Thursday, December 13, 2012
Saturday, December 8, 2012
माया और मुलायम ने बचाया
देश में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता उस समय साफ हो गया जब विपक्षी पार्टियों का इसके खिलाफ प्रस्ताव राज्य सभा में भी गिर गया.शुक्रवार को हुए मत विभाजन में सरकार के पक्ष में 123 वोट थे जबकि उसके खिलाफ 109 वोट रहे. यानी केवल 109 सदस्यों ने एफडीआई के खिलाफ विपक्ष के प्रस्ताव के हक में मतदान किया.सरकार का काम आसान किया उसकी सहयोगी पार्टियों बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने हालांकि यह दोनों पार्टियां एफडीआई का विरोध करती आई हैं.लोक सभा की तरह राज्य सभा में भी समाजवादी पार्टी ने वॉक आउट किया.वैसे यह गुरुवार को ही लगभग तय हो गया था कि सरकार को इस मत विभाजन में कोई मुश्किल पेश नहीं आएगी.सरकार को उस समय राहत मिली थी जब बसपा प्रमुख मायावती ने एफ़डीआई के मुद्दे पर बहस के दौरान कहा था कि वो सरकार के समर्थन में मतदान करेगी.मायावती ने यह तर्क दिया था कि राज्य सरकारों के पास अधिकार है कि वे इसे लागू करें या ना करें.इससे पहले बुधवार को लोक सभा में भी सरकार ने मतदान जीता था.
Friday, December 7, 2012
21/11 वन्दे मातरम्
Kalpesh Yagnik
यह 21/11 है। वह 26/11 थी। यह सारे राष्ट्र, सभी भारतीयों की आंखों में चमक का दिन है। वह मुंबई से आरंभ हो, सारे देश की आंखों में रोष या आंसू का दिन था। यह आतंक के विरुद्ध युद्ध की विजय का पल है। वह मानवता के विरुद्ध कलुषित कृत्य था। यह 'स्टेट पावर’ यानी सरकार, हम लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार की ताकत और इच्छाशक्ति के खुलकर सामने आने का प्रतीक है। वह सरकारी तंत्र की नाकामी और आपराधिक लापरवाही का लहूलुहान करने वाला परिणाम था।यह न्याय का उजला दिन है। वह अन्याय की काली रात थी। अर्थात् सबकुछ एकदम पूरी तरह अलग। उल्टा। दिनरात, धरती-आसमान जैसा अंतर। जबकि : यह भी कांग्रेस-आधारित यूपीए की सरकार है। वह भी यही थी। प्रधानमंत्री भी यही, डॉ. मनमोहन सिंह थे। 21/11 को दृढ़ता दिखाई। 26/11 को कमजोरी सामने आई। तो क्या अब इस तरह के रुदन का समय है?नहीं। समय यह ढूंढऩे का भी नहीं है कि कांग्रेस ने यह चुनावी फायदे के लिए किया। गुजरात चुनाव को ध्यान में रखकर तत्काल किया। या मध्यावधि चुनाव हो जाएं, इसलिए भ्रष्टाचार का मुद्दा दबाने के लिए किया। यह तो नया समय है। नई सोच का समय। नए लक्ष्य का समय। यह गर्व का समय चार साल बाद आया। बहुत अधिक है। बहुत ही। इसलिए नहीं कि हमारी न्याय व्यवस्था लंबी है। जटिल है। किन्तु इसलिए कि हमारा लक्ष्य स्पष्ट नहीं है।सरकार का लक्ष्य कुछ और। कानून के रखवालों का कुछ और। खुफिया तंत्र तो मानो बना ही विफल रहने के लिए है। बच जाती हैं आतंकी हमलों और उसके बाद उपजी शंका के आतंक से उठने वाली निर्दोष आहें। उन परिवारों की जिन्होंने न जाने किस पाकिस्तानी कोने में ली गई किसी कायराना कसम के बदले अनजाने में अपनी जिंदगी के महकते हिस्से खो दिए। इसलिए कर कानूनी कार्रवाई में बहुत तेजी आनी चाहिए।न्याय प्रक्रिया नहीं, हमारा नेतृत्व लचर है। हमें लाचार बना देता है। किन्तु आज अवसर है। विध्वंस के विरुद्ध, आगे बढक़र युद्ध छेडऩे का। क्योंकि कुछ अवसर ही ऐसे होते हैं जो न केवल एक इतिहास बना जाते हैं, वरन एक नया इतिहास बनाने की झलक भी दिखला जाते हैं। बशर्ते हम उस अवसर को पहचान लें। थाम लें। हृदय में उतार लें।21/11 आगे आने वाली पीढिय़ों के लिए ऐसा ही एक ऐतिहासिक अध्याय है। 26/11 को हुए भयावह रक्तपात के बाद जब हर कानूनी कार्रवाई, हर अदालत को पार कर सुप्रीम कोर्ट तक की मुहर लग गई, तब भी समूचा देश यह मानने को राजी नहीं था कि आतंक के इस जीवित आकार को कभी फांसी वास्तव में दी जा सकेगी। यह दयनीय स्थिति है। यानी हमारा, हमारी पुलिस, अदालत और हर तरह की व्यवस्था में अविश्वास इस कदर बढ़ चुका है कि हम सामान्य बात भी नहीं मानते। जब सुप्रीम कोर्ट ने फांसी दी है तो होगी ही। इसमें इतने गर्व, इतना आश्चर्य और इतनी प्रशंसा की बात ही क्या है? निश्चित है। इसलिए है कि एक अफजल गुरु सामने है। जिंदा। खूब जिंदा। अफजल को ही क्यों लें, राजीव गांधी के हत्यारे देखें। तीनों बने हुए हैं।
