भारत के पिकासो कहे जाने वाले मकबूल फिदा हुसैन अब इस दुनिया में नहीं रहे.
| उपेंद्र राय |
| सहारा इंडिया मीडिया के एडिटर एवं न्यूज डायरेक्टर |
इतने महान कलाकार की मृत्यु पर दुख तो होगा ही. यह कहने में बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हुसैन साहब भारत के महानतम कलाकारों में एक थे. बीसवीं सदी में उनसे बड़ा कोई दूसरा पेंटर पैदा नहीं हुआ. हुसैन साहब ने पेंटिंग के क्षेत्र में चालीस के दशक से लेकर 2011 तक राज किया. इतने बड़े कलाकार को जिंदगी के कुछ आखिरी साल देश के बाहर गुजारने पड़े तो इसका और भी दुख होता है.पिकासो की तरह एम एफ हुसैन का भी विवादों से चोली-दामन का साथ रहा. कभी उन पर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा तो कभी मुसलमानों ने उन परकुरान के अपमान का आरोप लगाया. इमरजेंसी का समर्थन करने की वजह से उन्हें कलाकार समुदाय की आलोचना सहनी पड़ी. इंदिरा गांधी की तुलना दुर्गा से करने की वजह से कई राजनीतिक पार्टियों को उनके विचार से भारी झटका लगा तो उन पर राज्यसभा की सदस्यता के पांच साल बर्बाद करने के आरोप भी लगे.लेकिन इन आरोपों के बावजूद कभी किसी ने उनकी कलाकारी, उनके हुनर और उनकी भारतीयता पर सवाल नहीं उठाए. लेकिन उनकी जिंदगी ज्यों-ज्यों अवसान की तरफ बढ़ने लगी, उनकी भारतीयता पर सवाल उठने लगे. हालात ऐसे बन गए कि जिंदगी के आखिरी पांच साल उन्हें खाड़ी के देश कतर में बिताने पड़े. महाराष्ट्र के पंधरपुर में पैदा हुए और अपने आप को सच्चा मराठी मानुष और सच्चा मुंबईकर समझने वाले हुसैन को मरते वक्त अपनी ही मिट्टी नसीब नहीं हुई. यह कितनी बड़ी विडम्बना है. ऐसा आखिर हो कैसे गया?एम एफ हुसैन ने सत्तर के दशक में ज्ञान की देवी सरस्वती की पेंटिंग बनाई थी. करीब 20 साल बाद यानी 1996 में कुछ हिन्दू संगठनों को लगा कि यह पेंटिंग उनके समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली है. इसके बाद से इन संगठनों ने एम एफ हुसैन का जीना हराम कर दिया. उनकी पेंटिंग प्रदर्शनियों पर तोड़-फोड़ होने लगी, उनके घर पर पत्थरबाजी होने लगी और देश की कई अदालतों में उनके खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में मुकदमें शुरू हो गए. इसके बाद 2004 में एम एफ हुसैन ने एक फिल्म बनाई, जिसका नाम था- मीनाक्षी-ए टेल ऑफ थ्री सिटीज. इस फिल्म में एक गाना है जो कुछ मुस्लिम संगठनों को आपत्तिजनक लगा. आरोप है कि इस गाने में कुरान की पंक्तियों का बेजा इस्तेमाल हुआ है. एम एफ हुसैन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के लिए इतना काफी था.इसके बाद से हालात लगातार बिगड़ते गए. 2004 में हुसैन साहब ने भारत माता की एक पेंटिंग बनाई. 2004 में इसे एक खरीदार भी मिल गया. लेकिन 2006 में इस पेंटिंग के सामने आने के बाद इतना बवाल शुरू हो गया कि हुसैन साहब को देश छोड़कर ही जाना पड़ा. हालांकि देश की अदालतों से उन्हें राहत मिलती रही. सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ मामले रद्द हो गए. हाईकोर्ट के एक फैसले में यह कहा गया कि 90 साल की उम्र वाले पेंटर को अपने घर में रहकर पेंटिंग करने का पूरा हक है. लेकिन अदालती फैसले भी हुसैन साहब को उनके आखिरी दिनों में अपने घर में रहने का हक नहीं दिला पाए.खुद हुसैन साहब चाहते थे कि उनकी जिंदगी के आखिरी लम्हें अपने मुल्क में ही गुजरें. नवम्बर 2009 में एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, मजबूत संचार तंत्र के सहारे मैं अपने मुल्क से सम्पर्क रखने में कामयाब रहा हूं. बावजूद इसके मेरे मन में अपने मुल्क लौटने की चाहत है. आखिरकार कोई अपनी मां की गोद को कैसे भूल सकता है. मुझे उम्मीद है कि सत्ताधारी लोग मुझे अपने देश में आखिरी सांस लेने की इजाजत देंगे. अफसोस कि इतने बड़े कलाकार की आखिरी ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो सकी. उनके मरने के बाद यह कोशिश हुई कि उनके शव को भारत में ही दफनाया जाए लेकिन उनके परिवार वालों को यह मंजूर नहीं हुआ. उनके मरने के बाद कुछ हिन्दू संगठनों के आकाओं को भी अपनी गलती का अहसास हुआ. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी.हुसैन साहब का विरोध करने वाले यह कैसे भूल गए कि साठ के दशक में उन्होंने राम मनोहर लोहिया के कहने पर 150 से ज्यादा ऐसी पेंटिंग बनाई थीं जिनकी थीम रामायण और महाभारत थी. हर दिन एक पंडित उन्हें रामायण और महाभारत की कहानी सुनाता और वे इससे प्रेरित होकर पेंटिंग करते और यह सिलसिला कई दिनों तक चला. भारतीय संस्कृति के रंग में रचे-बसे हुसैन साहब के लिए दरअसल कला धार्मिक बंधनों से कहीं ऊपर थी. कला उनके लिए अनुभूति का सम्प्रेषण थी जो कभी दकियानूसी से डरती नहीं थी. उनकी इसी दिलेरी को कई संकीर्ण विचारधारा वाले संगठनों का विरोध झेलना पड़ा. अपनी जवानी में तो वे सारा विरोध झेल गए. लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव में यह विरोध उन्हें हद से ज्यादा चुभने लगा. इसीलिए भारत के इस हीरे को अपना ही देश छोड़ना पड़ा.अब सवाल उठता है कि क्या इसे टाला जा सकता था. मेरे खयाल से यह सम्भव था. भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे लगाने वालों की कमी नहीं रही है. यहां हर छोटी-बड़ी बात का बतंगड़ बना दिया जाता है. कभी इस किताब को बैन करने की बात होती है तो कभी उस फिल्म पर कैंची चलाने की मांग होती है. कभी कलाकार से नहीं पूछा जाता है कि उनकी कला के पीछे की मंशा क्या थी? धर्म और समाज के तथाकथित ठेकेदारों को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" एक थोथी दलील लगती है. और दुर्भाग्यवश अब तक की सरकारें इन ठेकेदारों के सामने घुटने टेकती रही हैं.सरकारी सोच बदलने में और भी कई साल लग सकते हैं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि हुसैन साहब की मौत के बाद धर्म और समाज के तथाकथित ठेकेदारों को सबक मिलेगा. फिलहाल पूरे देश को एक नगीने को खोने का दुख है. सही श्रद्धांजलि के लिए जरूरी है कि हम कला को दकियानूसी चश्में से देखना बंद करें.
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