Tuesday, July 31, 2018

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी
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बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और सरकार के शीर्ष अधिकारी भी शक के दायरे में दिखने लगे हैं। पुलिस की जांच को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। खासकर तब जब सीबीआई ने इसकी जांच शुरू कर दी है।
दरअसल मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार कांड, सरकारी तंत्र की कार्यशैली को बेपर्दा कर चुका है। यानी हर मौके पर अपने और तथाकथित सुशासन का दम्भ भरनेवाले नीतीश कुमार के बिहार  में बेझिझक यह कहा जा सकता है कि शासन तंत्र अपनी खामियों को पकड़ने और उसे दुरुस्त करने की इच्छाशक्ति खो चुका है। भारतीय संविधान में प्रदत शक्तियों के तहत शासन तंत्र में क्षमता तो है ,लेकिन राजनीतिक चक्रव्यूह में जकड़े और घृनत मानसिकता के जाल में फंसे इस तंत्र की इच्छाशक्ति मर चुकी है।
जिसका नतीजा है कि अब इस मामले में संरक्षण का खेल खेला जा रहा है।पर्दापोशी की कोशिशें की जा रही हैं।हर वो हतखंडा अपनाया जा रहा है और चाल चली जा रही है जिसके बल पर मामले की इतिश्री की जा सके और दोषियों को बचाया जा सके।ताज़ा घटनाक्रम इस बात की पुष्टि करने को काफी हैं।मुजफ्फरपुर के आइजी और डीआइजी मामले उजागर होने के दो माह बाद बालिका गृह का निरीक्षण करने पहुंचे और एसएफएल की टीम बुलाकर जांच करवाई। कुछ आपत्तिजनक दवाएं और इंजेक्शन भी बरामद किए गए। अधिकारियों ने यहां की व्यवसथा देख नाराजगी जताई और इसे यातना गृह बताया। ये सब उस दिन हुआ जब मामला तूल पकड़ चुका था।मीडिया में हेडलाइन्स बन चुकी थीं।राजनीतिक दल के लोग मुज़फ़्फ़रपुर का रुख कर चुके थे।नीतीश कुमार चारों तरफ से सवालों के घेरे में आ चुक थे।यानी मज़बूरी के आलम में दिए गए सी बी आई जाँच के आदेश और सी बी आई के द्वारा केस टेकओवर करने  के एक दिन पहले।
अब सवाल तो लाज़मी है कि घटना के खुलासे के बाद पुलिस अधिकारी आखिर अचानक तब कैसे जागे जब सीबीआई ने एक दिन बाद ही जांच का जिम्मा संभाल लिया। आखिर क्या रहा होगा इसका मकसद? जबकि एक जून को ही मामले की प्राथमिकी मुजफ्फरपुर महिला थाने में दर्ज की गई थी। दो जून को कागजात ज़ब्त कर भवन सील कर दिया गया। सवाल उठता है कि आखिर सीबीआई टेक ओवर के मात्र एक दिन पहले बालिका गृह पहुंचकर एसएफएल टीम से जांच कराने के पीछे कहीं सबूतों से छेड़छाड़ की पुलिसिया कवायद तो नहीं है? इसका मकसद क्या यह नहीं कि सीबीआई को कुछ सबूत न मिल पाएं? दवाएं और इंजेक्शन पुलिस अधिकारियों ने इतने दिन बाद क्यों जब्त किए? क्या कुछ और रहस्यमय वस्तुओं के गायब करने की कवायद का यह हिस्सा तो नहीं?
यक़ीनन ये बड़ा और विचारणीय सवाल है।ये सवाल इस लिए भी अहम है क्योंकि अतीत में भी ऐसा ही खेल खेला गया था जिसका परिणाम लोगों ने देखा है।वो मामला तब बिहार के बहुचर्चित सृजन घोटाले का था।उस मामले में भी पुलिस और मिलीभगत तंत्र ने ऐसा ही खेल खेला था।उस मामले में अपने हतखंडे अपना कर और शातिरगिरी के सहारे पुलिस ने जब सारे सबूत को अपने कब्जे में ले लिया था तभी मामला सीबीआई के पास जाने दिया गया।
दूसरी ओर अगर मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले के उजागर होने के पहले के घटनाक्रम को देख जाए तो भी स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी तंत्र इसमें पूरी तरह लिप्त है और उसी के संरक्षण में ये घृणित खेल खेला गया।एक उदाहरण ही काफी है इस बात को समझने के लिए।वो ये की बालिका गृह में रहनेवाली बालिकाओं की देख रेख के लिए सलाहकार परिषद का गठन किया गया।साल 2012 में गठित इस परिषद के अध्यक्ष डीएम थे।सदस्य के रूप में डॉक्टर और शिक्षा पदाधिकारी भी शामिल थे लेकिन कभी किसी को इस बालिका गृह में यातना की दिल दहलाने वाली तस्वीर नहीं दिखी और ना किसी ने कभी कोई  ऐसी रिपोर्ट दी जिससे ये बातें सामने आतीं। 2017 में बिहार किशोर न्याय के अंतर्गत बालिकाओं की देखरेख के लिए जिला निरीक्षण समिति का गठन किया गया।इस समिति में भी डीएम को ही अध्यक्ष रखा गया।इस समिति में एक पुलिस के अधिकारी को जोड़ा गया ।यहां तक कि मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी को भी सदस्य बनाया गया ।इस समिति में एक महिला को भी रखा गया।एक डीएसपी रैंक के अधिकारी को रखा गया।बावज़ूद इसके बालगृह में नाबालिग बच्चियों के साथ यौनाचार होता रहा।सवाल उठता है कि आखिर क्या ये समिति सिर्फ कागज़ी कार्रवाई के लिए थी, सरकारी आदेश सिर्फ खानापूर्ति के लिए था? या फ़िर ये फाइल का एक हिस्सा भर रहा गया।सरकारी आदेश रद्दी का कागज़ बन गया और अधिकारियों ने अपना काम कर हाथ पर हाथ रख बैठ गए।
दूसरी तरफ राजनीतिक दल भी इस बहुचर्चित मामले में संदेहों की रडार पर दिखाई दे रहे हैं। कल्याण विभाग के अधिकारी तो पहले ही आरोपों के घेरे में आ चुके हैं। समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा पर यहां आने के आरोप लग चुके हैं।ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि इस हमाम में कौन कौन नंगा है।लेकिन ये तभी मुमकिन है जब तंत्र दबाव से परे सी बी आई जांच में सहयोग करे।अगर बिहार के तथाकथित सुशासन के सिपहसालारों नें अपने आक़ाओं की नामक हलाली की तो फिर  शायद सी बी आई जांच भी महज़ खानापूर्ति ही होगी जैसा कि कई मामलों में होता आया है।अगर निष्पक्ष जांच और न्याय हुआ तो यकीनन इसमें कई बेनक़ाब होंगे और बालिकाओं पर यातनाओं का पूर्ण कच्चा चिट्ठा खुलेगा ।

