Tuesday, August 30, 2011
Monday, August 29, 2011
AB BAS EID AAJAYE
اب بس عید آجائے۔۔۔۔
معراج نوری
رمضان کا پاک مہینہ رخصت ہونے والا ہے اور روزے داروں کو عید کا انتظار ہے۔ ایسے میں دو تےن دن بعد رمضان کے آخری روزے پرعقےدتمندوں کی نگاہیں آسمان میں چاند ڈھونڈےںگی۔ عید کا تہوار دھوم دھام سے منانے کے لئے شہر کی مسلم بستیوں میں جوش اور شہر کے بازاروں میں رونق بنی ہوئی ہے۔لوگ مارکیٹ میں خریداری کرنے میں مصروف ہیں۔جوں جوں عید کا تہوار قریب آ رہا ہے شہر میں چاروں طرف تیاریاں زور پکڑنے لگی ہیں۔ مسلمان بے صبری سے عید کا انتظار کر رہے ہیں ۔ یہ انتظار ٹھیک اسی طرح ہوتا ہے جیسے کوئی طالب علم سال بھر کی پڑھائی کے بعد اپنے امتحان کے نتائج کا انتظار کرتا ہے۔ جب اسے پتہ چلتا ہے کہ وہ پاس ہو گیا ہے تو اس کی خوشی کا ٹھکانا نہیں رہتا۔ اسی طرح مسلمان 30 روزے رکھنے کے بعد عید کا انتظار کرتا ہے۔ اب ہر طرف بھائی چارے ، بڑے پیمانے پر دعا اور ہم آہنگی کی علامت تہوار عید کی تاریخ قریب آ رہی ہے۔ مسلمانوں میں خدا کے تئیں وقف ہونے کا جذبہ تیز ہونے لگاہے۔ مساجد میں پانچوں وقت کی نمازےں اور قرآن کی آیتیں پڑھی جا رہی ہیں ، وہیں فرقہ وارانہ اتحاد کےلئے افطار پارٹی بھی منعقد کئے جا رہے ہیں۔ ممکنہ اکتیس اگست کو ہونے والی عید کے لئے مساجد اور عید گاہ کے آس پاس صفائی ، پانی ، بجلی کے انتظامات کئے جا رہے ہےں۔ عید کے موقع پر خصوصی طور پر پسند کی جانے والی کچی سےوےاں 50 روپے فی کلو کے حساب سے دستیاب ہیں۔ حالانکہ سےوےاں گھروں میں بھی بنائی جاتی ہیں ، لیکن اس بار مشین سے بننے والی سےوےاں کی بھی خاصی خریداری ہو رہی ہے۔اس کے علاوہ کھیر کا میوا اور تیل میں تلی جانے والی اشیاءکی خاصی فروخت ہو رہی ہے۔اس تعلق سے بچے بھی خرےداری مےںمصروف ہےںاور حال ہی میں ریلیز ہوئی فلم ”ونس اپن اے ٹائم ان ممبئی“ میں اجے دیوگن نے سلطان مرزا کا رول کرتے ہوئے خصوصی طرح کاجو سوٹ پہنا تھااسے نوجوانوں کے ذریعہ خاصا پسند کیا جا رہا ہے۔جبکہ عید کے موقع پر خواتین کی طرف سے خصوصی طور پر کپڑوں پرقصےدہ کاری وغیرہ بنوائی جا رہی ہیں۔ عید کے حوالے سے خواتین کی طرف سے کپڑوں پرقصےدہ اور اےمبراڈری کاڈیزائن بنوانے اور لیس وغیرہ لگوانے کا کام بھی کروایا جا رہا ہے۔ گزشتہ سالوں کی بنسبت اس سال یہ کام کافی پسند کیا جا رہا ہے۔ ہندوستان جےسے ملک مےںاس کی اور بھی اہمیت ہے کیونکہ یہاںمختلف زبان ،مختلف مذاہب اور طرح طرح سے عبادت کرنے والے لوگ رہتے ہیں۔ ان سب کے درمیان خےر سگالی،محبت اور ےکجہتی کا پیغام دیتی ہے عید۔آج کے دور میں اس انتظار اور عید کی اہمیت اور بڑھ جاتی ہے کیونکہ آج لوگوں کے سامنے جدےد تکنےک پر منحصر” رَف اےنڈ ٹَف“زندگی ، پرتشدد،پرفتن اور مذہبی امور سے بے پرواہ ماحول ہے۔ ایسے حالات میں پاک زندگی جینا آسان نہیں ہے۔ عید کی خوشی کا ایک سبب یہ بھی ہے کہ مسلمان اپنی حیثیت کے مطابق زکوٰةوغےرہ دے کر ان غریب مسلمانوں کو بھی عےد کی خوشی مےں شامل کرتے ہےں جو پوری طرح اس لائق نہیں ، انتہائی غریب ہیں۔عےد کے موقعہ پر ایسے غریب لوگ بھی خوشی منا لیتے ہیں اور خود کو عید کی نماز میں بڑے لوگوں کے ساتھ کھڑا پاتے ہےں۔ اگرچہ کسی بھی نماز میں چھوٹے ، بڑے ، امیر ، غریب کا فرق نہیں ہوتا ، لیکن عید کی خوشی الگ معنی رکھتی ہے۔روزے رکھ کرانسان نفس پر فتح حاصل کر چکا ہوتا ہے اور اس خوشی میں وہ عید مناتا ہے۔تہوار تو اور بھی منائے جاتے ہیں لیکن اس تہوار کی خصوصی اہمیت ہے کےونکہ عید سے پہلے رمضان کا مہینہ ہوتا ہے۔ اس مہینے میں خدا کی طرف سے رحمتوں کے دروازے کھول دےئے جاتے ہیں۔ دو زخ کے دروازے بند کر دےئے جاتے ہیں اور جنت کے دروازے کھول دےئے جاتے ہیں کیونکہ اس ماہ میں برے سے برا مسلمان بھی خدا سے ڈرنے لگتا ہے اور برائی کا راستہ چھوڑ کرمسجد کی راہ پکڑ لیتا ہے۔ یعنی جو مسلمان کبھی کبھی نماز پڑھتے ہیں وہ بھی مسجد جانے لگتے ہیں۔ روزے نفس پر قابو رکھنے کی علامت ہیں۔ تمام پرےشانےوں اور دشوارےوں کے باوجود مسلمان روزے رکھتے ہےں اور عید کا انتظار کرتے ہےں۔
عید اور عید کے مہینے کی اس لیے بھی اہمیت ہے کہ اسی مہینے قرآن نازل ہوا تھا۔ اس مہینے مےں غریبوں کو بھی خوشیاں منانے کا موقع ملتا ہے۔ جو لوگ سال بھر تک دشمنی رکھتے ہیں وہ بھی اپنی رنجش بھول کر عید پر گلے مل لیتے ہیں۔ اس لئے اسے پیار اور امن کا تہوار مانا گیا ہے۔ دراصل عید کا پیغام وہی ہے جو اسلام کا ہے۔ اسلام کہتا ہے کہ انسانوں کی رہنمائی کا حق اور انسان کے مالک ہونے کا حق صرف اسے حاصل ہے جس نے اسے پیدا کیا ہے ، جو سارے جہان کا رب ہے۔ خدا ہی ہر غلطی سے خالی اور کمی سے پاک ہے۔
Thursday, August 25, 2011
Tuesday, August 23, 2011
जननायक
दो छवियां देशवासियों को काफी दिनों तक नहीं भूलेंगी। 15 अगस्त की शाम को दिल्ली में महात्मा गांधी के समाधि स्थल राजघाट पर ध्यान की मुद्रा में चुपचाप अकेले बैठे अन्ना हजारे। पृष्ठभूमि में हरी घास का मैदान। हरेक मिनट बीतने के साथ चारों तरफ आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती लोगों की भीड़।
जिसे जब पता चला वह जहां कहीं था राजघाट की ओर दौड़ पड़ा। अगली सुबह अन्ना अपनी योजना के मुताबिक आमरण अनशन पर बैठने वाले थे। उन्हें अनशन के लिए जगह और अनुमति देने से इनकार किया जा चुका था।
ऐसे में बिना किसी पूर्व घोषणा के वह चुपचाप बापू की समाधि पर आकर बैठ गए। दो-ढाई घंटे बैठे रहे। बीच-बीच में चश्मा उतारकर आंख पोंछते अन्ना। चारों तरफ हलचल बढ़ रही थी। लोगों का हुजूम उमड़ रहा था। पर सबसे निरपेक्ष अन्ना ध्यान में डूबे वहां बैठे थे। मानो आने वाली चुनौती का मुकाबला करने के लिए शक्ति जुटा रहे हों।
दूसरी अविस्मरणीय छवि है अगले दिन देश के छोटे-बड़े कई शहरों में सड़कों पर उमड़े जनसैलाब की। अन्ना को सुबह निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने से पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था। 16 अगस्त की सुबह जिसने भी टेलीविजन खोला उसे अन्ना की गिरफ्तारी की खबर मिलने के साथ ही दिल्ली की सड़कों पर लोगों के एकत्र होने की तस्वीरें दिखने लगीं। जहां-जहां अन्ना को ले जाए जाने की खबर मिलती छात्रों-युवाओं की टोलियां उधर ही दौड़ जातीं।
