Saturday, March 31, 2012
'ब्लड मनी'
ब्लड मनी कहानी है कुणाल की जो कि कम उम्र में अनाथ हो गया था। पार्ट टाइम जॉब कर उसने अपने कॉलेज की फीस भरी और एमबीए किया। विदेश जाकर खूब पैसे कमाने की उसकी चाहत है।दक्षिण अफ्रीका स्थित ट्रिनीटी डायमंड्स कंपनी में उसे नौकरी मिल जाती है। छ: अंकों में सैलेरी, कार, शानदार बंगला और केपटाउन में काम करने का मौका। कुणाल की तो लॉटरी लग जाती है।जब यह बात वह अपनी गर्लफ्रेड आरजू को बताता है तो वह उसके साथ वहां जाने में हिचकती है। कुणाल उसे मना लेता है। दोनों शादी कर केपटाउन के लिए रवाना हो जाते हैं।धन और लक्जरी लाइफस्टाइल के चक्रव्यूह में कुणाल धीरे-धीरे फंसता जाता है।कुणाल यह बात अपनी पत्नी को बताता है। वह उसे भारत वापस चलने के लिए कहती है, लेकिन कुणाल को पता है कि यहां से निकल पाना बेहद मुश्किल है। कुणाल कंपनी के साथ ही काम करने का फैसला करता है ताकि वह उन लोगों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर सके। क्या कुणाल इसमें कामयाब हो पाता है?फिल्म की कहानी इसी पर आधारित है|स्टोरी ट्रीटमेंट:फिल्म की कहानी इंटरवल के बाद 'जन्नत' जैसी हो जाती है| कुणाल की पत्नी आरजू(अमृता) अपने पति को मिस करने लगती है| कुणाल काम की वजह से उन्हें वक्त ही नहीं दे पाते| जन्नत में भी कुछ ऐसा दिखाया गया था| इसके अलावा फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही कन्फ्यूज कर देने वाला है| ऑफिस में कैद घायल कुणाल वहां से महत्वपूर्ण कागजात लेकर कैसे निकलने में सफल हो जाता है वो समझ से परे है| स्टार कास्ट: कुणाल खेमू ने एक्टर के तौर पर अपना बेस्ट देने की कोशिश की है मगर बेहद कमजोर स्क्रिप्ट के चलते उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है|अमृता पुरी ने ठीक ठाक अभिनय किया है मगर कई बार वह ओवर एक्टिंग करती नजर आती हैं|खडूस बॉस के रूप में मनीष चौधरी ने बढ़िया काम किया है| संदीप सिकंद छोटे मगर महत्वपूर्ण रूप में हैं| मिया उएदा अपने रोल में छाप छोड़ने में नाकामयाब रहीं| निर्देशन:नए निर्देशक विशाल महादकर में एक अच्छे निर्देशक बनने की संभावना नजर आई है|हालांकि कमजोर स्क्रीनप्ले और कहानी की वजह से निर्देशन भी कमजोर ही साबित हुआ है| मगर पहली फिल्म होने के नाते विशाल ने अपना बेस्ट देने की पूरी कोशिश की है|म्यूजिक/सिनेमटोग्राफी/एडिटिंग: विशेष फिल्म्स की फिल्मों का संगीत हमेशा ही दर्शकों को लुभाता है और इस फिल्म से भी उन्होंने संगीत के मामले में निराश नहीं किया है| इसके अलावा कुछ डायलॉग्स भी प्रभावी है और सधी हुई एडिटिंग कमजोर फिल्म को कुछ हद तक संभालने में कामयाब हुई है|
Friday, March 30, 2012
पत्रकार फ़ज़ल इमाम मल्लिक को साल 2011 का ‘मीडिया एक्सेलेंस अवार्ड’
य्ुवा पत्रकार और जनसत्ता के वरिष्ठ उपसंपादक फ़ज़ल इमाम मल्लिक को साल 2011 के लिए पत्रकारिता पुरस्कार से नवाजा गया है। नई दिल्ली के फिक्की सभागार में आयोजित एक समारोह में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें साल के श्रेष्ठ पत्रकार का सम्मान दिया गया। यह सम्मान उन्हें बिहार प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष ललन कुमार, मध्य प्रदेश के पूर्व जनसंपर्क मंत्री और विधायक राजा मानवेंद्र सिंह, हरियणा के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार सतीश भाटिया और संस्था के अध्यक्ष अरुण शर्मा ने दिया। कुमार ने फेडरेशन आॅफ इंडिया की ओर से आयोजित ‘छठे मीडिया एक्सेलेंस अवार्ड’ में फजल इमाम मल्लिक को सम्मानित करते हुए फजल इमाम मल्लिक को बहुमुखी प्रतिभा का पत्रकार बताया और कहा के वे साहित्य, कला, खेल और सामाजिक सरोकारों के लिए जाने जाते हैं। सम्मान के तौर पर उन्हें प्रतीक चिन्ह व सम्मान पत्र दिया गया। पिछले महीने भी दिल्ली में उन्हें मीडिया संस्थान की तरफ से सम्मानित किया गया था। बिहार के चेवारा (शेखपुरा) के रहने वाले फ़ज़ल इमाम मल्लिक करीब दो दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं और देश के चुनिंदा खेल पत्रकारों में से एक हैं। उनका सरोकार साहित्य, कला और संस्कृति से भी रहा है। वे कई चैनलों पर भी बतौर विशेषज्ञ बुलाए जाते हैं। दूरदर्शन के उर्दू चैनल से प्रसारित धारावाहिक ‘सिपाही सहाफ़त के’ में फ़ज़ल इमाम मल्लिक के जीवन और लेखन को भी शामिल किया गया था। जनसत्ता के अलावा फ़ज़ल इमाम मल्लिक वेबपत्रिका ‘सृजनगाथा’ के लिए ‘बाअदब-बामुलाहिज़ा’ और ‘नव्या’ के लिए ‘सरे राह’ कालम भी लिख रहे हैं।ललन कुमार के अलावा बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारी अज़मी बारी ने भी उन्हें इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा है कि फ़ज़ल इमाम मल्लिक ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है और बिहार का नाम रोशन किया हा।
Tuesday, March 27, 2012
Friday, March 23, 2012
कई तालों में कैद है आजादी के मतवाले सुखदेव का घर
उम्र -23 साल. मकसद- भारत की आज़ादी. नाम-सुखदेव. साथी- भगत सिंह और राजगुरु. अंजाम- सज़ाए मौत. स्मृति चिन्ह- पंजाब में टूटा सा एक घर.
