इस देश में ऐसा कोई काम नहीं है, जो महिलाएं नहीं करती हों। पिछले कुछ बरसों से राजस्थान की राजधानी जयपुर में महिलाओं ने पारंपरिक रूप से पुरुषों का काम समझे जाने वाले मोची का भी काम अपना लिया है। जूते-चप्पलों की मरम्मत हो या कि पॉलिश, ये महिलाएं सभी काम बिल्कुल सहज भाव से करती हैं। आरंभ में इनके पास नौजवान-पुरुष ग्राहकों की संख्या अधिक होती थी, अब सब आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष और बच्चे भी समान रूप से आते हैं। पिछले 25 सालों से मैं जिस मोची से अपने जूतों की मरम्मत करवाता रहा हूं, उसने अब अपना धंधा बदल लिया है और कहता है कि जब से महिलाएं मोची का काम करने लगी हैं, लोग हमारे पास नहीं आते। वजह साफ है कि साफ-सुथरी हुनरमंद महिलाएं अगर पुरुषों वाले काम करने लगेंगी तो मर्दों को दूसरे काम तलाश करने ही होंगे। आप इस बदलाव को किस नजरिये से देखते हैं?
Thursday, July 26, 2012
Tuesday, July 24, 2012
कोकराझाड़ में हो रही हिंसा के पीछे क्या है?
गत 19 जुलाई को दो अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र नेताओं पर हुए हमले के बाद से असम के बोड़ो क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के कोकराझाड़ जिले में जो हिंसा शुरू हुई थी वह अब तक फैलकर पास के चिरांग और धुबड़ी जिलों में भी पहुंच चुकी है.अंतिम समाचार मिलने तक बिलासीपाड़ा सब-डिवीजन में पास के गांवों से लोगों का पलायन जारी है.मंगलवार को दिन में कोकराझाड़ में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में बीटीसी के मुख्य कार्यकारी पार्षद हाग्रामा मोहिलारी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि उसने समय पर सुरक्षा बल मुहैया नहीं कराया, जिसके कारण हिंसा को काबू करने में देर हो रही है.मोहिलारी ने बीटीसी इलाके में सेना को तैनात करने का भी राज्य सरकार से अनुरोध किया. स्वायत्तशासी बीटीसी इलाके में कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का दायित्व है.आम तौर पर बीटीसी में क्या होता है, इससे बिल्कुल ही मतलब नहीं रखने वाले असम के बाकी हिस्सों में हिंसा की आंच तब महसूस हुई जब असम से बाहर जाने के एकमात्र मार्ग कोकराझाड़ जिले में फैले दंगों के कारण विभिन्न ट्रेनों को पश्चिम बंगाल और असम के विभिन्न स्टेशनों पर रोक लिया गया.बीटीसी इलाके में तनाव कोई एक दिन में नहीं फैला है. हालांकि ताजा हिंसा फैलने का फौरी कारण 19 जुलाई को मुस्लिम छात्र संघ के दो नेताओं पर हुआ जानलेवा हमला बताया जा रहा है, लेकिन बोड़ो और गैर-बोड़ो समुदायों के बीच तनाव पिछले कई महीनों से बन रहा था.इस तनाव का कारण है बीटीसी में रहने वाले गैर-बोड़ो समुदायों का खुलकर बोड़ो समुदाय द्वारा की जाने वाली अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग के विरोध में आ जाना.गैर-बोड़ो समुदायों के दो संगठन मुख्य रूप से बोड़ोलैंड की मांग के विरुद्ध सक्रिय हैं. इनमें से एक है गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच और दूसरा है-अखिल बोड़ोलैंड मुस्लिम छात्र संघ. गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच में भी मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के कार्यकर्ता ही सक्रिय हैं.इन दोनों संगठनों की सक्रियता उन स्थानों पर अधिक है जहां बोड़ो आबादी अपेक्षाकृत रूप से कम है. लेकिन इससे एक तनाव तो बन ही रहा था जिसकी प्रतिक्रिया कोकराझाड़ जैसे बोड़ो बहुल इलाकों में हो रही थी.इन दोनों संगठनों की जो बात बोड़ो संगठनों को नागवार गुजर रही थी वह थी बीटीसी इलाके के जिन गांवों में बोड़ो समुदाय की आबादी आधी से कम है उन गांवों को बीटीसी से बाहर करने की मांग उठाना. अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग को विरोध तो खैर वे लोग कर ही रहे थे.अपनी इस मांग के समर्थन में ये दोनों संगठन समय-समय पर प्रदर्शन और बंद का आह्वान करते रहे थे. 16 जुलाई को भी गैर-बोड़ो समुदायों ने गुवाहाटी में राजभवन के सामने प्रदर्शन कर प्रशासन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया था.इधर बोड़ोलैंड की मांग का समर्थन करने वाले संगठन भी पिछले कुछ महीनों से सक्रिय होते हुए दिखाई दे रहे हैं. हाल ही में इन लोगों ने रेलगाड़ियों को रोककर यह बताने की कोशिश की थी कि बोड़ोलैंड राज्य की मांग उनलोगों ने अभी तक छोड़ी नहीं है.बोड़ो समुदाय के दो चरमपंथी गुट - नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोड़ोलैंड (एनडीएफबी) वार्तापंथी और इसी संगठन का वार्ताविरोधी गुट - भी अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग रहे हैं. जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रवक्ता अब तक यही कहते आए हैं कि अलग राज्य बनाने का सवाल ही नहीं पैदा होता है.असम के जनजातीय इलाकों में ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया कि गैर-जनजातीय समुदाय खुले रूप से जनजातीय आबादी के विरुद्ध मुखर हो जाएं. इसकी शुरुआत हुई थी एक अन्य इलाके में, जहां राभा जनजाति अपने लिए स्वायत्तता की मांग कर रही है.वहां रहने वाले विभिन्न गैर-राभा समुदायों ने उनकी उक्त मांग के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया. इस तरह वहां दो समुदायों के आमने-सामने आ खड़े होने की यह पहली घटना थी और इसके कारण वहां समय-समय पर हिंसा भी फैलती रही है.बीटीसी इलाके में गैर-बोड़ो समुदायों के गुस्से के फटने का एक प्रमुख कारण शायद यह है कि वहां स्वायत्तशासन लागू होने के बाद से कानून और व्यवस्था की स्थिति पहले से बदतर हुई है.गैर-बोड़ो समुदाय अक्सर भेदभाव किए जाने और शिकायत करने पर पुलिस द्वारा पर्याप्त कार्रवाई नहीं किए जाने की शिकायत करते रहे हैं.