दोपहर तक कई स्थलों पर जोश से भरे लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। दूसरे शहरों से भी ऐसे ही प्रदर्शनों की खबरें और तस्वीरें आने लगीं। हाथ में तिरंगे लिए, सिर पर ‘अन्ना टोपी’ लगाए, प्लेकार्ड लहराते लोगों की तस्वीरें। शांत और उत्सुक लोगों की तस्वीरें।
जरूरी और अहम काम का बीड़ा उठाने के अहसास से लबालब चेहरों की तस्वीरें। अपने भीतर गुस्से को जज्ब करते लोगों की तस्वीरें। अगले कुछ दिन टेलीविजन स्क्रीन पर ऐसी तस्वीरें आम हो गईं। उनमें विस्मय का बोध कम होता गया, लेकिन गंभीरता और जनसैलाब का आकार बढ़ता गया।
इन दो छवियों को जोड़कर देखने पर इनमें राष्ट्रीय फलक पर एक नए जनांदोलन और जननेता का उभार देखा जा सकता है। इनमें देश की तरुणाई की अंगड़ाई है, तो एक बुजुर्ग नेता की नई विराट जनछवि भी है।
आखिर क्या वजह है कि एक 74 बरस के बुजुर्ग ने युवाओं और लोगों की नब्ज को इस तरह छू लिया है कि जैसे पिछले दो-तीन दशकों में कोई भी दूसरा नेता नहीं कर सका? क्या वजह है कि अन्ना हजारे ने लोगों में इतने गहरे विश्वास की भावना भर दी कि उनके लिए वे सड़कों पर उतर आए?
हाल में कोई भी दूसरा नेता इस तरह जनाकांक्षाओं का केंद्र बनकर नहीं उभर सका, जिस तरह अन्ना उभर सके? आइए अन्ना के ऐसे 10 गुणों को देखते हैं जिन्होंने उन्हें इस उम्र में देशवासियों, खासकर युवाओं के दिलों का नायक बना दिया।
1. सादगी
अन्ना के व्यक्तित्व की जिस खूबी पर सबसे पहले ध्यान जाता है वह है उनकी सादगी। यह सादगी कदकाठी से लेकर पहनावे तक में दिखाई देती है। सफेद धोती-कुरते और टोपी से सुशोभित सामान्य कदकाठी के इस बुजुर्गवार से जुड़ने में जींसधारी युवा पीढ़ी को जरा दिक्कत नहीं हुई।
2. सच्चाई
सादगी पर उतना ध्यान नहीं जाता अगर उनके व्यक्तित्व में सच्चई नहीं होती। यह उनके पूरे व्यक्तित्व से झलकती है। जब उनके ऊपर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने संस्था के धन में से दो लाख रुपए अपने जन्मदिन पर खर्च कर लिये, तो कोई विश्वास नहीं करता।
3. पारदर्शिता
अन्ना के व्यक्तित्व में एक निश्छल पारदर्शिता है। उनके आर-पार देखा जा सकता है। उन्हें देखकर यह विश्वास होता है कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। कैमरे की आंख से देखने के इस दौर में व्यक्तित्व की इस पारदर्शिता को पहचानना आसान हो गया है।
4. विनम्रता
विनम्रता अन्ना के हर शब्द और कदम से झलकती है। विनम्रता निश्छल मुस्कराहट से प्रकट होती है। उनके चेहरे पर दर्प की एक लकीर भी दिखाई नहीं देती। महाराष्ट्र में कुछ मंत्रियों के इस्तीफे का श्रेय उन्हें हासिल है। लेकिन इसका अहंकार उनमें दिखाई नहीं देता। जब वह सिर पर हाथ रखकर कहते हैं, ‘..तो मैं घर पर पानी भरूंगा’, तो यही विनम्रता ध्यान खींचती है।
5. मितभाषिता
बड़बोलापन हमारी राजनीति ही नहीं, अधिकांश अनुशासनों की पहचान बन गया है। इसके विपरीत मितभाषिता का दुर्लभ गुण अन्ना में है। उन्हें लंबी तकरीर करते मुश्किल से ही देखा गया है। कम शब्दों में अपनी बात कहकर चुप हो जाते हैं। वाचालता या अतिकथन आत्मविश्वास की कमी का परिचायक माना जाता है। अन्ना की मितभाषिता उनके आत्मविश्वास से आती है।
6. दृढ़ता
दृढ़ता के बगैर विनम्रता का ज्यादा अर्थ नहीं है। इसके बगैर विनम्रता कमजोरी बन जाती है। इसीलिए ‘पानी भरने’ की बात में जहां विनम्रता है, वहीं उनकी दृढ़ता दिखाई देती है जब वह कहते हैं कि मैं सौ फीसदी का दावा तो नहीं करता, लेकिन जन लोकपाल बिल 60 से 65 फीसदी भ्रष्टाचार जरूर रोकेगा।
7. सोद्देश्यता
कार्यशैली में सोद्देश्यता के बगैर लोगों के दिलों को छू पाना संभव नहीं है। यह सोद्देश्यता ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना को विश्वसनीय बनाती है और लोगों के मन में उम्मीद जगाती है। लोगों को लगता है कि यह एक व्यक्ति है जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार से निजात दिलाना है।
8. जोखिम
जोखिम का सटीक आकलन और उसे उठाने की हिम्मत नेतृत्व के लिए जरूरी गुण है। अप्रैल में जब अन्ना जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठ रहे थे, तब खुद उन्हें भी पता नहीं था कि लोग साथ आएंगे या नहीं। पर उन्होंने जोखिम उठाया। 16 अगस्त को भी वह जोखिम उठा रहे थे। वह नाकाम भी हो सकते थे, लेकिन नाकामी के डर से वह अपने इरादे से पीछे नहीं हटे।
9. अभिव्यक्ति
मराठी अन्ना की मातृभाषा है। हिंदी वह मराठी जुबान और मुहावरे में बोलते हैं। और कम बोलते हैं। फिर भी ऐसा क्या है कि देश के नागरिकों और युवाओं से वह इतने जबरदस्त तरीके से कनेक्ट कर सके? उनमें आम आदमी की अभिव्यक्ति का पुट है। जब पूछा जाता है कि क्या उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री चिट्ठी का जवाब देंगे, तो वह कहते हैं ‘उम्मीद तो रखनी है’।
10. दूरदर्शिता
दूरदर्शिता अच्छे नेतृत्व का अनिवार्य गुण है। अन्ना के व्यक्तित्व में एक हद तक इसकी झलक मिलती है। अन्ना के मन में यह विश्वास होगा कि भ्रष्टाचार के सवाल पर लोग साथ आएंगे। यह विश्वास दूरदर्शिता के बगैर नहीं आ सकता था। अन्ना के आंदोलन को अभी लंबी यात्रा तय करनी होगी। इसमें उनकी दूरदर्शिता की कड़ी परीक्षा होगी।
जिसे जब पता चला वह जहां कहीं था राजघाट की ओर दौड़ पड़ा। अगली सुबह अन्ना अपनी योजना के मुताबिक आमरण अनशन पर बैठने वाले थे। उन्हें अनशन के लिए जगह और अनुमति देने से इनकार किया जा चुका था।
ऐसे में बिना किसी पूर्व घोषणा के वह चुपचाप बापू की समाधि पर आकर बैठ गए। दो-ढाई घंटे बैठे रहे। बीच-बीच में चश्मा उतारकर आंख पोंछते अन्ना। चारों तरफ हलचल बढ़ रही थी। लोगों का हुजूम उमड़ रहा था। पर सबसे निरपेक्ष अन्ना ध्यान में डूबे वहां बैठे थे। मानो आने वाली चुनौती का मुकाबला करने के लिए शक्ति जुटा रहे हों।