(नेशनल एडिटर दैनिक भास्कर समूह)
'खिलाड़ी 786'
बहुत दिनों से अक्षय कुमार एक हिट फिल्म की स्क्रिप्ट की तलाश में थे, पर किस्मत उनका साथ नहीं दे रही थी.यूं भी बढ़ती उम्र की वजह से अब वो रोमांटिक किरदारों के लिए तो अनफिट होते ही जा रहे हैं क्योंकि उम्र का असर उन पर दिखने लगा है.फिर दबंग, सिंघम, बॉडीगार्ड और राउडी राठौर जैसी एक्शन फिल्मों की कामयाबी के बाद उन्हें अपनी सोई हुई 'खिलाड़ी सीरीज़' को फिर से जगाने का ख़्याल आया. और ऐसे शुरू हुई 'खिलाड़ी 786' की तैयारी.फिल्म में खिलाड़ी अक्षय कुमार की वापसी के साथ-साथ एक और शख़्स की वापसी हुई है. और वो हैं बतौर कलाकार हिमेश रेशमिया.जी हां, फिल्म में कहानीकार, संगीतकार और सह-निर्माता की भूमिका निभाने के साथ-साथ वो एक ख़ास भूमिका में भी है.जैसा कि हाल के कुछ समय में रिलीज़ हुई 100 करोड़ रुपए कमाने वाली फिल्मों में तर्क को किनारे पर रखकर बेसिर-पैर की कहानी परोसी गई है, कुछ वैसा ही प्रयास इस फिल्म में दिखता है.कहानी के नाम पर बस जैसे-तैसे करके ताना-बाना बुन दिया गया है.अक्षय कुमार फिल्म में लूट-मार करते हैं लेकिन उनका किरदार कुछ रॉबिन हुड सरीखा है. क्योंकि वो लूटा हुआ माल ग़रीबों में बांट देता था. वो लात घूंसे मारकर गुंडों को हवा में उड़ाता है और भला आदमी बनकर लोगों का दिल जीत लेता है.क्या आप अभी से जम्हाई लेने लगे हैं. ज़रा ठहरिए. यहां पर एंट्री होती है इंदु (असिन) जो एक गैंग लीडर टीटी भाई (मिथुन चक्रवर्ती) की बहन है और अपने प्रेमी (राहुल सिंह) की चाहत में हर अच्छा रिश्ता ठुकराती जाती है.कहानी में पदार्पण होता है मैरिज एजेंट मनसुख लाल (हिमेश रेशमिया) का जो टीटी भाई की बहन यानी इंदू की शादी बहत्तर सिंह यानी खिलाड़ी 786 (अक्षय कुमार) से कराने की ठान लेता है.वो एक चाल चलता है जिसमें टीटी भाई, बहत्तर सिंह, उसके पिता सत्तर सिंह (राज बब्बर) और चाचा इकहत्तर सिंह ( मुकेश ऋषि) को फंसाता है.अगर आप फिल्म के टाइटल में 'खिलाड़ी' शब्द सुनकर पुराने अक्षय कुमार की खोज में जा रहे हैं तो ये 'खिलाड़ी 786' आपको बुरी तरह से निराश करेगी.इसमें पुराने 'खिलाड़ी कुमार' की कोई झलक नहीं है. फिल्म में एक्शन दृश्य ज़रूर अच्छे हैं, लेकिन आजकल तो हर दूसरी फिल्म में एक्शन बेमिसाल होता है.फिल्म के कई गीत ज़रूर इसकी रिलीज़ से पहले ही चर्चित हो चुके थे, जैसे हुक्का, बलमा, लोनली और लॉन्ग ड्राइव.फिल्म में कई किरदार जैसे राहुल सिंह या राजेश खट्टर, भारती सिंह के बेहद अटपटे किरदार हैं जो बेकार में हंसाने की कोशिश करते हुए नज़र आते हैं.रहे अक्षय कुमार. क्या उनमें 'ख़ान पावर' है. जवाब है नहीं. ना तो उनके पास सलमान ख़ान जैसी ज़बरदस्त फैन फॉलोइंग है ना ही शाहरुख जैसा करिश्मा. ऐसे में 'खिलाड़ी 786' कितनी कामयाब हो पाएगी, ये बड़ा सवाल है.(साभार बी बी सी डॉट कॉम )
پانچویں عالمی اردو کانفرنس کا افتتاح
جمرات کو کراچی آرٹس کونسل پاکستان کے زیر اہتمام پانچویں عالمی اردو کانفرنس شروع ہوئی۔ اس چار روزہ کانفرنس کے افتتاحی اجلاس میں ہندستان سے آنے والے مندوب ممتاز نقاد ڈاکٹر شمیم حنفی نے ’ہندوستان میں اردو ادب کا اجمالی جائزہ، اور ممتاز فکشن نگار انتظار حسین نے ’پاکستان میں اردو ادب کا اجمالی جائزہ‘ کے عنوانوں سے بات کی۔ جب کے آرٹس کونسل کے صدر محمد احمد شاہ نے استقبالیہ اور کونسل کے سیکریٹری نے مندوبین اور شرکا کا شکریہ ادا کیا۔افتتاحی اجلاس کی مجلس صدارت ڈاکٹر شمیم حنفی ، فاطمہ ثریا بجیا، ڈاکٹر اسلم فرخی، انتظار حسین، حمایت علی شاعر، ڈاکٹر پیر زادہ قاسم، محمد علی صدیقی، ڈاکٹر مبارک علی، کشور ناہید، مسعود اشعر، امینہ سید، ڈاکٹر انور سجاد، درمش بلگر، سعید نقوی اور محمد حسین سید پر مشتمل تھی۔پہلے روز کے دوسرے سیشن میں دوسرے اور تیسرے سیشن کو ملا کر ایک کر دیا گیا۔ یہ سیشن نیشنل اکیڈمی آف پرفارمنگ آرٹس، ناپا سے شائع ہونے والی کتابوں، ضیا محی الدین کی ’تھیٹرکس‘، شکیسپئر کے دو کھیل ترجمہ خالد احمد، دو یونانی کلاسیکی ڈرامے ترجمہ عقیل روبی کے اجرا کے حوالے سے تھا۔ جبکہ دوسرا سیشن ’ضیا محی الدین اعترافِ کمال‘ کے عنوان سے تھا۔ اس سیشن کی مجلسِ صدارت شمیم حنفی، انتظار حسین، راحت کاظمی، آصف فرخی اور احمد شاہ پر مشتمل تھی۔ اس سیشن میں شمیم حنفی، انتظار حسین، راحت کاظمی اور آصف فرخی نے خطاب کیا۔ نظامت ارشد محمود نے کی اور آخر میں خود ضیا محی الدین نے الف لیلٰی پر انتظار حسین کا پیش لفظ، مشتاق یوسفی، ابنِ انشا کی تحریریں اور میرا جی کی نظم سمندر کا بلاوا پڑھی۔