Wednesday, May 30, 2018

प्रणब मुखर्जी:एक ब्राह्मण के लिए जनेऊ सर्वपरि होता है।

प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवत
मेराज नूरी
आजकल भारतीय राजनीति खास तौर से धर्मनिरपेक्ष राजनीति में मानो भूचाल सा आया हुआ है।इस भूचाल का कारण न तो कोई घपला या घोटाला है ना ही कोई साम्प्रदायिक दंगे या फिर संवैधानिक संकट।दरअसल इस भूचाल के पीछे एक निमंत्रण है जिसे भारत के बंगाली ब्राह्मण और बाद में कांग्रेस नेता और फिर बाद में भारत के राष्ट्रपति रहे प्रणव मुखर्जी ने स्वीकार किया है।ये न्योता किसी आम ने नहीं बल्कि भारत के सबसे शक्तिशाली संगठन और ब्राह्मणवाद की करता धर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आर एस एस ने दिया है।ये न्योता आर एस एस के "संघ शिक्षण वर्ग "को संबोधित करने के लिए दिया गया है।ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी देता है  साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देता है। यानी प्रणव मुखर्जी संघ के मुख्यालय में समाज,राष्ट्र और धर्म का ज्ञान बाटेंगे।वो संघ जिसका मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और वह सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की ही बात करता है जबकि उसके विपरीत उसके आलोचकों का यह आरोप है कि ऐसे विचारों के प्रचार से भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होती है। संघ की मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि व पितृ-भूमि मानता है (अर्थात्‌ जहाँ उसके पूर्वज रहते आये हैं) तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है (अर्थात्‌ जहां उसके देवी देवताओं का वास है); हिन्दू है। संघ की यह भी मान्यता है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है तो इसका कारण भी केवल यह है कि यहां हिन्दू बहुमत में हैं। संघ मनुस्मृति का भी पुरज़ोर समर्थक है और उसी पथ पर भारत को अग्रसर देखना चाहता है।
अब सवाल ये है कि आखिर राजनीतिक तौर पर विचारों के टकराव के बावजूद प्रणव मुखर्जी संघ की दावत पर नागपुर क्यों जा रहे हैं।क्या वो कांग्रेस और धर्म निरपेक्षता का त्याग कर चुके हैं।जवाब है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।ना वो राजनीतिक से दूर हो रहे हैं ना ही धर्मनिरपेक्षता के पथ से बल्कि वो सिर्फ और अपना धर्म निभा रहे हैं जो प्रत्येक मनुष्य के लिए सर्वपरि होता है।अर्थात जिसके लिए उसका जन्म हुआ है।जिस पथ पर चल कर वो पाप और पुण्य ,स्वर्ग और नर्क का भागी बनता है।ये धर्म का बल और आकर्षण शक्ति है जो प्रणब मुखर्जी को संघ की शरण में जाने को मजबूर करती है।हालांकि राजनीतिक तौर पर प्रणब दा का अपना अलग किरदार है जिसे बताने और लिखने की आवश्यकता नहीं लेकिन प्रणब मुखर्जी सर्वप्रथम हिन्दू हैं और वो भी ब्राह्मण।जनेऊधारी।अर्थात ब्रह्म में रमण करने वाला। ऋग्वेद के अनुसार ब्रह्म अर्थात ईश्वर को रमण करने वाला ब्राहमण होता है।कहा जाता है कि ब्राह्मण अपनी धारणाओं से अधिक धर्माचरण को महत्व देते हैं।
ऐसे में प्रणब मुखर्जी का संघ के एक प्रशिक्षण शिविर अर्थात संघ शिक्षण वर्ग को संबोधित  करने जाना महज इत्तेफ़ाक़ नहीं बल्कि उनका धार्मिक कर्तव्य है।वैसे भी कहा जाता है कि मनुष्य अपने आखिरी समय में धर्म कर्म पर ज़्यादा ध्यान देता है सो प्रणब मुखर्जी भी उसी पथ पर अग्रसर हैं।क्योंकि आज की तारीख में आर एस एस हिंदुओं की धार्मिक आस्था और उसके पूर्णोद्धार के क्षेत्र में काम करने वाली सबसे सर्वोच्च और अद्वितीय संस्था है।इसलिए इस यात्रा को राजनीतिक चश्मे से ना देखकर धार्मिक चश्मे से देखा जाए तो बेहतर है।कुल मिलाकर ये कहा जाए कि राजनीति के द्वारा दुनिया की मोह माया का भोग करने वाले प्रणब मुखर्जी को मोक्ष की प्राप्ति धर्म में निहित दिखती है तोे इसमें  कोई बुराई भी नहीं है।वैसे भी कहा जाता है कि एक ब्राह्मण कभी भी मनुस्मृति के विपरीत नहीं जा सकता और एक ब्राह्मण के लिए जनेऊ राजनीतिक विचारधारा से कहीं ज़्यादा सर्वपरि होता है।