दूसरी अविस्मरणीय छवि है अगले दिन देश के छोटे-बड़े कई शहरों में सड़कों पर उमड़े जनसैलाब की। अन्ना को सुबह निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने से पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था। 16 अगस्त की सुबह जिसने भी टेलीविजन खोला उसे अन्ना की गिरफ्तारी की खबर मिलने के साथ ही दिल्ली की सड़कों पर लोगों के एकत्र होने की तस्वीरें दिखने लगीं। जहां-जहां अन्ना को ले जाए जाने की खबर मिलती छात्रों-युवाओं की टोलियां उधर ही दौड़ जातीं।
दोपहर तक कई स्थलों पर जोश से भरे लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। दूसरे शहरों से भी ऐसे ही प्रदर्शनों की खबरें और तस्वीरें आने लगीं। हाथ में तिरंगे लिए, सिर पर ‘अन्ना टोपी’ लगाए, प्लेकार्ड लहराते लोगों की तस्वीरें। शांत और उत्सुक लोगों की तस्वीरें।
जरूरी और अहम काम का बीड़ा उठाने के अहसास से लबालब चेहरों की तस्वीरें। अपने भीतर गुस्से को जज्ब करते लोगों की तस्वीरें। अगले कुछ दिन टेलीविजन स्क्रीन पर ऐसी तस्वीरें आम हो गईं। उनमें विस्मय का बोध कम होता गया, लेकिन गंभीरता और जनसैलाब का आकार बढ़ता गया।
इन दो छवियों को जोड़कर देखने पर इनमें राष्ट्रीय फलक पर एक नए जनांदोलन और जननेता का उभार देखा जा सकता है। इनमें देश की तरुणाई की अंगड़ाई है, तो एक बुजुर्ग नेता की नई विराट जनछवि भी है।
आखिर क्या वजह है कि एक 74 बरस के बुजुर्ग ने युवाओं और लोगों की नब्ज को इस तरह छू लिया है कि जैसे पिछले दो-तीन दशकों में कोई भी दूसरा नेता नहीं कर सका? क्या वजह है कि अन्ना हजारे ने लोगों में इतने गहरे विश्वास की भावना भर दी कि उनके लिए वे सड़कों पर उतर आए?
हाल में कोई भी दूसरा नेता इस तरह जनाकांक्षाओं का केंद्र बनकर नहीं उभर सका, जिस तरह अन्ना उभर सके? आइए अन्ना के ऐसे 10 गुणों को देखते हैं जिन्होंने उन्हें इस उम्र में देशवासियों, खासकर युवाओं के दिलों का नायक बना दिया।
1. सादगी
अन्ना के व्यक्तित्व की जिस खूबी पर सबसे पहले ध्यान जाता है वह है उनकी सादगी। यह सादगी कदकाठी से लेकर पहनावे तक में दिखाई देती है। सफेद धोती-कुरते और टोपी से सुशोभित सामान्य कदकाठी के इस बुजुर्गवार से जुड़ने में जींसधारी युवा पीढ़ी को जरा दिक्कत नहीं हुई।
2. सच्चाई
सादगी पर उतना ध्यान नहीं जाता अगर उनके व्यक्तित्व में सच्चई नहीं होती। यह उनके पूरे व्यक्तित्व से झलकती है। जब उनके ऊपर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने संस्था के धन में से दो लाख रुपए अपने जन्मदिन पर खर्च कर लिये, तो कोई विश्वास नहीं करता।
3. पारदर्शिता
अन्ना के व्यक्तित्व में एक निश्छल पारदर्शिता है। उनके आर-पार देखा जा सकता है। उन्हें देखकर यह विश्वास होता है कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। कैमरे की आंख से देखने के इस दौर में व्यक्तित्व की इस पारदर्शिता को पहचानना आसान हो गया है।
4. विनम्रता
विनम्रता अन्ना के हर शब्द और कदम से झलकती है। विनम्रता निश्छल मुस्कराहट से प्रकट होती है। उनके चेहरे पर दर्प की एक लकीर भी दिखाई नहीं देती। महाराष्ट्र में कुछ मंत्रियों के इस्तीफे का श्रेय उन्हें हासिल है। लेकिन इसका अहंकार उनमें दिखाई नहीं देता। जब वह सिर पर हाथ रखकर कहते हैं, ‘..तो मैं घर पर पानी भरूंगा’, तो यही विनम्रता ध्यान खींचती है।
5. मितभाषिता
बड़बोलापन हमारी राजनीति ही नहीं, अधिकांश अनुशासनों की पहचान बन गया है। इसके विपरीत मितभाषिता का दुर्लभ गुण अन्ना में है। उन्हें लंबी तकरीर करते मुश्किल से ही देखा गया है। कम शब्दों में अपनी बात कहकर चुप हो जाते हैं। वाचालता या अतिकथन आत्मविश्वास की कमी का परिचायक माना जाता है। अन्ना की मितभाषिता उनके आत्मविश्वास से आती है।
6. दृढ़ता
दृढ़ता के बगैर विनम्रता का ज्यादा अर्थ नहीं है। इसके बगैर विनम्रता कमजोरी बन जाती है। इसीलिए ‘पानी भरने’ की बात में जहां विनम्रता है, वहीं उनकी दृढ़ता दिखाई देती है जब वह कहते हैं कि मैं सौ फीसदी का दावा तो नहीं करता, लेकिन जन लोकपाल बिल 60 से 65 फीसदी भ्रष्टाचार जरूर रोकेगा।
7. सोद्देश्यता
कार्यशैली में सोद्देश्यता के बगैर लोगों के दिलों को छू पाना संभव नहीं है। यह सोद्देश्यता ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना को विश्वसनीय बनाती है और लोगों के मन में उम्मीद जगाती है। लोगों को लगता है कि यह एक व्यक्ति है जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार से निजात दिलाना है।
8. जोखिम
जोखिम का सटीक आकलन और उसे उठाने की हिम्मत नेतृत्व के लिए जरूरी गुण है। अप्रैल में जब अन्ना जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठ रहे थे, तब खुद उन्हें भी पता नहीं था कि लोग साथ आएंगे या नहीं। पर उन्होंने जोखिम उठाया। 16 अगस्त को भी वह जोखिम उठा रहे थे। वह नाकाम भी हो सकते थे, लेकिन नाकामी के डर से वह अपने इरादे से पीछे नहीं हटे।
9. अभिव्यक्ति
मराठी अन्ना की मातृभाषा है। हिंदी वह मराठी जुबान और मुहावरे में बोलते हैं। और कम बोलते हैं। फिर भी ऐसा क्या है कि देश के नागरिकों और युवाओं से वह इतने जबरदस्त तरीके से कनेक्ट कर सके? उनमें आम आदमी की अभिव्यक्ति का पुट है। जब पूछा जाता है कि क्या उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री चिट्ठी का जवाब देंगे, तो वह कहते हैं ‘उम्मीद तो रखनी है’।
10. दूरदर्शिता
दूरदर्शिता अच्छे नेतृत्व का अनिवार्य गुण है। अन्ना के व्यक्तित्व में एक हद तक इसकी झलक मिलती है। अन्ना के मन में यह विश्वास होगा कि भ्रष्टाचार के सवाल पर लोग साथ आएंगे। यह विश्वास दूरदर्शिता के बगैर नहीं आ सकता था। अन्ना के आंदोलन को अभी लंबी यात्रा तय करनी होगी। इसमें उनकी दूरदर्शिता की कड़ी परीक्षा होगी।
Sunday, August 14, 2011
Saturday, August 13, 2011
आधी रात को आई छुप कर दुल्हन आजादी की !
आधी रात को आई छुप कर
दुल्हन आजादी की !
हमने किया बेपर्दा उसको
सुबह - शाम चोराहे पर !
दुनिया को दिया हमने
सन्देश अहिंषा का !
फिर भी.........
