Thursday, March 1, 2012

धुंधली है यूपी की तस्वीर


'मायावती और चाहे जौन किहे होंय,गरीबन के लिए कुछौ नहीं किहिन'--ये आवाज गुलाबी साड़ी और आत्मविश्वास में लिपटी उर्मिला की थी। दलित जाति की उर्मिला सतगुरु खेड़ा गांव के बाहर मिल गई थीं। साथ में उनके पति छंगा भी थे। छंगा विकलांग हैं। बेहद नाराज नजर आ रहे छंगा ने मायावती को निशाने पर रखते हुए सीधा उलाहना दिया-'का हमका एक ठो कालोनी नहीं दइ सकती रहीं?' 'कालोनी' यानी दलितों के लिए बनाए जाने वाले सरकारी मकान।
16 जनवरी को काफी ठिठुरन थी, जब हम (मैं और कैमरामैन पंकज तोमर) लखनऊ पहुंचे थे। इरादा चैनल के लिए चुनावी माहौल का जायजा लेना था। लेकिन कुछ चुनाव आयोग की कृपा और कुछ लोगों की बेजारी, चुनाव का रंग कहीं नहीं दिखा। राजधानी के लोगों की निगाह में सरकार बदलने या बनाये रखने की कोई तड़प नजर नहीं आई। बस, एक बात पर सहमति थी कि मायावती के स्मारकों ने लखनऊ की नवाबी शान फीकी कर दी है। शाम को देखने हम भी गए। गोमतीनगर के अंबेडकर स्मारक के इर्दगिर्द मेले जैसा माहौल था। सूबे के तमाम जिलों में बिजली की चाहे जितनी किल्लत हो, यहां रोशनी के फव्वारे फूट रहे थे। समतावादी आंदोलन के नायकों और संतों के बुतों से पूरा इलाका पटा पड़ा था, लेकिन सैर-सपाटे के मूड से आए लोगों के लिए उनकी ओर देखने-सोचने की फुर्सत शायद ही थी। वे इस बात पर खुश थे कि लखनऊ में अब मुंबई के नरीमन प्वाइंट का मजा लिया जा सकता है। जाहिर है, 'चुनाव' यहां भी नहीं था।
ऐसे में जरूरी था कि शहर से बाहर निकलकर माहौल को परखा जाए। एक सुबह कानपुर जाने वाले एक्सप्रेस-वे पर निकल पड़े। लखनऊ और उन्नाव सीमा पर जाम लगा था। पता चला कि गाड़ियों की चैकिंग हो रही है। चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों का असर था। वीडियोग्राफी भी हो रही थी। अग्रवाल साहब का गुस्से से लाल चेहरा आंखों के सामने घूम गया। लखनऊ में समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर झंडे-बैनर-बिल्ले-पोस्टर की दुकान चलाने वाले अग्रवाल साहब हमारा कैमरा देखकर ही भड़क उठे थे। उन्हें लगा था कि हम उनकी दुकान की तस्वीर लेने आए हैं जहां काफी 'माल' पड़ा है। हम कोई ऐसी स्टोरी दिखा देंगे जिससे दुकान पर आयोग का ताला पड़ जाएगा। चुनाव आयोग के नाम पर गालियों की बौछार कर रहे अग्रवाल साहब के लाखों रुपये डूब गए हैं। उन्हें शिकायत है कि प्रचार सामग्री की थोक खरीद रुकी हुई है। कोई खरीदे भी तो झंडा-पोस्टर शहर से बाहर नहीं जा पाता।
खैर, चेक पोस्ट से कुछ दूर आगे जाने पर बाईं ओर एक पतली और ऊबड़-खाबड़ सड़क फूट रही थी। गाड़ी उधर ही मोड़ दी गई। 'दलित मुख्यमंत्री के राज में दलितों का हाल'-चालू किस्म की इस 'स्टोरीलाइन' का सिरा पकड़कर हम सतगुरु खेड़ा पहुंचे थे। इस गांव में सिर्फ दलित जाति के लोग बसते हैं। किसी जमाने में पास के किसी गांव के दबंगों ने खदेड़ दिया था तो इस ऊसर में शरण मिली थी, जहां अब ये खेड़ा बसा हुआ है।