Monday, December 3, 2012
عام آدمیپارٹی
نئی دہلی۔03 دسمبر(پی ایس آئی) ہندستان میں کرپشن کے بارے میں عوامی تشویش میں اضافہ ہو رہا ہے اور اس کے ساتھ ہی ایک ممتاز شخصیت نے کرپشن کے خلاف ایک ایسی سیاسی پارٹی تشکیل دی ہے جس نے حکومت کو کرپشن سے پاک کرنے کا عہد کیا ہے۔اگرچہ اس پارٹی کے سیاسی مستقبل کے بارے میں ابھی کچھ کہنا مشکل ہے، لیکن نئی پارٹی سے سرکاری سیاسی حلقوں میں ہلچل مچ گئی ہے اور رشوت ستانی کا مسئلہ عوامی توجہ کا مرکز بن گیا ہے۔
اس نئی سیاسی پارٹی کا نام عام آدمی ہے۔ اس کے کرتا دھرتا شعلہ بیان 44 سالہ سابق ٹیکس افسر اروند کجری وال ہیں جو کرپشن کے خلاف ایک ملک گیر مہم میں پیش پیش تھے۔ جب یہ مہم جو ایک طاقتور اور با اختیار محتسب کے قیام کے لیے چلائی گئی تھی، دم توڑ گئی، تو کجری وال نے عہد کیا کہ وہ معاشرے میں پھیلے ہوئے کرپشن کے خلاف جنگ کے لیے سیاسی طریقہ کار اختیار کریں گے۔
کجری وال کہتے ہیں کہ ان کا مقصد ہندستان کے رشوت اور بد عنوانی سے بھر پور سیاسی نظام کو جڑ سے اکھاڑ پھینکنا ہے۔ ان کا کہنا ہے کہ ”ہم ان ضابطوں کے تحت انتخابات نہیں لڑیں گے۔ ہم ان ضابطوں کو تبدیل کرنا چاہتے ہیں۔ انتخابات پیسے اور دھونس دھاندلی کے زور پر، ذات پات اور مذہب کی بنیاد پر لڑے جاتے ہیں۔ ہم ایسا نہیں کریں گے۔“
عام لوگوں میں بے تحاشا رشوت کے خلاف سخت غم و غصہ موجود ہے۔ ڈرائیونگ لائسنس اور گیس کے کنیکشن جیسے چھوٹے چھوٹے کاموں سے لے کر اربوں ڈالر کے اسکینڈلز تک جن میں اعلیٰ سرکاری افسر ملوث ہوتے ہیں، ہر طرف رشوت کا بازار گرم ہے۔ گذشتہ دو برسوں میں کرپشن کے بعض بڑے بڑے اسکینڈل منظرِ عام پر آئے ہیں، اور لوگوں میں ناراضگی عروج پر پہنچ گئی ہے۔نئی دہلی کے سیاسی مبصر یوگندر یادو جو نئی پارٹی کے ایک اہم رکن ہیں، کہتے ہیں کہ وقت آ گیا ہے کہ کرپشن کے خلاف سیاسی سطح پر تحریک چلائی جائے۔ ان کے مطابق ”پورے سیاسی نظام کے بارے میں شدید بے اطمینانی پائی جاتی ہے، اور یہ ایک غیر معمولی، بلکہ تاریخی موقع ہے کہ ہم ایک مختلف قسم کی سیاست کا آغاز کریں۔ ہمارا منصوبہ ہے کہ ہم ایسا ہی کریں گے۔“
کجری وال نے حکمران کانگریس پارٹی اور حزبِ اختلاف کی بھارتیہ جنتا پارٹی دونوں پر بد عنوانی پر مبنی نظام کے فروغ کے لیے گٹھ جوڑ کا الزام عائد کیا ہے۔ انھوں نے کھلے عام ہندستان کے بعض انتہائی با اثر لوگوں کا نام لیا ہے جو اس ہیر پھیر میں ملوث ہیں۔ان میں سب سے بڑا نام رابرٹ وادرا کا ہے جو کانگریس پارٹی کی سربراہ سونیا گاندھی کے داماد ہیں۔ کجری وال نے ان پر الزام لگایا ہے کہ انھوں نے ہندستان کے بعض سب سے بڑے پراپرٹی ڈیلرز کے ساتھ ساز باز کی ہے اور زمین کے سودوں میں دھوکے بازی سے بڑی مقدار میں دولت اکٹھی کر لی ہے۔ وزیرِ خارجہ، حزبِ اختلاف کی بڑی پارٹی کے سربراہ، اور ملک کا سب سے بڑا کاروباری ادارہ، ریلائنس بھی ان کی تنقید کا نشانہ بنا ہے۔ ان سب نے الزامات کی صحت سے انکار کیا ہے۔
میڈیا میں کجری وال کی تعریف ہوئی ہے اور ان پر تنقید بھی کی گئی ہے۔ کچھ لوگوں کا خیال ہے کہ وہ کرپشن کے خلاف لڑ رہے ہیں جب کہ بعض دوسرے لوگ انہیں سیاسی موقع پرست کہتے ہیں جو ایک مسئلے سے فائدہ اٹھا رہے ہیں جو بہت سے ہندستانیوں کے لیے پریشان کن ہے۔
نئی دہلی کی جواہر لال یونیورسٹی میں سیاسیات کی پروفیسر، زویا حسن کہتی ہیں کہ اس نئی پارٹی نے کرپشن کو ہندستانی سیاست کا مرکزی مسئلہ بنا دیا ہے۔ انھوں نے کہا کہ”یہ لوگ سیاست اور بزنس کے درمیان گٹھ جوڑ کو بے نقاب کرنے میں کامیاب ہوگئے ہیں۔ اس کا کچھ اثر ہو سکتا ہے کیوں کہ متوسط طبقے کے لوگ اور میڈیا میں کرپشن کے بارے میں تشویش موجود ہے۔ ممکن ہے کہ اس کی وجہ سے کرپشن کے خلاف قانون سازی کی رفتار تیز ہو جائے، اور میرا خیال ہے کہ حکومت اور بیوروکریسی دونوں میں کرپشن کے مسئلے کے شعور میں اضافہ ہو گا۔“