हर तरफ मचा है हाहाकार ,
क्यों रुसवा होते है हर बार नेता हमारे ,
दुनिया की इस भीड़ में !
क्यों रुसवा होते है हर बार खिलाडी हमारे ,
हर ओलंपिक और वर्ल्ड कप में !
क्यों रुसवा होती है भारतीय नारी ,
हर गली -चोराहे पर !
कभी जाति के नाम पर !
तो कभी प्यार के नाम पर !
देवी कहलाने के बाद भी !
आधी रात को आई छुप कर
दुल्हन आजादी की !
इक बार सोचो क्या सच में हमने ,
संभाला है अपनी आजादी को !
अपने दिल से पुछो कैसे ,
हम खुद ही करते है ,
शर्मशार अपनी आजादी की दुल्हन को ,
हर गली - चोराहे पर !
भूल जाते है अपनी माँ को ,
जो देती है जीवन हम को ,
इसलिए हम सभी भारतीयों को ,
अपनी आजादी की कदर करनी चाहिए !
जिसको हमने बहुत कुर्बानियों से पाया है !
पंद्रह अगस्त पर मेरी और से
मेरे भारत महान के महान भारतीयों को
हार्दिक शुभकामनाये !
दुल्हन आजादी की !
हमने किया बेपर्दा उसको
सुबह - शाम चोराहे पर !
दुनिया को दिया हमने
सन्देश अहिंषा का !
फिर भी.........
हर तरफ मचा है हाहाकार ,
क्यों रुसवा होते है हर बार नेता हमारे ,
दुनिया की इस भीड़ में !
क्यों रुसवा होते है हर बार खिलाडी हमारे ,
हर ओलंपिक और वर्ल्ड कप में !
क्यों रुसवा होती है भारतीय नारी ,
हर गली -चोराहे पर !
कभी जाति के नाम पर !
तो कभी प्यार के नाम पर !
देवी कहलाने के बाद भी !
आधी रात को आई छुप कर
दुल्हन आजादी की !
इक बार सोचो क्या सच में हमने ,
संभाला है अपनी आजादी को !
अपने दिल से पुछो कैसे ,
हम खुद ही करते है ,
शर्मशार अपनी आजादी की दुल्हन को ,
हर गली - चोराहे पर !
भूल जाते है अपनी माँ को ,
जो देती है जीवन हम को ,
इसलिए हम सभी भारतीयों को ,
अपनी आजादी की कदर करनी चाहिए !
जिसको हमने बहुत कुर्बानियों से पाया है !
पंद्रह अगस्त पर मेरी और से
मेरे भारत महान के महान भारतीयों को
हार्दिक शुभकामनाये !
Friday, August 12, 2011
جنگ آزادی میں شعرا کاکردار
ملک کی آزادی میں جہاں اصحاب فکرو نظر ، اصحاب قلم ،علما، صلحا،ادبا،صحافی، قائدین اور مجاہدین نے اہم کردار ادا کیا ہے۔وہیںشعراءکرام کا بھی بہت بڑا کردار رہا ہے۔
ہمارے ملک میںصدیوں کی غلامی کی وجہ سے ساری فضا پر ذہنی، نظریاتی، تہذیبی اور عملی نقطئہ نظر سے مرعوبیت طاری تھی۔یہاں تک کہ جو طور طریق مغرب سے ’سند جواز ‘ پائیں وہ یہاں قابل تقلید تھے، چاہے وہ ہندوستانی معاشرے کے مزاج کے مطابق ہوں یا نہ ہوں۔ ظاہر ہے یہ کیفیت بڑی تشویش ناک تھی۔ اتنے بڑے قومی خسارے کا مداوا بس حصول ِ آزادی ہی کی صورت میں ہوسکتاتھا۔ محمد علی جوہر کی وہ تقریر جو سن ۰۳۹۱ء میں گول میز کانفرنس کے موقع پر لندن میں کی گئی اس پر شاہد عدل ہے۔ یہ محض الفاظ نہ تھے بلکہ ایک سچے محب وطن کے دل کی آواز تھی جن کو پڑھ کر آج بھی دل تڑپ جاتاہے۔ یہاں اس کا ایک چھوٹا سا اقتباس دیکھتے چلئے : ’میں آپ سے درجہ ءمستعمرات لینے کے لئے نہیں آیا، میں مکمل آزادی کے عقیدے کا قائل ہوںمیں اسی وقت اپنے ملک کو واپس جاو¿ں گا جب آزادی کا منشور میرے ہاتھ میں ہوگا۔ میں ایک غلام ملک کو لوٹ کر نہیں جاو¿ں گا۔ مجھے ایک غیر ملک میں جو آزاد ہے مسافری کی موت منظور ہے۔ اگر تم مجھے آزادی نہیں دوگے تو پھر تمھیں میرے لئے ایک قبر کی جگہ دینی ہوگی،،
اگرچہ اس وقت آزادی نہیں ملی مگر قدرت نے اس شہیدِ آزادی کو خالی ہاتھ لوٹ آنے کی ذلت سے بچالیا۔ برسوں پہلے غالب نے کہاتھا:
مارا دیارِ غیر میں لاکر وطن سے دور
رکھ لی مرے خدا نے مری بے کسی کی لاج
عجیب بات تھی کہ وہ خود بھی اپنے متعلق پیشین گوئی کر چکے تھے کہ :
ہے رشک ایک خلق کو جوہر کی موت پر
یہ اس کی دین ہے جسے پروردگار دے
ہمارے دیگر شعرا بھی غلامی کی وجہ سے زندگی پر پڑنے والے اثرات کو ظاہر کرتے رہے مثلاً محروم نے کہا :
غریبی بدنصیبی تلخ کامی بڑھتی جاتی ہے
وطن کی آہ میعادِ غلامی بڑھتی جاتی ہے
محروم وطن جب تک آزاد نہیںہوتا
سوبار بسنت آئے دل شاد نہیں ہوتا
ظفر علی خاں نے ظاہری کوششوں کے علاوہ خدا سے دعا کا بھی اہتمام کیا تھا:
جب تک آزادی نہ ہوگی ہم نہ ہوںگے شادکام
دیکھئے یہ عمر کب تک تلخ کامی میں کٹے
ہند کو بھی اے خدا قیدِ غلامی سے چھڑا
اپنے گھر کا ہم کو بھی مالک بنا، مختار کر
ان کے ماسوا بہت سے ایسے بھی تھے جو جد و جہد ِ آزادی کی راہ میں تن من دھن کی قربانیاںپیش کررہے تھے۔ سیف الدین کچلو اپنی چلتی ہوئی پریکٹس چھوڑ کر تحریکِ آزادی میں شریک ہوگئے۔ اپنا سوا لاکھ کا لینن پرائز بھی آل انڈیا پیس کونسل کے حوالے کردیا۔ حسرت موہانی نے کئی بار جیل کی ہوا کھائی۔ جلیل قدوائی نے درست کہاتھا کہ مسلسل قیدو بند کے باعث ان کی طبیعت میں مستقل مزاجی، صبرو رضا،توکل و استغنا، کی جو صفات پیدا ہوگئی تھیں ان کا عکس شاعری میں جھلکے بغیرنہ رہا۔ مثلاً یہ اشعار ملاحظہ ہوں :
ہے مشقِ سخن جاری چکی کی مشقت بھی
اک طرُفہ تماشا ہے حسرت کی طبیعت بھی
پابند· عیش نہ ہوسکے بندگانِ عشق
گرچہ ساماں سحر کا تھا نہ افطاری کا
کٹ گیا قید میں ماہِ رمضاں بھی حسرت
گو ختم قید کی وہ میعاد کرچکے
حریت کامل کی قسم لے کے اٹھے ہیں
اب سایہءبرٹش کی طرف جائیں گے ہم کیا
جہاں تک ان کی صحافت کا تعلق ہے وہ ان کے لئے ایک عقیدے سے کم نہ تھی۔ عقیدئہ حریت کے بغیر وہ صحافت کو دُکان داری کہتے تھے ۔ انھیںباتوں کی وجہ سے انھیں سید الاحرار کا خطاب دیا گیا تھا۔
