक खुद उनकी ओर से कोई बयान नहीं आया है। आर्थिक सुधारों समेत देश की सुरक्षा, विदेश नीति से उनका पाला अब तक नहीं पड़ा है क्योंकि उनकी जिंदगी का हर पल क्रिकेट और सिर्फ क्रिकेट से ही प्रेरित होता रहा है लेकिन उन्हें बतौर सांसद सार्थक भूमिका निभाने के लिए वैचारिक तौर पर स्पष्टता तो रखनी ही पड़ेगी, जाहिर तौर पर देश उनके लिए अहम है लेकिन देश के भविष्य का रास्ता क्या है, उस रास्ते को लेकर सचिन की सोच जानने की हसरत देश तो पालेगा ही क्योंकि सचिन ने अब पैर खेल की दुनिया से ‘ नेतागिरी’ की ओर बढ़ाए हैं। देश की खेल नीति को लेकर वो क्या सुझाव देंगे, इस पर भी लोगों की निगाह जरूर रहेगी, क्योंकि जिस क्रिकेट की बदौलत वो दुनिया भर में छा गए, उसी क्रिकेट पर देश के बाकी खेलों की दुर्गति का आरोप भी लगता रहा है। क्रिकेट को किसी सरकारी खैरात की दरकार नहीं है तो भी, इस सवाल से किसी को इंकार नहीं हो सकता कि क्रिकेट की नियामक संस्थाओं में बदलाव की बड़ी गुंजाइश है जिस पर खिलाड़ियों से ज्यादा कॉरपोरेट और राजनीतिज्ञों का कब्जा बना हुआ है, लेकिन बतौर राज्यसभा सदस्य सचिन इसमें बदलाव लाने की हिम्मत जुटा पाएंगे। सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि खेल को राजनीति और कॉरपोरेट जुगलबंदी से छुड़ाकर हर स्तर पर सही प्रतिभाओं और खिलाड़ियों के लिए रास्ता बनाने की कोशिश आज वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन सच्चाई ये भी है इस ओर उठने वाला कोई भी क़दम बड़े विरोध और विवाद की वजह बन जाता है। उम्मीद है कि सचिन इस ओर कुछ ध्यान देंगे, देश के खेल वातावरण में सुधार की दिशा में सांसद के रुतबे का सही और सार्थक इस्तेमाल करेंगे।
 सवाल है कि क्या सचिन ऐसा कर पाएंगे? कहीं हम उनसे कुछ ज्यादा ही उम्मीदें तो नहीं लगा रहे? देश की सियासत में अहम बदलाव जब बड़े समर्पित राजनीतिक दलों कांग्रेस, बीजेपी के साथ वामपंथ की बड़ी मौजूदगी के बावजूद नहीं हो पा रहा है तो एक अदद सचिन के सामने उम्मीदों का पहाड़ खड़े कर देना भी गलत है। 750 से ज्यादा सांसदों की भीड़ में सचिन की आवाज़ संसद में क्या गुल खिलाएगी, वो खुद संसद की गैररोमांचक किंतु गंभीर कार्यवाही में कितना रुचि दिखाएंगे, संसद में कलाकारों और खिलाड़ियों से जुड़े पहले के अनुभवों से भी ये सवाल उठ खड़ा हुआ है। खैर, तमाम सवालों से इतर सचिन को देश बधाई दे रहा है क्योंकि एक प्यारा इंसान, सबके दिलों पर राज करने वाला, सांसद जो बन गया है।
राकेश उपाध्याय