Sunday, July 22, 2012
सच हुई बहन की बात, प्रेजिडेंट बने प्रणव
आखिरकार एक बहन की भविष्यवाणी सही साबित हुई और उसका भाई देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच ही गया। हम यहां बात कर रहे हैं देश के 13वें प्रेजिडेंट बनने वाले प्रणव मुखर्जी और उनकी बहन अन्नपूर्णा की।एक हिंदी न्यूज चैनल के दिए इंटरव्यू में प्रणव मुखर्जी ने बताया कि एक बार जब वह युवा सांसद थे, तब उन्होंने प्रेजिडेंट हाउस देखते हुए अपनी बहन से कहा था कि वह अगले जन्म में कुलीन प्रजाति के घोड़े के रूप में जन्म लेना चाहते हैं, ताकि वह राष्ट्र्पति भवन में पहुंच सकें। इस बात पर उनकी बहन ने तभी कहा था कि राष्ट्रपति का घोड़ा क्यों बनोगे, तुम इसी जीवन में राष्ट्रपति बनोगे।मुखर्जी ने बताया कि उनके 10 साल बड़ी बहन अन्नपूर्णा के साथ वह दिल्ली में अपने आधिकारिक आवास के बरामदे में चाय की चुस्कियों के बीच बातचीत कर रहे थे, जब अन्नपूर्णा ने भाई के राष्ट्रपति बनने के बारे में भविष्यवाणी की थी।अन्नपूर्णा ने कहा कि मुखर्जी के आवास से राष्ट्रपति भवन दूर नहीं था और बरामदे से हम घोड़ों को ले जाने वाले रास्ते को देख सकते थे। हम घोड़ों की देखभाल करने वालों और उन्हें खिलाने-पिलाने वालों को देख सकते थे। अन्नपूर्णा ने कहा कि मुखर्जी ने कहा था कि जब मैं मरूंगा तो अगले जन्म में राष्ट्रपति का घोड़ा बन जाऊंगा। इसके बाद मैंने कहा, राष्ट्रपति का घोड़ा क्यों बनोगे, तुम इसी जीवन में राष्ट्रपति बनोगे।आज उनकी बहन खुश हैं कि उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई, लेकिन वह इस बात से दुखी भी हैं कि नई दिल्ली में होने वाले मुखर्जी के शपथ-ग्रहण समारोह में वह नहीं जा पाएंगी, क्योंकि अधिक उम्र की वजह से उन्हें जाने-आने में परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि बचपन में मुखर्जी बहुत नटखट थे। वह मुझसे रुकने के लिए कहता और मुझे उसके लिए खड़ा होना पड़ता, यदि मैं आगे बढ़ जाती तो वह मेरे बाल खींचकर मुझसे कहता, क्या मैंने रुकने के लिए नहीं कहा था।शपथ-ग्रहण समारोह में नहीं शरीक हो पाने पर दुख जताते हुए उन्होंने कहा कि मैं उसे राष्ट्रपति पद की शपथ लेते हुए अपनी आंखों से नहीं देख पाऊंगी, इससे मैं थोड़ी दुखी हूं।
Thursday, July 19, 2012
راجیش کھنہ کی یادیں اور باتیں
بھارتی فلموں کی سو سالہ تاریخ کے پہلے سپر اسٹار،راجیش کھنہ کی زندگی کی پہیلی آج سدا کے لئے حل ہوگئی۔ وہ واقعی خاموشیاں چن کر سپنوں کی دنیا سے بھی آگے نکل گئے۔آج انہوں نے اس دنیا سے منہ موڑ لیا اور اپنے لاکھوں چاہنے والوں کو سوگوار کر گئے۔بالی وڈ کو حقیقی سپر اسٹار کا تصور دینے والے راجیش جنھیں پیار سے ’کاکا‘ کہا جاتا تھا، ان کی ذاتی زندگی بھی کسی فلم ہی کی طرح نشیب و فراز سے پر رہی۔خوبصورت ،نرم گفتار، دھیمی اور دلکش شخصیت کے مالک راجیش کھنہ نے فلم نگری میں قدم کیا رکھا ،اچھے اچھے رومنیٹک ہیروز کی سمجھو چھٹی ہی کرا دی۔ ان کے سحر میں گرفتار پرستار خواتین ان کی ایک جھلک دیکھنے کو پاگل ہوئی جاتی تھیں۔دوستوں کو مہنگے تحائف دینا ا ±ن کی عادت تھی ....آواز کی دنیا میں راج کرنےوالی آشابھونسلے کے بقول ”ان کی پرستار ہرعمر کی خواتین خواہ شادی شدہ ہوں یا غیر شادی شدہ راجیش کھنہ کو جنون کی حد چاہتی تھیں اور ان کی تصویر اپنے پرس میں رکھا کرتی تھیں۔۔ انہیں خون سے خط بھی لکھے جاتے۔۔ تو ان کی تصویر سے بیاہ بھی رچا یا جاتا۔ خود اپنی ہی انگلی کو کاٹ کر راجیش کھنہ کے نام پر خون سے مانگ بھی خود ہی بھر لی جاتی۔ غرض کہ راجیش کھنہ کی پسندیدگی مانو کسی ’وائرس‘ کی طرح سب کو اپنی لپیٹ میں لئے ہوئے تھی۔ا ±ن کی شائقین راجیش کی تصویر اپنے پرس میں رکھا کرتی تھیں ...
.انگنت کامیاب فلموں کے مصنف اور راجیش کھنہ کے پڑوسی سلیم کے مطابق ”راجیش کھنہ بنیادی طور پر بہت شرمیلے تھے۔ وہ اپنے جذبات کا کھل کر اظہار بھی نہیں کرپاتے تھے۔ یہ وہ بات ہے جو راجیش کھنہ جیسے سپر اسٹار کے بارے میں کوئی سوچ بھی نہیں سکتا لیکن وہ حقیقی زندگی میں ایسے ہی تھے۔ وہ بہت سخی اور کھلے دل کے بھی تھے۔ دوستوں کو مہنگے مہنگے تحائف دینا ان کی عادت تھی۔“بادشاہوں جیسی زندگی گزارنے والے راجیش کھنہ بہت حساس دل کے مالک تھے اور اس کا اعتراف ان کے قریبی حلقے میں شامل ہر شخص کرتا ہے۔ وہ اپنی ذات سے کسی کو تکلیف دینے کا سوچ بھی نہیں سکتے تھے۔’ٹائمز آف انڈیا‘ سے وابستہ ایک صحافی شروتی پنڈت کا کہنا ہے ”’ایک بارمیں نے راجیش کھنہ سے ملاقات کی اور ان کی زندگی پر کتاب لکھنے کا ارادہ ظاہر کیا جسے سن کر وہ مخصوص نرم مسکراہٹ کے ساتھ بولے کہ وہ اپنے اوپرٍ کتاب نہیں لکھوانا چاہتے۔ ان کا کہنا تھا کہ جھوٹ وہ بول نہیں سکتے اور اگر انہوں نے سب سچ سچ کہا تو کئی لوگوں کے دل کو ٹھیس پہنچنے گی اور وہ اپنی وجہ سے کسی کو تکلیف نہیں دینا چاہتے۔‘وہ ایک حساس دل کے مالک تھے ...سلور اسکرین سے لاکھوں دلوں کی دھڑکن بننے والے راجیش کھنہ کی نجی زندگی میں محبت کا گزر نہ ہو یہ ممکن ہی نہیں تھا۔انہوں نے بھی طوفانی انداز کا عشق کیا۔عمر میں اپنے سے پندرہ سال چھوٹی ڈمپل کپاڈیہ سے۔ ڈمپل کی عمر ا س وقت سولہ سال تھی اور ان کی پہلی فلم ’بابی‘ بھی اس وقت تک ریلیز نہیں ہوئی تھی۔اس محبت کا انجام شادی پر ہوا جو گیارہ سال چلی۔ اس کے بعد دونوں کے راستے جدا ہو گئے۔ ڈمپل کے بعدر اجیش کھنہ کا نام کبھی ٹینا مینم تو کبھی کسی اور لڑکی کے ساتھ جڑا۔