Friday, July 29, 2011

आखिर RTE से क्यों डरता है दारुल उलूम


दुनिया के प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थानों में शुमार दारुल उलूम देवबंद ने शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के खिलाफ आवाज उठाने का ऐलान किया है। आरटीई में शिक्षण संस्थान चलाने के लिए जो प्रावधान जरूरी हैं, अधिकांश मदरसे उनका पालन नहीं कर पाएंगे। इसीलिए देवबंद इसका विरोध कर रहा है।
माली हालत अच्छी नहीं
शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हो जाने के बाद निजी विद्यालयों की तरह अब उर्दू मदरसों को भी तमाम सुविधाएं जुटानी होंगी। मान्यता के बुनियादी आधार के लिए संचालित समिति का रजिस्ट्रेशन, भवन की उचित व्यवस्था, लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग सुविधा घर की व्यवस्था, समुचित पेयजल व्यवस्था, योग्य शिक्षकों द्वारा अध्यापन कराना और संचालन समिति का नियमित आडिट होना बेहद जरूरी होगा। अधिकांश मदरसे उनका पालन नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनकी माली हालत अच्छी नहीं होती है।
पाठ्यक्रम सैकड़ों वर्ष पुराना
संविधान के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपना शैक्षिक पाठ्यक्रम पढ़ा सकते हैं या सरकार द्वारा निर्धारित शैक्षिक पाठ्यक्रम में तब्दीली के साथ शिक्षा दे सकते हैं। लेकिन शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 8 और 9 के तहत यह अधिकार सरकार तथा स्थानीय निकायों को दे दिया गया है। क्योंकि मदरसों में जो पाठ्यक्रम लागू किया जाता है वह सैकड़ों वर्ष पुराना है। इसलिए आरटीई के हिसाब से मदरसों को अपना पाठयक्रम भी बदलना पड़ेगा। इस कानून लागू होने से धार्मिक शिक्षा देने के लिए शिक्षक की योग्यता निर्धारित करने का अधिकार भी छिन गया है।
मदरसों की शिक्षा कितनी उपयोगी
मदरसा अरबी भाषा का शब्द है एवं इसका अर्थ है शिक्षा का स्थान। इस्लाम धर्म एवं दर्शन की उच्च शिक्षा देने वाली शिक्षण संस्थाएं भी मदरसा ही कहलाती है। मदरसों के बारे में आम धारणा यही है कि यहां इस्लाम धर्म की शिक्षा दी जाती है एवं यहां से छात्र उसी से संबंधित विषयों में पारंगत होकर निकलते हैं। मदरसों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा देने वाले मदरसों को मकतब कहते है।यहां इस्लाम धर्म का प्रारंभिक ज्ञान कराया जाता है। मध्यम श्रेणी के मदरसों में अरबी भाषा में कुरान एवं इसकी व्याख्या, हदीस इत्यादि पढ़ाई जाती है। इससे भी आगे उच्च श्रेणी के मदरसे होते हैं जिन्हें मदरसा आलिया भी कहते हैं। इनके अध्ययन का स्तर बी.ए. तथा एम.ए. के स्तर का होता है। इनमें अरबी भाषा का साहित्य, इस्लामी दर्शन, यूनानी विज्ञान इत्यादि विषयों का अध्ययन होता है।
क्या है शिक्षा का अधिकार
-देश के हर 6 से 14 साल की उम्र के बच्चे को मुफ्त शिक्षा हासिल होगी यानी हर बच्चा पहली से आठवीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य रूप से पढ़ेगा।
-सभी बच्चों को घर के आसपास स्कूल में दाखिला हासिल करने का हक होगा।
-सभी तरह के स्कूल चाहे वे सरकारी हों, अर्द्धसरकारी हों, सरकारी सहायता प्राप्त हों, गैर सरकारी हों, केंद्रीय विद्यालय हों, नवोदय विद्यालय हों, सैनिक स्कूल हों, सभी तरह के स्कूल इस कानून के दायरे में आएंगे।
-गैर सरकारी स्कूलों को भी 25 प्रति‍शत सीटें गरीब वर्ग के बच्चों को मुफ्त मुहैया करानी होंगी। जो ऐसा नहीं करेगा उसकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।
-सभी स्कूल शिक्षित-प्रशिक्षित अध्यापकों को ही भर्ती करेंगे और अध्यापक-छात्र अनुपात 1:40 रहेगा।
-सभी स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं होनी अनिवार्य है। इसमें क्लास रूम, टॉयलेट, खेल का मैदान, पीने का पानी, दोपहर का भोजन, पुस्तकालय आदि शामिल हैं।
-स्कूल न तो प्रवेश के लिए केपिटेशन फीस ले सकते हैं और न ही किसी तरह का डोनेशन। अगर इस तरह का कोई मामला प्रकाश में आया तो स्कूल पर 25,000 से 50,000 रुपए तक का जुर्माना वसूला जाएगा।
-निजी ट्यूशन पर पूरी तरह से रोक होगी और किसी बच्चे को शारीरिक सजा नहीं दी जा सकेगी।
-गुणवत्ता समेत प्रारंभिक शिक्षा के सभी पहलुओं पर निगरानी के लिए प्रारंभिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाया जाएगा।

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