Friday, April 27, 2012

हैप्पी बर्थडे ज़ोहराजी


भारतीय सिनेमा की शुरुआत से एक वर्ष पूर्व पैदा हुई सिनेमा की जानी-मानी कलाकार जोहरा सहगल 100 साल की हो गई हैं.शुक्रवार 27 अप्रैल को ज़ोहरा सहगल का जन्मदिन है. उनका जन्म 27 अप्रैल, 1912 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ था.मजे की बात यह है कि भारतीय सिनेमा की लाडली कहलाने वाली जोहरा के जीवन की यादें भी उतनी ही रंगीन हैं, जितना की भारतीय सिनेमा. फिल्म उद्योग के अनुभवी लोगों का भी यही कहना है कि जोहरा का जीवन, ज्ञान और आकर्षण के प्रति उत्साह लगातार नई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा, इसका कोई मुकाबला नहीं है.फिल्म निदेशक आर. बाल्की कहते हैं, "मैं अभी तक जितनी भी महिलाओं से मिला हूं उनमें से वह बहुत असाधारण महिला हैं और अब तक मुझे मिली सबसे बढ़िया अभिनेत्रियों में से वह एक हैं." जोहरा ने बाल्की की 2007 में आई फिल्म 'चीनी कम' में अमिताभ की 'बिंदास' मां का किरदार निभाया था.बाल्की कहते हैं कि "ज़ोहराजी के काम के प्रति उत्साह की दाद देनी होगी. चीनी कम की शूटिंग के दौरान दिल्ली का तापमान 42 डिग्री सेल्सियस था. लेकिन इतनी गर्मी के बावजूद उन्होंने कुतुब मीनार में बने सेट पर शूटिंग की."वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनपीएफ)-लाडली मीडिया अवार्डस ने उन्हें 'सदी की लाडली' के रूप में नामित किया था.अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाली जोहरा फिलहाल दिल्ली में अपनी बेटी और मशहूर ओडिशी नर्तकी किरण सहगल के साथ रहती हैं. 1994 में उन्हें कैंसर होने का पता चला, लेकिन उन्होंने इस जानलेवा बीमारी का बहादूरी से सामना किया.जोहरा के परिवार के एक सदस्य ने बताया कि वह अपना 100वां जन्मदिन शुक्रवार को दिल्ली स्थित अपने निवास पर बेटी और कुछ कला बिरादरी के करीबी दोस्तों के साथ मनांएगी.युवा अवस्था में जोहरा नृत्य को लेकर खासी उत्साही थी. सिनेमा के साथ भी उनका रिश्ता 1935 में नृत्य के कारण उदय शंकर के सम्पर्क में आने के बाद जुड़ा और उन्होंने उनके साथ कई वर्षो तक काम किया. उदय शंकर के डांस ट्रूप के साथ उन्होंने जापान, मिस्र, यूरोप और अमेरिका सहित कई देशों में अपनी प्रस्तुतियां दीं. बाद में वह कई वर्षों तक ब्रिटेन में रहीं और अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया.बाद में वह अलमोरा में नृत्य की अध्यापक बनकर चली गई, जहां उनकी मुलाकात पेंटर और नर्तक कमलेश्वर सहगल से हुई. दोनों ने शादी कर ली.मजेदार बात यह कि जोहरा पृथ्वीराज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक, बॉलीवुड के मशहूर कपूर परिवार की चार पीढ़ियों के साथ काम कर चुकी हैं. ज़ोहराजी थियेटर को अपना पहला प्यार मानती हैं. उन्होंने पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर में करीब 14 साल तक काम किया. वह भारतीय जन नाट्य संघ से भी जुड़ी रही हैं.जोहरा को विशेष रूप से 'भाजी ऑन द बीच' (1992), 'हम दिल दे चुके सनम' (1999), 'बेंड इट लाइक बेकहम' (2002), 'दिल से..'(1998) और 'चीनी कम' (2007) जैसी फिल्मों में अपने अभिनय के लिए जाना जाता है.इसके अलावा वह पहली ऐसी भारतीय हैं, जिसने सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय मंच का अनुभव किया. उन्होंने 1960 के दशक के मध्य में रूडयार्ड किपलिंग की 'द रेस्कयू ऑफ प्लूफ्लेस' में काम किया.इतना ही नहीं 1990 के दशक में लंदन से भारत लौटने से पहले जोहरा ने 'द ज्वेल इन द क्राउन', 'माय ब्यूटीफुल लाउंडेरेटे', 'तंदूरी नाइट्स' और 'नेवर से डाइ' जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों में भी काम किया.पुरस्कारों के मामले में भी अभिनेत्री किसी से पीछे नहीं हैं. उन्हें 1998 में पद्मश्री, 2001 में कालीदास सम्मान, 2004 में संगीत नाटक अकादमी और 2010 में पद्म विभूषण से नवाजा गया. जोहरा सहगल की बहन उजरा बंटवारे के बाद पाकिस्तान चली गई थीं. इसके बाद 40 सालों तक दोनों बहनें नहीं मिल पाईं. आखिरकार 1980 के दशक में दोनों बहनों की मुलाकात दिल्ली में हुई. ली मेरिडियन होटल की संचालक हरजीत कौर चरनजीत सिंह ने ‘एक थी नानी’नामक एक नाटक में इन दोनों बहनों को एक मंच पर लाने के लिए अथक प्रयास किया था.
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Sunday, April 22, 2012

चमत्कार


 उदयपुर.क्या आपने कभी पुरुषों द्वारा संतान उत्पन्न करने की घटना के बारे में सुना है? शायद नहीं। राजस्थान के स्वास्थ्य केंद्र पर ऐसी एक नहीं 32 घटनाएं दर्ज हैं। यहीं नहीं यहां एक महिला ने एक साल में 24 बार संतान उत्पन्न किया है।गिनीज बुक के विश्व रिकार्ड को तोड़ देने वाले इन आंकड़ों से साफ जाहिर है कि यह हकीकत नहीं बल्कि एक नया घोटाला है।एक वरिष्ठ अधिकारी ने शनिवार को बताया कि कोटड़ा कस्बे के गोगुंडा सामुदायिक केंद्र में स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने शुक्रवार को इस घोटाले का पता लगाया।इस केंद्र की गर्भावस्था सहायिकाओं ने केंद्र सरकार की जननी सुरक्षा योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे की गर्भवती महिलाओं के लिए निर्धारित सहायता राशि को हड़पने के लिए गलत रिपोर्ट पेश की।जननी सुरक्षा योजना के तहत पहले दो बच्चों के जन्म के लिए गरीबी रेखा से नीचे की महिला को 1700 रुपये और प्रत्येक प्रसव पर मिडवाइफ को इसके लिए 200 रुपये मिलते हैं। योजना का मकसद प्रसव के दौरान जच्चे और बच्चे की होने वाली मृत्यु को रोकना है। योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले कई तरह की सेवाएं और सुविधाएं दी जाती हैं।अधिकारी ने बताया कि स्वास्थ्य केंद्र के रिकार्ड में ऐसे 32 पुरुषों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने संतान को जन्म दिया। इनमें से कुछ के नाम कई बार दर्ज हैं।रिकार्ड के अनुसार 60 साल की महिला ने साल में दो बार संतान उत्पन्न किया और सीता नाम की महिला ने तो साल में 24 संतान उत्पन्न किए।
अधिकारी ने बताया कि गर्भवास्था वार्ड की प्रमुख ने खुद भी एक साल में 11 बार संतान उत्पन्न किये।अधिकारी ने बताया कि घोटालों के उजागर होने के बाद वार्ड प्रमुख को पद से हटा दिया गया है और वह इस समय फरार है।
उसने बताया कि विभागीय जांच के बाद शिकायत दर्ज कराई जाएगी। जांच के लिए तीन वरिष्ठ चिकित्सकों का दल गठित कर दिया गया है।(दैनिक भास्कर)