لیکن شایدسچی محبت انہوں نے بھی ڈمپل ہی سے کی تھی۔ عمر کی شام تک آتے آتے راجیش کھنہ تنہائی اور اکیلے پن کا شکار ہوتے چلے گئے۔گو کہ وہ جہاں اورجس محفل میں بھی جاتے ان کی پذیرائی والہانہ انداز میں ہی کی جاتی لیکن پھر بھی گزرتے وقت نے بہت کچھ تبدیل کردیا تھا۔راجیش کھنہ کی بیماری میں ان کی پہلی محبت یعنی ڈمپل ایک بار پھر ان کی زندگی میں لوٹ آئیں اور ان کا بھرپور خیال رکھا۔ ان کی دو بیٹیوں ٹونئکل اور رنکل کھنہ کی موجودگی نے ان کو ایک با ر پھر بیماری سے لڑنے کی طاقت دی اور خاندان کا سکھ ان کے لئے خوشی کا باعث بھی بنا۔راجیش کھنہ اپنی فیملی کے بارے میں بات کرتے ہوئے کہتے تھے۔’ میں مطمئن ہو ں کہ میری دونوں بیٹیوں کی شادیاں بہت اچھی جگہ ہوئیں اوروہ خوش ہیں۔ میرے دونوں ہی داماد بہت اچھے ہیں لیکن اکشے (اداکار اکشے کمار)سے میری زیادہ جمتی ہے۔ شاید اس لئے کہ وہ بھی میری طرح فلم انڈسٹری سے تعلق رکھتا ہے اور میری ہی طرح ہنس مکھ ہے‘۔اپنی جاندار اداکاری سے محبت کو حقیقت کے روپ میں ڈھالنے والا یہ شخص اپنے گھر’آشیرواد ‘ میں اپنے چاہنے والوں کے بیچ خاموشی سے دنیا چھوڑ گیا لیکن اس کا کام اسے امر کرنے کے لئے کافی ہے جو آنے والی کئی نسلوں کو بالکل اسی طرح حوصلہ دلاتا رہے گا جیسے اب تک کئی نسلوں کو کرتا آیا ہے۔
कामयाबी के शिखर पर
चंदा कोचर
आईसीआईसीआई बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबन्ध निदेशक चंदा कोचर भारत की सबसे शक्तिशाली कारोबारी महिला हैं.नवंबर 2011 में ‘फॉर्च्यून इंडिया’ पत्रिका ने 50 शक्तिशाली कारोबारी महिलाओं की सूची में उन्हें पहला स्थान दिया था.इसके अलावा उन्हें दुनिया के 50 सबसे प्रभावशाली लोगों में भी शामिल किया गया है.17 नवंबर 1961 को राजस्थान के जोधपुर शहर में पैदा होने वाली चंदा कोचर ने साल 1982 में मुंबई के जय हिंद कॉलेज से कला-स्नातक की डिग्री प्राप्त की.उसके बाद उन्होंने जमनालाल बजाज प्रबंधन संस्थान से प्रबंधन के क्षेत्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की. साल 1984 में बतौर प्रबंधन प्रशिक्षु आईसीआईसीआई में प्रवेश करने वाली चंदा कोचर आज बैंक में सबसे ऊंचे पायदान पर हैं.चंदा कोचर के ही नेतृत्व में आईसीआईसीआई बैंक ने जुलाई 2000 में खुदरा व्यापार शुरू किया.उनके नेतृत्व में आईसीआईसीआई ने चार वर्षों तक 'बेस्ट रिटेल' बैंक का अवार्ड जीता. साल 2010 में भारत सरकार ने उन्हें बैंकिंग क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया.
Monday, July 16, 2012
मेरी तरह न बनें भारतीय लड़कियां : पूनम पांडे
अतुल पटैरिया, नई दिल्ली। वाकई! भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां नारी पूज्यनीय है और प्रताड़ित भी की जाती है। यहां एक ओर महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं तो पैरों तले रोंदी भी जाती हैं। यहां की कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स जहां अंतरिक्ष की उड़ान भर देश का सीना चौड़ा करती हैं तो वहीं अनेक लड़कियां ऑनर किलिंग का शिकार हो जाती हैं। कई तो कोख में ही मार दी जाती हैं। कौन कहेगा कि हम डेवलपिंग कंट्री हैं? यह कहना है मॉडल-अभिनेत्री पूनम पांडेय का। जी हां, वही पूनम पांडेय जो अपनी बोल्डनेस के लिए जानी जाती हैं। वही पूनम पांडेय जो अपनी न्यूड तस्वीरों के लिए पहचानी जाती हैं। पूनम ने भारतीय लड़कियों को संदेश दिया है कि वे उनकी तरह न बनें। वह जो भी कर रही हैं या कर चुकी हैं, वह उनकी प्रोफेशनल मजबूरी है।
हम किस समाज में जी रहे हैं..
पूनम ने गुवाहाटी मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहा, हम यह कैसा विकास कर रहे हैं? हम अपने आप को तब तक डेवलपिंग कंट्री नहीं कह सकते हैं, जब तक कि हम महिलाओं को लेकर अपनी सोच का विकास नहीं कर लेते। गुवाहाटी में जो हुआ, सोनाली मुखर्जी मामले में जो हुआ, वह बेहद शर्मनाक है। खाप पंचायतों के फरमानों पर भी ध्यान दें। वे अब महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर भी प्रतिबंध लगा देने को आमादा हैं। अभी एक खाप पंचायत ने कहा कि महिलाएं मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें। आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं।
प्रॉब्लम लड़कियों की शॉर्ट ड्रेस में नहीं..
पूनम जब आप और शर्लिन चोपड़ा जैसी भारतीय महिलाएं अपनी न्यूड तस्वीरें सार्वजनिक कर सकती हैं, तो क्या यह आपको मिली आजादी नहीं? लोग कहते हैं कि आप जैसी महिलाएं समाज में लड़कियों के लिए मुसीबत का सबब बन रही हैं। इसी वजह से कुछ लोग मॉडर्न लड़कियों को गंदे नजरिए से देखते हैं? इस पर पूनम का कहना है, मामला लोगों की सोच का ही तो है। ये लोग हमेशा लड़कियों को कसौटी पर रखने में लगे रहे हैं। ये लोग महिला-पुरुष में समानता का नजरिया कभी नहीं रख सकते और ना ही ऐसा बर्दाश्त कर सकते हैं। महिलाओं के साथ हमेशा नाइंसाफी होती आई है और हो रही है। हमें अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक है, जैसा कि पुरुषों को है। आप उन पर इस तरह की पाबंदियां क्यों नहीं लगाते। क्यों हमेशा लड़कियों पर ही नियम-कानून-कायदे थोपे जाते हैं। इस सोच को बदलना होगा। लोगों ने लड़कियों पर तमाम पाबंदियां लगा रखी हैं कि शॉर्ट कपड़े मत पहने, यहां मत जाओ-वहां मत जाओ। प्रॉब्लम शॉर्ट कपड़ों में नहीं बल्कि पुरुषों की शॉर्ट सोच में है। ऐसे लोगों को समाज में जीने का हक नहीं है।
मर्द कुछ भी कर सकते हैं..