حکمران کانگریس پارٹی تسلیم کرتی ہے کہ کرپشن کو جڑ سے اکھاڑنا ضروری ہے، اور وہ ایسا کرنے کی پابند ہے۔ لیکن اس نے نئی سیاسی پارٹی کو شعبدہ بازی کہہ کر مسترد کر دیا ہے۔کئی سیاسی تجزیہ کاروں نے یہ بھی کہا ہے کہ اگرچہ کجری وال میڈیا میں سرخیوں کی زینت بن رہے ہیں، لیکن ہندستان میں کرپشن کے خلاف جنگ لڑنا ایک چھوٹی سی نئی پارٹی کے بس کی بات نہیں جس کی سرگرمیاں ملک کے شمالی حصے تک محدود ہیں۔اس پارٹی کی اصل آزمائش اس وقت ہوگی جب یہ اگلے سال ہندستان کے دارالحکومت میں مقامی انتخاب میں، اور 2014ء میں عام انتخابات میں حصہ لے گی۔زویا حسن کہتی ہیں کہ عام آدمی نامی پارٹی کا محدود ایجنڈا ایک بڑا مسئلہ ہے۔ اس نے سیاست میں ہلچل تو مچا دی ہے، لیکن اس بات کا امکان بہت کم ہے کہ اس کی وجہ سے انتخابی سیاست میں کوئی بڑا فرق پڑے گا۔
Tuesday, November 6, 2012
Monday, October 15, 2012
بجلی کا بحران
ہندوستان کی ریاستیں اترپردیش اور مدھیہ پردیش کے درمیان سونبھدر اور سنگرولی دو ایسے علاقے ہیں جو بجلی کی پیدوار کرنے کے باوجود اندھیرے میں ڈوبے ہیں اور وہاں کے لوگ مختلف بیماریوں میں مبتلا ہیں۔’توانائی کے دارالحکومت‘ کہے جانے والے اس علاقے میں ہر گھنٹے دس ہزار میگا واٹ بجلی پیدا کی جاتی ہے اور یہ علاقے ملک کی بجلی کی پیداوار میں دس فی صد سے زیادہ کی حصہ داری رکھتے ہیں۔سونبھدر کا یہ علاقہ ایشیا میں تجارت کے اعتبار سے اہم ہے لیکن یہاں ہر گھر میں بے روزگاری، بدحالی اور بیماری ہے۔کوئلہ کانوں کی کالکی اور بجلی کے کارخانوں کی راکھ میں ڈوبی ایسی ہی ایک اندھیری بستی میں جب ہم پہنچے تو ہماری ملاقات پچپن سالہ سنیتا سے ہوئی جو گزشتہ پندرہ برسوں میں کبھی اپنے گھر سے باہر نہیں نکلی ہیں۔ ہاتھ پیروں سے معذور سنیتا کے پانچ افراد پر مشتمل خاندان میں چار افراد معذوری کا شکار ہیں۔لرزتے ہاتھوں سے مائیک پکڑنے کی کوشش کرتے ہوئے سنیتا نے کہا ’یہ علاقہ کبھی بہت زرخیز ہوا کرتا تھا۔ میری شادی ہوئی تو سب نے کہا میں یہاں بہت عیش کروں گی۔ لیکن چالیس برس کی عمر ہوتے ہوتے میرے ہاتھ پیر بے جان ہونے لگے۔ تب سے میں صرف بیٹھ کر ہی چل پاتی ہوں۔ بیٹا ہوا تو یہ احساس ہوا کہ بڑھاپے میں سہارا بنے گا لیکن اس کے ہاتھ پاو ¿ں تو بچپن سے ہی بیکار ہیں۔ کسی طرح اس کی شادی ہوئی تو اب پوتے کے پیر ٹیڑھے ہونے لگے ہیں۔‘بجلی کے کارخانوں سے نکلنے والے فلورائڈ کی وجہ سے علاقے میں معذوری پھیل رہی ہے۔سونبھدر اور سنگرولی صنعتی علاقے کے تقریباً سو کلومیٹر کے دائرے میں شاید ہی کوئی گاو ¿ں، کوئی علاقہ ایسا ہو جہاں ہر گلی محلے میں بچے اور بوڑھے رینگتے، لاٹھیوں کے سہارے نہ چلتے ہوئے نظر آئیں۔پانی میں فلورائڈ کی موجودگی لوگوں کے جسم کی ہڈیوں کو نشانہ بناتی ہے۔پاس کے علاقے رینوکوٹ میں سرکاری ڈاکٹر راجیو رنجن کہتے ہیں ’لوگ ہینڈ پمپ اور ندیوں سے پانی لاتے ہیں جس میں کارخانے سے نکلا فلورائڈ پوری طرح گھل چکا ہے۔ اس کا اثر جسم کی ہڈیوں اور دانتوں پر پڑتا ہے۔ فلورائڈ سے ایک بار ہڈی بیکار ہوجاتی ہے اور اس کا کوئی علاج بھی نہیں ہے۔‘ہندوستان کا شمار دنیا کی دوسری سب سے تیزی ترقی کرنے والی معیشت کے طور پر کیا جارہا ہے اور ترقی کی رفتار مزید تیز کرنے کے لیے اس بجلی کی ہر قیمت پر ضرورت ہے۔ یہی وجہ ہے ہندوستان نے سال دوہزار بارہ اور سترہ کے درمیان بجلی کی پیداوار میں سالانہ اضافہ کا ہدف ایک لاکھ میگا واٹ رکھا ہے۔حکومت شاید اس ہدف کو پورا کربھی لے لیکن جن علاقوں میں بجلی کے کارخانے لگے ہیں وہاں کے لوگوں کی زندگی داو ¿ پر لگی ہے۔ایک تازہ جائزے کے مطابق سونبھدر سنگرولی کے علاقوں میں ہوا، پانی اور مٹی ہی نہیں بلکہ وہاں رہنے والے لوگوں کے خون میں پارے یعنی مرکری کے نمونے پائے گئے ہیں۔اس علاقے میں پارہ اپنا اثر دکھا رہا ہے لیکن حکومت کی جانب اس کی کوئی تفتیش نہیں ہوئی ہے۔ہندوستان میں بجلی کی مطالبہ اور بجلی کی صنعت کے منافے میں اضافہ ہورہا ہے اور ریلائنس جیسی بڑی کمپنیاں ان علاقوں میں بجلی کے کارخانے کھولنے کی تیاری میں ہیں۔ایک اندازے کے مطابق سنہ دوہزار اٹھارہ تک سنگرولی میں بجلی کی پیدوار پینتیس ہزار میگاواٹ تک پہنچ جائے گی۔سنگرولی گاو ¿ں میں پیدا ہونے والی بجلی پورے ملک کو جاتی ہے لیکن گاو ¿ں اندھیرے میں ڈوبا ہے۔ چالیس برس میں ابھی بھی وہاں صرف چند گھنٹوں کے لیے کبھی کبھی بجلی آتی ہے۔تو کیا ملک کی معیشت میں اہم کردار ادا کرنے والے ان علاقوں کے لیے لوگوں یا حق نہیں ہے کہ انہیں نہ صرف بجلی ملے بلکہ ہو صحت یاب اور اقتصادی اعتبار سے بہتر زندگی گزاریں؟