Friday, April 20, 2012

जहां भैरवी के इशारे पर चलती हैं टैक्सियां


न्यूयॉर्क। भारतीय महिलाओं ने देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। ऐसी ही भारतीय मूल की 38 वर्षीय भैरवी ने अमेरिका के टैक्सी चालकों का दुखदर्द समझा एवं उनकी आवाज बुलंद करने में जुट गई। टैक्सी चालकों के हितों की रक्षा के लिए उनकी मांगों को लेकर कई बार भैरवी ने हड़ताल भी कराई। इन दिनों वह अमेरिकी नेशनल टैक्सी वर्कर्स अलायंस की अध्यक्ष हैं।पांच फुट लंबी दुबली-पतली यह महिला हमेशा परंपरागत भारतीय पोशाक में नजर आती है। गुजरात के सूरत शहर के निकट एक गांव में जन्मी भैरवी देसाई जब छह वर्ष की थीं, अपने परिवार के साथ अमेरिका आकर बस गई थीं। उन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद करीब 16 वर्ष पूर्व सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से यहां के टैक्सी चालकों की मदद करना शुरू कर दिया था। भैरवी का कहना है कि जब उन्होंने टैक्सी चालकों की परेशानियां देखीं तो तय कर लिया था कि वह उनकी मदद अवश्य करेंगी क्योंकि यह धंधा ही ऐसा है जिसमें टैक्सी चालकों का शोषण होता है। उनका कहना है कि 1979 में अमेरिका आने के बाद न्यू जर्सी के हैरिसन शहर में उनके परिवार ने बेहद गरीबी में दिन गुजारे।भैरवी बताती हैं कि मेरी मां न्यू जर्सी की एक फैक्ट्री में काम करती थीं और पिता छोटी सी परचून की दुकान चलाते थे, लेकिन माता पिता ने उन्हें हमेशा न्याय के लिए आवाज उठाना सिखाया। बचपन में दादा-दादी से भारत की आजादी की कहानियां सुनने के बाद से ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का जज्बा जागा।न्यूयॉर्क में करीब 50 हजार टैक्सियां चलती हैं एवं करीब 10 लाख लोग प्रतिदिन टैक्सियों का प्रयोग करते हैं इसलिए यहां की अर्थव्यवस्था में टैक्सी चालकों का बड़ा योगदान है। इन टैक्सी चालकों में अधिकतर अप्रवासी हैं। इनमें अधिकतर अशिक्षित हैं इसलिए दूसरा काम ढूंढ़ने में भी काफी मुश्किल होती है।भैरवी की संस्था न्यूयॉर्क टैक्सी अलायंस से करीब 15 हजार टैक्सी चालक जुड़े हैं। इनका कई स्तर पर शोषण किया जाता है। पुलिस भी इन्हें निशाना बनाने से नहीं चूकती है। इन्हीं मुश्किलों को लेकर भैरवी ने 1998 में हड़ताल का एलान कर शहर में टैक्सियों का संचालन बंद करा दिया था। इसके बाद भैरवी खबरों में छा गई। उन्हें टैक्सी चालकों की मांगों के लिए आवाज उठाने पर कई संस्थाओं की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका है।

‘अग्नि’ की उड़ान


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भारत अब उन देशों में है, जिनके पास अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। अग्नि-5 के सफल परीक्षण से भारत को सुरक्षा का एक नया संबल मिला है। हर्ष का विषय है कि मिसाइल का परीक्षण सभी कसौटियों पर सटीक रहा। यह हमारे रक्षा वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं परिश्रम का ही परिणाम है कि अपने आसपास के चुनौतीपूर्ण सुरक्षा माहौल में अब हम ज्यादा आश्वस्त होकर रह सकते हैं। अग्नि-5 के सेना में शामिल होने पर भारत 5000 किलोमीटर दूर तक मार करने में सक्षम हो जाएगा। इस मिसाइल की खूबी यह है कि इसे देश के किसी भी हिस्से से दागा जा सकेगा। यहां तक कि सड़क या रेलमार्ग पर चलते हुए भी। इससे दुश्मन के लिए यह पता करना कठिन बना रहेगा कि मिसाइल कहां से छोड़ी गई। जाहिर है, ठिकाने पर या रास्ते में ही मिसाइल को नष्ट कर देना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा। अग्नि-5 का व्यास दो मीटर का है, जिससे इसे एक साथ कई मुखास्त्रों (वॉरहेड) से लैस किया जा सकेगा, जो कई ठिकानों पर मार कर सकेंगे। जाहिर है, जब कभी इसका इस्तेमाल हुआ, ये मिसाइल घातक मार करेगी। चीन और पाकिस्तान के पास पहले से ऐसी मिसाइलें हैं, जिनसे भारत के महत्वपूर्ण शहरों एवं ठिकानों तक मार की जा सकती है। ऐसे में यह आवश्यक था कि भारत के पास भी ऐसा प्रक्षेपास्त्र हो, जिससे उनके यहां अंदर तक निशाना साधने की क्षमता हमारी सेना में आ सके। अग्नि-5 एशिया में यह शक्ति संतुलन कायम करेगी। इसलिए ऐसे आरोपों का कोई आधार नहीं है कि भारत अपनी मिसाइल क्षमता में बढ़ोतरी कर इस क्षेत्र में हथियारों की होड़ बढ़ाने की राह पर चल रहा है। इसके विपरीत यह हमारी सुरक्षा के लिए खड़ी होती गई चुनौतियों के मद्देनजर एक ऐसी तैयारी है, जिसकी उपेक्षा देश सिर्फ अपने लिए खतरों या धौंस को न्योता देते हुए ही कर सकता था। इस तैयारी को सफलता से अंजाम देने के लिए हमारे वैज्ञानिक बधाई एवं धन्यवाद के पात्र हैं। रक्षा मंत्री एके एंटनी की यह टिप्पणी सार्थक है कि इससे देश का कद और ऊंचा हुआ है।