Saturday, March 31, 2018

NCPUL न हुआ कबाड़खाना हो गया।



मेराज नूरी
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आजकल क़ौमी कौंसिल बराए फरोग ए उर्दू ज़बान यानी NCPUL के ताल्लुक़ से बड़े ही आला पैमाने पर एक बहस छिड़ी हुई है।सब लोग अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक उंगली डाल डाल कर घी निकालने की कोशिशों में मसरूफ दिखाई दे रहे हैं।लोगों की सुन सुन कर और पढ़ पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे ये कौंसिल न हुआ कबाड़खाना हो गया।ऐसा लगता है जैसे कौंसिल नें आलमी उर्दू कांफ्रेंस न किया बल्कि डांस प्रतियोगिता करा डाली जिसमें नचनियों (नाच करने वालों)को बुलाया गया उर्दू वालों (बड़े वाले)को नहीं बुलाया गया।लोग आर्टिकल पर आर्टिकल और बयान पर बयान ठोके जा रहे हैं।ये ना हुआ ये हो गया,उसे बुलाया उसे क्यों नहीं,वो इस लायक नहीं वो उस लायक़ नहीं।हर चंद के कायें कायें का शोर है।गोश्त के टुकड़े नुमा कौंसिल है और ऊपर मंडराते चील कौए।सभी अपनी अपनी (उर्दू का दम भरने वाली) तिरछी नज़र से कौंसिल को उचक लेने की फिराक में है।आज अचानक एक भीड़ को लगने लगा कि कौंसिल में फलां ग़लत हो रहा है,ढिमका ग़लत हो रहा है।बड़े ही शातिराना अंदाज़ में ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि एक खास शख़्श की वजह से ही ये सब हो रहा है।अरे कमाल है।ये नहीं हो रहा वो नहीं हो रहा ।क्या नहीं हो रहा है।सब कुछ तो हो रहा है।छोटी छोटी ग़लतियाँ होती रहती हैं लेकिन इसका ये मतलब थोड़े ही होता है कि आप किसी को सिरे से खारिज कर दो।किसी को महज चंद एक कमी की वजह से कटघरे में खड़ा कर दो।
आजतक तथाकथित उर्दू के खिदमत गुज़ारों पर ही तो मेहरबान थी कौंसिल और है भी।क्या आजतक उर्दू के खादिमों को कुछ नही दिया कौंसिल ने।क्या आज किताबें नही छप रही हैं,क्या किताबों को ग्रांट नही मिल रहा है,क्या सेमिनार नही हो रहे है,क्या कंप्यूटर सेंटर नहीं चल रहे हैं।सब कुछ तो हो ही रहा है।क्या कमी रह गयी भाई।इससे पहले ऐसा क्या था जो अब नहीं है।या जिसे इस डाइरेक्टर ने खत्म कर दिया।क्या ऐसा मिल रहा था जो अचानक बंद हो गया।कमाल है।आजतक इस पैमाने पर उर्दू वाले हज़रात कहीं नहीं दिख रहे थे।अलग अलग मंच से जितने उर्दू वाले अपनी भड़ास निकाल रहे हैं या पर्सनल टारगेट कर रहे हैं उनमें ज़्यादा तर वैसे हैं जिन्होंने पहले खूब मलाई खाई है इसी कौंसिल के सहारे।उर्दू उर्दू करके सबने खूब उड़ाई हैं और पूंजी बनाई हैं।अब अगर नहीं बन पा रहा है तो प्रॉब्लम।खैर होना भी चाहिए।मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा है कि कौंसिल और उसके कर्ता धर्ता को कोसने वाले लोगों में क्या कोई ऐसा नहीं जो उसके गलत फैसले और कारनामे को हुकूमत तक पहुंचा सके ।कोई इस लायक नहीं है क्या।है ।लेकिन वो नही जाएंगे क्योंकि वो भी तो मलाई खा चुके हैं और खा रहे हैं उर्दू का ढोल पिट पिट कर।सवाल ये है कि क्या कोई इस क़दर खुदमोख्तार है कि कुछ भी कर सकता है जैसा कहा जा रहा है।क्या कौंसिल बेलगाम है।क्या उसके डायरेक्टर उसे अपनी प्रॉपर्टी समझ कर इस्तेमाल कर रहे हैं।नहीं,बिल्कुल नहीं।क्योंकि कौंसिल की गवर्निंग बॉडी है,मिनिस्ट्री है,सरकार है उसके ऊपर।क्या सभी अंधे और गूंगे हैं।क्या उन्हें सब कुछ नज़र नही आता।उन्हें सब कुछ नज़र आता है और ज़ाहिर है सब की नज़र भी होगी।अगर वाक़ई कुछ गड़बड़ और ग़लत होता तो कोई न कोई नोटिस ज़रूर लेता।
बात दर असल सिर्फ और सिर्फ """ मैं"""और ""हम""" की है।कुछ लोगों को लगता है कि मैं ही हूँ जो हूँ और हमारे बग़ैर न कोई कौंसिल,न उर्दू ,न फलां ढिमका।खुदा खैर करे।

