Saturday, March 31, 2012

'ब्लड मनी'


ब्लड मनी कहानी है कुणाल की जो कि कम उम्र में अनाथ हो गया था। पार्ट टाइम जॉब कर उसने अपने कॉलेज की फीस भरी और एमबीए किया। विदेश जाकर खूब पैसे कमाने की उसकी चाहत है।दक्षिण अफ्रीका स्थित ट्रिनीटी डायमंड्स कंपनी में उसे नौकरी मिल जाती है। छ: अंकों में सैलेरी, कार, शानदार बंगला और केपटाउन में काम करने का मौका। कुणाल की तो लॉटरी लग जाती है।जब यह बात वह अपनी गर्लफ्रेड आरजू को बताता है तो वह उसके साथ वहां जाने में हिचकती है। कुणाल उसे मना लेता है। दोनों शादी कर केपटाउन के लिए रवाना हो जाते हैं।धन और लक्जरी लाइफस्टाइल के चक्रव्यूह में कुणाल धीरे-धीरे फंसता जाता है।कुणाल यह बात अपनी पत्नी को बताता है। वह उसे भारत वापस चलने के लिए कहती है, लेकिन कुणाल को पता है कि यहां से निकल पाना बेहद मुश्किल है। कुणाल कंपनी के साथ ही काम करने का फैसला करता है ताकि वह उन लोगों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर सके। क्या कुणाल इसमें कामयाब हो पाता है?फिल्म की कहानी इसी पर आधारित है|स्टोरी ट्रीटमेंट:फिल्म की कहानी इंटरवल के बाद 'जन्नत' जैसी हो जाती है| कुणाल की पत्नी आरजू(अमृता) अपने पति को मिस करने लगती है| कुणाल काम की वजह से उन्हें वक्त ही नहीं दे पाते| जन्नत में भी कुछ ऐसा दिखाया गया था| इसके अलावा फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही कन्फ्यूज कर देने वाला है| ऑफिस में कैद घायल कुणाल वहां से महत्वपूर्ण कागजात लेकर कैसे निकलने में सफल हो जाता है वो समझ से परे है|  स्टार कास्ट: कुणाल खेमू ने एक्टर के तौर पर अपना बेस्ट देने की कोशिश की है मगर बेहद कमजोर स्क्रिप्ट के चलते उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है|अमृता पुरी ने ठीक ठाक अभिनय किया है मगर कई बार वह ओवर एक्टिंग करती नजर आती हैं|खडूस बॉस के रूप में मनीष चौधरी ने बढ़िया काम किया है| संदीप सिकंद छोटे मगर महत्वपूर्ण रूप में हैं| मिया उएदा अपने रोल में छाप  छोड़ने में नाकामयाब रहीं|  निर्देशन:नए निर्देशक विशाल महादकर में एक अच्छे निर्देशक बनने की संभावना नजर आई है|हालांकि कमजोर स्क्रीनप्ले और कहानी की वजह से निर्देशन भी कमजोर ही साबित हुआ है| मगर पहली फिल्म होने के नाते विशाल ने अपना बेस्ट देने की पूरी कोशिश की है|म्यूजिक/सिनेमटोग्राफी/एडिटिंग: विशेष फिल्म्स की फिल्मों का संगीत हमेशा ही दर्शकों को लुभाता है और इस फिल्म से भी उन्होंने संगीत के मामले में निराश नहीं किया है| इसके अलावा कुछ डायलॉग्स भी प्रभावी है और सधी हुई एडिटिंग कमजोर फिल्म को कुछ हद तक संभालने में कामयाब हुई है| 

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