Thursday, April 19, 2012

سنجےدہ ماحول کی ضرورت


داخلی سلامتی پر وزراءاعلی کی مےٹنگ مےں اتفاق نہےں ہو سکاتو ا س کی بڑی وجہ مرکز اور رےاستوں کے درمےان بڑھتی خلےج ہے۔ےہ ممکن ہے کہ غےر کانگرےسی وزراءاعلی کے رخ مےں آئی سختی کے پس پردہ سےاسی وجوہات ہو ں لےکن ےہ بھی حقےقت ہے کہ حال ہی مےں مرکز کی جانب سے ا ٹھائے گئے کئی اقدامات کی وجہ سے رےاستوں مےں تاثرپےدا ہوا ہے کہ ان کے اختےارات کی تلفی ہو رہی ہے ۔ چونکہ اےسے معاملات پر گفت وشنےد کی کمی ہے اس لئے اےسی شکاےات بڑھ رہی ہےں۔مرکز نے اس تعلق سے پےر کو وزراءاعلی کی مےٹنگ بلائی تھی ۔ےہ اچھی بات ہے کہ مےٹنگ مےں وزےر اعظم کا رخ مےل ملاپ والا رہا۔اس کے باوجود مےٹنگ اس حساب سے نہےں ہو سکی ۔حالانکہ قومی انسداد دہشت گردی مرکز (اےن سی ٹی سی ) کے قےام کے مدعے پر 5مئی کو وزراءاعلی کی مےٹنگ ہونی ہے لےکن پےر کو بھی ےہ اےک اہم مدعہ بنا رہا۔ےہاں جو بھی ہو ا اس سے ےہ امےد کم ہی ہے کہ موجودہ شکل مےں اےن سی ٹی سی پر کوئی عام اتفاق قائم ہو سکے گا۔جب پڑوس کے ساتھ ساتھ ملک کے اندر بھی داخلی سے متعلق چےلنج ہوں تب عدم اتفاق کا ےہ مسئلہ باعث تشوےش ہے۔داخلی سلامتی مرکز اور رےاست دونو ں کی ذمہ داری ہے ۔وزےر داخلہ پی چدمبرم نے بجا طور پر اس کا ذکر کےا ہے کہ دہشت گردی کے آدھے معاملے مرکزی اےجنسےوں اور رےاستوں کی پولس دونوں کے تعاون سے حل ہوتے ہےں اور کارروائی کی سطح پر ان مےں کوئی ٹکراو ¿ نہےں ہےں۔ظاہر ہے ،ضرورت اس بات کی ہے کہ داخلی امورکو سےاسی داو ¿ پےچ سے نکالا جائے۔ےہ صحےح ہے کہ بھروسے کا ماحول تےار کرنے کی پہلی ذمہ داری مرکز پر ہے لےکن رےاستوں سے بھی ےہ امےد کی جاتی ہے کہ سلامتی جےسے مسئلے پر وہ خاطر خواہ سنجےدگی دکھائے۔مورچہ ےا محاذ بنانے اور کسی ممکنہ انتخابات کے لئے سمےکرن جوڑنے کے لئے مدعے اور مواقع کی کمی نہےں ہے۔لےکن سلامتی سے متعلق مےٹنگ اےسا موقع نہےں ہو سکتا۔اگر اےسی سمجھ اور سوچ کی مثال دونوں فرےقےن پےش کرےں تب ہی 5مئی کی مےٹنگ کامےاب ہو سکتی ہے۔

Wednesday, April 18, 2012


مکہ و مشاعر مقدسہ
 جدید و قدیم تاریخ کا حسین امتزاج!
ویسے تو مکہ مکرمہ عالم مشرق و مغرب کی توجہ کا کئی پہلوو ¿ں سے توجہ کا مرکز رہا ہے تاہم مسلمانان عالم کے ہاں اس کی مرکزیت کی سب سے اہم اور بنیادی وجہ یہاں کے مقدس روحانی مقامات اور مشاعر ہیں۔ انہی مقدس مقامات کی بدولت ازمنہ قدیم سے فرزندان توحید اس کی حرمت وتقدیس کو اپنے جسم و جاں سے عزیز رکھتے چلے آ رہے ہیں۔حرم مکہ کی اس روحانی مرکزیت کو اجاگر کرنے کی ایک بڑی کاوش گذشتہ برس برطانیہ کی جانب سے دیار مقدسہ کے بارے میں لندن میں ایک نمائش میں کی گئی۔ نمائش میں حرم پاک کے قریب موجود تاریخی میوزیم اور شاہ عبدالعزیز لائبریری کو تاریخ مکہ کے اہم ترین تاریخی ورثے کے طور پرشامل کیا گیا۔تاریخ اور تقدیس کے چشمہ صافی سے دھ ±لے حرم مکہ کی روحانی شعائیں مکان اور لامکان سب کو روشن اور منور کر رہی ہیں۔ کیا زمانہ قدیم اور کیا دور حاضر، کرہ ارض کا یہ مقام بلند ہمیشہ اپنی روحانی تقدیس میں کسی بھی آلودگی سے پاک اور ہر طرح کی ملاوٹ سے صاف رہا۔ یہی وجہ ہے کہ اس کی اصلیت اور حرمت کی گواہی آج بھی اسی طرح دی جاتی ہے جس طرح صدیوں پہلے دی جاتی تھی۔عصر حاضر میں مکہ معظمہ ایک حسین وجمیل لوح (تختی) کی مانند ہے۔ تقدیس اور حرمت جس کا متن اور فقید المثال مقامات اس کے حواشی ہیں۔ شہر مقدس کا یہ حقیقی شاہانہ مزاج ہے جس کا اصلی قدیم اور جدید نسب آج اکیسویں صدی میں بھی ثابت ہے۔یہ اس کے مشاعر مقدسہ ہیں جو جدید وقدیم کی خوبیوں کو اپنے اندر سموئے وقت کے ساتھ وسعت پذیر ہیں۔ انہی میں لوگوں کے مکانات، مساجد، تاریخی بازار حسن وخوبی کے ساتھ جدت کے سفر پر بھی گامزن ہیں۔حرم کے سائے میں وہ قدیم ہوٹل، کالونیاں، عمارات، بازار، شاہرائیں، ان پر بنے روشن وچمکدار پ ±ل، ریل کی پٹڑیاں نہ صرف شہر کی رونق میں اضافے کا موجب ہیں بلکہ بجائے خود حرم کے مشاعر ہی کا درجہ رکھتے ہیں۔ زمان ومکان ان کی حرمت کے گواہ ہیں کہ ان جیسا مقام کائنات میں اور کہیں نہیں۔