Wednesday, March 28, 2018

बिहार दंगे:2019 के लिए भाजपा की शरुआत

मेराज नूरी
कुछ ही दिनों पहले जब ये खबर आई कि बिहार सरकार ने राज्य के नए पुलिस महानिदेशक के तौर पर के एस द्विवेदी का मनोनयन किया है तो उसी वक़्त अंदाज़ हो गया था कि भविष्य में क्या होने वाला है ।भजपानीत नीतीश कुमार के सरकार के इस फैसले की सभी ने आलोचना भी की थी लेकिन संघ और भाजपा के दबाव में नीतीश कुमार  को ये करना पड़ा।दरअसल, 1989 में जब के एस द्विवेदी भागलपुर के एसपी पद पर तैनात थे तब भागलपुर में भीषण दंगा हुआ था। इस दंगे में करीब एक हजार लोगों की जान चली गई थी। तब आरोप लगे थे कि तत्कालीन एसपी के एस द्विवेदी ने न सिर्फ दंगों पर काबू पाने में कोताही बरती थी बल्कि दंगा भड़काने में भी अहम भूमिका निभाई थी।ये बात न किसी से ढकी छुपी है और ना ही कोई इससे इनकार कर सकता है।बताया जाता है कि वे आरएसएस के एजेंट के रूप में काम कर थे और उनके इशारे पर पूरी भागलपुर पुलिस भी हिन्दू-मुसलमान में बंट चुकी थी। इस क्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने के एस द्विवेदी को हटाने का निर्देश दिया। इसका प्रतिरोध भागलपुर में कुछ लोगों ने इस कदर किया कि जब राजीव गांधी दंगे का जायजा लेने पहुंचे तब उन्हें भागलपुर शहर में घुसने तक नहीं दिया गया।इन आरोपों की जांच के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा ने हाईकोर्ट के तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई थी। इस कमेटी के दो सदस्यों ने संयुक्त रिपोर्ट में एसपी द्विवेदी के खिलाफ टिप्पणी की थी।
आज जब वही द्विवेदी बिहार पुलिस के मुखिया बन कर अवतरित हुए तो फिर से बिहार में भागलपुर रूपी तांडव की शरुआत हो चुकी है।आज बिहार में चारों तरफ दंगों का खौफ है।हर जगह दंगाई बेकाबू हैं और एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है।धार्मिक स्थलों,मकानों और दुकानों को आग के हवाले किया जा रहा है।ये सब उन्ही द्विवेदी जी और उनकी पुलिस के सामने बेखौफ हो रहा है और पुलिस ख़ामोश तमाशाई ही नहीं है बल्कि वो उस तांडव में अपनी भूमिका भी निभा रही है।सैंकड़ों तस्वीर और वीडियो इसकी गवाही दे रहे हैं।भागलपुर,समस्तीपुर,औरंगाबाद और गया के अलावे दर्जनों जगह पर दंगाई बेकाबू होकर शासन,सामाजिक तानाबाना और इंसानियत की धज्जियां उड़ा रहे है।
इन सब का एक दूसरा पहलू भी है।वो ये कि ये सब न ही  मात्र संयोग है और न ही अचानक होने वाले कुकृत्य।ये सब एक साजिश और षड्यंत्र के तहत किया जा रहा है।एक प्रचलित मान्यता है कि दंगे आम तौर पर चुनाव के आस-पास भड़कते हैं या भड़काए जाते हैं।ऐसे दंगों के राजनीतिक मायने होते हैं ।समाज में धार्मिक वैमनस्य बढ़ा कर उसे धर्म के आधार पर बांटना ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो सके।राम नवमी के दौरान इस बार जिस तरह से बिहार में दंगे भड़के हैं उससे ये बखूबी अंदाज़ लगाया जा सकता है कि दंगे क्यों हो रहे हैं,कौन करवा रहा है और किसको इसका राजनीतिक लाभ लेना है।
दरअसल संघ और भाजपा को इस बात का बखूबी अंदाजा लग चुका है कि उत्तर भारत खासतौर से बिहार,बंगाल और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में अब उसकी दाल आसानी से गलने वाली नहीं है।2014 के चुनाव में तथाकथित विकास और अच्छे दिन का नारा लगाकर जीत हासिल करने वाली पार्टी को अब वो समर्थन नहीं मिलेगा।इस लिए संघ और भाजपा अपनी पुरानी राह पर अग्रसर है।जिस तरह से 2014 से पहले पश्चमी उत्तरप्रदेश में दंगों का खेल खेला गया था उसी प्रकार से अब बिहार को जलाने की कोशिश शरू हुई है ताकि इस आग में 2019 कई रोटी सेंकी जा सके।