Thursday, October 11, 2012
قفس کی تیلیوں سے
ہندوستان کی جیلوں میں قیدیوں کی بڑھتی تعداد اور جیل کے ماحول نے قیدیوں کی اصلاح کے پروگرام کو بری طرح متاثر کیا ہے۔ لیکن جے پور کے مرکزی جیل نے اسی ماحول میں اصلاح کی ایک نئی راہ نکالی ہے۔جیل انتظامیہ نے قیدیوں میں پینٹنگ کے ہنر کے فروغ کا پروگرام تیار کیا ہے۔ عمر قید کی سزا کاٹنے والے انیس قیدیوں نے ایسی شاندار تصویریں بنائیں کہ وہ اب فروخت ہونے لگی ہیں۔جے پور میں پچھلے دنوں مہاتما گاندھی کی سالگرہ کے موقع پر ان کی تصاویر کی نمائش بھی لگائی گءجن میں سے ایک تصویر تقریبا تیس ہزار روپے میں فروخت ہوئی۔راجستھان کے وزیراعلیٰ اشوک گہلوت بھی قیدیوں کے برش سے بنی تصویروں کی نمائش میں شامل ہوئے۔انہوں نے کہا ’یہ قیدیوں میں اصلاح کی جانب ایک پہل ہے۔ مہاتما گاندھی نے بھی ہمیشہ قیدیوں کی زندگی کو بہتر بنانے پر زور دیا تھا۔ ان تصویروں سے قیدیوں کے فن کا پتہ چلتا ہے۔ حکومت ہمیشہ اس سمت میں کوشش کرتی رہی ہے تاکہ قیدی جب جیل سے باہر اپنی نئی زندگی شروع کریں تو اچھے شہری بن کر آئیں۔‘قیدیوں کی پینٹنگ کی حوصلہ افزائی کے لیے جیل انتظامیہ نے پینٹنگ کے اساتذہ کی مدد لی اور ان کی تربیت کا انتظام کیا۔اس جیل میں ایسے چالیس قیدی تھے جنہوں نے پینٹنگ سیکھی۔ ان میں سے انیس قیدیوں نے ایسی تصویریں بنائیں کہ ان کی خوب صورتی کو دیکھتے ہوئے نمائش میں جگہ دی گئی۔قیدیوں کی تصاویر میں امید کی کرن کے طور پر مناظر قدرت کے نمونے ہیں تو چند پینٹنگز میں مذہب اور روحانی ماحول کو بھی دکھایا گیا ہے۔جیل کے نائب انسپکٹر جنرل سرور خان کا کہنا ہے ’ان قیدیوں میں سے ایک مان بہادر تھاپا نے ایک ماہر فنکار کی طرح تصویروں کا گراف کیا ہے۔ قیدیوں کی اس ہنر میں دلچسپی اور لگن پیش نظر جیل کے اندر کا ماحول بہتر بنانے کا کام تیزی سے جاری ہے۔‘ان تصویروں میں زندگی کے رنگ بھرنے والے قیدی ابھی جیل کی سلاخوں کے پیچھے ہیں مگر ان کے ہاتھوں بنی تصو?ریں جیل کے باہر ان کی صلاحیت کا لوہا منوا رہی ہیں۔جے پور کے ایک پینٹر گوپال ?ھیتانچ? ان پینٹنگز کے بارے میں کہتے ہیں ’اگر ان میں سے کچھ کو مناسب تعلیم ملے تو وہ بہتر آرٹسٹ ہو سکتے ہیں۔ پھر فن آپ میں اچھے ہونے کا احساس پیدا کرتی ہے۔ یہ ایک اچھی پہل ہے۔ فن انسان میں نرمی پیدا کرتی ہے۔‘قیدیوں کے ہاتھوں بنی ان تصویروں میں زندگ? کے شوخ رنگ بھی ہیں ان کا کینوس امید کی روشنی سے چمک رہا ہے۔ کبھی ان ہاتھوں نے جرم کی عبارت لکھی اب دلکش تصویر بناتے ہیں۔شاید اسی لیے کچھ لوگ کہتے ہیں کہ جرم کے لیے ہاتھ نہیں حالات ذمہ دار ہوتے ہیں۔
ملالہ کی ڈائری سے
ملالہ کی داستا دکھاتی ہے کہ شمالی - مغربی پاکستان کی سوات میں طالبان کے جانے کے بعد بھی، ایک 14 سالہ لڑکی کی زندگی کتنے خوف، درد اور مشکلات سے بھری ہے۔ خوشحال اسکول میں پڑھنے والی ملالہ بھی اپنے علاقے کی اور لڑکیوں کی طرح بچپن کی عام مسرت کی راہ تکتی رہتی تھی اور مل جائیں تو محفوظ رکھتی تھی۔ لیکن ملالہ الگ نکلےں، کیونکہ انہوں نے ہمت اور جدوجہد کا راستہ منتخب کیا۔ ملالہ پہلی بار شہ سرخیوں میں 2009 میں آئی جب 11 سال کی عمر میں انہوں نے طالبان کے سائے میں زندگی کے بارے میں گل مکائی نام سے بی بی سی اردو کے لیے ڈائری لکھنا شروع کیا۔ وہ ڈائری کسی بھی بیرونی شخص کے لئے سوات کے علاقے اور اس میں رہنے والے بچوں کی مشکل صورت حال کو سمجھنے کا بہترین آئینہ ہے۔ اس کے لئے ملالہ کو بہادری کے لئے قومی اےوارڈملا اور سال 2011 میں بچوں کے لیے بین الاقوامی امن انعام کے لئے نامزد کیا گیا۔ پاکستان کی سوات میں طویل طالبان شدت پسندوں کا دبدبہ تھا لیکن گزشتہ سال فوج نے طالبان کو وہاں سے نکال پھینکا۔ گزشتہ سال بی بی سی سے بات چیت میں ملالہ نے بتایا کہ طالبان کے آنے سے پہلے سوات ایک دم خوش حال تھا لیکن طالبان نے آکر وہاں لڑکیوں کے تقریبا 400 اسکول بند کر دیے۔
