Wednesday, March 28, 2018

बिहार दंगे:2019 के लिए भाजपा की शरुआत

मेराज नूरी
कुछ ही दिनों पहले जब ये खबर आई कि बिहार सरकार ने राज्य के नए पुलिस महानिदेशक के तौर पर के एस द्विवेदी का मनोनयन किया है तो उसी वक़्त अंदाज़ हो गया था कि भविष्य में क्या होने वाला है ।भजपानीत नीतीश कुमार के सरकार के इस फैसले की सभी ने आलोचना भी की थी लेकिन संघ और भाजपा के दबाव में नीतीश कुमार  को ये करना पड़ा।दरअसल, 1989 में जब के एस द्विवेदी भागलपुर के एसपी पद पर तैनात थे तब भागलपुर में भीषण दंगा हुआ था। इस दंगे में करीब एक हजार लोगों की जान चली गई थी। तब आरोप लगे थे कि तत्कालीन एसपी के एस द्विवेदी ने न सिर्फ दंगों पर काबू पाने में कोताही बरती थी बल्कि दंगा भड़काने में भी अहम भूमिका निभाई थी।ये बात न किसी से ढकी छुपी है और ना ही कोई इससे इनकार कर सकता है।बताया जाता है कि वे आरएसएस के एजेंट के रूप में काम कर थे और उनके इशारे पर पूरी भागलपुर पुलिस भी हिन्दू-मुसलमान में बंट चुकी थी। इस क्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने के एस द्विवेदी को हटाने का निर्देश दिया। इसका प्रतिरोध भागलपुर में कुछ लोगों ने इस कदर किया कि जब राजीव गांधी दंगे का जायजा लेने पहुंचे तब उन्हें भागलपुर शहर में घुसने तक नहीं दिया गया।इन आरोपों की जांच के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा ने हाईकोर्ट के तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई थी। इस कमेटी के दो सदस्यों ने संयुक्त रिपोर्ट में एसपी द्विवेदी के खिलाफ टिप्पणी की थी।
आज जब वही द्विवेदी बिहार पुलिस के मुखिया बन कर अवतरित हुए तो फिर से बिहार में भागलपुर रूपी तांडव की शरुआत हो चुकी है।आज बिहार में चारों तरफ दंगों का खौफ है।हर जगह दंगाई बेकाबू हैं और एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है।धार्मिक स्थलों,मकानों और दुकानों को आग के हवाले किया जा रहा है।ये सब उन्ही द्विवेदी जी और उनकी पुलिस के सामने बेखौफ हो रहा है और पुलिस ख़ामोश तमाशाई ही नहीं है बल्कि वो उस तांडव में अपनी भूमिका भी निभा रही है।सैंकड़ों तस्वीर और वीडियो इसकी गवाही दे रहे हैं।भागलपुर,समस्तीपुर,औरंगाबाद और गया के अलावे दर्जनों जगह पर दंगाई बेकाबू होकर शासन,सामाजिक तानाबाना और इंसानियत की धज्जियां उड़ा रहे है।
इन सब का एक दूसरा पहलू भी है।वो ये कि ये सब न ही  मात्र संयोग है और न ही अचानक होने वाले कुकृत्य।ये सब एक साजिश और षड्यंत्र के तहत किया जा रहा है।एक प्रचलित मान्यता है कि दंगे आम तौर पर चुनाव के आस-पास भड़कते हैं या भड़काए जाते हैं।ऐसे दंगों के राजनीतिक मायने होते हैं ।समाज में धार्मिक वैमनस्य बढ़ा कर उसे धर्म के आधार पर बांटना ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो सके।राम नवमी के दौरान इस बार जिस तरह से बिहार में दंगे भड़के हैं उससे ये बखूबी अंदाज़ लगाया जा सकता है कि दंगे क्यों हो रहे हैं,कौन करवा रहा है और किसको इसका राजनीतिक लाभ लेना है।
दरअसल संघ और भाजपा को इस बात का बखूबी अंदाजा लग चुका है कि उत्तर भारत खासतौर से बिहार,बंगाल और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में अब उसकी दाल आसानी से गलने वाली नहीं है।2014 के चुनाव में तथाकथित विकास और अच्छे दिन का नारा लगाकर जीत हासिल करने वाली पार्टी को अब वो समर्थन नहीं मिलेगा।इस लिए संघ और भाजपा अपनी पुरानी राह पर अग्रसर है।जिस तरह से 2014 से पहले पश्चमी उत्तरप्रदेश में दंगों का खेल खेला गया था उसी प्रकार से अब बिहार को जलाने की कोशिश शरू हुई है ताकि इस आग में 2019 कई रोटी सेंकी जा सके।

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