Thursday, March 1, 2018

होली का गंगा जमुनी पैग़ाम।

मेराज नूरी
ऐसे माहौल में जबकि आज भारत में चारों तरफ एक संकीर्ण सोच और निर्लज अंतरात्मा के सहारे यहां की गंगा जमुनी तहजीब को खण्ड विखंड करने की कोशिशें जारी हैं होली का ये पर्व यक़ीनन इस माहौल में अमन और शांति,भाईचारा और सद्भाव को साकार करने में मददगार साबित होगा।
ज़ाहिरी तौर पर इसे एक धर्म विशेष के पर्व के तौर पर देखा जाता है और मनाया जाता है लेकिन इतिहास और भाईचारे की किताब पलटने के बाद ये मिथक न सिर्फ टूट जाता है बल्कि इस पर्व के सर्वधर्म स्वीकार और हर्षोल्लाश के साथ मनाए जाने की परंपरा का ऐसा ज्ञान प्राप्त होता है कि जिससे भारत के संवैधानिक चरित्र यथा हिन्दू,मुस्लिम,सिख और ईसाई के परस्पर प्रेमपूर्वक रहने की गाथा को बल प्रदान होता है।
कहते है कि राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक  है।राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।
इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
इन सब के इतर सूफी संतों के इस देश में ये भी इतिहास में दर्ज है कि जिस शिद्दत और जोश व जज़्बे से हमारे हिन्दू भी इस पर्व को मनाते हैं या मनाते आए हैं उसी जोश और जज़्बे से यह के मुसलमानों ने भी इस में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है।सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।
अतीत में सूफी और भक्ति आंदोलनों ने भी दोनों समुदायों के बीच मेलजोल को बढ़ावा दिया था।अपनी बहुचर्चित और सर्वधर्म में प्रेम और भाईचारे का दीप जलाने वाली किताब ""आलम में इंतिखाब: दिल्ली ""में समाज सेवा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1972 में पद्म भूषण से सम्मानित महेश्वर दयाल लिखते हैं:‘होली एक पुराना हिंदुस्तानी त्यौहार है जो हर कोई खेलता है चाहे वह पुरुष हो या महिला. चाहे वह किसी भी धर्म और जाति का हो।भारत में आने के बाद मुसलमान भी जोश से होली खेलने लगे चाहे वह कोई बादशाह हो या फकीर।'
13वीं सदी में हुए अमीर खुसरो (1253-1325) ने होली के त्यौहार पर कई छंद लिखे हैं:
खेलूंगी होली, ख्वाजा घर आए
धन धन भाग हमारे सजनी
ख्वाजा आए आंगन मेरे
मुगल सम्राट अकबर ने भी सांस्कृतिक मेल-जोल और सहिष्णुता को बढ़ावा दिया था ।अकबर के राज में सभी त्यौहार उत्साह के साथ मनाए जाते थे और यह परंपरा आने वाले शहंशाहों के समय भी जारी रही।
16वीं सदी में इब्राहिम रसखान (1548-1603) ने लिखा:
आज होरी रे मोहन होरी
कल हमरे आंगन गारी दे आयो सो कोरी
अब क्यों दूर बैठे मैय्या ढ़िंग, निकसो कुंज बिहारी
तुजुक-ए-जहांगीर में जहांगीर (1569-1627) ने लिखा है:उनका (हिंदुओं का) जो होली का दिन है, उसे वे साल का आखिरी दिन मानते हैं ।इसके एक दिन पहले शाम को हर गली-कूचे में होली जलाई जाती है। दिन में वे एक दूसरे के सिर और चेहरे पर अबीर लगाते हैं।
इतिहास में दर्ज है कि रात को लाल किले में होली का बड़ा जश्न होता था।रात भर नाच-गाना चलता ।देश के अलग-अलग हिस्सों से मशहूर तवायफों का भी इस मौके पर आना होता था ।इस मौके पर स्वांग करने वालों के झुंड शाहजहांबाद में जगह-जगह घूमते और दरबारियों और अमीरों के घरों में जाकर उनका मनोरंजन करते।रात को शहर मे महफिलें सजती थीं। क्या सामंत, क्या दरबारी और क्या कारोबारी, सभी इनमें जुटते और खूब जश्न मनाते थे।
कुल मिलाकर कर ये कहा जा सकता है की ये पर्व न सिर्फ रंगों की अठखेलियों के सहारे जश्न मनाने का नाम है अपितु आपसी सौहार्द और भाईचारे को बढ़ावा देने और मुहब्बत को आम करने का एक सर्वमान्य मौक़ा है।ज़रूरत इस बात की है कि इस पर्व के गर्भ में समाए मोहब्बत और भाईचारे के पैग़ाम को सार्थक करके आज की द्वेषपूर्ण और नफरत को बढ़ावा देने वाली तथाकथित मुठ्ठीभर ताक़तों को एक ऐसा पैग़ाम दिया जाए कि उनकी चंद एक बेमानी हरकत इस देश की सदियों पुरानी परंपरा और तहज़ीब को नुकसान नहीं पहुंचा सकती। हमारा देश अपनी सदियों पुरानी सर्वधर्म स्वीकार्य वाली सभ्यता को जिंदा रखने में कामयाब रहे बस यही दुआ है।देश वासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
(merajmn@gmail.com)