ये है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक सुखदेव का संक्षिप्त बायोडाटा... ख़ासकर उन लोगों के लिए जिनकी यादों से शायद सुखदेव का साया मिट चुका है. ये वह सुखदेव हैं जिन्हें भगत सिंह के साथ अंग्रेज़ हुकूमत ने फांसी पर चढ़ा दिया था.सुखदेव की यादों के साथ-साथ लुधियाना शहर में उनका घर भी उपेक्षा का शिकार है जहाँ उनका जन्म हुआ था. बरसों तक तो ज्यादातर लोगों को पता भी न था कि उनका घर है कहाँ. ये घर बुरी हालत में था और यहाँ गाय भैंसे घूमती थीं.सुखदेव के वंशजों और नागरिक समाज के कुछ लोगों के निजी अभियान के बाद सरकार नींद से जागी और उसने आज़ादी के 65 वर्षों बाद अब जाकर सुखदेव के घर को अपने कब्जे में लिया है.लुधियाना में रहने वाले सुखदेव के वंशज विशाल नैयर बताते हैं कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा.वे कहते हैं, "सच कहूं तो मेरी आंखें भी तब खुली जब मैने एक स्थानीय अखबार में एक सर्वे पढ़ा. सर्वे में बच्चों ने कहा कि भारत को प्रकाश सिंह बादल ने आज़ाद करवाया है और भगत सिंह देश के पहले प्रधानमंत्री हैं. तब मुझे लगा कि कुछ करना होगा. हमने सुखदेव जी का घर सरकार को समर्पित कर दिया था लेकिन छह साल बाद भी वहां कोई स्मारक नहीं बना है. मैने कई दिन बैठकर अनशन किया, कोर्ट में गुहार लगाई. सुखदेवजी के मकान के लिए अनशन करने के कारण मुझे नौकरी से निकाल दिया गया था. "लेकिन अब इस घर के और भी दावेदार सामने आ गए हैं. मालिकाना हक के लिए सरकार और स्थानीय लोगों के बीच जंग छिड़ी हुई है.सरकार ने घर बंद कर इस पर ताला डाल दिया है. जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि आज़ादी के बाद से उन्होंने इस घर को सेहज कर रखने की कोशिश है और अब घर पर उन्हीं का हक़ है.सुखदेव के नाम पर ट्रस्ट चलाने वाले इन लोगों ने घर के बाहर बनी चारदिवारी कर अपना ताला लगाया हुआ है. ये विडंबना ही है कि भारत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने में भूमिका निभाने वाले सुखदेव का अपना घर कई तालों की बेड़ियों में कैद है. आपसी तकरार के कारण यहां कोई स्मारक नहीं बन पाया है.हाल ही में पंजाब चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए जब लुधियाना जाने का मौका मिला था तो मैं सुखदेव का घर देखने का मोह छोड़ नहीं पाई थी. लेकिन वहां तक जाना आसान नहीं था.विशाल मुझे गाड़ी में उस मोहल्ले तक ले गए जहाँ सुखदेव का घर है लेकिन तंग गलियों में आगे का सफर मुझे अकेले ही पैदल तय करना था.वो इसलिए क्योंकि उस मोहल्ले के लोगों का सुखदेव के वंशजों से छत्तीस का आंकड़ा है.सकरी गलियों से होते हुए मैं जैसे ही इलाके में पहुँची मोहल्ले के मुखिया ने मुझे जाने से रोका.काफी ज्यादा पूछताछ और बीबीसी का माइक दिखाने के बाद ही उन्होंने मुझे उस घर के नजदीक जाने दिया...अगर उनका सरकार से कोई झगड़ा है भी तो भी सुखदेव या भगत सिंह का घर बाहर से देखने के लिए इतनी बंदिश और पहरा मुझे काफी अटपटा लगा.