गांव में चराता था गाय-भैंस, अब बनेगा टीम इंडिया का हिस्सा!


 इंदौर के पास स्थित जानापाव कुटी के जितेंद्र पाटीदार का चार साल पहले तक बास्केटबॉल से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था लेकिन अब वे टीम इंडिया के लिए आयोजित कैम्प में चार बार हिस्सा ले चुके हैं। वे अब भारतीय टीम में चुने जाने के तगड़े दावेदार हैं। बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया ने जितेंद्र के प्रदर्शन को देखते हुए उनसे पासपोर्ट तैयार रखने को कहा है।पत्थर रखकर किया अभ्यास : 11वीं के छात्र जितेंद्र ने बताया, ‘अकसर मैं एड़ी के नीचे जूतों में पत्थर रखकर दौड़ता था ताकि पंजों के बल दौड़ने का अधिक से अधिक अभ्यास हो सके। मैं पहले अनफिट था लेकिन फिर फिटनेस पर अधिक ध्यान दिया।’ जितेंद्र नेशनल में तीन बार मध्यप्रदेश जूनियर टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनके खाते में 1 रजत और 2 कांस्य पदक दर्ज हैं। अब वे राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनने को तैयार हैं।
 दिलचस्प है जितेंद्र की कहानी
 जितेंद्र के बास्केटबॉल से जुड़ने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। महू के रेलवे क्लब के बास्केटबॉल कोच अजय सिंह शेखावत ने चार साल पहले जितेंद्र को जानापाव जाते समय रास्ते में देखा था और वे उनकी 6 फीट 10 इंच की लंबाई से बेहद प्रभावित हुए थे। अजय ने भास्कर से बातचीत में कहा ‘जानापाव के रास्ते जाते समय मुझे एक लंबा लड़का गाय-भैंस चराते हुए दिखा। मैंने गाड़ी रोकी और उसके बारे में पूछताछ की और उसे अपने क्लब में खेलने के लिए आमंत्रित किया। उसके बाद वह हर दिन अभ्यास के लिए आया करता था।’ जितेंद्र ने बताया, ‘मेरी लंबाई सबसे ज्यादा होने की वजह से गांव में बच्चे लंबू कहकर चिढ़ाते थे और अब यह मेरे लिए प्लस प्वाइंट हो गया है।’
 कई जगह से हैं नौकरी के ऑफर 
 बाद में बेहतर एक्सपोजर के लिए जितेंद्र को नेशनल बास्केटबॉल एकेडमी (एनबीए) इंदौर भेज दिया गया। एनबीए के कोच रामराव नागले बताते हैं, ‘यहां आने के बाद हमने उनका स्कूल में एडमिशन कराया और बास्केटबॉल के लिए जरूरी ट्रेनिंग पर ध्यान दिया। जूनियर नेशनल में जितेंद्र ने मप्र के लिए बेहतरीन प्रदर्शन किया, उसे सभी ने नोटिस किया। जितेंद्र के पास अभी आर्मी सहित कई जगहों से नौकरी के ऑफर हैं लेकिन वे अभी पढ़ाई पूरी करना चाहते हैं।
 पढ़ाई के लिए भी मिला सहयोग
 पढ़ाई के साथ अन्य सहयोग के लिए एडवांस्ड एकेडमी के निदेशक अनिल राय आगे न आते तो जितेंद्र की राह मुश्किल होती। जितेंद्र कहते हैं, ‘राय सर ने हमेशा मेरी मदद की।’ राय भी कहते हैं, ‘जितेंद्र की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी लेकिन उनके परिणाम अच्छे आ रहे थे इसलिए मैंने हमेशा उनका सहयोग किया।’