اسی طرح بیسیوں جان نثار ان وطن نے قید و بند کی مصیبتیں سہیں۔آصف علی نے سات سال جیل کاٹی۔ انھیں چکی کی مشقت تو نہیں ملی مگر تنہائی کی مصیبت دور کرنے کے لئے انھوں نے کاغذقلم سے کام لے کرزندانی ادب کی بنا ڈالی۔ اس طرح ہمارے عظیم لیڈروں ، مثلاً گاندھی، نہرو، آزاد وغیرہ نے قید کے زمانے میں نہایت قیمتی تحریریںسپرد قلم کیں۔اسی کی عکاسی کرتے ہوئے وحید الدین سلیم نے کہا تھا:
اگر آزاد· ہندوستان پنہاں ہے جیلوں میں
تو ہے مشتاق ہر ہندی درودیوارِ زنداں کا
کبھی روکے سے رکتا ہے کہیں یہ ذوقِ آزادی
دہانے سے بھڑک اٹھتا ہے شعلہ آہِ سوزاں کا
اس جدو جہد کے دوران گاندھی جی وغیرہ نے عدم تشدد کی ایک فضا بنائی تھی۔ اس کے مثبت پہلوکو ذہن نشیں کرانے کی فکریں برابر جاری تھی۔لیکن ہر سوسائٹی میں کچھ جلد باز طبیعتیں بھی ہوا کرتی ہیں۔آزادی کے متوالوں میں بھی ایسوں کی کمی نہ تھی۔ انگریزوں سے نفرت کئے جانے کی معقول وجہیںبھی تھیں تو اپنے طور پر لوگوں نے انتقامی اقدامات کئے۔ان انقلابیوں سے بے شک کچھ زیادتیاں بھی ہوئیں مگر کسی نے بربریت سے کام نہیں لیا۔بہ ہر حال وہ پکڑے جاتے رہے اور انھیں قیدیں اور سزائیں ہوتی رہیں۔انھیں لوگوں میں بھگت سنگھ، اشفاق اللہ خاں، رام پرساد بسمل، چندسیکھر آزاد وغیرہ ہیں۔
اسی زمانے میں غلام بھیک نیرنگ کی دعوتِ عمل نہال کی وطن رواں کی ہندوستان جگر بریلوی کی بھارت صفی کیصحیفہءقوممحمود اسرائیلی کی نالہءعندلیب شفیق کیمیرا دیسشاد کی مادرِ وطن اور خوابِ وطن آزاد انصاری کی پیغامِ وطن نامی نظمیں کافی مشہور ہوئیں۔ آخر الذکر کی ایک نظم تعلیم ِبیداری کا یہ حصہ نظم کے عمومی لہجے کا اندازہ لگانے میں مدد دے گا۔
فکر عبث ہے جان نہ جائے ٭ جان کا کیا غم آن نہ جائے
ملکی قومی شان نہ جائے ٭مرد بنو میدان نہ جائے
توپوں کے تک وار نہ مانو ٭ جانیں دے دو ہار نہ مانو
بڈھو جوانو عورتو مردو ٭ کردو ترک غلامی کر دو
گھردو دردو زردو مردو ٭ بھر دو ملک کو ہُن سے بھر دو
گھر گھر شمعیں روشن کردو ٭ چپہ چپہ گلشن کردو
انور صابری کی نظم دیوانے میں بھی اسی تاثر کا اظہار ہے:
شیدا ہوں آزادی کا آزادنگر میں ڈیرا ہے
کیا بتلاو¿ں میرے بھیا کون جہاں میں میرا ہے
وہ میرا جو آزادی کی زلفوں کا دیوانہ ہے
وہ میرا جو شمع وطن کا شیدائی پروانہ ہے
وہ میرا جو موت کے آگے بے جگری سے تنتا ہے
وہ میرا جو آپ نہ ہو کچھ جس کی سب کچھ جنتا ہے
وہ میرا جو ہنستے ہنستے پھانسی پر چڑھ جاتاہے
وہ میرا جو موت سے بھی دوچار قدم بڑھ جاتاہے
آزادی کے طالب سن لے موت ہی میری منزل ہے
تو دنیا کا بن سکتاہے میرا بننا مشکل ہے
یحییٰ اعظمی نے اپنی قربانی کو ،حصولِ مقصد تک پہنچادینے پر زور دیا۔
چلیں گر گولیاں بھی عرصہ ءپیکار میں تم پر
تو سینہ تان کر اک آ ہنی دیوار ہو جاو¿
بڑھو ہاتھوں میں لے کر جنگِ آزادی کے پرچم کو
جوانانِ وطن کے قافلہ سالار ہوجاو¿
ساغر نظامی نے آزادی پر بہت ہی دل کو لگنے والے اشعارلکھے : نمونہ دیکھئے :
درد ملت ہے یہی احساسِ غیرت ہے یہی
راہِ آزادی میں موت آئے شہادت ہے یہی
جمیل مظہری کی نوائے جرس کا تیکھا لہجہ نظم کے ان اشعار سے ظاہر ہے :
سروں سے باندھ کر کفن، بڑھے چلو بڑھے چلو
امیدِمادرِوطن، بڑھے چلو بڑھے چلو
دعائیں دے رہی ہے ماں،بڑھے چلو بڑھے چلو
برادرانِ نوجواں، بڑھے چلو بڑھے چلو
جو راہ میں ٹھہر گئے، نہیں مقام پیش و پس
جو ہم سفر بچھڑگئے، تو چھیڑو نالہ ءجرس
سنو جمیل کی فغاں ، بڑھے چلو بڑھے چلو
برادرانِ نوجواں ، بڑھے چلو بڑھے چلو
شورش کاشمیری نے اس موضوع پر نئے دور کا فرماں، ذرا صبر وغیرہ نظمیں لکھیں ۔ اول الذکر کے اس ایک شعر سے ساری نظم کا اندازہ ہوجائے گا۔
تقدیر کو تدبیر کے بازو سے جھکادو
ناموس وطن کے لئے جانوں کو لڑادو
اس زمانے میں اختر شیرانی کی لوری کی بہت شہرت تھی نمونتاً یہ شعرملاحظہ ہوں :
وطن کی جنگِ آزادی میں جس نے سر کٹایا ہے
یہ اس شیدائے ملت باپ کا پرُجوش بیٹاہے
ابھی سے عالمِ طفلی کا مہر انداز کہتاہے
وطن کا پاسباں ہوگا، مرا ننھا جواں ہوگا
قدرتی طور پر ان کی نظم اُٹھ ساقی تلوار اُٹھا کا لہجہ بہت تیز تھا اور بڑھے چلوبھی اس سے کچھ کم درجے کی نظم نہ تھی۔اس کے چند شعر دیکھئے :
سپاہیانہ زندگی جو قسمت سعید ہے
تو رزم گہِ موت بھی سپاہیانہ عید ہے
جیا تو فخرِقوم ہے مرا تو وہ شہید ہے
سروں سے باندھ کر کفن بڑھے چلو بڑھے چلو
دلاورانِ تیغ زن بڑھے چلو بڑھے چلو
بہادرانِ صفت شکن بڑھے چلو بڑھے چلو
مجازکی نظم اندھیری رات کا مسافر، میں ہزار رکاوٹوں کے باوجود قوم کے آگے بڑھتے رہنے کا عزمِ صمیم ملتاہے۔
حکومت کے مظاہر جنگ کے پُر ہول نقشے ہیں
کدالوںکے مقابل توپ بندوقیںہیں نیزے ہیں
سلاسل، تازیانے، بیڑیاں، پھانسی کے تختے ہیں
مگر میں اپنی منزل کی طرف بڑھتا ہی جاتاہوں
مخدوم محی الدین کے جوشیلے لہجے میں بھی وہی گرمی تھی جس کا اثر سارے نوجوان شاعروں پر تھا :
کہو ہندوستان کی جے، کہو ہندوستان کی جے
سردار جعفری نے اس وقت کی نشان دہی کی جب مظلوموں کے دن پھریںگے۔شاعر کے جس سوال کا جواب خود آزادی نے دیا تھا اسے سنئے ۔
صبر ایوبی کا جب لبریز ہوتا ہے سُبو
سوزِ غم سے کھولتا ہے جب غلامی کا لہو
غاصبوں سے بڑھ کے جب کرتاہے حق اپنا سوال
جب نظر آتا ہے مظلوموں کے چہرے پر جلال