स्थानीय नागरिक अशोक थापर कहते हैं, "पिछले 80 सालों से यहां के लोगों ने इस घर को देखा है. हमने कई लाख देकर इस घर को खाली करवाया, कोई महिला यहां रहने लगी थी. हमने ट्रस्ट बना यहां कई कार्यक्रम भी किए हैं. अब सरकार जबरदस्ती कब्जा करना चाहती है."सुखदेव ने भगत सिंह, राजगुरु, बटुकेश्वर बत्त, चंज्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर कई ऐसे कारनामों को अंजाम दिया था जिसने अंग्रेज सरकार की नींव हिलाकर रख दी थी.सेंट्रल एसेंबली के सभागार में बम और पर्चे फेंकने और फिर गिरफ़्तारी की घटना, और अन्य योजनाओं को भले ही भगत सिंह समेत दूसरे क्रांतिकारियों ने अंजाम दिया हो लेकिन इतिहासकार कहते हैं कि सुखदेव इस युवा क्रांतिकारी आंदोलन की नींव और रीढ़ थे.सुखदेव बचपन में अपने ताया के पास लायलपुर चले गए थे. ये इलाका़ अब पाकिस्तान में है. भगत सिंह और सुखदेव बचपन से ही गहरे दोस्त थे.सुखदेव पर किताब लिख चुके डॉक्टर हरदीप सिंह के अनुसार उस समय हुई बैठक में एसेंबली में बम फेंकने का जिम्मा पहले भगत सिंह को नहीं दिया गया था.वे कहते हैं, "रेवोलूशनरी पार्टी की बैठक में फैसला लिया गया कि सेंट्रल एसेंबली में बम गिराना है. इस बैठक में सुखदेवजी मौजूद नहीं थे. पार्टी ने फ़ैसला लिया कि भगत सिंह को नहीं भेजा जाएगा क्योंकि पुलिस पहले से ही सांडर्स कत्ल मामले में उन्हें ढूँढ रही थी. पार्टी नहीं चाहती थी कि भगत सिंह पुलिस के हाथ लगें. लेकिन सुखदेवजी ने फैसला पलटते हुए कहा कि उनके दोस्त भगत सिंह ही जाएंगे. सुखदेव चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति जाकर एसेंबली में पर्चे फेंके और गिरफ़्तारी दे जिसकी आवाज़ सुनकर जनता जागृत हो."डॉक्टर हरदीप सिंह बताते हैं, "इस फैसले पर कई लोगों ने सुखदेव को कठोर दिल भी कहा कि उन्होंने अपने दोस्त भगत सिंह को मौत के मुंह में भेज दिया. सुखदेव का तर्क सुनने के बाद भगत सिंह को उनकी बात सही लगी. किताबों में हमने यही पढ़ा है कि भगत सिंह के गिरफ़्तार होने के बाद सुखदेव बंद कमरे में बहुत रोए थे कि उन्होंने अपने सबसे प्यारे दोस्त को कुर्बान कर दिया."सुखदेव और भगत सिंह की गहरी दोस्ती को मौत भी नहीं तोड़ सकी. मौत में भी उन्होंने एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा.साल 1931 में 23 मार्च यानी आज ही के दिन अग्रेज हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षडयंत्र मामले में फांसी के तख्ते पर लटका दिया था. यकीनन भारत को गुलामी की बेड़ियों से छुड़ाने में अपनी जान गंवाने वालों के लिए कई समारोह हो रहे हैं.लेकिन मुझे रह रह कर सुखदेव का घर याद आ रहा है. मालिकाना हक जिसका भी हो लेकिन ये घर एक अदद स्मारक का हकदार है.लेकिन अभी तो ये घर आपसी लड़ाइयों में जकड़ा हुआ है और कई तालों में बंद है. सुखदेव ने आज़ाद भारत की परिकल्पना की थी लेकिन उनके घर तक जाने के लिए बंदिशों और पूछताछ से होकर गुज़रना पड़ता है. घर के बाहर लगी सुखदेव की मूर्ति इस तमाशे को मूक दर्शक की तरह देखने को मजबूर है.(साभार बी बी सी )
Monday, March 19, 2012
Thursday, March 15, 2012
गुंडों के बल पर रोकेंगे गुंडाराज?
उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी सरकार के पहले ही दिन विवादों में घिर गए हैं। यूपी में गुंडाराज पर लगाम लगाने की बात करने वाले अखिलेश कुंडा के गुंड़ा कहे जाने वाले निर्दलीय विधायक राजा भैया को कैबिनेट मिनिस्टर बनाकर विरोधियों के निशाने पर हैं।बाहुबली डी.पी. यादव की समाजवादी पार्टी में एंट्री रोकने पर अखिलेश की खूब तारीफ हुई थी, लेकिन अब राजा भैया को कैबिनेट में लेने पर उनकी कथनी और करनी पर सवाल उठ रहे हैं। समाजवादी पार्टी को यूपी में अपने दम पर बहुमत मिला है। ऐसे में अखिलेश की क्या मजबूरी थी कि राजा भैया को मंत्री बनाना पड़ गया ?बुधवार को जब उनसे इस बारे में सवाल पूछा गया तो वह राजा भैया के पक्ष में ही जमकर खड़े दिखे। उन्होंने सफाई दी कि राजा भैया के खिलाफ कार्रवाई राजनीति से प्रेरित थी। पोटा और गैंगस्टर ऐक्ट समेत कई संगीन मामलों में आरोपी रहे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया मुलायम सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। अखिलेश की कैबिनेट में राजा भैया ही अकेले दागी नहीं हैं। 19 कैबिनेट मंत्रियों में राजा भैया समेत से सात ऐसे मंत्री हैं, जिन पर किसी न किसी तरह के आपराधिक मामले दर्ज हैं।
Saturday, March 10, 2012
कौन बनेगा द्रविड़ के स्थान का दावेदार
महान क्रिकेटर राहुल द्रविड़ ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया है तो क्रिकेट के प्रति जुनूनी देश में सबसे बड़ी चिंता यह बनी हुई है कि अगला द्रविड़ कौन होगा यानी उनकी जगह कौन लेगा। द्रविड़ की जगह कौन ले सकता है, इस दौड़ में कई युवा खिलाड़ी जैसे विराट कोहली, चेतेश्वर पुजारा, रोहित शर्मा और अंजिक्या रहाणे शामिल हैं। तेईस वर्षीय कोहली को एक दिवसीय प्रारूप का उप कप्तान बना दिया गया है। उन्होंने दिखा दिया है कि उनमें काफी प्रतिभा मौजूद है और वह भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम में तीसरे महत्वपूर्ण स्थान पर बल्लेबाजी कर सकते हैं। आस्ट्रेलिया के भारत के निराशाजनक टेस्ट दौरे पर जब सभी सीनियर बल्लेबाज जूझते नजर आए तब कोहली अकेले ऐसे खिलाड़ी रहे जिन्होंने भारत की ओर से एकमात्र टेस्ट शतक लगाया। एडिलेड में खेली गई उनकी पारी काफी धैर्य से खेली और परिपक्व थी। अभी तक उन्होंने आठ टेस्ट खेले हैं और 32.73 के औसत से 491 रन बनाए हैं।मुंबई के शीर्ष क्रम के बल्लेबाज रोहित शर्मा में भी इस दौड़ में शामिल हैं। उनमें प्रतिभा और तकनीक मौजूद है लेकिन फिटनेस और लगातार प्रदर्शन की कमी है। 2008-09 रणजी सत्र के बाद उन्होंने लंबे प्रारूप में लंबी पारी नहीं खेली है।चौबीस वर्षीय रोहित का वनडे रिकार्ड काफी अच्छा है जिसमें उन्होंने 77 मैचों में 33.14 के औसत से 1889 रन बनाए हैं लेकिन उन्हें टेस्ट स्तर पर अपनी प्रतिभा का नजारा पेश करना बाकी है।मुंबई के एक अन्य बल्लेबाज रहाणे ने भी दिखाया है कि वह लंबे समय तक बल्लेबाजी कर सकते हैं। वह पिछले कुछ वर्षों में मुंबई की तरफ से रणजी ट्राफी में तीसरे और चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए काफी रन बना चुके हैं।दाएं हाथ के इस तेईस वर्षीय बल्लेबाज का घरेलू क्रिकेट में रन बनाना जारी है। वह रणजी ट्राफी के 2009-10 और 2010-11 सत्र में तीन शतक जड़ चुके हैं। आस्ट्रेलिया में एमर्जिंग प्लेयर्स टूर्नामेंट में दो शतकों ने उन्हें 2011 में इंग्लैंड के दौरे के लिए भारतीय वनडे टीम में जगह दिलाई लेकिन अभी उन्हें टेस्ट में आगाज करना बाकी है।तीसरे अहम टेस्ट नंबर के एक अन्य दावेदार 24 वर्षीय सौराष्ट्र के बल्लेबाज चेतेश्वर पुजारा हैं जो अपनी मजबूत तकनीक के लिये काफी मशहूर हैं। उनकी तकनीक टेस्ट क्रिकेट के मुफीद है। हालांकि द वाल से तुलना करना जल्दबाजी होगी लेकिन उनके प्रथम श्रेणी बल्लेबाजी रिकार्ड को देखते हुए अहसास होता है कि पुजारा को सही मायनों में अगला द्रविड़ कहा जा सकता है।
Saturday, March 3, 2012
शादी से पहले एक बार जरुर पढ़ लें
गलत आदतों का मजा और नशा व्यक्ति को तुरंत मिलता है जबकि उसके दुष्परिणाम कुछ वक्त गुजर जाने के बाद ही सामने आ पाते हैं। यहां हम छोटी दिखने वाली कुछ ऐसी आदतों के बारे में जिक्र करेंगे जिनको धर्म-अध्यात्म और आयुर्वेद शास्त्रों में सफल और सुखद गृहस्थ व दाम्पत्य जीवन के लिये साक्षात विष (जहर) के समान घातक बताया गया है। जो युवा लड़के-लड़कियां वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने की कगार पर खड़ें हैं, उन्हें ये सातों बातें अच्छी तरह से गांठ बांध लेना चाहिए.....