गांव के बाहर उर्मिला और छंगा ही नहीं लल्लूराम और छोटेलाल भी मिल गए। सब के पास तकलीफों के अनंत किस्से थे। अवधी के मुहावरे और तंज उनकी शिद्दत को और बढ़ रहे थे। हमें इत्मिनान में देखा तो बातचीत बढ़ती चली गई। पता ही नहीं चला कि दिल पर पड़ा दिल्ली छाप ताला कब टूटा और अवधी का धाराप्रवाह सोता फूट पड़ा। अब सब 'अवधिये' थे। पंचायत जुट गई।
छोटेलाल बता रहे थे कि ब्लाक के 'सचिव जी' ने कैसे खाद मांगने पर उन्हें धक्के मार कर भगाया। बाजार से से साढ़े चार सौ रुपये बोरी खरीदने में जान निकल गई। उनका जोर इस बात पर था कि-'मायावती तो देत हैं, मुला अफसरवै सब खाय जात हैं..।'उधर, जालंधर में अरसे तक रिक्शा चलाने के बाद गांव लौटे लल्लूराम का अंदाज खासा दार्शनिक था। बोले-'भइया, कौनो पाल्टी गरीबन का कुछ दिहिस है कि मायावती देहैं। खाय का कोई ना देई बगैर बाजुअन से कमाये।'
लल्लूराम ने बात 'जयहिंद-जयभारत' के नारे के साथ खत्म की थी। साथ में दोनों हाथ भी उठाकर जोड़ लिए थे। अंदाजा सही निकला- लल्लूराम जालंधर में रिक्शा युनियन में सक्रिय थे।
इस बीच पंकज तोमर खेतों की हरियाली, जानवरों और बच्चों के झुंड की तस्वीरें कैद कर चुके थे। अब बारी थी गांव के अंदर जाने की। गांव के लोग भी ये चाहते थे। गांव में बिजली के तार तो छोड़िए खंभा भी नजर नहीं आया। लोगों ने बताया कि हर चुनाव में बिजली लाने का वादा होता है, पर विधायक चुने जाने के बाद कोई लौट कर नहीं आता। यही वजह है कि मोबाइल क्रांति के इस युग में यहां इक्का-दुक्का लोगों के पास ही मोबाइल है। जब चार्जिंग के लिए दो किमोलीटर दूर बाजार जाना हो तो कोई खरीदे भी क्यों। गांव में विकास के नाम पर दो हैंडपाइप भर लग पाए हैं। रास्ते और पानी निकासी की समस्या की कोई सुनवाई नहीं है।
गांव में हर कदम पर कोई ना कोई सरकार से शिकायतों का नया पुलिंदा लेकर खड़ा था। लग रहा था कि दलित मायावती सरकार से काफी नाराज हैं। 'स्टोरी' बनने की खुशी महसूस ही हुई थी कि अचानक निगाह घरों के किवाड़ों पर गई। ज्यादातर किवाड़ों पर 'बीएसपी को वोट दो' के ताजा स्टीकर चस्पा थे। लग गया कि मामला इतना सीधा नहीं है। दार्शनिक लल्लूराम ने कैमरा बंद होने के बाद चुपके से कान में कहा था-'आपन समाज हम पंचै खुदै थोड़े बिगाड़ब।'
यानी बीएसपी पार्टी नहीं 'समाज' है। उत्तर प्रदेश की एक जमीनी सच्चाई तो समझ में आ गई थी कि तमाम नाउम्मीदी के बावजूद दलितों का बीएसपी से मोहभंग नहीं हुआ है। किसी क्षेत्र में कोई विशेष मुद्दा नहीं हुआ तो बटन हाथी पर ही दबेगा। दलितों के बीच इस दौरान बड़ा सांस्कृतिक बदलाव भी आया है। गांवों में डॉ. अंबेडकर की मूर्तियां तो कई साल पहले से लग रही थीं, अब बुद्ध मूर्तियां और 'भंते' भी नजर आने लगे हैं। सतगुरु खेड़ा से लौटते वक्ता रास्ते में लखनऊ का मवई पड़ियाना गांव पड़ा। पता चला कि यहां दलित ही नहीं कई पिछड़ी जाति के