Tuesday, April 17, 2012

ٹائٹےنک گاو


ٹائٹےنک کو ڈوبے ہوئے سو سال ہو گئے ہیں لیکن ابھی بھی اس جہاز میں لوگوں کی بہت دلچسپی ہے۔ ساری دنیا میں اسے یاد کیا گیا کہ کس طرح اس حادثے میں 1500 افراد کی جان چلی گئی تھی لیکن آئر لینڈ کا ایک چھوٹا سا گاو ¿ں ایسا ہے جہاں کے رہنے والے 11 نوجوان لڑکے اور لڑکیوں کی جان چلی گئی تھی۔ یہ سارے وہ لوگ تھے جو کہ بہتر زندگی کی تلاش میں امریکہ جا رہے تھے۔ یہ گاو ¿ں ٹا ئٹےنک کی وراثت سے جڑا ہوا ہے۔ یہ ہے اڈرگول گاو ¿ں۔
اڈرگول گاو ¿ں میں پالن بریٹ کی ایک چھوٹی سی گفٹ کی دکان ہے جو پوری طرح سے ٹائٹےنک سے متعلق اشیاءسے بھری ہے۔ ٹائٹےنک کی تصاویر والی ٹی شرٹ، چابی کا چھلا، پین، ٹوپی، بیس بال کے ساتھ ساتھ ٹائٹےنک کے ماڈل، ٹائٹےنک کی گھڑیاں یہاں موجود ہیں، لیکن دکان مالک پالن بریٹ کو ان اشیاءسے زیادہ دلچسپی ٹائٹےنک کی کہانی میں ہے۔ وہ کہتی ہیںکہمیری نانی کے بھائی جیمز پھلےن ٹائٹےنک پر سوار تھے، اس وقت وہ تقریبا 29 سال کے رہے ہوں گے۔ میں نے اپنی دادی سے ان کے بارے میں پوچھا تو انہیں ان کے بارے میں کوئی بہت زیادہ پتہ نہیں تھا۔ انہیں صرف اتنا ہی پتہ تھا کہ انہیں کشتی پر سوار نہیں ہونے دیا گیا، کیونکہ خواتین اور بچوں کواہمےت دیا جانا فطری تھا۔ اسی گاو ¿ں کی اینی کیٹ کیلی بھی تھیں۔ وہ واحد زندہ بچی خاتون تھیں جو واپس لوٹ کر آئی تھیں۔ ڈےلےن نالےن کہتے ہیںکہعینی کیٹ کیلی لائف بوٹ تعداد 16 میں سوار ہوئی تھیں۔ انہوں نے حقیقت میں اس تجربے کو محسوس کیا تھا جو 14 اور 15 اپریل کی درمیانی رات کو ہوا تھا۔ انہوں نے دیکھا کہ جہاز پر سوار ایک شخص پیٹرک نے انہیں کشتی کا راستہ دکھایا اور ہاتھ ہلا کر رخصتی دی۔ انہوں نے ہی اینی کی جان بچائی۔
ولیم بارڈ ٹائٹےنک میموریل کمیٹی کے رکن ہیں۔ گزشتہ کچھ ماہ سے وہ مسلسل محنت کر رہے ہیں تاکہ ٹائٹےنک کا ماضی بھلایا نہ جا سکے۔ ولیم بارڈ کہتے ہیں کہ پہلے لوگ اتنے صدمے میں تھے کہ اس کے بارے میں بات نہیں کرنا چاہتے تھے۔ آپ تصور کر سکتے ہیں کہ جس جگہ کے 14 لوگوں میں سے 11 نے جان گنواےا، وہاں کیا ہوا ہوگا۔ یہ لوگ اچھے زندگی کی تلاش میں جا رہے تھے۔ اس وقت آئرلینڈ میں روزگار نہیں تھا۔ سو سال بعد آج پھر سے نقل مکانی بڑھ گئی ہے۔اس گاو ¿ں کے لوگوں کو امید ہے کہ ٹائٹےنک سے وابستہ وراثت کی وجہ سے اڈرگول گاو ¿ں میں سیاحت کی امےد بڑھ سکتی ہیں۔ اس واقعہ کے سو برس ہو چکے ہیں اور اڈرگول گاو ¿ں ٹائٹےنک کی تاریخ کے صفحات میں جگہ بنا چکا ہے۔ سو سال پہلے 15 اپریل کی رات جب دنیا کے سب سے بڑے جہاز (اس وقت کے) ٹائٹےنک نے سمندر کی سطح میں لمبا غوطہ لگایا تھا تو اس کے 1500 مسافروں میں ہندوستان کے چھتیس گڑھ ریاست سے تعلقرکھنے والی ایک خاتون بھی شامل تھیں۔ اےنی کلےمر، چاپا جانجگےر میں مےنونائٹ مشنری کے طور پر کام کر رہی تھیں۔ اےنی ایک مشنری کے طور پر اس علاقے میں 1906 میں آئیں تھیں اور پھر کئی طرح کے سماجی کاموں کو انجام دیا۔ غیر ملکی ہوتے ہوئے بھی انہوں نے یہاں کی زبان اور ثقافت کو اپنا لیا تھا۔ انہوں نے پرورش سے محروم بچوں کے درمیان کافی کام کیا اور ایک اسکول بھی کھولا جس میں خاص طور پر غریب لڑکیوں کی تعلیم پر خاص توجہ دی جاتی تھی۔

काम नहीं आया शीला दीक्षित का करिश्मा


दिल्ली नगर निगम चुनाव में शीला दीक्षित का करिश्मा काम नहीं आया। नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली है। उत्तर, दक्षिण और पूर्वी दिल्ली तीनों ही नगर निगम में बीजेपी का परचम लहरा रहा है। एमसीडी के तीनों निगमों के 272 वार्डों की अधिकतर सीटों पर बीजेपी ने कब्जा जमा लिया है।पूर्वी दिल्ली की कुल 64 सीटों में से बीजेपी ने 35 सीटें जीतीं तो कांग्रेस को मिलीं सिर्फ 19, बीएसपी ने यहां भी 3 सीटें जीतीं हैं तो अन्य के हाथ लगी हैं सात सीटें। उत्तरी दिल्ली में तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है। यहां की कुल 104 सीटों में से बीजेपी ने 59 सीटें जीत लीं, वहीं कांग्रेस के हाथ आईं सिर्फ 29, बीएसपी ने यहां सात सीटें तो अन्य ने 9 सीटें जीती हैं। वहीं पॉश दक्षिण दिल्ली की 104 सीटों में से बीजेपी ने 44 तो कांग्रेस ने 30 सीटें जीतीं। यहां बीजेपी को बहुमत के लिए चाहिए 14 और सीटें, वहीं बीएसपी ने यहां पांच सीट तो अन्य ने दस सीटें हासिल की हैं।एमसीडी चुनाव में प्रचार की कमान खुद शीला ने अपने हाथों में थामी हुई थी लेकिन वो वोटरों को नहीं लुभा पाईं। कांग्रेस के नेता दबी जुबान से ये मान रहे हैं कि महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे ने उनके विकास के नारे को चट कर लिया। सवाल ये कि क्या बीजेपी ये जानती थी कि महंगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस को धूल चटाएगा। बीजेपी की चुनावी रणनीति देखें तो शायद ये पहली बार हुआ है कि बीजेपी ने स्थानीय मुद्दों को छोड़ दिया। उसने एमसीडी चुनाव राष्ट्रीय मुद्दे पर लड़ा। चुनाव प्रचार की शुरुआत से ही बीजेपी ने सड़कों, नालों, प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा तरजीह महंगाई और भ्रष्टाचार को दी। अब नतीजे देखने के बाद कहा जा सकता है कि लोगों ने बीजेपी की इस सोच का साथ दिया।बीजेपी ये सोचकर खुश हो सकती है कि उसने 2013 में होने वाले दिल्ली विधानसभा का सेमीफाइनल जीत लिया है। अब वो दिल्ली की सत्ता के सपने देख सकती है। वहीं कांग्रेस ये सोच कर खुद को तसल्ली दे रही है कि एमसीडी की हार का खामियाजा विधानसभा चुनावों तक पूरा कर लिया जाएगा। साल भर में लोगों का गुस्सा वो अपने विकास के बल पर ठंडा कर देगी लेकिन सवाल ये है कि महंगाई और भ्रष्टाचार से नाराज जनता का गुस्सा वो कैसे ठंडा कर पाएगी।