नशा- नशा चाहे वो किसी भी तरह का हो, गृहस्थ जीवन को नर्क बनाने में सबसे अहम् भूमिका निभाता ।अहंकार- खुद को ही हर हाल में सही मानना और अपने जीवनसाथी को अपने अनुसार चलाने या बदलने की कोशिश करना खुशियों के संसार को दुखों को अड्डा बना सकता है। यह अटल सत्य है कि दुनिया का कोई भी इंसान पूरी तरह से आपकी कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता, रात-दिन साथ रहने वाला व्यक्ति कभी भी आपकी इच्छाओं पर 100 फीसदी खरा नहीं उतरेगा।
आलस्य- पति-पत्नी दोनों में से एक भी व्यक्ति आलसी और काम को टालने वाला हुआ तो निश्चित रूप से घर में नर्क का आना शुरु हो जाएगा।
दुराव-छुपाव- किसी भी बात को छुपाने या झूंठ बोलने की आदत भी आपसी संबंधों की जड़ों में जहर घोलने का काम करती है।
अपेक्षा- अपने जीवनसाथी से आदर्श होने की अपेक्षा रखना सच्चाई से मुंह मोडऩे जैसा है। संसार में कोई भी किसी की अपेक्षाओं पर कभी खरा नहीं उतर सकता।
Friday, March 2, 2012
चुन लो अपनी किताब
यहां सजी हुई हैं किताबें ही किताबें। बड़ों की किताबें, बच्चों की किताबें, दिल को छूने वाली किताबें, रोमांच से भरपूर किताबें..। पर ये हैं सीडी में सिमटी हुई और ई-बुक में बंद। विश्व पुस्तक मेले से आपके लिए हम लाए हैं नए जमाने की नई किताबें..गूगल बाबा की जय! एक यही 'बाबा' हैं, जो हमें बस एक क्लिक पर दुनिया की किसी भी किताब से रू-ब-रू करा देते हैं। पर हमें चाहिए ऐसी किताब, जिसके पन्ने पलट सकें, जिनकी बातों को सहेज कर जेहन में रख सकें। क्योंकि शोध बताते हैं कि भले ही गूगल बाबा की शरण में जाने से ज्ञान मिलता हो, लेकिन जो इनकी अंधी भक्ति करते हैं, उनकी स्मृति कमजोर होने लगती है..।दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे 20वें विश्व पुस्तक मेले में लगभग सभी प्रकाशकों से ऐसी ही बातें सुनने को मिलीं। जब हमने उनसे पूछा कि गूगल से मुकाबला कैसे होगा? तो उन्होंने हमें दिखाईं बुक्स और सीडी में बंद अनगिनत किताबें। मैकमिलन प्रकाशन के स्टाल में मिले विक्रम ने बताया, 'ये हैं नए जमाने की नई किताबें, जिनसे यंग रीडर्स को आसानी से जोड़ा जा सकता है।'
Thursday, March 1, 2012
धुंधली है यूपी की तस्वीर
'मायावती और चाहे जौन किहे होंय,गरीबन के लिए कुछौ नहीं किहिन'--ये आवाज गुलाबी साड़ी और आत्मविश्वास में लिपटी उर्मिला की थी। दलित जाति की उर्मिला सतगुरु खेड़ा गांव के बाहर मिल गई थीं। साथ में उनके पति छंगा भी थे। छंगा विकलांग हैं। बेहद नाराज नजर आ रहे छंगा ने मायावती को निशाने पर रखते हुए सीधा उलाहना दिया-'का हमका एक ठो कालोनी नहीं दइ सकती रहीं?' 'कालोनी' यानी दलितों के लिए बनाए जाने वाले सरकारी मकान।
16 जनवरी को काफी ठिठुरन थी, जब हम (मैं और कैमरामैन पंकज तोमर) लखनऊ पहुंचे थे। इरादा चैनल के लिए चुनावी माहौल का जायजा लेना था। लेकिन कुछ चुनाव आयोग की कृपा और कुछ लोगों की बेजारी, चुनाव का रंग कहीं नहीं दिखा। राजधानी के लोगों की निगाह में सरकार बदलने या बनाये रखने की कोई तड़प नजर नहीं आई। बस, एक बात पर सहमति थी कि मायावती के स्मारकों ने लखनऊ की नवाबी शान फीकी कर दी है। शाम को देखने हम भी गए। गोमतीनगर के अंबेडकर स्मारक के इर्दगिर्द मेले जैसा माहौल था। सूबे के तमाम जिलों में बिजली की चाहे जितनी किल्लत हो, यहां रोशनी के फव्वारे फूट रहे थे। समतावादी आंदोलन के नायकों और संतों के बुतों से पूरा इलाका पटा पड़ा था, लेकिन सैर-सपाटे के मूड से आए लोगों के लिए उनकी ओर देखने-सोचने की फुर्सत शायद ही थी। वे इस बात पर खुश थे कि लखनऊ में अब मुंबई के नरीमन प्वाइंट का मजा लिया जा सकता है। जाहिर है, 'चुनाव' यहां भी नहीं था।