تفرقہ پڑتا ہے جب دنیا میں نسل و رنگ کا
لے کے میں آتی ہوں پرچم انقلاب و جنگ کا
ان دنوں الطاف مشہدی اپنی نظم جھوم کر اُٹھو وطن آزاد کرنے کے لئے کی وجہ سے مشہور ہوئے ، اور شمیم کرہانی کا یہ شعر زبان زد خاص و عام ہوگیا تھا۔
ہم پرچم قومی کو لہرا کے ہمالہ پر
دشمن کی حکومت کے جھنڈے کو جھکادیں گے
انھوں نے جنگ ِ عظیم پرتفصیل سے اظہار ِ خیال کیا مگر تان یہاں توڑی :
ماں تونہیں اس جنگ کی حامی ٭قتل ہوں جس میں ہند کے نامی
پر نہیں اٹھتا بارِ غلامی ٭گرتی ہوں میں اٹھ کے سنبھال
جاگ مرے نو عمر سپاہی ٭جاگ بھی مےرے لال
مطّلبی فرید آبادی کے اٹھ رے سپہیا باورے لشکر تیرا کوچ اور جیل چلا دیس سپاہی رانی تجھ کو چھوڑ والے گیت بھی اسی جوش و جذبہ کے تحت لکھے گئے ۔ سکندر علی وجد بھی اپنے کسی ہم عصر سے پیچھے نہ تھے۔ وہ نوجوانوں کو اپنی پُرانی دل چسپیوں کو چھوڑ کر نئی ذمہ داریوں کو اپنے سر لینے پر آمادہ کرگئے۔
بتانِ سیم و زر پر مرنے والے نوجوانوں کو
وطن پر جان دینے کے لئے تیار کرنا ہے
غلامی کے اندھیرے میں نظر آتی نہیں منزل
چراغ عزم سے آساں رہِ دشوار کرنا ہے
امیں سلونوی نے قوم سے خطاب میںکہا کہ آزادی کی جدو جہد میں ہمت مردانہ سب سے اہم چیز ہے :
مثلِ قاروں نہ شوقِ مال و دولت چاہئے
مثل شاہوں کے نہ فکرِ جاہ و حشمت چاہئے
آسماں کی سی نہ تجھ کو حرص و رفعت چاہئے
ہاں یہ سب بے کار ہیں تھوڑی سی ہمت چاہئے
اپنی ملت اپنا ملک اپنا وطن آزاد کر
جس قدر بربادیاں ہیں اٹھ انھیں برباد کر
جوش ملیح آبادی اپنی گھن گرج کے لئے بہت مشہور تھے۔ مثلاً
دور محکومی میں راحت کفر، عشرت ہے حرام
دوستوں کی چاہ آپس کی محبت ہے حرام
علم ناجائز دستارِ فضیلت ہے حرام
انتہا یہ کہ غلامی کی عبادت ہے حرام
سایہءذلت سے مومن کا گزرنا ہے حرام
صرف جینا ہی نہیں بلکہ مرنا ہے حرام
لیکن ایسا بھی نہیں کہ موڈ ہمیشہ یکساں رہتا ہو بلکہ کبھی کبھی مضمون کی اہمیت کے پیش نظر ان کے طرز میں سنجیدگی اور متانت بھی نظر آجاتی تھی مثلاً :
سنو اے ساکنانِ خاکِ پستی
ندا کیا آرہی ہے آسماں سے
کہ آزادی کا اک لمحہ ہے بہتر
غلامی کی حیاتِ جاوداں سے
احمقپھپھوندوی بھی عنوانِ آزادی پر برابر لکھے جارہے تھے۔ سلام مچھلی شہری اور دوسرے شعرانے ایک نئے رجحان کو اپنے فن میں داخل کیا جسے سبھوں نے بہت پسند کیا۔ مثلاً
مجھے نفرت نہیں ہے عشقیہ اشعار سے لیکن
ابھی ان کو غلام آباد میں میں گا نہیں سکتا
مجھے نفرت نہیں پازیب کی جھنکار سے لیکن
ابھی دوزخ میں اس جنت سے دل بہلا نہیں سکتا
ابھی ہندوستاں کو آتشیں نغمے سنانے دو
ابھی چنگاریوں کو اک گلِ رنگیں بنانے دو
اسی طرح فیض احمد فیضکا کہنا کہ ع اور بھی کام ہیں دنیا میں محبت کے سوا
اور اختر شیرانی کے یہ الفاظ :
عشق و آزادی بہارِ زیست کا عنوان ہے
عشق میری جان ہے آزادی مرا ایمان ہے
عشق پر کردوں فدا میں اپنی ساری زندگی
لیکن آزادی پر میرا عشق بھی قربان ہے
اس بات کا ثبوت ہیں کہ اب شعرا اپنے روایتی محبوب سے زیادہ معشوقہء وطن کے دل دادہ ہیں۔ ایک سیدھے سادے ہندوستانی کے ذہن میں آزادی کے بعد ملک کا جو نقشہ تھاوہ ظفر علی خاںکے الفاظ میںیہ تھا :
برہمن مندروں میں اپنی پوجا کر رہے ہوں گے
مسلماں دے رہا اپنی مساجد میں اذاں ہوگا
جنھیں دو وقت کی روٹی میسر اب نہیں ہوتی
بچھا ان کے لئے دنیا کی ہر نعمت کا خواں ہوگا
من و تو کے یہ جتنے خرخشے ہیں مٹ چکے ہوں گے
نصیب اس وقت ہندو ومسلماں کا جواں ہوگا
لیکن حصولِ آزادی کے بعد آنکھوں نے جو دیکھا اور دل نے جو محسوس کیا وہ بھی شاعروں کی زبانوں پر آئے بغیر نہ رہا۔ فیض کے لہجے کی یہ تڑپ، جب انھوں نے اعلان کیا :
یہ داغ داغ اجالا، یہ شب گزیدہ سحر
وہ انتظار تھا جس کا، یہ وہ سحر تو نہیں
جگر کا یہ جذبہ ء احتساب جب انھوں نے لکھا :
کام بڑا ہے اور آزادی، نام بڑے اور درشن چھوٹے
شمع ہے لیکن دھندلی دھندلی، سایہ ہے لیکن روشن روشن
دونوں باتیں کسی اور ہی چیز کی غماز ہیں۔اکثر لوگ یہ کہنے پر مجبور تھے:
غلط کہ چھٹ گئیں تاریکیاں - اندھیرا ہے
افق کو دیکھو ابھی تک وہی اندھیرا ہے
وہ ملتفت ہیں مگر حدِ بے نیازی تک
گھنا درخت ہے سایہ کہاں گھنیرا ہے
سفیرِ روشنی سمجھو نقیبِ نور کہو
مگر چراغ تلے ہر جگہ اندھیرا ہے
جہاں تک آزادی کے خیر مقدم پر اور اس کی ہر سال گرہ پر لکھی جانے والی نظموں اور مضامین کا سوال ہے ان کے مجموعے شائع ہوچکے ہیں۔دعوے کے ساتھ کہا جاسکتا ہے کہ ہندوستان کی کسی اور زبان میں اتنی چیزیں نہ لکھی گئی ہوں گی جتنی اردو میں لکھی گئیں ۔
۵۱ اگست اور ۶۲ جنوری کی خوشی و مسرت ہر شخص کو ہوتی ہے مگر اس سے زیادہ ضروری خود اپنا احتساب ہے کہ ہم نے کہاں تک ان کا حق ادا کیااور کوتاہیوں کا کیا علاج کیا۔آزادی سے پہلے انگریزی حکومت پر نکتہ چینی کرنے والوں کو محب وطن کا سرٹیفکٹ مل رہا تھا مگر سن ۷۴کے بعد اپنوں کے خلاف بول کر ان کی ناخوشی مول لینا معمولی بات نہ تھی۔اہل اردو میں یہ ہمت تھی کہ وہ اہل اقتدار کو ٹوکیں۔ جوش نے جشنِ آزادی کے موقعہ پر ایک نظم سنائی جس میں تقریباً سارے ہی لیڈروں کی جھوٹی قوم پرستی اور دوغلے پن کا برملا اظہار کیا، یہاں تک کہ پنڈت نہروکے بارے میں یہ کہہ دیا :
فکرو نظر بھی تیشہءالفاظ بھی ہیں پاس
مشکل تو تیرے سامنے کوہِ انا کی ہے
Thursday, August 11, 2011
آئنہ جھوٹ نہیں بولتا!