बापू के चश्‍मे और पत्रों की नीलामी


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के गोल रिम वाला चश्मा, चरखा और 1948 में जिस जगह बापू की हत्या की गई थी, वहां की थोड़ी सी मिट्टी और घास उन दुर्लभ चीजों में हैं, जिन्हें 17 अप्रैल को नीलाम किया जाएगा। ‘मुलॉक्स’ नीलामी घर इन्हें नीलाम कर रहा है। इस नीलामी में बापू की ओर से लिखे गए कुछ पत्र भी शामिल हैं।गौर हो कि बापू के चश्मे, चरखा और नई दिल्ली के बिड़ला हाउस की थोड़ी सी मिट्टी और घास की नीलामी के लिए ‘मुलॉक्स’ की ओर से शुरुआती कीमत 10,000 पाउंड से 15,000 पाउंड तय की गई है। बिड़ला हाउस की थोड़ी सी मिट्टी और घास तो पीपी नांबियार नाम के एक शख्स ने उस दिन सहेज कर रखा था जिस दिन गांधीजी की हत्या हुई थी। इस बारे में नांबियार ने एक स्तंभ भी लिखा था। महात्मा गांधी के जिस चश्मे की नीलामी की जानी है उसे 1890 में उस वक्त लंदन में खरीदा गया था जब वह कानून की पढ़ाई करने आए थे।साल 1931 में बापू जब लंदन आए थे तो उस वक्त ली गई उनकी असल तस्वीरें भी नीलाम की जाएंगी। रंगून में एनईआर के सार्जेंट रहे राघवन को बापू की ओर से लिखे गए पत्रों की भी नीलामी होगी। गुजराती में गांधीजी की ओर से लिखे गए पत्र भी नीलाम होंगे। उधर, लंदन में बापू की वस्तुओं की नीलामी को रोकने के लिए राष्‍ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की गई है। अगर नीलामी न रुक पाये तो भारत सरकार नीलामी में इन वस्तुओं की खरीददारी कर ले और इस खरीददारी में जो भी रकम लगेगी वह मानस संगम संस्था आम जनता से जनसहयोग और चंदे के रूप में एकत्र करके भारत सरकार को दे देगी। बस हर भारतीय की तरह उनकी भी यह इच्छा है कि राष्ट्रपिता के खून से सनी मिट्टी और अन्य सामान भारत लाया जा सके।उधर, गांधीवादी लेखक गिरिराज किशोर ने बताया कि उन्होंने  महात्मा गांधी की वस्तुओं की नीलामी रोकने के लिये मशहूर समाज सेवी अन्ना हजारे को फोन किया और उन्हें पूरी बात बताई और उनसे इस नीलामी को रोकने के लिये कुछ करने को कहा। गौरतलब है कि लेखक गिरिराज किशोर ने लंदन में महात्मा गांधी के खून से सनी मिट्टी एवं अन्य वस्तुओं की नीलामी को रोकने और ऐसा न होने पर पद्मश्री सम्मान वापस करने की बाबत पहले पांच अप्रैल को प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था, लेकिन प्रधान मंत्री को लिखे पत्र का कोई जवाब न आया तो उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उनसे बापू के इन सामानों की नीलामी रोकने के लिये हस्तक्षेप की मांग की थी।उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा था कि अगर लंदन में 17 अप्रैल को गांधी के सामान की नीलामी हो गई तो वह बहुत दुखी होंगे इसलिए वह चाहते है कि राष्ट्रपति 18 अप्रैल के बाद का कोई समय उन्हें दे दे ताकि वह अपना पदमश्री सम्मान उन्हें वापस कर सकें। लंदन में महात्मा गांधी के खून से सनी मिटटी एवं अन्य वस्तुओं की नीलामी से दुखी प्रख्यात गांधी वादी लेखक पदमश्री गिरिराज किशोर ने गांधी की इन वस्तुओं की नीलामी को रोकने के लिये इसी माह पांच अप्रैल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र भी लिखा था लेकिन आज तक उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय से पत्र का कोई जवाब नही मिला है।पद्मश्री किशोर ने कहा कि जब प्रधानमंत्री को लिखे पत्र का कोई जवाब नहीं मिला था तो हमने मजबूर होकर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को पत्र लिखा था कि सरकार इस नीलामी को रोकने के लिये कुछ प्रयास करें। मानस संगम नामक संस्था ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा कि भारत सरकार इस सामान को नीलामी में खरीद लें और उसको खरीदने में जो पैसा सरकार का लगेगा वह जनता से चंदा करके उनकी संस्था सरकार को उपलब्ध करा देगी।

Saturday, April 14, 2012

पति की मौत के बाद जब दूसरे शासकों ने डाली गंदी निगाहें...