اس دور میں ملالہ نے ڈائری میں لکھا، ’طالبان لڑکیوں کے چہرے پر تیزاب پھینک سکتے ہیں یا ان کا اغوا کر سکتے ہیں، اس لیے اس وقت ہم کچھ لڑکیاں یونیفارم کی جگہ سادہ کپڑوں میں اسکول جاتی تھیں تاکہ لگے کہ ہم طالب علم نہیں ہیں۔ اپنی کتابیں ہم شال میں چھپا لیتے تھے۔ ‘اور پھر کچھ دن بعد ملالہ نے لکھا تھا،’ آج اسکول کا آخری دن تھا اس لئے ہم نے میدان پر کچھ زیادہ دیر کھیلنے کا فیصلہ کیا۔ میرا خیال ہے کہ ایک دن اسکول کھلے گا لیکن جاتے وقت میں نے اسکول کی عمارت کو اس طرح دیکھا جیسے میں یہاں پھر کبھی نہیں آو ¿ں گی۔‘فوج کی کارروائی کے بعد، سوات میں صورتحال بدل رہی ہے۔ نئے اسکول بھی بنائے جا رہے ہیںلےکن ملالہ کہتی ہیں یہ سب بہت جلد ہونے کی ضرورت ہے کیونکہ گرمی میں تمبوو ¿ں میں پڑھنا بہت مشکل ہے۔ حالانکہ ملالہ اس بات پر چین کی سانس لیتی ہیں کہ کم سے کم اب ان جیسی لڑکیوں کو اسکول جانے میں کوئی خوف نہیں ہے۔ ملالہ کا کہنا ہے کہ وہ بڑے ہو کر قانون کی تعلیم حاصل کر کے سیاست میں جانا چاہتی ہیں۔ انہوں نے کہا تھا،’میں نے ایسے ملک کا خواب دیکھا ہے جہاں تعلیم سب سے اہم ہو۔‘ساتھ ہی ملالہ یاد کرتی ہیں کہ طالبان کے دور میں لڑکیاں اور خواتین بازار نہیں جا سکتی تھیں،طالبان کو کیا معلوم کہ خواتین جہاں بھی رہیں، انہیں خریداری پسند ہے۔ وہ کہتی ہیں کہ بازار میں کسی طالب سے پکڑے جانے پر ڈانٹا جانا یا گھر لوٹا دیا جانا یا پھر مارا جانا، ایسے تجربے اب بھی یاد آتے ہیں تو وہ سہر جاتی ہیں۔ اس دور میں خواتین گھر سے باہر کس طرح کا برقع پہن کر جائیں اس پر بھی روک ٹوک تھی، ملالہ کہتی ہیں کہ ان چھوٹی چھوٹی پابندیوں سے آزادی کا احساس بہت سکون دیتا ہے۔
Sunday, October 7, 2012
कौन हैं रॉबर्ट वाड्रा?
यूँ तो रॉबर्ट वाड्रा उस समय से ही चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने भारत के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और सबसे प्रभावशाली महिला सोनिया गाँधी की बेटी प्रियंका गाँधी से शादी की थी.उस वक्त भारत का ये नवविवाहित जोड़ा न सिर्फ चर्चा में रहा बल्कि लोग जानना चाहते थे कि ये रॉबर्ट वाड्रा हैं कौन?रॉबर्ट वाड्रा का दरअसल हैंडीक्राफ्ट आइटम्स और कस्टम आभूषणों का कारोबार है और उनकी कंपनी का नाम है आर्टेक्स एक्सपोर्ट्स.इसके अलावा भी रॉबर्ट वाड्रा की कई कंपनियों में भागीदारी है.रॉबर्ट वाड्रा 18 अप्रैल 1969 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में पैदा हुए. मुरादाबाद भारत में पीतल के काम के लिए प्रसिद्ध है. उनके पिता राजेंद्र वाड्रा पीतल व्यवसायी थे और माँ मूलत: स्कॉटलैंड की रहने वाली है.मूल रुप से वाड्रा परिवार पाकिस्तान के सियालकोट से है, भारत विभाजन के समय राजेंद्र वाड्रा के पिता यानि रॉबर्ट वाड्रा के दादा भारत आकर बस गए.रॉबर्ट वाड्रा के एक भाई और एक बहन थीं.2001 में उनकी बहन की कार दुर्घटना में मौत हो चुकी है और 2003 में उनके भाई ने आत्महत्या की थी. 2009 में उनके पिता की हृदयगति रुक जाने से मृत्यु हो गई. अब वाड्रा परिवार में उनकी माँ ही उनके साथ है.कहा जाता है कि रॉबर्ट अपनी मां के बेहद करीब हैं और उनकी माँ का कहना है कि रॉबर्ट और प्रियंका गलत वजहों से सुर्खियों में आते हैं.रॉबर्ट वाड्रा के एक बेटा और एक बेटी है.रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की मुलाकात 1991 में दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी. बाद में दोनों की नज़दीकियां बढ़ीं और दोनों ने 18 फरवरी, 1997 को शादी कर ली. प्रियंका से विवाह करने के बाद रॉबर्ट वाड्रा का जीवन ही बदल गया.रॉबर्ट वाड्रा मोटर साइकिलों और कारों के भी शौकीन हैं. कहा जाता है कि वाड्रा के पास कई शानदार विदेशी कारों के अलावा मोटर साइकिलें भी हैं.व्यापार के साथ साथ रॉबर्ट वाड्रा फिटनेस और फैशन में भी काफी दिलचस्पी रखते हैं.दिसंबर 2011 में रॉबर्ट वाड्रा को एक अंग्रेजी अखबार ने बेस्ट ड्रेस्ड मैन का खिताब दिया था.