اگرچہ ضرورت ایجاد کی ماں ہی، لیکن ہم اکثر سوچتے ہیں کہ اگرآئینہ ایجاد نہ ہوتا تو آدم زاد کی زندگی کتنی پھیکی، بے مزہ اور ویران ہوکر رہ جاتی۔ آئینے نے آدمی کی زندگی میں ہلچل‘ طمانیت اور رنگینی پیدا کردی ہے۔ وہ اپنے دن کا آغازآئینہ دیکھ کر کرتا اور آئینے پر ایک الوداعی نظر ڈال کر دن بھرکی مصروفیات کو سمیٹتا ہے۔ لیکن یہ بھی ایک حقیقت ہے کہ دنیا میں بہت سے لوگ ایسے ہیں جنہیں ساری عمرآئینہ دیکھنا نصیب نہیں ہوتا۔ سبب اس کا یہ نہیں کہ ا±ن کی مصروفیت انہیں آئینہ نہیں دیکھنے دیتی، بلکہ وہ زندگی کے شکنجے میں ایسے کسے ہوئے ہیں کہ انہیں آئینہ ہی میسر نہیں ہوپاتا۔ وہ اپنا سراپا دیکھے بغیر ساری عمرگزاردیتے ہیں اور بے نیل ومرام دنیا سے رخصت ہوجاتے ہیں۔ ان لوگوں کو عرف ِعام میں عوام کالانعام کہا جاتا ہے۔ دانشورکہتے ہیں کہ آئینہ کیا، ان لوگوں کے لیے کوئی چیز بھی ایجاد نہیں ہوئی۔ اب یہی دیکھیے کہ بجلی اِس دور کی اہم ترین ایجاد ہے لیکن عوام کالانعام کو یہ میسر نہیں۔ وہ یہ تو جانتے ہیں کہ بجلی بہت کام کی چیز ہی، اس سے زندگی میں بہت آسانی پیدا ہوجاتی ہی، بہت سے کام پلک جھپکتے ہوجاتے ہیں، بجلی ہی کے طفیل جان لیوا گرمی میں ٹھنڈی ہوا اور ٹھنڈا پانی میسر آتا ہی، لیکن عوام یہ سب کچھ جاننے کے باوجود بجلی کے دیدار سے محروم رہتے ہیں۔ اگر وہ کبھی آتی بھی ہے تو انہیں اور تڑپا کر چلی جاتی ہے۔لیجیے صاحب! بات کہاں سے کہاں نکل گئی۔ ذکر ہورہا تھا آئینے کا۔ آئینے کو اردو شاعری میں بڑی اہمیت حاصل ہے۔ شاعر نے جہاں اپنے کلام میں محبوب کے حسن اور اس کی ہوشربا اداوں کا ذکرکیا ہے وہیں اپنے بیان کی تائید میں آئینے کی گواہی بھی پیش کی ہے کہ آئینہ جھوٹ نہیں بولتا اور اس کی گواہی بہت معتبر سمجھی جاتی ہے۔ مومن خان مومن اپنے عہد کے نہایت ہوش مند شاعر تھے، انہیں شاعری کے ساتھ ساتھ حکمت اورفلسفے میں بھی درک حاصل تھا، اس لیے وہ اس کوشش میں رہتے تھے کہ ان کا محبوب آئینہ نہ دیکھنے پائے اور وہ اس کے ہوشربا اثرات سے بچے رہیں۔ چنانچہ کہتے ہیں: تابِ نظارہ نہیں آئینہ کیا دیکھنے دوں اور بن جائیں گے تصویر جو حیراں ہوں گی لیکن غالب اپنی طرز کے انوکھے شاعر تھے۔ وہ اپنے محبوب سے چہلیں کرنے اور اسے تنگ کرنے سے باز نہیں آتے تھے۔ چنانچہ کہتے ہیں: آئینہ دیکھ اپنا سا منہ لے کے رہ گئی صاحب کو دل نہ دینے پہ کتنا غرور تھا وقت کی برق رفتاری نے اچھے بھلے آدمی کو مشین کا پرزہ اور گاڑی کا پہیہ بنادیا ہے لیکن آئینے کا طلسم اور اس کی حشرسامانی بدستور قائم ہے۔ بنت ِحوا جوکسی زمانے میں سارا سارا دن آئینے کے سامنے بیٹھ کر گزار دیتی تھی اب وقت کی گردش کے ہاتھوں کولہو کا بیل بن کر رہ گئی ہے۔ منہ اندھیرے اٹھی، گھرکے ضروری کام کاج نمٹائی، ناشتہ کیا، بچوں کو تیارکرکے اسکول چھوڑا اور خودکسی دفتر یا تعلیمی ادارے یا اسپتال کی راہ لی۔ اب آپ سوچیں گے کہ ایسے میں بھلا اس بے چاری کو آئینہ دیکھنے کا کیا ہوش ہوگا! نہیں صاحب ایسا نہیں ہی، اس مصروف زندگی میں بھی آئینے سے اس کا رشتہ بہرحال قائم ہے۔ صبح آئینے کے سامنے کھڑی ہوکر اپنے سراپے کا جائزہ لیا، بال سنوارے‘نک سک سے درست کیا اور اپنے معمولات پر روانہ ہوگئی۔ اب یہ نہ سمجھئے کہ سارے دن کے لیے آئینے سے اس کا تعلق ٹوٹ گیا ہے۔ نہیں صاحب! ایک چھوٹا سا آئینہ اور میک اپ کا مختصر سامان اس کے پرس میں موجود ہی، وہ جب چاہے پرس سے آئینہ نکال کر اپنے چہرے سے ہمکلام ہوسکتی ہے۔سچ پوچھیے تو آئینہ آدمی کا ہمزاد ہی، وہ اس کے ساتھ رہتا اور اس کی خوبیوں خامیوں سے آگاہ کرتا رہتا ہے۔ ہم جس چیز کا سامنا کرنے سے کتراتے اور جس حقیقت کو دیکھنے سے منہ چھپاتے ہیں آئینہ اسے بلاجھجک ہمارے روبرو کردیتا ہے۔ ہمارے چہرے پر مہ وسال کی گردش سے پڑنے والے اثرات کا پتا سب سے پہلے ہمیں آئینہ ہی دیتا ہی، اور ہم ان اثرات کو چھپانے کے لیے آئینے کا ہی سہارا لیتے ہیں۔ آئینہ ہمارا دمساز بھی ہے اور ہمراز بھی۔ اسی لیے کہا جاتا ہے کہ آئینے سے بگاڑ اچھا نہیں۔ جو لوگ آئینے سے ناراض ہوتے ہیں اور طیش میں آکر اسے توڑ دیتے ہیں وہ اپنا ہی نقصان کرتے ہیں اور بے خبری میں زندگی گزارتے ہیں۔ سکھوں کے بارے میں ایک لطیفہ مشہور ہے کہ ایک سردار جی ٹرین کے درجہ اوّل میں سفرکررہے تھی، انہیں دورانِ سفر واش روم جانے کی ضرورت محسوس ہوئی۔ دروازہ کھولا تو آئینے میں اپنی شکل نظر آئی‘ ”سوری“ کرکے پیچھے ہٹ گئے اور اپنی نشست پر واپس آکر انتظار کرنے لگے کہ اندر موجود شخص باہر نکلے تو وہ جائیں۔ جب کافی دیرتک کوئی آدمی باہر نہ نکلا تو انہوں نے پھر جرا¿ت رندانہ سے کام لیتے ہوئے دروازہ کھولا لیکن آئینے میں اپنی صورت دیکھ کر بڑبڑاتے ہوئے پھر پیچھے ہٹ گئے۔ آدمی شریف تھی، سوچا یہ شخص اس طرح باہر نہیں نکلے گا، ٹرین گارڈ سے مدد لینی چاہیے۔ ٹرین ایک اسٹیشن پر رکی تو گارڈ کے پاس گئے اور اس سے شکایت کی کہ ایک شخص واش روم میں گھسا ہی، نکلنے کا نام ہی نہیں لیتا۔ گارڈ بھی اتفاق سے سکھ تھا، کہنے لگا ”چلو دیکھتے ہیں کون بدمعاش آپ کو تنگ کررہا ہے“۔ اس نے آکر ایک جھٹکے سے دروازہ کھولا تو آئینے میں اپنی شکل نظرآئی، آہستہ سے دروازہ بند کرتے ہوئے بولا”اپنا ہی آدمی ہی، آپ دوسرے کمپارٹمنٹ میں ہوآئیں“۔یہ تو ہوا لطیفہ، لیکن عملی زندگی میں بھی بعض لوگوں کا رویہ کچھ ایسا ہی ہوتا ہے۔ وہ آئینے میں اپنی شکل نہیں پہچان پاتے اور ساری عمرآئینے سے لڑنے جھگڑنے میں گزار دیتے ہیں۔ سیاست دانوں اور خاص طور پر حکمرانوں میں یہ مرض عام ہے۔ انہیں آئینہ دکھایا جائے تو برا مان جاتے ہیں اور زور زبردستی پر اترآتے ہیں۔ آئینہ جھوٹ نہیں بولتا۔ حکمران بے شک آئینے میں اپنی شکل پہچاننے سے انکارکردیں لیکن اس سے کیا ہوتا ہے۔ پتّا پتّا بوٹا بوٹا حال ہمارا جانے ہی پوری دنیا ہمارے حکمرانوں کا چہرہ پہچان رہی ہے۔ ہمیں ڈر ہے کہ حکمرانوں کا بگاڑ کہیں پوری قوم کو نہ لے ڈوبے اور آئینہ دہائی دیتا رہ جائے۔
Monday, August 8, 2011
’سپر پاور‘کی بے بسی...