लोग भी बौद्ध हो चुके हैं। शादी-ब्याह भी बौद्ध रीत से हो रहे हैं (हालांकि कोई जाति पहचान नहीं छोड़ रहा है)। गांव में बौद्ध बिहार बन रहा है। साथ में भिक्षु प्रशिक्षण केंद्र। कमान भंते प्रज्ञासार के हाथ में है। उम्र चालीस भी नहीं है। कुछ दिन सरकारी नौकरी करने के बाद, करीब 16 साल पहले वे भिक्षु बन गए थे। उन्होंने बताया कि दलितों को बुद्ध की बातें समझ में आने लगी हैं। इशारों में ये भी बताया कि मायावती शासन की वजह से उनका काम बिना रोक-टोक बढ़ रहा है। वहां मौजूद और लोगों से बात हुई तो ये भी साफ हुआ कि लखनऊ से नोएडा तक बने पार्क और स्मारक विपक्ष की नजर में भले ही फिजूलखर्ची हो, दलितों की नजर में ये किसी तीर्थ से कम नहीं हैं। बुतों में ही सही, समतावादी नायकों की ऐसी भव्य प्रतिष्ठा देश के किसी और हिस्से में नहीं हुई है।
हालांकि बुद्धिजीवियों का एक तबका बीएसपी की सीमाओं को अच्छी तरह समझ रहा है। लखनऊ की एक सीट से सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के प्रत्याशी बनकर चुनाव लड़ रहे वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस ने कहा भी-'मायावती केवल ब्राह्मणवाद को बरकरार रखने की शर्त पर मुख्यमंत्री बनी हैं। आखिर उनके अलावा कोई दलित नेता क्यों नहीं दिखता। बीएसपी में कोई दलित आगे बढ़ना चाहे तो सबसे बड़ी दुश्मन मायावती ही होंगी।' डॉ. अंबेडकर महासभा से जुड़े डॉ. लालजी निर्मल ने भी कहा-'बीएसपी शासन में दलितों को सम्मान का अहसास तो हुआ है, लेकिन पेट की आग बुझाने का कोई बंदोबस्त नहीं है।'
वैसे भी, केवल दलित समर्थन के दम पर बीएसपी की नैया पार नहीं हो सकती। 2007 में मायावती को तमाम दूसरे वर्गों का समर्थन ना मिलता तो वे गठबंधन का 17 साला दौर खत्म करके पूर्ण बहुमत की सरकार ना बना पातीं। तब एक मुद्दा मुलायम का कुशासन और समाजवादी पार्टी नेताओं की गुंडागर्दी भी था। लोगों का गुस्सा मायावती की ताकत बन गया। लेकिन पांच साल में माया सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया कि उनकी अपनी कोई ताकत बन पाती। भ्रष्टाचार और कुशासन के मामले में वे भी किसी से उन्नीस साबित नहीं हुई हैं। उन्होंने करीब ढाई हजार करोड़ की चीनी मिलें केवल 470 करोड़ में एक शराब माफिया को बेच दी हैं। पूरे सूबे में शराब कारोबार पर इसी माफिया का एकछत्र राज है और मायावती की घोषित व्यक्तिगत संपत्ति 87 करोड़ के आंकड़े को छू रही है।
मायावती की खुशकिस्मती है कि उनके विरोध में कोई ऐसी पार्टी नहीं खड़ी है जो पाक-साफ हो, या जो जनता के बीच कोई नया सपना जगाने में कामयाब हुई हो। जिसने ऐसा कोई पाप ना किया हो जिसमें मायावती के हाथ रंगे हैं। या फिर मुद्दा आधारित आंदोलनों का कोई ज्वार खड़ा कर पाई हो। विकल्प के रूप में समाजवादी पार्टी का जिक्र छिड़ा तो लखनऊ विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक परेशान हो उठे। वे भुला नहीं पाए हैं कि मुलायम के शासन में विश्वविद्यालय कैसे गुंडों की जकड़न में था। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर मायावती उन्हें कई गुना बेहतर नजर लगती हैं।
