मेराज नूरी
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दरअसल इस मज़मून को लिखने का न तो मैं अहल हूँ और न ही मुझे ऐसी कोई ज़रूरत थी कि मैं इस जैसे मसले पर लिख कर 'मिल्लत के कुछ एक लोग' की शान में गुस्ताखी करूँ लेकिन जैसा कि मैंने कहाँ 'मिल्लत के कुछ एक लोग' को छोड़ कर जब औरों की करतूत देखता हूँ,सुनता हूँ और पढ़ता हूँ तो अक्सर ज़ेहन में आता है कि सोशल मीडिया पर ही सही अपनी भड़ास उड़ेल दूँ ताकि कम से कम नींद तो सुकून से आ जाये।में ये भी जानता हूँ कि हम जैसे कई पड़े हैं जो लिख लिख कर थक हार चुके हैं लेकिन अशरफुल मख़लूक़ात में शुमार हमारी ये क़ौम यानी मुस्लिम क़ौम अभी सोई है और ये क़ौम उस वक़्त अंगराई लेती है या जागती है जब वक़्त निकल चुका होता है।जैसे तीन तलाक़ का ही मामला ले लीजिए।शाहबानो मामले के उठने के बाद से आज तक ये क़ौम ख़्वाब ए ख़रगोश में रही ।उसकी नींद कब खुली जब मौजूदा हुकूमत ने उसे अपने राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए उसके पर्सनल लॉ को ही दरकिनार कर दिया।क़ौम की और उसके आकाओं की बेग़ैरती देखिए।अब जहां तहां जलसे जुलूस निकाल कर सीना चौड़ा किया जा रहा है।हद दर्जे की बेहूदगी देखिए कि अब ये क़ौम अपनी माँ बहनों को भी सड़कों पर ला खड़ी करके अपने जुलूस और जलसे को कामयाब बनाने का ढिंढोरा पिटती है।कहती है आज फलां जगह दो लाख ख्वातीन नें अपनी हक़ की लड़ाई सड़कों पर आकर लड़ी,हक़ की सदा बुलंद की फलां ढिमकां।
खैर,बात शुरू हुई या हमने की है ''चंद एक लोग ''को छोड़ कर ''बाकी के मिल्लत फरोशों और ज़मीर फरोशों'' के करतूतों से बाख़बर होने की तो आइए आप को लिए चलते उस जानिब।
रात के आधे पहर जब मैं सोशल मीडिया की ख़ाक छानने में मशगूल था तो मेरी नज़र हमारे एक फेसबुक फ्रेंड की एक फोटो पर पड़ी जिसे उन्होंने शेयर करते हुए मौजूदा वक़्त के सबसे हॉट प्लेटफार्म (मीडिया की नज़रों में)आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से चंद सवाल पूछे है।उस फ़ोटो में यूँ तो दो और जुब्बे वाले शख़्स नज़र आरहे हैं लेकिन उसी फ़ोटो में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक रुक्न यानी मेम्बर और इस्लामी लिबास में मलबुस मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी बंद कमरे में हुई मीटिंग के बाद शायद प्रेस को बयान जारी करने की खातिर फ़ोटो सेशन के दौरान ग्रुप पोज़ में उन लोगों के साथ खड़े है या यूं कहें कि उन लोगों के साथ फ़ोटो खिंचवाकर फ़ख्र महसूस कर रहे हैं जो न तो ज़ाहिरी तौर पर और ना ही बातनि तौर पर इस लायक़ हैं कि उनको अपने शाना ब शाना खड़ा किया जाए।ये हैं बाबरी बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर की पैरवी करने वाले डबल श्री रविशंकर और उसके चेले चपाटी।ये तस्वीर श्री श्री रविशंकर के खास लोगों में शुमार पंडित अमरनाथ मिश्र ने 06 अक्टूबर 2017 को फेसबुक पर पोस्ट की है।ये वही अमर नाथ मिश्र हैं जिन्होंने मौलाना सलमान नदवी पर बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर बनवाने की पैरवी और कोशिश की खातिर 5000 करोड़ रुपये और भाजपा नीत सरकार से राज्यसभा के टिकट लेने का इल्जाम लगा कर सनसनी फैलाई है।