Sunday, February 18, 2018

मिल्लत फ़रोशी और मुस्लिम पर्सनल लॉ

मेराज नूरी
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दरअसल इस मज़मून को लिखने का न तो मैं अहल हूँ और न ही मुझे ऐसी कोई ज़रूरत थी कि मैं इस जैसे मसले पर लिख कर 'मिल्लत के कुछ एक लोग' की शान में गुस्ताखी करूँ लेकिन जैसा कि मैंने कहाँ 'मिल्लत के कुछ एक लोग' को छोड़ कर जब औरों की करतूत देखता हूँ,सुनता हूँ और पढ़ता हूँ तो अक्सर ज़ेहन में आता है कि सोशल मीडिया पर ही सही अपनी भड़ास उड़ेल दूँ ताकि कम से कम नींद तो सुकून से आ जाये।में ये भी जानता हूँ कि हम जैसे कई पड़े हैं जो लिख लिख कर थक हार चुके हैं लेकिन अशरफुल मख़लूक़ात में शुमार हमारी ये क़ौम यानी मुस्लिम क़ौम अभी सोई है और ये क़ौम उस वक़्त अंगराई लेती है या जागती है जब वक़्त निकल चुका होता है।जैसे तीन तलाक़ का ही मामला ले लीजिए।शाहबानो मामले के उठने के बाद से आज तक ये क़ौम ख़्वाब ए ख़रगोश में रही ।उसकी नींद कब खुली जब मौजूदा हुकूमत ने उसे अपने राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए उसके पर्सनल लॉ को ही दरकिनार कर दिया।क़ौम की और उसके आकाओं की बेग़ैरती देखिए।अब जहां तहां जलसे जुलूस निकाल कर सीना चौड़ा किया जा रहा है।हद दर्जे की बेहूदगी देखिए कि अब ये क़ौम अपनी माँ बहनों को भी सड़कों पर ला खड़ी करके अपने जुलूस और जलसे को कामयाब बनाने का ढिंढोरा पिटती है।कहती है आज फलां जगह दो लाख ख्वातीन नें अपनी हक़ की लड़ाई सड़कों पर आकर लड़ी,हक़ की सदा बुलंद की फलां ढिमकां।
खैर,बात शुरू हुई या हमने की है ''चंद एक लोग ''को छोड़ कर ''बाकी के मिल्लत फरोशों और ज़मीर फरोशों'' के करतूतों से बाख़बर होने की तो आइए आप को लिए चलते उस जानिब।
रात के आधे पहर जब मैं सोशल मीडिया की ख़ाक छानने में मशगूल था तो मेरी नज़र हमारे एक फेसबुक फ्रेंड की एक फोटो पर पड़ी जिसे उन्होंने शेयर करते हुए मौजूदा वक़्त के सबसे हॉट प्लेटफार्म (मीडिया की नज़रों में)आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से चंद सवाल पूछे है।उस फ़ोटो में यूँ तो दो और जुब्बे वाले शख़्स नज़र आरहे हैं लेकिन उसी फ़ोटो में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक रुक्न यानी मेम्बर और इस्लामी लिबास में मलबुस मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी बंद कमरे में हुई मीटिंग के बाद शायद प्रेस को बयान जारी करने की खातिर फ़ोटो सेशन के दौरान ग्रुप पोज़ में उन लोगों के साथ खड़े है या यूं कहें कि उन लोगों के साथ फ़ोटो खिंचवाकर फ़ख्र महसूस कर रहे हैं जो न तो ज़ाहिरी तौर पर और ना ही बातनि तौर पर इस लायक़ हैं कि उनको अपने शाना ब शाना खड़ा किया जाए।ये हैं बाबरी बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर की पैरवी करने वाले डबल श्री रविशंकर और उसके चेले चपाटी।ये तस्वीर श्री श्री रविशंकर के खास लोगों में शुमार पंडित अमरनाथ मिश्र ने 06 अक्टूबर 2017 को फेसबुक पर पोस्ट की है।ये वही अमर नाथ मिश्र हैं जिन्होंने मौलाना सलमान नदवी पर बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर बनवाने की पैरवी और कोशिश की खातिर 5000 करोड़ रुपये और भाजपा नीत सरकार से राज्यसभा के टिकट लेने का इल्जाम लगा कर सनसनी फैलाई है।
हालांकि पहली नज़र में मुझे न ही इस फोटो पर कोई ऐतराज़ था न ही उसमें मौजूद लोगों के फ़ख्रिया अन्दाज़ ए पेशकश पर।होना भी नही चाहिए क्योंकि हर एक के अपने अपने निजी मामलात होते है और उसमें दखल अंदाज़ी की मुझको क्या किसी को भी इजाज़त नहीं।लेकिन बात जब रहबर होने और समझने तक जाती है तो कुछ ताक झांक लाज़मी है।ताकि ये जाना जाए कि आखिर किस हद तक हमारे रहबर हमारी कम अपनी फिक्र में ज़्यादा मुब्तला हैं और मिल्लत फ़रोशी की कौन सी आला तेजारत करने में मशगूल हैं।
कुछ एक मौके पर मौलाना एजाज़ अरशद क़ासमी से मेरी मुलाकात है और प्रोफेशनल बातचीत भी ।मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी लिखते है अपने आपको।ये अलग बात है कि फेसबुक पर जो पेज बना रखा है उसमें मुफ़्ती गायब है ।खैर ये उनका निजी मामला है No Comments.बात चूंकि मिल्लत की तर्जुमानी और रहबरी करने वाली तंज़ीम आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की है तो जाहिर है ये तस्वीर एक अदना से मुसलमान को भी खटकेगी।वजह भी है।मौजूदा हालात में क़ौम की तर्जुमानी करने वाली और तीन तलाक़ से लेकर बाबरी मस्जिद जैसे हस्सास और संवेदनशील मामले पर ये जमात आखरी मरहले तक लड़ाई लड़ने में मशगूल है ।इसलिए इस वक़्त उसके एक एक मेम्बर और उससे जुड़े सभी लोगों पर लोगों की न सिर्फ नज़र है बल्कि उनसे मिल्लत को बहुत सी उम्मीदें हैं।ऐसे वक्त में ये सवाल भी लाज़मी है कि आया बोर्ड के एक मेंबर मौलाना सलमान हुसैनी नदवी की गैर जिम्मेदाराना हरकत और बयान बाज़ी से मिल्लत को पहुंचने वाले नुकसान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अज़मत की जो पामाली हुई है उसके जितने ज़िम्मेदार मौलाना सलमान नदवी है उतने ही मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी भी।
फ़ोटो हालांकि अभी सामने आयी है या यूँ कहें कि लोगों का ध्यान अभी इस ओर गया है लेकिन मुलाक़ात की दिन तारीख के हिसाब से उधर वाले श्री श्री और हमारे वाले हज़रत हज़रत के दरमियान खिचड़ी काफी दिनों से पक रही थी जिसकी या तो हो सकता है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खबर न हो या फिर वो भी इसमें शामिल हो ।दोनों सूरत चिंता जनक है।अगर बोर्ड को इसकी भनक तक नही हुई तो फिर आखिर ये कैसा इदारा या संगठन है जिसके मेंबर उस प्लेटफार्म से हट कर अकेले अकेले खिचड़ी पकाता है और फिर दुश्मनों को परोसकर हम पर ही यलगार करने का मौका फ़राहम कराता है।और अगर इस खिचड़ी में बोर्ड भी शामिल है तो बंद कर देनी चाहिए ऐसी दुकान जो ज़मीर फ़रोशी और मिल्लत फ़रोशी करके अपनी तिजोरी भर रही हो।ये सवाल भी है कि आखिर पर्सनल लॉ बोर्ड किस राह पर है।क़ौम की खातिर या क़ौम के खात्मे की खातिर।आज के हालात में जबकि मौलाना सलमान नदवी को बयानबाज़ी और कुकृत्यों की खातिर बोर्ड से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है अब ज़रूरत इस बात की है मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी जैसे लोगों के लिए भी वही तरीका अख्तियार किया जाए।वरना कल को क्या पता मौलाना सलमान नदवी टाइप का फार्मूला या उससे मिलता जुलता नया फार्मूला ये भी पेश कर दें या इनसे पेश करा दिया जाए। अब देखने वाली बात ये है कि आया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने पैमाने पर कहाँ तक खरा उतरता है।