कुछ दिनों पहले मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा था कि लड़कियों को आजादी के नाम पर समाज की हदें पार नहीं करनी चाहिए, जैसा कि कुछ लड़कियां कर रही हैं। तस्लीमा ने यह टिप्पणी सन्नी लिओन को लेकर दी थी। तब विवाद उठा था कि आम लड़कियों के लिए लिओन जैसी लड़कियां क्या संदेश-सीख दे रही हैं? इस पर पूनम का कहना है कि वह तस्लीमा की इज्जत करती हैं, लेकिन समाज हमेशा से महिलाओं को ही कमजोर बनाता रहा है। महिलाओं की ही हर बात पर उसे आपत्ति होती है, जबकि मर्द कुछ भी करते रहें, किसी को कोई तकलीफ नहीं होती।
जो चाहें वो पहनें लड़कियां..
पूनम कहती हैं कि वे देश की तमाम लड़कियों को यही संदेश देना चाहती हैं कि गंदी सोच के सामने वे बिलकुल झुकें नहीं। पूनम ने कहा, मैं नई पीढ़ी की सभी लड़कियों से यही कहूंगी कि वे वे वही करें, जो वे करना चाहती हैं। खुल कर जिएं। बिकनी, शॉर्ट, स्कर्ट, जींस-टॉप या टी शर्ट, जो चाहें पहनें। आपकी आजादी कोई क्यों छीने। जो गंदे हैं, वे गंदे ही रहेंगे। उनकी गंदी सोच को बदलना होगा।
लेकिन मेरी तरह बनने की जरूरत नहीं..
मैं लड़कियों से यह भी कहना चाहूंगी कि वे खुलकर जिएं, लेकिन मुझे या मेरे जैसी किसी मॉडल को फॉलो न करें। मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मैं जो कर रही हूं, न्यूड फोटो या और भी कुछ, वह सब मेरी प्रोफेशनल मजबूरी है। मैं शो बिज में हूं और बहुत आगे बढ़ चुकी हूं। अब यही मेरा करियर और यही मेरी जिंदगी है। लेकिन आम लड़की इसका मतलब उस फ्रीडम से न जोड़े, जिसकी मैं पैरवी कर रही हूं।
क्या तुम्हारी बहन-बेटी नहीं है..
पूनम ने गुवाहाटी मामले में जमकर गुस्सा उतारते हुए कहा कि जिन 20 लोगों ने उस अकेली लड़की को सरे राह बेइज्जत किया, क्या उनकी कोई मां-बहन-बेटी नहीं है। जरूर होगी। लेकिन यही तो हमारा समाज है, जो अपने घर की लड़कियों के लिए कुछ और और दूसरे की लड़कियों के लिए कुछ और ही नजरिया रखता है।
तो मैं मर जाती..
मैं यह सोच कर कांप उठती हूं कि यदि मैं उस लड़की की जगह होती तो मैं कैसे जी पाती। मैं उस लड़की का दर्द समझ सकती हूं। बात कपड़े फाड़ देने भर की नहीं है बल्कि जो खौफनाक हादसा उसके साथ हुआ, वह किसी भी लड़की को तोड़ कर रख देगा। उसे जिंदगी भर एक भयंकर खौफ के साथ जीना पड़ेगा।
बदलेंगे हालात..
पूनम ने कहा कि लड़कियों को लेकर जो हालात हमारे यहां पहले थे, वह अब बदल रहे हैं। वक्त लगेगा, लेकिन एक दिन यह अंतर मिट जाएगा। मैं अपनी ही बात करूं तो मैं आज से पांच साल पहले के जो हालात थे, उनमें काफी अंतर पाती हूं। बड़े शहरों में लड़कियां खुल कर जीने लगी हैं। छोटे शहरों और गांवों में भी यह बदलाव आज नहीं तो कल जरूर होगा।
Sunday, July 15, 2012
سےلف ہےلف گروپ سے سنورتی زندگےاں۔۔۔
ہندوستان کی آبادی کا ایک بڑا حصہ اب بھی بینک اور دوسری مالی سہولیات سے محروم ہے. ایسے میں سےلف ہےلف گروپ لوگوں کی زندگی کو بہتر بنانے میں کافی مدد گار ثابت ہو رہے ہیں. ملک کے چھ لاکھ گاو ¿ں میں صرف تیس ہزار دیہاتوں میں بینکوں کی شاخیں ہیں. ملک کے صرف 40 فیصد لوگوں کے بینکوں میں اکاو ¿نٹ ہیں اور قریب تین چوتھائی کسان خاندانوں کومالیاتی خدمات کی ضرورت ہے. صرف دو فیصد لوگوں کے پاس بینک کے کریڈٹ کارڈ ہیں. ایسے میں لوگ اپنی چھوٹی موٹی ضروریات پوری کرنے کے لئے ساہوکاروں کے علاوہ کہاں جائیں؟ دراصل انہیں کہیں جانے کی ضرورت نہیں ہے. ضرورت ہے تو بس خود اور اپنے پاس پڑوس کو منظم کر کے سےلف ہےلف گروپ بنانے کی. سیلف ہیلپ گروپ نام کی اس منصوبہ بندی میں پہلے دس سے بیس لوگ اپنا ایک گروپ بناتے ہیں اور آپس میں چندہ جمع کر کے کچھ رقم جمع کرتے ہیں. پھر یہ لوگ اس رقم سے آپس میں قرض دیتے ہیں اور وصولتے ہیں. کئی تنظیمےں اس کام میں انہیں تربیت دیتے ہیں اور پھر قریب کے بینک سے جوڑ کر گروپ کا اکاو ¿نٹ کھلواتے ہیں. تمام خانہ پری ہونے کے بعد بینک ان کی کیش کریڈٹ لمٹ یا قرض ساکھ طے کر دیتے ہیں. پھر گروپ اس رقم سے آپس میں قرض باٹتا ہے. بینک کو قسط ادا کرنے کی ذمہ داری گروپ کی ہوتی ہے. رائے بریلی سے الہ آباد جانے والی سڑک سے تھوڑا ہٹ کر بےلا ٹکئی قریب تین ہزار کی آبادی والا گاو ¿ں ہے. راجیو گاندھی خواتےن ترقی منصوبہ کے کارکن نے بےلا ٹکئی گاو ¿ں میں کئی سےلف ہےلفگروپس بنوائے . سروج ان میں سے ایک گروپ کی صدر ہیں. ان کا کہنا ہے کہ منظم ہونے سے نہ صرف اقتصادی بلکہ سماجی فائدہ بھی ہوا. وہ بتاتی ہیں،’پہلی تبدیلی تو یہ آئی ہے کہ بولنے کی ہمت بڑھی ہے. ہمارا پردہ کم ہوا. ہر معلومات ملی. آج گروپ میں بیٹھ کر ہم اپنی پریشانی دور کر رہے ہیں. اگر ہمارا گروپ نہ ہوتا، تو ہم بھینس نہ پال پاتے اور کوئی دھندھا روزگار نہ کر پاتے، اور نہ بچوں کو پڑھا سکتے. گاو ¿ں کی ایک اور خاتون سنتوش کماری کا کہنا ہے کہ گروپ سے جڑنے سے نہ صرف انہیں ساہوکار کے چنگل سے نجات ملی بلکہ وہ اقتصادی طور پر خود کفیل بھی ہو گئیں.