وقت اور حالات کب کس کروٹ بدلتے ہیں اس کی پیشن گوئی عام انسان کے بس میں نہیں ہوتی ۔ کب کس کا ستارہ گردش میں آجائے یہ بھی قبل از وقت کہنا بڑا ہی مشکل ہو تا ہے ۔جےسا کہ اس وقت قریب ایک صدی سے معاشی ، اقتصادی اور فوجی طاقت کا تاج پہنے بیٹھے امریکہ کے ساتھ پےش آرہا ہے، جس پر قرض کے مرض کا اثر صاف دیکھا جا سکتا ہے۔حالیہ دنوں میں اپنا کریڈٹ ریٹنگ گھٹنے کے صدمے سے امریکہ ابھی ابھر بھی نہیں پا یا تھا کہ اسٹینڈر ڈ اینڈ پوورز نے اسے ایک اور کرارا جھٹکا دے دیا۔ یہ جھٹکا ایسا لگا کہ امریکہ کو دن میں تارے نظر آنے لگے ۔ دنیا کے سب سے طاقتور شخص براک اوبامہ اور سپر پاور امریکہ دونوں اپنی اوقات میں آتے ہوئے دکھائی دے رہے ہیں۔ جیسے ہی ہفتہ کو یہ خبر آئی کہ عالمی سطح پر اقتصادی ساکھ کا تعین کرنے والی ایجنسی اسٹینڈر ڈ اینڈ پوورز نے امریکہ کے قرض لینے کی اہلیت کو گھٹا کر A+کردیا ہے اس خبر نے نہ صرف امریکہ کے ہوش اڑا دیئے بلکہ اس خبر سے ساری دنیا سکتے میں آگئی۔ یہ ایسی خبر تھی جس نے پوری دنیا کے حصص مارکیٹ کو اپنی زد میں لے لیا اور پوری دنیا کے اسٹاک مارکیٹ میں کھلبلی مچ گئی۔ یکے بعد دیگرے مختلف ممالک کے شیئر بازاروں سے رونقیں غائب ہونے لگیں اور اس سے منسلک افراد میں بے چینی اور اضطرابی کیفیت پیدا ہونے لگی ۔ظاہر سی بات ہے کہ جب سپر پاور کے سر پر خطرات کے بادل منڈلائےں گے تو بقےہ کی پےشانی پر بل تو پڑے گا ہی۔ہم جس سپر پاور کی بات کررہے ہیں اب اس کی حالت اس قدر باگفتہ بہ ہوگئی ہے کہ دوسرے ممالک تو کیا خود ان کیہی اپوزیشن اس بات کی اجازت دینے میں لیٹ لطیفی کی تھی کہ جس سے ”سپر پاور “ کی اقتصادی حالت بہتر ہوسکے ۔ یہی کچھ ایک دو ہفتے قبل کی ہی بات ہے جب امریکی صدر براک اوبامہ نے سینیٹ میں ایک تجویز رکھی تھی کہ موجودہ قرض لینے کی حدود کو بڑھا یا جائے جس سے معیشت کو درپیش خطرات سے باہر نکالنے میں دقتوں کا سامنا نہ کرنا پڑے لیکن اپوزیشن نے اس ایک تجویز کوپاس کرانے کےلئے اوبامہ کو لوہے کے چنے چبانے پر مجبور کر دےا۔ اس بل کو حالانکہ اپوزیشن نے گذشتہ 30اگست کو منظوری دے دی ہے لیکن اسے منظور کرانے میں امریکی صدر براک اوبامہ کو کتنے پسینے آئے اسے ساری دنیا نے محسوس کیا۔ اب تک جس امریکہ کو دنیا سپر پاور تسلیم کرتی رہی ہے اب اس پر قرض کا تنا بڑا بوجھ آن پڑا ہے جس میں دب کر وہ کراہ رہا ہے۔ حالیہ آئی ایک رپورٹ کے مطابق امریکہ پر چین کا 1.2ٹریلین ڈالر ، جاپان کا 912بلین ڈالر ، برازیل کا 211بلین ڈالر ، برطانیہ کا 346بلین ، روس کا 115بلین ڈالر کے علاوہ ، مجموعی طور پر تقرےبا 1.83لاکھ کڑور کا قرض ہے جو مذکورہ ممالک نے امرےکی برانڈ اور سےکورٹی مےں سرماےہ کر رکھا ہے ۔ یعنی کہ اب سپر پاور امریکہ کو ”سپرقرض دار “ کا خطاب دیا جائے اور اسے اس نام سے پکارا جائے تو بے جا نہیں ہو گا۔ اب جبکہ امریکہ اپنے ابتر ہوتے حالات پر بے بس و مجبور نظر آرہا ہے اس سے ہندوستان کو بھی خطرہ لاحق ہے ۔اعداد و شمار بتاتے ہیں کہ امریکہ میں غیر ممالک سے جتنی سرماےہ کاری ہوئی ہے اس میں ملک ہندوستان کی حصے داری تقریباً 41ارب ڈالر ہے ۔ یہ رقم فرانس اورآسٹریلیا جیسے ممالک کی جانب سے کی گئی سرمایہ کاری کے مقابلے کافی زیادہ ہے ۔ دوسری جانب اسٹینڈرڈ اینڈ پوورز نے ایک اور انتباہ یہ دے ڈالا ہے کہ امریکی کریڈٹ ریٹنگ کے تعلق سے ہمارا نظریہ منفی ہے اور اگر امریکہ کی اقتصادی حالت اور بگڑتی ہے یا سیاسی گٹ بازی اور پیچیدہ ہوتی ہے تو کریڈٹ ریٹنگ کو اور کم کرنے کا راستہ ہموار ہو جائیگا ۔ یعنی کہ اب سپر پاور کو اپنی جان پر آن پڑی ہے ۔ حالات اس قدر بگڑ چکے ہیں کہ امرےکہ تباہ و بر باد ہونے کے دہانے پر پہنچ چکا ہے۔ اس ضمن میں یہ بات بھی اہمیت کی حامل ہے کہ اب G-7کے ممالک امریکہ ، برطانیہ ، جرمنی ، جاپان ، فرانس ، کناڈا اور اٹلی نے اےمر جنسی میٹنگ کرکے اس بلاسے چھٹکا را پانے کے لئے غور و خوض کرنے کا من بنایا ہے۔ لب لبا ب یہ کہ ایک صدی سے عالمی منظر نامے پر اپنی دھاک اور اپنا قبضہ جمائے امریکہ پر خطرات کے جو بادل منڈلا رہے ہیں اس سے نہ صرف یہ کہ عالمی سطح پر بے چینی ، بے بسی اور اضطرابی کیفیت پیدا ہوگئی ہے بلکہ پوری دنیا میں ایک بار پھر سے 2008کی طرح معاشی بحران پیدا ہونے کا خطرہ بڑھ گیا ۔ یہ وہ خطرہ ہے جو عالمی معیشت کی کمر توڑ کر اسے بد حال اور غیر فعال بناسکتا ہے ۔
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