हालांकि पहली नज़र में मुझे न ही इस फोटो पर कोई ऐतराज़ था न ही उसमें मौजूद लोगों के फ़ख्रिया अन्दाज़ ए पेशकश पर।होना भी नही चाहिए क्योंकि हर एक के अपने अपने निजी मामलात होते है और उसमें दखल अंदाज़ी की मुझको क्या किसी को भी इजाज़त नहीं।लेकिन बात जब रहबर होने और समझने तक जाती है तो कुछ ताक झांक लाज़मी है।ताकि ये जाना जाए कि आखिर किस हद तक हमारे रहबर हमारी कम अपनी फिक्र में ज़्यादा मुब्तला हैं और मिल्लत फ़रोशी की कौन सी आला तेजारत करने में मशगूल हैं।
कुछ एक मौके पर मौलाना एजाज़ अरशद क़ासमी से मेरी मुलाकात है और प्रोफेशनल बातचीत भी ।मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी लिखते है अपने आपको।ये अलग बात है कि फेसबुक पर जो पेज बना रखा है उसमें मुफ़्ती गायब है ।खैर ये उनका निजी मामला है No Comments.बात चूंकि मिल्लत की तर्जुमानी और रहबरी करने वाली तंज़ीम आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की है तो जाहिर है ये तस्वीर एक अदना से मुसलमान को भी खटकेगी।वजह भी है।मौजूदा हालात में क़ौम की तर्जुमानी करने वाली और तीन तलाक़ से लेकर बाबरी मस्जिद जैसे हस्सास और संवेदनशील मामले पर ये जमात आखरी मरहले तक लड़ाई लड़ने में मशगूल है ।इसलिए इस वक़्त उसके एक एक मेम्बर और उससे जुड़े सभी लोगों पर लोगों की न सिर्फ नज़र है बल्कि उनसे मिल्लत को बहुत सी उम्मीदें हैं।ऐसे वक्त में ये सवाल भी लाज़मी है कि आया बोर्ड के एक मेंबर मौलाना सलमान हुसैनी नदवी की गैर जिम्मेदाराना हरकत और बयान बाज़ी से मिल्लत को पहुंचने वाले नुकसान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अज़मत की जो पामाली हुई है उसके जितने ज़िम्मेदार मौलाना सलमान नदवी है उतने ही मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी भी।
फ़ोटो हालांकि अभी सामने आयी है या यूँ कहें कि लोगों का ध्यान अभी इस ओर गया है लेकिन मुलाक़ात की दिन तारीख के हिसाब से उधर वाले श्री श्री और हमारे वाले हज़रत हज़रत के दरमियान खिचड़ी काफी दिनों से पक रही थी जिसकी या तो हो सकता है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खबर न हो या फिर वो भी इसमें शामिल हो ।दोनों सूरत चिंता जनक है।अगर बोर्ड को इसकी भनक तक नही हुई तो फिर आखिर ये कैसा इदारा या संगठन है जिसके मेंबर उस प्लेटफार्म से हट कर अकेले अकेले खिचड़ी पकाता है और फिर दुश्मनों को परोसकर हम पर ही यलगार करने का मौका फ़राहम कराता है।और अगर इस खिचड़ी में बोर्ड भी शामिल है तो बंद कर देनी चाहिए ऐसी दुकान जो ज़मीर फ़रोशी और मिल्लत फ़रोशी करके अपनी तिजोरी भर रही हो।ये सवाल भी है कि आखिर पर्सनल लॉ बोर्ड किस राह पर है।क़ौम की खातिर या क़ौम के खात्मे की खातिर।आज के हालात में जबकि मौलाना सलमान नदवी को बयानबाज़ी और कुकृत्यों की खातिर बोर्ड से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है अब ज़रूरत इस बात की है मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी जैसे लोगों के लिए भी वही तरीका अख्तियार किया जाए।वरना कल को क्या पता मौलाना सलमान नदवी टाइप का फार्मूला या उससे मिलता जुलता नया फार्मूला ये भी पेश कर दें या इनसे पेश करा दिया जाए। अब देखने वाली बात ये है कि आया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने पैमाने पर कहाँ तक खरा उतरता है।