शायद छवि बदलने का ही दबाव है कि मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश को आगे किया है। अंग्रेजी-कंप्यूटर में दक्ष इस विदेश पलट बेटे में उन्हें समाजवाद का भविष्य नजर आ रहा है। ये समाजवादी युवराज कांग्रेसी युवराज के मुकाबल मैदान में है और भीड़ भी बटोर रहा है। कोई कोर कसर ना रह जाए, इसके लिए दिल्ली की जामा मस्जिद इमाम बुखारी का खुला समर्थन भी हासिल कर लिया गया है जिन्हें कुछ साल पहले मुलायम ने सियासत में टांग ना अड़ाने की नसीहत दी थी।
मुस्लिमों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने भी घोड़े खोल दिए हैं। पिछड़ों के 27 फीसदी आरक्षण में मुस्लिमों को नौ फीसदी हिस्सा देने का नया दांव चला गया है। कांग्रेस भी उसी जोड़-घटाने के सहारे है जिसके आधार पर बीएसपी और समाजवादी पार्टी सत्ता का समीकरण बैठा रही हैं। राहुल गांधी जब आईटी क्रांति के चेहरे सैम पित्रोदा को कांग्रेस के मंच पर लाकर उन्हें बढ़ई का बेटा बताने से ये बात पूरी तरह साफ हो गई। उधर, बीजेपी हमेशा की तरह सांप्रदायिक कार्ड खेल रही है। मेडिकल घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लेने से शुरू में बैकफुट पर नजर आ रही बीजेपी अब मुस्लिम आरक्षण को मुद्दा बनाकर चुनाव में सांप्रादियक रंग घोलने की जुगत भिड़ा रही है। यही वजह है कि कमान साध्वी उमा भारती को सौंपी गई है।
जाहिर है, उत्तर प्रदेश में किसी दल के पास ऐसी बड़ी लकीर खींचने की कुव्वत नहीं है, जिसके सामने जाति-धर्म के समीकरण छोटे पड़ जाएं। जनता की बेजारी की ये बड़ी वजह है। ऐसा नहीं कि लोग वोट देने नहीं जाएंगे, लेकिन किसी के पक्ष या विपक्ष को लेकर कोई उत्साह नहीं है। जोश में सिर्फ वो हैं जो किसी के जीतने में निजी स्वार्थ देख रहे हैं। यानी फलां विधायक बन गया तो सड़क-नहर वगैरह बनाने का ठेका मिलेगा। विकास के सरकारी धन की लूट यूपी का सबसे बड़ा उद्योग है जिस पर राजनीति भी पलती है।
वैसे,इस बात पर चुनावी सर्वे कराने वालों से लेकर आम लोगों तक में सहमति है कि यूपी में मुकाबला एसपी और बीएसपी में ही है। लेकिन दोनों दल बहुमत से दूर रहेंगे। बीजेपी और कांग्रेस तीसरे-चौथे नंबर की लड़ाई लड़ रहे हैं। त्रिशंकु विधानसभा से बच पाना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। यानी, इस बार की होली जोड़तोड़ के रंग और विधायकों की खरीद-फरोख्त के कीचड़ से सराबोर होगी।
22 जनवरी को दिल्ली लौटने के बाद कई लोगों ने पूछा कि यूपी मे क्या होगा। जवाब कुछ था नहीं, सो कह दिया-खुदा ही बता सकता है। ये हजारों साल पुराना दांव है। अपनी अज्ञानता को खुदा का नाम दीजिए, और जान छुड़ा लीजिए।(साभार आई बी एन ७)

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