बेग़ैरत समाज


मेराज नूरी
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ये तस्वीर जो आपको नज़र आ रही है वो है महाराष्ट्र के मालेगाँव की।ये तस्वीर है मुस्लिम माँ बहनों की जो बज़ाहिर तो नक़ाब में नज़र आ रही है और अपने हक़ के लिए लड़ती हुई दिखाई और पेश की जा रही हैं लेकिन शायद इस तस्वीर और हुजूम के पीछे की घटिया और नापाक हरकत किसी को नज़र नही आ रही है।अखबारात में बड़ी बड़ी तस्वीरें छपेंगी।चैनलों पर बहसें होंगी।
इन तस्वीरों के सहारे क़ौम के ठेकेदार अपना सीना चौड़ा करके ये कहते और सुनते मिलेंगे की आज फलां जगह ख्वातीन(औरतों) ने ज़बरदस्त मुज़ाहेरा (प्रदर्शन)करके हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई,अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं,फलां ढिमका वगैरा वगैरा।सवाल ये है कि जिस क़ौम और मज़हब में औरतों को घर की ज़ीनत समझ गया,जिसकी इज़्ज़त व हुरमत की रखवाली और निगहबानी(सुरक्षा)की सख्त हिदायत है आज उस क़ौम के ठेकेदार उसी ख्वातीन को सड़कों पर लाकर किस मज़हब और रवायत को बचाना चाहते हैं ।ये समझ से परे है।क्या ये औरतों को बेइज़्ज़त और बेआबरू करना नही की जब जहां देखो धरणो,मोज़ाहरों के नाम पर घर की इज़्ज़त को सरे बाज़ार लाकर खड़ा कर दिया जाता हो।मज़हब की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने वाली जमातें और उसके कर्ताधर्ता क्या अब नामर्द और नपुंसक हो चले हैं कि जिसकी(ख्वातीन) निगहबानी के लिए वो पैदा किये गए वही(औरतें)अब उसके लिए ढाल बन कर मैदान में आने को मजबूर हैं या मजबूर की जा रही है।1400 साल से दुनिया में इस्लाम के खिलाफ कहीं न कहीं कोई न कोई फितना पनपता रहा है।ये ना तो कोई नई बात है और न ही गैर मामूली।इस्लाम अपने वजूद से ही ग़ैरों की आंखों में खटकता रहा है।अरब से लेकर मिस्र,इराक,ईरान,शाम,फिलिस्तीन से लेकर भारत,पाकिस्तान,अफग्गनिस्तान वगैरा वगैरा तमाम जगह वक़्त बे वक़्त किसी न किसी बहाने इस्लाम के खिलाफ कोई न कोई साज़िश होती रही है और उसका मुहतोड़ जवाब भी दिया जाता रहा है।लेकिन हालिया दिनों में जिस तरह बे सर पैर की हरकतें हो रही हैं वो न सिर्फ चिंता जनक हैं बल्कि इस्लाम की रूह के भी मुनाफी(विपरीत )है।
इस्लाम की समझ रखने वाला और एक आम सा मुसलमान भी ये जानता है की हमारे पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो एलैहे वसल्लम जब इस दुनिया में तशरीफ़ लाये और इस्लाम को फैलाना शुरू किया तो उनके खिलाफ क्या क्या न हुआ।उस वक़्त भी इस्लाम को ज़ेर(नीचा दिखाने)करने और मिटा देने की खातिर क्या क्या न किया गया।मक्का से लेकर मदीना तक साज़िशों की भरमार रही लेकिन इसके बावजूद इस्लाम फैला और सारी दुनिया में सुर्खरू हुआ।
हमारे नबी और उनके बाद के लोगों ने भी इस्लाम को वो ताक़त और रूह बख्शी की जिस की मिसाल नहीं।हम उनके एहसान मंद हैं कि उन्होंने अपनी कुर्बानियां देकर हमें वो दीन और मज़हब अता किया कि जिसके रहते तक ही इस दुनिया का वजूद है।जिस दिन इस्लाम और उसके मानने वाले नही होंगे उस दिन ये बाज़ीगर दुनिया खुद ब खुद मिट जाएगी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि उस दीन और उसकी तालीमात(शिक्षा) पर अमल पैरा होकर उसके बताए उसूलों पर चल कर ज़िन्दगी बसर किया जाए लेकिन आज उसके उलट हो रहा है।जिस दीन को बचाने की खातिर मर्दों को मैदान में आना चाहिए वहां पहली क़तार में औरतें खड़ी कर दी जाती हैं।