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दरअसल इस मज़मून को लिखने का न तो मैं अहल हूँ और न ही मुझे ऐसी कोई ज़रूरत थी कि मैं इस जैसे मसले पर लिख कर 'मिल्लत के कुछ एक लोग' की शान में गुस्ताखी करूँ लेकिन जैसा कि मैंने कहाँ 'मिल्लत के कुछ एक लोग' को छोड़ कर जब औरों की करतूत देखता हूँ,सुनता हूँ और पढ़ता हूँ तो अक्सर ज़ेहन में आता है कि सोशल मीडिया पर ही सही अपनी भड़ास उड़ेल दूँ ताकि कम से कम नींद तो सुकून से आ जाये।में ये भी जानता हूँ कि हम जैसे कई पड़े हैं जो लिख लिख कर थक हार चुके हैं लेकिन अशरफुल मख़लूक़ात में शुमार हमारी ये क़ौम यानी मुस्लिम क़ौम अभी सोई है और ये क़ौम उस वक़्त अंगराई लेती है या जागती है जब वक़्त निकल चुका होता है।जैसे तीन तलाक़ का ही मामला ले लीजिए।शाहबानो मामले के उठने के बाद से आज तक ये क़ौम ख़्वाब ए ख़रगोश में रही ।उसकी नींद कब खुली जब मौजूदा हुकूमत ने उसे अपने राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए उसके पर्सनल लॉ को ही दरकिनार कर दिया।क़ौम की और उसके आकाओं की बेग़ैरती देखिए।अब जहां तहां जलसे जुलूस निकाल कर सीना चौड़ा किया जा रहा है।हद दर्जे की बेहूदगी देखिए कि अब ये क़ौम अपनी माँ बहनों को भी सड़कों पर ला खड़ी करके अपने जुलूस और जलसे को कामयाब बनाने का ढिंढोरा पिटती है।कहती है आज फलां जगह दो लाख ख्वातीन नें अपनी हक़ की लड़ाई सड़कों पर आकर लड़ी,हक़ की सदा बुलंद की फलां ढिमकां।
खैर,बात शुरू हुई या हमने की है ''चंद एक लोग ''को छोड़ कर ''बाकी के मिल्लत फरोशों और ज़मीर फरोशों'' के करतूतों से बाख़बर होने की तो आइए आप को लिए चलते उस जानिब।
रात के आधे पहर जब मैं सोशल मीडिया की ख़ाक छानने में मशगूल था तो मेरी नज़र हमारे एक फेसबुक फ्रेंड की एक फोटो पर पड़ी जिसे उन्होंने शेयर करते हुए मौजूदा वक़्त के सबसे हॉट प्लेटफार्म (मीडिया की नज़रों में)आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से चंद सवाल पूछे है।उस फ़ोटो में यूँ तो दो और जुब्बे वाले शख़्स नज़र आरहे हैं लेकिन उसी फ़ोटो में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक रुक्न यानी मेम्बर और इस्लामी लिबास में मलबुस मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी बंद कमरे में हुई मीटिंग के बाद शायद प्रेस को बयान जारी करने की खातिर फ़ोटो सेशन के दौरान ग्रुप पोज़ में उन लोगों के साथ खड़े है या यूं कहें कि उन लोगों के साथ फ़ोटो खिंचवाकर फ़ख्र महसूस कर रहे हैं जो न तो ज़ाहिरी तौर पर और ना ही बातनि तौर पर इस लायक़ हैं कि उनको अपने शाना ब शाना खड़ा किया जाए।ये हैं बाबरी बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर की पैरवी करने वाले डबल श्री रविशंकर और उसके चेले चपाटी।ये तस्वीर श्री श्री रविशंकर के खास लोगों में शुमार पंडित अमरनाथ मिश्र ने 06 अक्टूबर 2017 को फेसबुक पर पोस्ट की है।ये वही अमर नाथ मिश्र हैं जिन्होंने मौलाना सलमान नदवी पर बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर बनवाने की पैरवी और कोशिश की खातिर 5000 करोड़ रुपये और भाजपा नीत सरकार से राज्यसभा के टिकट लेने का इल्जाम लगा कर सनसनी फैलाई है।