سنتوش نے بتایا،’جب ہم گروپ میں نہیں جڑے تھے تو باہر سے دس فےصدماہانہ سود پر قرض لےتے تھے۔ جب ہم گروپ سے وابستہ ہوئے تو ہم نے دو فےصد ماہانہ شرح سود پر دس ہزار روپے کا قرض لیا اور اسے چکا دیا. پھر ہم گروپ سے 15 ہزار روپے قرض لے کر دکان چلانے لگے. دکان سے سارا خرچ نکلنے لگا اور پھر سلائی کا کام بھی شروع کر دیا۔ سروج اب دکان کے علاوہ گھر کے پاس سلائی سینٹر چلاتی ہیں. اس مرکز میں کئی خواتین سلائی سیکھ رہی ہیں. اس گاو ¿ں میں اس طرح کے کئی گروپ کو ملا کر درگا مہےلا گرام سنگٹھنبنا ہے اور پھر راہی بلاک کے قریب ساٹھ گرام پنچایتوں کے گروپ کو ملا کر شکتی مہےلا سنگٹھن بنا ہے. اس سے تقریبا چوبیس ہزار خواتین منسلک ہیں. یہ گروپ صرف آپس میں قرض لینے دینے کا کام نہیں کرتے، بلکہ یہ حکومت کی پنشن یا شمسی توانائی جیسی کئی ترقیاتی اسکیموں کا فائدہ بھی اپنے ارکان کو دلواتے ہیں. گاو ¿ں کے بینک آف بڑودا کے برانچ منیجر جے پی گپتا اپنے علاقے میں سےلف ہےلف گروپ کے کام کاج سے خوش ہیں، خاص طور اس لئے کہ یہ گروپ بینک کا قرض وقت پر واپس کرتے ہیں. بینک ان گروپوں کو دس فیصد سالانہ پر قرض دیتا ہے، جب کہ گروپ آپس میں چوبیس فیصد سود لیتے ہیں. جو بچت ہوتی ہے اس سے گروپ کا سرمایہ بڑھتا ہے اور وہ گروپ کے ہی کام آتا ہے. رائے بریلی اور آس پاس کے علاقے میں سےلف ہےلف گروپ بنوانے میں راجیو گاندھی چےرٹبل ٹرسٹ کا بڑا تعاون رہا ہے. یہ ٹرسٹ راجیو گاندھی خاتون ترقی منصوبے کے ذریعے سے نابارڈ کے ساتھ مل کر خواتین کو اپنا گروپ بنانے اور انہیں چلانے کی تربیت دیتا ہے. ٹرسٹ کے ایگزیکٹو ایک آئی اے ایس افسر سمپت کمار ہیں، جنہیں آندھرا پردیش اور میگھالیہ میں اس طرح کے کام کے تجربہ کی وجہ سے یہاں لایا گیا ہے. سمپت کمار سے مل کر نہیں لگتا کہ وہ ایک سینئر آئی اے ایس افسر ہیں، بلکہ وہ ایک سماجی کارکن کی طرح کام کرتے ہیں. سمپت کمار کے مطابق ٹرسٹ کے ذریعے اتر پردیش کے چالیس علاقہ میں تقریبا پینتیس ہزار گروپ بنائے جا چکے ہیں، جو خواتین کو ان کے گاو ¿ں میں ہی خود کفےل بناکر انہیں اقتصادی طور پر خود کفیل بنا رہے ہیں.
Friday, July 13, 2012
Wednesday, July 11, 2012
गांधी बने रसोइया..
वैसे तो भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी की पहचान सत्य और अहिंसा की राह पर चलने वाले देशभक्त की है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गांधी को ‘लाजवाब’ पारंपरिक भारतीय खाना बनाने वाले के रूप में भी याद किया जाता है?दरअसल भारत में स्वतंत्रता आंदोलन का बिगुल फूंकने से पहले गांधी दक्षिण अफ्रीका के जोहानसबर्ग में अपने मित्र हरमन कालेनबाख के साथ रहा करते थे.महात्मा गांधी के भारत चले आने के बाद दोनों मित्रों ने एक दूसरे को कई पत्र भी लिखे जिन्हें हाल ही में लंदन के एक नीलामघर सदबीस ने नीलाम करना था लेकिन अब रिपोर्टों के अनुसार इन्हें भारत सरकार ने खरीद लिया है.दक्षिण अफ्रीका में स्थित घर में जहां महात्मा गांधी और कालेनबाख रहते थे, उसका नाम सत्याग्रह हाऊस आंदोलन से प्रेरित था.गांधी और कालेनबाख के जीवन की यादों की एक झलक पाने के लिए बीबीसी संवाददाता मिलटन एनकोसी ‘सत्याग्रह हाऊस’ गए दक्षिण अफ्रीका के जोहानसबर्ग में स्थित सत्याग्रह हाऊस को जाने-माने वास्तुकार हरमन कालेनबाख ने बनाया था, जो कि बाद में महात्मा गांधी के मित्र बने और उनके साथ इसी घर में रहे. अब ये घर एक संग्रहालय और यात्री निवास स्थल में तब्दील हो चुका है.हरमन कालेनबाख से दो पीढ़ी छोटे उनके रिश्तेदार ऐलन लिपमैन बिल्कुल हरमन जैसे ही दिखते हैं.अपने युवा काल में रंगभेद के खिलाफ काम करने वाले कार्यकर्ता ऐलन लिपमैन को महात्मा गांधी से प्रेरणा मिली थी.उन्होंने कहा, “हरमन कालेनबाख मुझे काफी प्रभावित करते थे. मैं एक वास्तुकार बना क्योंकि वो एक वास्तुकार थे. उनकी ही तरह मैं भी एक सक्रीय सामाजिक कार्यकर्ता बना जिस वजह से दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने मुझे 27 साल के लिए निर्वासित कर दिया.लिपमैन कहते है कि जब महात्मा गांधी और कालेनबाख साथ रहते थे तो कालेनबाख गांधी के लिए खाना भी पकाया करते थे.लिपमैन ने कहा, “जब शुरू-शुरू में दोनों मित्र साथ रहते थे तो कालेनबाख खाना पकाया करते थे. उस खाने का जायका गांधी को बिलकुल नहीं पसंद था. इसलिए उन्होंने एक दिन कालेनबाख से कहा कि वो घर साफ करें और गांधी खाना पकाने का काम अपने जिम्मे ले रहे हैं. तो गांधी बन गए सत्याग्रह हाऊस का रसोइया....गांधी भारतीय खाना अच्छा बनाते थे जो सबको पसंद आता था. उन्हें पारंपरिक जीवन जीना बेहद पसंद था.गांधी पहली बार दक्षिण अफ्रीका में साल 1896 में आए और अगले 21 वर्षों तक वही उनका निवास रहा. कालेनबाख और गाधी के बीच लिखे गए कई पत्र इसी जगह लिखे गए हो सकते हैं.गांधी और कालेनबाख के इस घर की सैर कराने वाले गाइड बताते है कि 19वीं शताब्दी में वहां के समाज पर रंगभेद बुरी तरह हावी था.सत्याग्रह हाऊस के संग्रहालय की देखरेख करने वाली डिथेबे मेलाटो चाहती हैं कि ज्यादा से ज्यादा दक्षिण अफ्रीकी युवा संग्रहालय में आए.उन्होंने कहा, “मैं यहां पर युवाओं को आते देखना चाहती हूं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग गांधी के बारे में जान पाएँ और अपना जीवन सीधा और सरल बना पाएँ.