Tuesday, September 25, 2012
सोनिया के 'दाएं हाथ' अहमद पटेल
हाल के कुछ सालों में कांग्रेस में संकट मोचक की भूमिका अदा करने वाले प्रणव मुखर्जी अब रायसीना हिल्स की लाइबेरी में बैठकर आराम से किताबों की खाक छान रहे हैं, लेकिन कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। प्रणब के जाने के बाद संकट मोचक की भूमिका पूरी तरह से गांधी परिवार के सबसे वफादार सिपहसालार माने जाने वाले सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के हाथों में आ गर्इ है। राजनीतिक दल और मीडिया में 'अहमद भाई' के नाम से मशहूर अहमद पटेल गुजरात से आते हैं। उनके रसूख और असर के बारे में जानने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अहमद पटेल की मर्जी के बिना कांग्रेस पार्टी के 'शक्तिस्थल' माने जाने वाले सोनिया गांधी के आवास 10, जनपथ में पत्ता तक नहीं हिलता है। कांग्रेस का कोई कार्यकर्ता हो या फिर किसी राज्य का मुख्यमंत्री, अहमद पटेल की इजाजत के बिना सोनिया गांधी से मुलाकात तक नहीं कर सकता है। आखिर इस नेता में ऐसा क्या है कि वे सोनिया के सबसे करीबी और राजनीतिक सलाहकार बने हुए हैं। सोनिया ने पटेल को पूरी तरह 'फ्री हैंड' दिया हुआ है। यही वजह है कि कोई कांग्रेसी अहमद पटेल से दुश्मनी मोल लेना तो दूर संबंध खराब करने की भी नहीं सोच सकता है।
Friday, September 21, 2012
Thursday, September 6, 2012
سیکورٹی ایجنسی کی خود احتسابی کی ضرورت
معراج نوری
گذشتہ 18جولائی کے ہندوستان کے اےک معتبر ہندی روزنامہ کے ایک شمارے میںکرکٹ کے تعلق سے ایک خبر پڑھنے کو ملی جس میں اس بات پر روشنی ڈالی گئی تھیکہ ہندو پاک کرکٹ ٹیموں کے در میان مجوزہ سیریز اگر ہندوستان مےںکھیلی جاتی ہے تو تحفظات کے نقطہ ¿ نظر سے اس میچ کو دیکھنے کے خواہش مند پاکستانی کرکٹ شائقین کو ہندوستان آنے کا ویزہ ایسے ہی نہیںدیا جائے گاجیسے اب تک دیا جاتا ہے یعنی معمولی خانہ پری کئے ہوئے بلکہ اب اس جانب پھونک پھونک کر قدم بڑھائے جائیں گے۔ اس خبر میں مرکزی وزارت داخلہ کے حوالے سے یہ بات کہی گئی ہے کہ ہر کھلاڑی کو تحفظ دینا ہماری ذمہ داری ہے اور ہم اس کے لئے تیار بھی ہیں لیکن کرکٹ میچ دیکھنے آنے والے ہر ایک باشندے کو مکمل جانچ پڑتال کے بعد ہی ویزا جاری کیا جائے گا۔ یہ احتیاط اس لئے برتا جارہا ہے تاکہ 26/11ممبئی حملے کا ملزم اسجد میر جیسا کوئی دہشت گرد پھر سے اس ملک میں نہ گھس آئے۔ ہندوستانی وزارت داخلہ کا یہ بھی کہنا ہے کہ وزارت اس بات کو یقینی بنانا چاہتا ہے کہ کہیں کوئی پاک نژاد دہشت گرد کرکٹ کی آڑ میں ہندوستان نہ آجائے ۔یہی نہیں ضرورت پڑنے پر میچ دیکھنے آنے والے پاک شائقین کو ویزا حاصل کرنے کے لئے گارینٹر کی بھی ضرورت پڑسکتی ہے۔
یہ چیزیں تو ظاہر ہے کہ تحفظات اور سلامتی کے تعلق سے ضروری ہےں ےا یوں کہیں کہ نہایت ضروری ہیں جو ملک ہندوستان کے ہر ایک عوام کے تئیں حکومت وقت کی بھی ذمہ داری ہے کہ وہ حالات کے اعتبار سے فیصلہ سازی کر کے ملک کی سالمیت اور تحفظات کو یقینی بنائے۔ اس کے برعکس اس خبر میں وزارت داخلہ کے حوالے سے ہی ایک اور بات کہی گئی ہے اور وہی بات ہے جس نے ہمیں اس مضمون کو لکھنے پر مجبور کیا ہے۔ وہ یہ ہے کہ وزارت داخلہ کے ایک سینئر افسر نے کہا ہے کہ” ہر پاکستانی کرکٹ شائقین جو اس سیریز کا لطف اٹھانے ہندوستان آئے گا اس پر اس وقت تک نظر رکھی جائے گی جب تک وہ یہاں سے واپس نہیں چلاجاتا ہے ۔کیونکہ سابق میں کرکٹ میچ دیکھنے آئے پاکستانی باشندے یہاں آکر گم ہوچکے ہیں جنہیں ہماری سیکورٹی ایجنسیاں اب تک نہیں ڈھونڈپائی ہیں۔“