हालांकि पहली नज़र में मुझे न ही इस फोटो पर कोई ऐतराज़ था न ही उसमें मौजूद लोगों के फ़ख्रिया अन्दाज़ ए पेशकश पर।होना भी नही चाहिए क्योंकि हर एक के अपने अपने निजी मामलात होते है और उसमें दखल अंदाज़ी की मुझको क्या किसी को भी इजाज़त नहीं।लेकिन बात जब रहबर होने और समझने तक जाती है तो कुछ ताक झांक लाज़मी है।ताकि ये जाना जाए कि आखिर किस हद तक हमारे रहबर हमारी कम अपनी फिक्र में ज़्यादा मुब्तला हैं और मिल्लत फ़रोशी की कौन सी आला तेजारत करने में मशगूल हैं।
कुछ एक मौके पर मौलाना एजाज़ अरशद क़ासमी से मेरी मुलाकात है और प्रोफेशनल बातचीत भी ।मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी लिखते है अपने आपको।ये अलग बात है कि फेसबुक पर जो पेज बना रखा है उसमें मुफ़्ती गायब है ।खैर ये उनका निजी मामला है No Comments.बात चूंकि मिल्लत की तर्जुमानी और रहबरी करने वाली तंज़ीम आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की है तो जाहिर है ये तस्वीर एक अदना से मुसलमान को भी खटकेगी।वजह भी है।मौजूदा हालात में क़ौम की तर्जुमानी करने वाली और तीन तलाक़ से लेकर बाबरी मस्जिद जैसे हस्सास और संवेदनशील मामले पर ये जमात आखरी मरहले तक लड़ाई लड़ने में मशगूल है ।इसलिए इस वक़्त उसके एक एक मेम्बर और उससे जुड़े सभी लोगों पर लोगों की न सिर्फ नज़र है बल्कि उनसे मिल्लत को बहुत सी उम्मीदें हैं।ऐसे वक्त में ये सवाल भी लाज़मी है कि आया बोर्ड के एक मेंबर मौलाना सलमान हुसैनी नदवी की गैर जिम्मेदाराना हरकत और बयान बाज़ी से मिल्लत को पहुंचने वाले नुकसान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अज़मत की जो पामाली हुई है उसके जितने ज़िम्मेदार मौलाना सलमान नदवी है उतने ही मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी भी।
फ़ोटो हालांकि अभी सामने आयी है या यूँ कहें कि लोगों का ध्यान अभी इस ओर गया है लेकिन मुलाक़ात की दिन तारीख के हिसाब से उधर वाले श्री श्री और हमारे वाले हज़रत हज़रत के दरमियान खिचड़ी काफी दिनों से पक रही थी जिसकी या तो हो सकता है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खबर न हो या फिर वो भी इसमें शामिल हो ।दोनों सूरत चिंता जनक है।अगर बोर्ड को इसकी भनक तक नही हुई तो फिर आखिर ये कैसा इदारा या संगठन है जिसके मेंबर उस प्लेटफार्म से हट कर अकेले अकेले खिचड़ी पकाता है और फिर दुश्मनों को परोसकर हम पर ही यलगार करने का मौका फ़राहम कराता है।और अगर इस खिचड़ी में बोर्ड भी शामिल है तो बंद कर देनी चाहिए ऐसी दुकान जो ज़मीर फ़रोशी और मिल्लत फ़रोशी करके अपनी तिजोरी भर रही हो।ये सवाल भी है कि आखिर पर्सनल लॉ बोर्ड किस राह पर है।क़ौम की खातिर या क़ौम के खात्मे की खातिर।आज के हालात में जबकि मौलाना सलमान नदवी को बयानबाज़ी और कुकृत्यों की खातिर बोर्ड से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है अब ज़रूरत इस बात की है मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी जैसे लोगों के लिए भी वही तरीका अख्तियार किया जाए।वरना कल को क्या पता मौलाना सलमान नदवी टाइप का फार्मूला या उससे मिलता जुलता नया फार्मूला ये भी पेश कर दें या इनसे पेश करा दिया जाए। अब देखने वाली बात ये है कि आया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने पैमाने पर कहाँ तक खरा उतरता है।

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