Tuesday, July 10, 2012
‘लिव इन रिलेशनशिप’
विदेशों से चली प्रथा ‘लिव इन रिलेशनशिप’ धीरे-धीरे भारतीय सभ्यता में सिक्का जमा रही है। ‘इसे’ कुछ लोग प्रथा तो कुछ लोग कुप्रथा कहते आए हैं। रायपुर थाना क्षेत्र के नथुआवाला में विधवा महिला व एक कम उम्र का लड़का लिव इन रिलेशनशिप में साथ रह रहे हैं। गांव के लोगों के विरोध पर ये लोग दबंगईता पर उतारू हैं। पिछले दिनों इसको लेकर गांव में बखेड़ा खड़ा हुआ। पुलिस जांच के लिए पहुंची तो महिला के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाला लड़का फरार हो गया। विधवा महिला के अपने बेटे की उम्र के लड़के से लिव इन रिलेशनशिप को लेकर नथुआवाला में माहौल गरमाया हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार किसी भी सूरत में चली आ रही भारतीय सामाजिक व्यवस्था को ठेस नहीं पहुंचने दी जाएगी। नथुआवाला के प्राथमिक विद्यालय के करीब रहने वाली एक 48 वर्षीय महिला के पति का दो माह पहले देहांत हो गया। परिवार में महिला व उसकी 17 साल की बेटी व 18 साल का बेटा ही हैं। करीब पन्द्रह दिनों से एक 28 वर्षीय लड़का महिला के घर में आकर रहने लगा। बच्चों ने मां की हरकतों का विरोध किया तो लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे युवक ने बच्चों की पिटाई कर दी। बच्चों ने गांव के लोगों को यह बात बताई। बच्चों के अनुसार मां व उस लड़के ने हालांकि विवाह नहीं किया है, मगर लिव इन रिलेशनशिप में साथ घर पर रह रहे हैं। गांववालों के अनुसार लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाला लड़का इससे पहले गांव की ही पांच लड़कियों को बहला फुसलाकर भगा चुका है। बाद में पुलिस ने सभी को बरामद कर लिया था। लड़के की गतिविधियोें को भी गांव वाले संदिग्ध मानकर चल रहे हैं। उसके मूल रहने का स्थान न तो महिला और न ही दूसरों को मालूम है। दो रोज पहले गांव के लोगों ने एक राय होकर इसका विरोध किया, तो घर के बाहर हंगामा हो गया। रायपुर पुलिस के मौके पर पहुंचने तक लड़का भाग निकला था। रायपुर पुलिस के अनुसार वहां हर स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
Friday, July 6, 2012
अगर न होती ये छुईमुई तो उस दिन कट जाती भारत की नाक
हिसार. हिसार की हॉकी स्टार पूनम मलिक की स्टिक का जादू एक बार देखने को मिला है। मलेशिया में जारी जूनियर एशिया कप के सेमीफाइनल मुकाबले में पूनम के गोल्डन गोल से इंडिया टीम ने फाइनल में जगह बना ली। गुरुवार को खेले गए इस मुकाबले में इंडियन टीम का सामना जापान की टीम के साथ था। मैच के अंत तक दोनों टीमें गोल बनाने में असफल रही। इसलिए मुकाबले के निर्णय लिए मैच को 15 मिनट का अतिरिक्त समय देना पड़ा। टीम की उप कप्तान और हिसार की पूनम ने इस समय का पूरा फायदा उठाया और गोल्डन गोल करते हुए टीम को फाइनल में पहुंचा दिया। इस प्रतियोगिता का फाइनल मुकाबला शनिवार को खेला जाएगा। गांव उमरा के एक साधारण से किसान परिवार में पली बढ़ी पूनम ने वर्ष 2003 में अपने खेल कैरियर की शुरुआत गांव के ही हॉकी मैदान से की थी।
Monday, July 2, 2012
जादूगर अब बन जाएगा इतिहास
अहमदाबाद। पूरी दुनिया को अपनी जादूगरी से हैरान कर देने वाले और विश्व प्रख्यात जादूगर के. लाल अब अपने जीवन का अंतिम शो करने जा रहे हैं। आपको बताते चलें कि सम्मोहन और जादूगरी की कला से लोगों को अपने वश में कर लेने वाले के. लाल मूल गुजराती हैं और उनका पूरा नाम कांतिलाल गिरधारीलाल वोरा है। 80 वर्षीय के. लाल पिछले 61 वर्षो से जादूगरी के अजब-गजब खेल दिखाते आ रहे हैं। वे अब तक 22,400 शो कर चुके हैं।इन दिनों के. लाल का एक शो अहमदाबाद स्थित एच.के हॉल में चल रहा है। इसके बाद वे अपना आखिरी शो उत्तर प्रदेश में करेंगे। उन्होंने अपनी निवृत्ति की बात का समर्थन करते हुए कहा ‘मैं अब 80 साल का हो चुका हूं, इसलिए अब मैं रिटायरमेंट लेना चाहता हूं। उत्तर प्रदेश मंे मैं अपना आखिरी शो करूंगा।’के. लाल का जन्म जनवरी 1924 में गुजरात के राजकोट शहर के पास बगसरा में हुआ था। उन्होंने 7 वर्ष की उम्र से ही जादूगरी की टिप्स सीखना शुरू कर दी थीं। बॉलीवुड के शो मैन यानी की राज कपूर ने भी एक बार उनकी तारीफ करते हुए कहा था ‘अगर के. लाल के ब्लड सैंपल की जांच की जाए तो उसमें भी कोई न कोई जादू ही दिखाई देगा।’ के. लाल देश और दुनिया में अब तक 22, 400 शो कर चुके हैं, जो एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है।अहमदाबाद के एच.के हॉल में 29 जून से उनका शो शुरू हुआ था, जो 1 जुलाई को शाम 7 बजे समाप्त हुआ। हालांकि उनके 60 वर्षीय पुत्र हसुभाई (जूनियर के. लाल) अपने पिता की विरासत को संभाले हुए हैं और जादू के खेल दिखा रहे हैं। कई दशकों से पूरी दुनिया को अपने अजीबो-गरीब करामात से अवाक करते रहने वाला यह जादूगर अगले महीने उत्तर प्रदेश में आखिरी शो करने के बाद इतिहास बन जाएगा।
Sunday, July 1, 2012
کون بنےگا یورپ کا بادشاہ؟