अब मालेगाँव में हुए इस प्रदर्शन को ही ले लीजिए।ये प्रदर्शन भारत सरकार के उस क़ानून के खिलाफ हुआ जिसके तहत तीन तलाक़ एक बार में दिया जाना अपराध माना गया है।ये बिल लोक सभा से पास हो चुका है और राज्यसभा से पारित होना बाकी है।ये कोई बड़ी बात भी नही।ये एक सोंची समझी साजिश के तहत किया गया कार्य है जिसका मकसद मुसलमानों और इस्लाम को नुकसान पहुंचाना या यूं कहें उनके पर्सनल लॉ में दखलंदाज़ी करके अपना उल्लू सीधा करना और एक विशेष समुदाय को खुश करना है।ये महज़ वोट बैंक की सियासत है उसके अलावा कुछ नहीं।और फिर ये कोई नया मामला भी नही।ये मामला तो राजीव गांधी के ज़माने में ही सामने आया था ।शाहबानो मामले के तौर पर तब उसने सुर्खिया बटोरी थीं और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उस वक़्त अपने हिसाब से इसे हैंडिल किया था।तब से लेकर आज तक न तो हमारे उलमा और ना ही क़ौम के ठेकेदार ये समझ पाए कि आया इस ताल्लुक़ से क़ौम में बेदारी लायी जाए ताकि आगे चलकर कोई बड़ा इशू न खड़ा हो।क़ौम सोती रही और क़ौम की ठेकेदारी करने वाले अपनी जेबें भरते रहे।इन सालों में अगर ईमानदाराना तौर पर कोशिश की जाती तो यकीन मानिए आज जो ये बावेला मचा है वो हरगिज़ नही होता।
इन सालों में विपक्षियों ने इस ताल्लुक़ से भ्रामक और दुष्प्रचार करके एक तरफ तो बहुसंख्यक समुदाय को खुश करके वोट हासिल किया तो दूसरी तरफ मुस्लिम मां बहनों को इंसाफ दिलाने के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ करना शुरू किया जिसका नतीजा हुआ कि आज ये स्थिति पैदा हुई।
दूसरी तरफ आज जिस मुस्तैदी और दिखावे का मुज़ाहेरा किया जा रहा है अगर ये मुस्तैदी पहले दिखाई जाती तो शायद ये दिन देखने को नही मिलते।हम आखिर ये बात कयूँ नही समझ पा रहे हैं कि हमारा मज़हब,हमारा दीन तालीमात नबवी और बेदारी के ज़रिए फला फुला है ना कि धरना,प्रदर्शन और रैलियों के ज़रिए।
हाँ, तो बात मालेगाँव की।यानी जिस चीज़ के खिलाफ 5 करोड़ लोगों का हस्ताक्षर लिया जा चुका हो और हुकूमत को गला फाड़ फाड़ कर बताया जा चुका हो कि भारत की मुस्लिम महिलाएं इस कानून के खिलाफ हैं अगर उसके बावजूद सरकार वो काम कर रही हो तो अब ये महज़ दिखावे का विरोध क्यों।और वो भी अपनी मां बहनों की इज़्ज़त और उनकी हुरमत की कीमत पर।आखिर क्यों।क्या हमारी मां बहनों के यूँ सरे आम सड़कों पर आ जाने से मसले का हल मुमकिन है?क्या इससे या इस जैसे प्रदर्शनों से नफरत की आग में जलने वाली हुकूमत अपना नापाक इरादा तर्क कर देगी ?क्या ये हुजूम सरकार को मजबूर करके उसे अपने कदम वापस करने को मजबूर कर देगा।हरगिज़ नहीं।हरगिज़ नहीं।हरगिज़ नहीं।
अगर आप कुछ करना ही चाहते हैं तो खुद लड़ाई लड़िये।आखिर अपनी इज़्ज़त को सरे आम यूँ नीलाम करके क्या हासिल कि जिसके लिए अल्लाह की अदालत में भी क़सूरवार होंगे।क्या हम मर्द इतने ज़लील और रुसवा हो चले हैं कि औरतों को उसका हक भी ना दिला सकें।क्या हम मर्द इतने बेग़ैरत हो चले हैं कि औरतें अपने होक़ूक़ के लिए खुद ही मैदान में आएं या उनको मैदान में आने के लिए मजबूर किया जाए।सोंचिये।आखिर हम कहाँ जा रहे हैं और क्या हासिल करना चाहते हैं।

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...