وزارت داخلہ کے افسر کا یہ بیان اپنے آپ میں نہ صرف ایک بیان ہے بلکہ اس میں دو باتیں پوشیدہ ہیں۔ اولاً یہ کہ اس سے ہماری سیکورٹی ایجنسیوں کی ناکامی اور بے بسی کا پتہ چلتا ہے کہ 120کروڑ ہندوستانی عوام کی سیکورٹی جس ایجنسی کے سپرد ہے اور جس پر سالانہ کروڑوں روپے صرف ہوتے ہیں ا نہیں وہ چند پاکستانی لوگ بھی چکمادے کر ان کی نظر سے پوشیدہ اسی ہندوستان میں رہ رہے ہیں۔ اسے ہندوستانی سیکورٹی ایجنسی کی بے بسی کہیں یا غفلت یا مجبوری کہ وہ جس کام کے لئے وجود میں آئی ہے وہ کام ہی وہ انجام نہیں دے پارہی ہے۔ یہ ایک ایسا المیہ ہے جس سے ہر ہندوستانی کی سلامتی کو خطرات لاحق ہونے کا خدشہ پیدا کرتا ہے۔ سوال یہ بھی پیدا ہوتا ہے کہ آیا جب سیکورٹی ایجنسی خود اس بات کو تسلیم کرتی ہے کہ چند وہ افراد جن کے تعلق سے یہ پتہ بھی ہے کہ وہ ہندوستانی ویزا پر ہندوستان آیا تو ضرور ہے لیکن واپس گیا نہیں تو آخر وہ ہے کہاں؟تو پھر اس سیکورٹی کے کیا معنی؟ ےایہ کہ اس کی کیا ضرورت رہ گئی کہ جس پر عام عوام کی جیب سے لیا گیا پیسہ صرف کیا جائے۔
اس تعلق سے دوسرا پہلو نہ صرف چونکا دینے والا ہے بلکہ ہندوستانی اقلیتوں بالخصوص مسلمانوں کے تعلق سے نفی سوچ کی عکاسی کرتا ہے۔ یہاں اہم سوال یہ ہے کہ ہماری جس سیکورٹی ایجنسی کو معدودے چند پاکستانیوں کا ہندوستان میں پتہ ڈھونڈنا مشکل ہے وہی سیکورٹی ایجنسیاں یکایک کیسے اتنی فعال، ایماندار اور جاذب ہوجاتی ہے کہ ادھر بم دھماکہ ہوا اور اگلے چند گھنٹوں میںاسے یہ معلوم ہوجاتا ہے کہ اس میں لشکر طیبہ ، ہوجی ، سیمی اور حزب المجاہدین کا ہاتھ ہے ۔اس ایجنسی میں اتنی چستی اور پھرتی کیسے آجاتی ہے کہ ادھربم دھماکہ ہوا اور اگلے دو چار گھنٹے میں ہی کشمیر سے کنیاکماری تک چھان مار کر دوچار مسلمانوں کو گرفتار کر کے اپنی پیٹھ تھپتھپانے لگتی ہے۔ آخر کیا وجہ ہے کہ جس سیکورٹی ایجنسی کو پاکستانیوں کا اتا پتہ نہیں ہوتا اسے بہار کے مدھوبنی، دربھنگہ، سیتا مڑھی ، اترپردیش کے اعظم گڑھ اور مہاراشٹر کے مالے گاﺅں میں ہر ایک مسلم چہرہ دہشت گرد نظر آتا ہے۔ آخر سیکورٹی ایجنسی اس طرح کا عمل کر کے کیا ثابت کرنا چاہتی ہے؟ کیا اس کے احتساب کا وقت نہیں آیا کہ وہ خود اپنے گریبان میں جھانکے اور خود احتساب کرے کہ آیا ایک معرکہ پر تو ہم ایسے بے بس، لاچار اور بے حس نظر آتے ہیں کہ لوگوں کو ہم پر ترس آتا ہے اور دوسری جانب جب بات مسلمانوں کے تعلق سے آتی ہے تو یکایک ہم میں اتنی چستی اور پھرتی کیسے آجاتی ہے کہ ہم شک کی نگاہ سے دیکھے جانے لگتے ہیں۔ یہاں سوال سیکورٹی ایجنسی کی کامیابی اور ناکامی کا نہیں ہے بلکہ اس کی گندی اور فرقہ پرست ذہنیت کا ہے جو نہ صرف مسلمانان ہند کے لئے خطرے کی گھنٹی ہے بلکہ ملک ہندوستان جو دنیا کی سب سے بڑی جمہوریت کا تمغہ لئے ہے اس کے لئے بھی خطرے کی گھنٹی ہے۔ اب بھی وقت ہے کہ نظام کی سطح پر اس جانب غیر جانبداری، ایمانداری اور انصاف پسندی سے کام لیتے ہوئے ذہنیت کو مثبت سمت دی جائے ورنہ وہ دن دور نہیں جب ناانصافی ، عدم مساوات اور فرقہ پرست ذہنیت ملک ہندوستان کا بیڑا غرق کر کے اس کی شناخت کو ثبوتاز کردے گی۔
merajnoorie.blogspot.com
+919013194626
Thursday, August 23, 2012
Sunday, August 19, 2012
Saturday, August 18, 2012
Subscribe to:
Comments (Atom)
सुशासन की त्रासदी
मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...
-
عظیم فن کار کندن لال سہگل کی مقبولیت ہر کوئی خاص وعام میں تھی، لیکن منگیشکر خاندان میں ان کا مقام علیٰحدہ تھا۔ اس گھر میں صرف اور صرف سہگل ...
-
अहमदाबाद। पूरी दुनिया को अपनी जादूगरी से हैरान कर देने वाले और विश्व प्रख्यात जादूगर के. लाल अब अपने जीवन का अंतिम शो करने जा रहे हैं। ...





