جس وقت ےہ اخبار آپ کے ہاتھوں مےں ہوگا اس وقت ےہ طے ہوچکا ہوگا کہ ےورو کپ 2012کا فاتح کون بنا ۔ےعنی کہ اس وقت تک ےہ طے ہوچکا ہوگا کہ دنےائے فٹبال کا کو ن ہے ’شہنشاہ‘۔لےکن ےہ بھی جاننا کم دلچسپ نہےں کہ قسمت کے دھنی عالمی فاتح اور گزشتہ چمپئن اسپین اور جرا ¿ت کی علامت اٹلی اتوار کو جب اولمپک اسٹیڈیم میں یورو کپ فٹ بال ٹورنامنٹ کے خطابی مقابلہ مےں آمنے سامنے تھے تو دونوں کی ہی نظریں تاریخ بنانے پر لگی تھےں۔ دنیا کی نمبر ایک ٹیم اسپین نے سیمی فائنل میں پرتگال کو پنالٹی شوٹ آو ¿ٹ میں 4-2 سے شکست دے کر اور دنیا کی 12 ویں نمبر کی ٹیم اٹلی نے الٹ پھےر کرتے ہوئے جرمنی کو 2-1 سے شکست دے کر خطابی مقابلے میں جگہ بنائی تھی۔ فائنل میں اب قسمت اور ہمت کے درمیان کا مقابلہتھا۔ اسپین اور اٹلی کی ٹیمیں فائنل میں تاریخ بنانے کی دہلےز پر کھڑیتھےں۔ اگرا سپیننے خطاب پر قبضہ کےا تو وہ جرمنی کے تین یورو خطاب جےتنے کے رےکارڈ کی برابری کر لے گا۔ اسپین نے اس سے پہلے 1964 اور 2008 میں یورو خطاب جےتے تھے۔ اسپین 1984 کے یورو فائنل میں میزبان فرانس سے ہارگےاتھا۔ اٹلی کی پچھلی واحد یورو کامیابی 1968 میں رہی تھی۔ تب وہ میزبان تھا اور اس نے فائنل میں یوگوسلاویہ کو ہراےا تھا۔ اٹلی سال 2000 میں فرانس سے اضافی وقت میں گولڈن گول کے ذریعے 1-2 سے ہار کر رنراپ رہا تھا۔ا سپین اور اٹلی کا اس ٹورنامنٹ کے گروپ مرحلے میں مقابلہ 1-1 کی برابری پر چھوٹا تھا۔
ےہی سبب ہے کہ اقتصادی بحران سے دو چار یورو زون کے ےہ دو مممالک اٹلی اورا سپین مےں سے جو بھی فاتح ہوااس ملک کے لوگوں کو کچھ دنوں کے لئے بیل آو ¿ٹ پیکج اور اقتصادی اصلاحات کی باتوں سے دور ہو کر جشن منانے کا موقع ملے گا جبکہ ہارنے والے ملک کے لوگوں کے زخموں پر تھوڑا سا نمک اور گر جائے گا۔ ٹورنامنٹ کی کارکردگی کو دیکھتے ہوئے اس وقت اٹلی خطاب کامضبوط دعویدار نظر آ رہا ہے جبکہ موجودہ یورپی اور عالمی چمپئن ہسپانوی ٹیم کی کارکردگی دےکھناابھی باقی ہے۔ دونوں ٹیمیں گروپ سطح کے مقابلے میں ایک بار مدمقابل ہوچکی ہےں اور وہ مقابلہ 1-1 کی برابری پر رہا تھا۔ ایسے میں دونوں ٹیموں کے درمیان ایک دلچسپ مقابلے کی امید ہے۔ا سپین نے اس ٹورنامنٹ پر اب تک دو بار قبضہ کیا ہے۔ اس نے پہلی بار 1964 میں جبکہ دوسری بار 2008 میں اس ٹورنامنٹ کو اپنے نام کیا تھا۔ اٹلی نے اس ٹورنامنٹ کو ایک بار اپنے نام کیا ہے۔ 1968 میں اٹلی نے اس باوقار ٹورنامنٹ کو جیتا تھا۔ اٹلی کی ٹیم 2000 میں نائب فاتح رہی تھی۔ ایسے میں 12 سال بعد اٹلی کی ٹیم فائنل میں پہنچی ہے اور اس کی نظر44 سال کے خطابی خشک سالی کو ختم کرنے پر ہوگی۔
اٹلی کا فائنل تک کاسفر نااےک ناٹک کی طرح رہا۔ ماریو بالوٹےلی کے دم پر سیمی فائنل میں جرمنی کو 2-1 سے شکست دینے کے بعد لگتا ہے کہ اجوری صحیح وقت پر فارم میں لوٹ آئے ہیں۔ موجودہ عالمی اور یورپی چمپئن اسپین مسلسل تین اہم ٹورنامنٹ جیتنے والی پہلی ٹیم بننے کی دہلےز پر ہے۔ پرتگال کے خلاف سیمی فائنل میں پنالٹی شوٹ آو ¿ٹ کی جیت کے دوران حالانکہ اس کی ٹیم نے امےدوں کے مطابق مظاہرہ نہیں کےالےکن شروع سے ہی خطاب کے مضبوط دعوےدار رہے اسپین نے کوارٹر فائنل میں فرانس کے خلاف 2-0 کی جیت میں دبدبہ قائم رکھا تھا، لیکن پرتگال کے خلاف وہ اس طرح کا مظاہرہ نہیں کر پایا۔ اس کے برعکس جس اٹلی کو ٹورنامنٹ سے پہلے خطاب کے مضبوط دعویداروں میں نہیں شمار کیا جا رہا تھا، اس نے انگلینڈ اور پھر جرمنی کو باہر کا راستہ دکھایا اور اب وہ دوسری بار یورپی چمپئن بننے سے صرف ایک قدم دور ہے۔
انسانیت کا ثبوت۔۔۔
کوئی چار سال پہلے دھماکوں میں خاندان کے سربراہ کی موت کے بعد اس خاندان میں یہ جشن کا موقع آیا تو اپنوں کے ساتھ سماج کے بہت لوگ ساتھ کھڑے نظر آئے۔جے پور میں 2008 میں ہوئے سلسلہ وار دھماکوں نے 60 سے زیادہ لوگوں کی جان لے لی تھی۔ ان میں تاراچند شرما بھی تھے۔ جمعہ کی رات تاراچند کی بیٹی شوانی کی شادی ہوئی، تو دعائیں دینے کے لیے کئی سرکردہ لوگ پہنچے جن میں فلم اداکار سنجے دت بھی تھے۔ شادی کے منگل گیت اور شہنائی کی دھن نے فضا میں جشن کا احساس بھرا تو دھماکوں کادرد جھیل چکے اس خاندان میں خوشیاں لوٹ آئیں۔ تاراچند تو اس دنیا میں نہیں ہےں، لیکن شوانی کی شادی کے لئے سماج خود کھڑا ہو گیا۔ پنجابیمہا سبھانے اپنے ہاتھوں سے اس شادی کا انتظام کیا اور اپنے جذبے سے ماحول کی روحانےتکو اور بھی پاکےزہ کر دیا۔