भोपाल। भारत का दिल कहे जाने वाला राज्य मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को झीलों की नगरी कही जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि इस खूबसूरत शहर के निर्माता दोस्त मोहम्मद खान हैं? भास्कर नॉलेज पैकेज के अंतर्गत आज हम आपको इससे जुड़ी रोचक कहानी बताने जा रहे हैं।सन् 1720 ई. के आस-पास की बात है। इतिहास में मौजूद साक्ष्यों के अनुसार निजाम शाह उस समय भोपाल के आस-पास के इलाकों के प्रतापी गौंड राजा थे। उनकी पत्नी रानी कमलापति काफी सुंदर स्त्री थीं। कई गौंड शासक उनकी सुंदरता के कायल थे। उन्हीं में से एक आलम शाह नामक शासक उनसे काफी प्रभावित थे।इसी दरम्यान रानी कमलापति के पति निजाम शाह की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु होते ही शासकों ने उनपर गंदी निगाहें डालना शुरू कर दीं। तब रानी की सुरक्षा खतरे में पड़ गई। वे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगीं। इसके लिए उन्होंने इस्लामनगर के दुर्दात अफगान लड़ाके दोस्त मोहम्मद खां को अपनी रक्षा का बुलावा भेजा। लेकिन रानी के पास उस समय मोहम्मद खां को देने के लिए बहुत कुछ नहीं था।इसके बावजूद उन्होंने एक लाख रुपए में सौदा तय किया। मोहम्मद खां को सौदा मंजूर हो गया और उन्होंने रानी की सुरक्षा करते हुए गौड़ राजाओं की निर्ममता से हत्या कर दी। इसके बाद रानी कमलापति मोहम्मद खां को सिर्फ 50 हजार रुपए ही दे सकीं। सौदा पूरा नहीं हुआ। ऐसे में शेष 50 हजार रुपयों के बदले रानी ने मोहम्मद खां को बेरसिया और गिन्नौर के बीच बड़ी झील के किनारे की बस्ती दे दी।मोहम्मद खां ने उसे सहर्ष स्वीकार लिया। दरअसल, वही बस्ती भोपाल के रूप में प्रसिद्ध हुई। इतिहास के पन्नों में भोपाल के जन्मदाता के रूप में राजा भोज का नाम भी चर्चे का विषय है। ऐसा कहा जाता है कि भोपाल के जन्मदाता राजा भोज ही हैं। लेकिन इतिहास में इस बात का कहीं भी विस्तार से जिक्र नहीं मिलता।इसका जिक्र शहरयार खां की किताब द बेगम्स ऑफ भोपाल में भी मिलता है।

Tuesday, April 10, 2012

कॉलेज में लड़कियों के प्रचलित नाम



कॉलेज में लड़कियों के प्रचलित नामों की व्याख्या
प्रश्नः कॉलेज में पाई जाने वाली लड़कियों के सबसे प्रचलित नाम बताइये?
उत्तरः यूं तो कॉलेज में पाई जाने वाली लड़कियों के अपने-अपने नाम होते हैं लेकिन लड़कों के बीच कुछ खास नाम ही प्रचलित होते हैं।
कॉलेज में पाई जाने वाली लड़कियों का सबसे प्रचलित नाम 'मेरी वाली' है। ये नाम अक्सर कॉलेज की हर खूबसूरत लड़की को मिल जाता है।
ज्यादातर लड़के किसी लड़की को पहली बार देख कर ही मेरी वाली कह देते हैं। इस नाम को लेते वक्त लड़कों के मुंह पर कुटिल मुस्कान और गर्व का भाव होता है। इसे ड्रीम गर्ल का बिगड़ा हुआ रूप भी कहा जा सकता है।
कॉलेज में दूसरा सबसे प्रचलित नाम है तेरी वाली। यह नाम अक्सर लड़के अपनी दोस्त की ड्रीम गर्ल को दे देते हैं। इसका इस्तेमाल दोस्त को चिढ़ाने या उसे यह बताने के लिए किया जाता है कि उसकी सपनों की रानी आंखों के दायरे में है, उसे देखकर दिल खुश किया जा सकता है।
कॉलेज में लड़कियों के लिए प्रयोग किए जाने वाले नामों में एक और प्रचलित नाम 'तेरी भाभी' भी है। जब कोई लड़का अपनी पसंद की लड़की के साथ अपने सपने भी जोड़ लेता है तब वो 'मेरी वाली' के स्थान पर 'तेरी भाभी' का प्रयोग करता है। इस नाम का प्रयोग करने के पीछे मूल भावना होती है अपने दोस्तों को यह बताना कि वो अब इस लड़की पर आंखें सेंकना बंद कर दें और अपना फोकस कहीं और शिफ्ट कर दें।
वहीं एक और अन्य प्रचलित नाम है 'मेरी भाभी'। यह तब प्रयोग होता है जब लड़के के दोस्त भी उसकी पसंद का सम्मान करना शुरु कर देते हैं। तेरी वाली के स्थान पर प्रयोग किया जाने वाला सम्मानसूचक शब्द ही मेरी भाभी है।
वैसे तो लड़कियों के कई और नाम कॉलेज में खासे प्रचलित होते हैं लेकिन सबसे प्रचलित नामें में शुमार एक और नाम है बहनजी। यह नाम उन लड़कियों को दिया जाता है जिन्हें लड़कों के समूह में कोई भी पसंद नहीं करता है। लड़के मजाक में इस नाम का प्रयोग करते हैं लेकिन लड़कियों में कोई भी इस नाम को सुनना पसंद नहीं करती हैं।

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...