इस देश में ऐसा कोई काम नहीं है, जो महिलाएं नहीं करती हों। पिछले कुछ बरसों से राजस्थान की राजधानी जयपुर में महिलाओं ने पारंपरिक रूप से पुरुषों का काम समझे जाने वाले मोची का भी काम अपना लिया है। जूते-चप्पलों की मरम्मत हो या कि पॉलिश, ये महिलाएं सभी काम बिल्कुल सहज भाव से करती हैं। आरंभ में इनके पास नौजवान-पुरुष ग्राहकों की संख्या अधिक होती थी, अब सब आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष और बच्चे भी समान रूप से आते हैं। पिछले 25 सालों से मैं जिस मोची से अपने जूतों की मरम्मत करवाता रहा हूं, उसने अब अपना धंधा बदल लिया है और कहता है कि जब से महिलाएं मोची का काम करने लगी हैं, लोग हमारे पास नहीं आते। वजह साफ है कि साफ-सुथरी हुनरमंद महिलाएं अगर पुरुषों वाले काम करने लगेंगी तो मर्दों को दूसरे काम तलाश करने ही होंगे। आप इस बदलाव को किस नजरिये से देखते हैं?
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सुशासन की त्रासदी
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