پنجابی مہا سبھاکے روی نےئراس شادی میں ایسے مشغول تھے جیسے ان کی اپنی بیٹی رشتوں کی ڈور میں بندھ رہی ہو۔ ایک - ایک مہمان کی مہمان نوازی میں لگے نےئر بتانے لگے کہ دھماکوں کے بعد انہیں میڈیا سے پتہ لگا کہ تاراچند کے خاندان کے سامنے تین بیٹیوں کے شادی کا مسئلہ کھڑا ہو گیا ہے۔ وہ کہتے ہیں،’ اس دکھ کی گھڑی میں جب ہم غمزدہ خاندان میں پہنچے تو منہ سے یہ ہی نکلا، آپ فکر نہ کریں بیٹیوں کی شادی دھوم سے ہوگی، نہ جانے کیسے طاقت اور وسائل ملے، ایک ایک کر تینوں بیٹیوں کی شادی ہو گئی‘۔ کبھی فلم اداکار مرحوم سنیل دت جے پور سے ہی سدبھاو ¿نا کے سپاہی بن کر نکلے تھے لیکن اب ان کے بیٹے سنجے دت جمعہ کو ایک فلم کی شوٹنگ کے سلسلے میں جے پور میں تھے۔ موقع ملا تو شوانی کو دعائیں دینے کے لیے چلے آئے۔ کہنے لگے کہ وہ شوانی اور جےتندر کو دعائیں دینے کے لیے آئے ہیں۔ سنجے دت کہتے ہیں،’ پنجابی مہا سبھا نے اس بارے میں بتایا تو چلا آیا، پنجابی دل کے بڑے اچھے ہوتے ہیں۔ میں اپنے والد کے ادھورے کام پورے کرنا چاہتا ہوں‘۔ اپنی شادی سے شوانی خوش تھیں لیکن پوچھا تو دلہن بنی شوانی کچھ بول نہیں پائیں۔ البتہ دولہے راجہ جےتندر نے کہا کہ وہ سماج کے اس جذبے سے بہت خوش ہیں۔
دراصل شوانی اسی گھر میں دلہن بن کر گئی ہیں جہاں دو بہنےں ان دھماکوں کے بعد بہو بن کر گئی تھیں۔ شوانی کے بہنوئی ونود کہتے ہیں،’ سماج نے یہ بہت نیک کام کیا ہے۔ ہمارے گھر میں تاراچند جی کے خاندان سے یہ تیسری بہو ہوگی‘۔ اس جشن میں سماجی شرکت کا دائرہ بڑا تھا تو سوال بھی بڑا تھا۔ ہر کوئی اس فرق کو نمایاں کر رہا تھا کہ ایک وہ ہاتھ تھے جو دھماکوں میں انسانیت کو لہولہان کر گئے، ایک یہ ہاتھ ہے جو انسان کی خوشی کے لئے بڑھے اور دعا کے لئے اٹھے۔
پاس ورڈ کی فکر
پروفےشنلس کے لئے خصوصی طور پر بنائی گئی سوشل نےٹورکنگ سائٹ لنکڈن کے 65 لاکھ صارفین کے پاس ورڈ چوری ہونے کی خبر نے اطلاع ٹیکنالوجی کی دنیا کو حیران کر دیا. اس معاملے میں لنکڈن امریکی جانچ ایجنسی ایف بی آئی کا تعاون لے رہی ہے. جانچ کا نتیجہ کچھ بھی آئے، لیکن لنکڈن جیسی مشہور آئی ٹی کمپنی کے صارفین کے پاس ورڈ چوری ہونے کی خبر فکر کا سبب ہے. کمپنی کا دعوی ہے کہ ہےکرس نے صرف پاس ورڈ کی فہرست جاری کی ہے اور ابھی یہ طے نہیں ہے کہ ان کے پاس پاس ورڈ ہیں بھی یا نہیں. لنکڈن نے اپنے تمام صارفین سے فوراً پاس ورڈ تبدیل کرنے کے لئے بھی کہا ہے، لیکن اس میں کوئی شک نہیں ہے کہ ہےکرس نے منصوبہ بند طریقہ سے اس حملے کو انجام دیا. ہےکرس نے پہلے یوزرس کے ڈیٹا کو محفوظ رکھنے کے لئے انکرپشن کوڈ کو توڑا اور پھر پاس ورڈ کی فہرست ایک روس کی ویب سائٹ پر جاری کر دی. لنکڈن کے پاس ورڈ چوری ہونے کے انکشاف کے بعد کئی دوسری بڑی کمپنیوں نے بھی مانا کہ ان کے صارفین کے پاس ورڈ بھی چوری کئے گئے ہیں. امریکہ کی مشہور ڈیٹنگ ویب سائٹ ایہارمانی اور برطانیہ کی موسیقی سائٹ لاسٹم اےف اےم ڈاٹ کام ان میں شامل ہیں. ایہارمانی کے تقریباً 15 لاکھ صارفین کے پاس ورڈ چوری ہونے کا خدشہ ہے. اس سال کے آغاز میں رےمنٹ نامی کمپیوٹر مالویر کے حملے میں 45 ہزار فیس بک صارفین کے پاس ورڈ چوری ہو گئے تھے، جب کہ نومبر 2011 میں منظم غیر متعلقہ حملے کی وجہ سے فیس بک کے 60 لاکھ سے زیادہ لوگ متاثر ہوئے تھے. اس وقت حملے کے بعد اچانک لاکھوں لوگوں کی نیوزفیڈ اور وال پر فحش اور بھدی تصاویر نظر آنے لگی تھیں. فیس بک کے مطابق کہ ہر دن 6 لاکھ بار اس کے اکاو ¿نٹس کو ہیک کرنے کی کوشش کی جاتی ہے. یہ الگ بات ہے کہ حملے کامیاب نہیں ہوتے. پاس ورڈ چوری ہونا کوئی معمولی بات نہیں ہے. خاص طور کلاﺅڈ کمپیوٹنگ کے دور میں جب لوگ عموماً کمپیوٹر، موبائل اور دوسرے آلات کو ایک ہی پاس ورڈ کے ذریعے آپس میں جوڑے رکھتے ہیں. فیس بک - ٹویٹر وغیرہ سوشل نےٹورکنگ سائٹ کے پاس ورڈ چوری ہونے کے بعد ان کا استعمال فشنگ یعنی آن لائن جعل سازی کے لئے کیا جا سکتا ہے. افواہیں پھیلانے کے لئے کیا جا سکتا ہے. پاس ورڈ چوری ہونے کے بعد کریڈٹ کارڈ اور ڈیبٹ کارڈ جیسی معلومات لیک ہونے پر تو شدید گڑبڑجھالا ہو سکتا ہے. پاس ورڈ سے متعلق ایک بڑا مسئلہ اور فکر بے حد آسان پاس ورڈ رکھنے کا رواج کی ہے. اس کی وجہ سے عموماً پاس ورڈ چوری آسان ہو جاتی ہے. آج صرف ایک چھوٹی سی غلطی آپ کا آن لائن وجود بحران میں ڈال سکتی ہے. وجہ یہ کہ لوگ عموما ًزیادہ اکاو ¿نٹس کا پاسورڈ ایک رکھتے ہیں تاکہ یاد رکھنے میں آسانی ہو. ایک سائٹ کا پاس ورڈ چوری ہونے کی حالت میں ہےکرس چاہیں تو آپ کا آن لائن وجود ہی ختم کر سکتے ہیں. دوسری بڑی فکر آئی ٹی کمپنیوں کے سیکورٹی انتظامات کی ہے. آخر فیس بک - لنکڈن اور رپورٹیں جیسی دنیا کی سب سے بڑی کمپنیوں کے یوزرس کا ڈیٹا کس طرح چوری ہو جاتا ہے؟ ایسا نہیں ہے کہ ان کمپنیوں نے حفاظتی انتظامات نہیں کئے، لیکن ہےکرس دو قدم آگے ہیں. ہےکرس اور کمپنیوں کے درمیان جنگ جاری ہے، لیکن داﺅں پر صارفین کی قسمت ہے. یوزرس کو یہ بات سمجھ میں آنی چاہیے. پاس ورڈ سلامتی سب سے اوپر ہے. بھارت کے حوالے سے بھی یہ سوال اتنا ہی اہم ہے کیونکہ یہاں بھی سوشل سائیٹس کا استعمال کرنے والے لوگوں کی تعداد تیزی سے بڑھ رہی ہے. لنکڈن کی ہی بات کریں تو امریکہ کے بعد سب سے زیادہ صارفین بھارت میں ہیں. گزشتہ تین سال میں لنکڈن کے صارفین بھارت میں 300 فیصد بڑھے ہیں. ابھی تقریبا ً1 کروڑ 40 لاکھ لوگ اس سائٹ کا استعمال کر رہے ہیں. فیس بک کے بھارت میں تقریبا ًساڑھے پانچ کروڑ یوزرس ہے. یہ اعداد و شمار انٹرنیٹ آبادی کے لحاظ سے بہت زیادہ ہے.
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