ऐसे में जरूरी था कि शहर से बाहर निकलकर माहौल को परखा जाए। एक सुबह कानपुर जाने वाले एक्सप्रेस-वे पर निकल पड़े। लखनऊ और उन्नाव सीमा पर जाम लगा था। पता चला कि गाड़ियों की चैकिंग हो रही है। चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों का असर था। वीडियोग्राफी भी हो रही थी। अग्रवाल साहब का गुस्से से लाल चेहरा आंखों के सामने घूम गया। लखनऊ में समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर झंडे-बैनर-बिल्ले-पोस्टर की दुकान चलाने वाले अग्रवाल साहब हमारा कैमरा देखकर ही भड़क उठे थे। उन्हें लगा था कि हम उनकी दुकान की तस्वीर लेने आए हैं जहां काफी 'माल' पड़ा है। हम कोई ऐसी स्टोरी दिखा देंगे जिससे दुकान पर आयोग का ताला पड़ जाएगा। चुनाव आयोग के नाम पर गालियों की बौछार कर रहे अग्रवाल साहब के लाखों रुपये डूब गए हैं। उन्हें शिकायत है कि प्रचार सामग्री की थोक खरीद रुकी हुई है। कोई खरीदे भी तो झंडा-पोस्टर शहर से बाहर नहीं जा पाता।
खैर, चेक पोस्ट से कुछ दूर आगे जाने पर बाईं ओर एक पतली और ऊबड़-खाबड़ सड़क फूट रही थी। गाड़ी उधर ही मोड़ दी गई। 'दलित मुख्यमंत्री के राज में दलितों का हाल'-चालू किस्म की इस 'स्टोरीलाइन' का सिरा पकड़कर हम सतगुरु खेड़ा पहुंचे थे। इस गांव में सिर्फ दलित जाति के लोग बसते हैं। किसी जमाने में पास के किसी गांव के दबंगों ने खदेड़ दिया था तो इस ऊसर में शरण मिली थी, जहां अब ये खेड़ा बसा हुआ है।
गांव के बाहर उर्मिला और छंगा ही नहीं लल्लूराम और छोटेलाल भी मिल गए। सब के पास तकलीफों के अनंत किस्से थे। अवधी के मुहावरे और तंज उनकी शिद्दत को और बढ़ रहे थे। हमें इत्मिनान में देखा तो बातचीत बढ़ती चली गई। पता ही नहीं चला कि दिल पर पड़ा दिल्ली छाप ताला कब टूटा और अवधी का धाराप्रवाह सोता फूट पड़ा। अब सब 'अवधिये' थे। पंचायत जुट गई।
छोटेलाल बता रहे थे कि ब्लाक के 'सचिव जी' ने कैसे खाद मांगने पर उन्हें धक्के मार कर भगाया। बाजार से से साढ़े चार सौ रुपये बोरी खरीदने में जान निकल गई। उनका जोर इस बात पर था कि-'मायावती तो देत हैं, मुला अफसरवै सब खाय जात हैं..।'उधर, जालंधर में अरसे तक रिक्शा चलाने के बाद गांव लौटे लल्लूराम का अंदाज खासा दार्शनिक था। बोले-'भइया, कौनो पाल्टी गरीबन का कुछ दिहिस है कि मायावती देहैं। खाय का कोई ना देई बगैर बाजुअन से कमाये।'
लल्लूराम ने बात 'जयहिंद-जयभारत' के नारे के साथ खत्म की थी। साथ में दोनों हाथ भी उठाकर जोड़ लिए थे। अंदाजा सही निकला- लल्लूराम जालंधर में रिक्शा युनियन में सक्रिय थे।
इस बीच पंकज तोमर खेतों की हरियाली, जानवरों और बच्चों के झुंड की तस्वीरें कैद कर चुके थे। अब बारी थी गांव के अंदर जाने की। गांव के लोग भी ये चाहते थे। गांव में बिजली के तार तो छोड़िए खंभा भी नजर नहीं आया। लोगों ने बताया कि हर चुनाव में बिजली लाने का वादा होता है, पर विधायक चुने जाने के बाद कोई लौट कर नहीं आता। यही वजह है कि मोबाइल क्रांति के इस युग में यहां इक्का-दुक्का लोगों के पास ही मोबाइल है। जब चार्जिंग के लिए दो किमोलीटर दूर बाजार जाना हो तो कोई खरीदे भी क्यों। गांव में विकास के नाम पर दो हैंडपाइप भर लग पाए हैं। रास्ते और पानी निकासी की समस्या की कोई सुनवाई नहीं है।
गांव में हर कदम पर कोई ना कोई सरकार से शिकायतों का नया पुलिंदा लेकर खड़ा था। लग रहा था कि दलित मायावती सरकार से काफी नाराज हैं। 'स्टोरी' बनने की खुशी महसूस ही हुई थी कि अचानक निगाह घरों के किवाड़ों पर गई। ज्यादातर किवाड़ों पर 'बीएसपी को वोट दो' के ताजा स्टीकर चस्पा थे। लग गया कि मामला इतना सीधा नहीं है। दार्शनिक लल्लूराम ने कैमरा बंद होने के बाद चुपके से कान में कहा था-'आपन समाज हम पंचै खुदै थोड़े बिगाड़ब।'
यानी बीएसपी पार्टी नहीं 'समाज' है। उत्तर प्रदेश की एक जमीनी सच्चाई तो समझ में आ गई थी कि तमाम नाउम्मीदी के बावजूद दलितों का बीएसपी से मोहभंग नहीं हुआ है। किसी क्षेत्र में कोई विशेष मुद्दा नहीं हुआ तो बटन हाथी पर ही दबेगा। दलितों के बीच इस दौरान बड़ा सांस्कृतिक बदलाव भी आया है। गांवों में डॉ. अंबेडकर की मूर्तियां तो कई साल पहले से लग रही थीं, अब बुद्ध मूर्तियां और 'भंते' भी नजर आने लगे हैं। सतगुरु खेड़ा से लौटते वक्ता रास्ते में लखनऊ का मवई पड़ियाना गांव पड़ा। पता चला कि यहां दलित ही नहीं कई पिछड़ी जाति के लोग भी बौद्ध हो चुके हैं। शादी-ब्याह भी बौद्ध रीत से हो रहे हैं (हालांकि कोई जाति पहचान नहीं छोड़ रहा है)। गांव में बौद्ध बिहार बन रहा है। साथ में भिक्षु प्रशिक्षण केंद्र। कमान भंते प्रज्ञासार के हाथ में है। उम्र चालीस भी नहीं है। कुछ दिन सरकारी नौकरी करने के बाद, करीब 16 साल पहले वे भिक्षु बन गए थे। उन्होंने बताया कि दलितों को बुद्ध की बातें समझ में आने लगी हैं। इशारों में ये भी बताया कि मायावती शासन की वजह से उनका काम बिना रोक-टोक बढ़ रहा है। वहां मौजूद और लोगों से बात हुई तो ये भी साफ हुआ कि लखनऊ से नोएडा तक बने पार्क और स्मारक विपक्ष की नजर में भले ही फिजूलखर्ची हो, दलितों की नजर में ये किसी तीर्थ से कम नहीं हैं। बुतों में ही सही, समतावादी नायकों की ऐसी भव्य प्रतिष्ठा देश के किसी और हिस्से में नहीं हुई है।
हालांकि बुद्धिजीवियों का एक तबका बीएसपी की सीमाओं को अच्छी तरह समझ रहा है। लखनऊ की एक सीट से सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के प्रत्याशी बनकर चुनाव लड़ रहे वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस ने कहा भी-'मायावती केवल ब्राह्मणवाद को बरकरार रखने की शर्त पर मुख्यमंत्री बनी हैं। आखिर उनके अलावा कोई दलित नेता क्यों नहीं दिखता। बीएसपी में कोई दलित आगे बढ़ना चाहे तो सबसे बड़ी दुश्मन मायावती ही होंगी।' डॉ. अंबेडकर महासभा से जुड़े डॉ. लालजी निर्मल ने भी कहा-'बीएसपी शासन में दलितों को सम्मान का अहसास तो हुआ है, लेकिन पेट की आग बुझाने का कोई बंदोबस्त नहीं है।'
वैसे भी, केवल दलित समर्थन के दम पर बीएसपी की नैया पार नहीं हो सकती। 2007 में मायावती को तमाम दूसरे वर्गों का समर्थन ना मिलता तो वे गठबंधन का 17 साला दौर खत्म करके पूर्ण बहुमत की सरकार ना बना पातीं। तब एक मुद्दा मुलायम का कुशासन और समाजवादी पार्टी नेताओं की गुंडागर्दी भी था। लोगों का गुस्सा मायावती की ताकत बन गया। लेकिन पांच साल में माया सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया कि उनकी अपनी कोई ताकत बन पाती। भ्रष्टाचार और कुशासन के मामले में वे भी किसी से उन्नीस साबित नहीं हुई हैं। उन्होंने करीब ढाई हजार करोड़ की चीनी मिलें केवल 470 करोड़ में एक शराब माफिया को बेच दी हैं। पूरे सूबे में शराब कारोबार पर इसी माफिया का एकछत्र राज है और मायावती की घोषित व्यक्तिगत संपत्ति 87 करोड़ के आंकड़े को छू रही है।
मायावती की खुशकिस्मती है कि उनके विरोध में कोई ऐसी पार्टी नहीं खड़ी है जो पाक-साफ हो, या जो जनता के बीच कोई नया सपना जगाने में कामयाब हुई हो। जिसने ऐसा कोई पाप ना किया हो जिसमें मायावती के हाथ रंगे हैं। या फिर मुद्दा आधारित आंदोलनों का कोई ज्वार खड़ा कर पाई हो। विकल्प के रूप में समाजवादी पार्टी का जिक्र छिड़ा तो लखनऊ विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक परेशान हो उठे। वे भुला नहीं पाए हैं कि मुलायम के शासन में विश्वविद्यालय कैसे गुंडों की जकड़न में था। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर मायावती उन्हें कई गुना बेहतर नजर लगती हैं।
शायद छवि बदलने का ही दबाव है कि मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश को आगे किया है। अंग्रेजी-कंप्यूटर में दक्ष इस विदेश पलट बेटे में उन्हें समाजवाद का भविष्य नजर आ रहा है। ये समाजवादी युवराज कांग्रेसी युवराज के मुकाबल मैदान में है और भीड़ भी बटोर रहा है। कोई कोर कसर ना रह जाए, इसके लिए दिल्ली की जामा मस्जिद इमाम बुखारी का खुला समर्थन भी हासिल कर लिया गया है जिन्हें कुछ साल पहले मुलायम ने सियासत में टांग ना अड़ाने की नसीहत दी थी।
मुस्लिमों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने भी घोड़े खोल दिए हैं। पिछड़ों के 27 फीसदी आरक्षण में मुस्लिमों को नौ फीसदी हिस्सा देने का नया दांव चला गया है। कांग्रेस भी उसी जोड़-घटाने के सहारे है जिसके आधार पर बीएसपी और समाजवादी पार्टी सत्ता का समीकरण बैठा रही हैं। राहुल गांधी जब आईटी क्रांति के चेहरे सैम पित्रोदा को कांग्रेस के मंच पर लाकर उन्हें बढ़ई का बेटा बताने से ये बात पूरी तरह साफ हो गई। उधर, बीजेपी हमेशा की तरह सांप्रदायिक कार्ड खेल रही है। मेडिकल घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लेने से शुरू में बैकफुट पर नजर आ रही बीजेपी अब मुस्लिम आरक्षण को मुद्दा बनाकर चुनाव में सांप्रादियक रंग घोलने की जुगत भिड़ा रही है। यही वजह है कि कमान साध्वी उमा भारती को सौंपी गई है।
जाहिर है, उत्तर प्रदेश में किसी दल के पास ऐसी बड़ी लकीर खींचने की कुव्वत नहीं है, जिसके सामने जाति-धर्म के समीकरण छोटे पड़ जाएं। जनता की बेजारी की ये बड़ी वजह है। ऐसा नहीं कि लोग वोट देने नहीं जाएंगे, लेकिन किसी के पक्ष या विपक्ष को लेकर कोई उत्साह नहीं है। जोश में सिर्फ वो हैं जो किसी के जीतने में निजी स्वार्थ देख रहे हैं। यानी फलां विधायक बन गया तो सड़क-नहर वगैरह बनाने का ठेका मिलेगा। विकास के सरकारी धन की लूट यूपी का सबसे बड़ा उद्योग है जिस पर राजनीति भी पलती है।
वैसे,इस बात पर चुनावी सर्वे कराने वालों से लेकर आम लोगों तक में सहमति है कि यूपी में मुकाबला एसपी और बीएसपी में ही है। लेकिन दोनों दल बहुमत से दूर रहेंगे। बीजेपी और कांग्रेस तीसरे-चौथे नंबर की लड़ाई लड़ रहे हैं। त्रिशंकु विधानसभा से बच पाना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। यानी, इस बार की होली जोड़तोड़ के रंग और विधायकों की खरीद-फरोख्त के कीचड़ से सराबोर होगी।
22 जनवरी को दिल्ली लौटने के बाद कई लोगों ने पूछा कि यूपी मे क्या होगा। जवाब कुछ था नहीं, सो कह दिया-खुदा ही बता सकता है। ये हजारों साल पुराना दांव है। अपनी अज्ञानता को खुदा का नाम दीजिए, और जान छुड़ा लीजिए।(साभार आई बी एन ७)
साजिश है, तो खुलासा हो
पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक विदेशी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा कि तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना के खिलाफ जारी आंदोलन के पीछे अमेरिका एवं स्कैंडेनेवियन देशों से धन पाने वाले गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) का हाथ है।उसके बाद तीन ऐसे संगठनों की मान्यता रद्द कर दिए जाने की खबर आई। फिर रूस ने, जिसके सहयोग से कुडनकुलम में परमाणु प्लांट लगा है, यह कहने में देर नहीं लगाई कि उसे इसका शक पहले से ही था। अब अमेरिका ने इसकी जांच कराने की बात कही है। यानी मामला गंभीर है। क्या सचमुच भारत की परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को नाकाम करने की कोई सुनियोजित कोशिश की जा रही है? महाराष्ट्र में जैतापुर से लेकर हरियाणा में गोरखपुर और पश्चिम बंगाल के हरिपुर में प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को भी स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा है।क्या इन सभी जगहों पर ऐसे एनजीओ सक्रिय हैं? अगर सरकार के पास इस बारे में कोई ठोस सबूत हैं, तो उन्हें अब जरूर सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोग परमाणु ऊर्जा एवं इसके विरोध को लेकर तथ्य आधारित राय बना सकें। लेकिन अगर जनता के एक हिस्से में परमाणु ऊर्जा से लाभ-हानि और ऐसे संयंत्रों से सुरक्षा को लेकर वास्तविक चिंताएं मौजूद हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने बीटी बैंगन के हुए विरोध के पीछे भी गैरसरकारी संगठनों की भूमिका की चर्चा की। लेकिन जयराम रमेश ने, जिन्होंने बतौर पर्यावरण मंत्री बीटी बैंगन की खेती पर रोक लगाई थी, यह बयान देकर स्थिति अस्पष्ट कर दी है कि उन्होंने वह फैसला किसी एनजीओ के दबाव में नहीं लिया, बल्कि वो वैज्ञानिकों, कई मुख्यमंत्रियों और इस मुद्दे से संबंधित हित-समूहों से लंबे विचार-विमर्श का परिणाम था।प्रधानमंत्री देश का तीव्र गति से विकास चाहते हैं, यह प्रशंसनीय है। लेकिन देश में ऐसे लोग भी हैं, जो विकास की उस धारणा से सहमत नहीं हैं। आज आवश्यकता इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संवाद की है। ऐसा तभी हो सकता है, जब सारे तथ्य सबके सामने हों और सरकार इसकी पहल करे।(साभार दैनिक भास्कर)
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