मेराज नूरी
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ये तस्वीर जो आपको नज़र आ रही है वो है महाराष्ट्र के मालेगाँव की।ये तस्वीर है मुस्लिम माँ बहनों की जो बज़ाहिर तो नक़ाब में नज़र आ रही है और अपने हक़ के लिए लड़ती हुई दिखाई और पेश की जा रही हैं लेकिन शायद इस तस्वीर और हुजूम के पीछे की घटिया और नापाक हरकत किसी को नज़र नही आ रही है।अखबारात में बड़ी बड़ी तस्वीरें छपेंगी।चैनलों पर बहसें होंगी।
इन तस्वीरों के सहारे क़ौम के ठेकेदार अपना सीना चौड़ा करके ये कहते और सुनते मिलेंगे की आज फलां जगह ख्वातीन(औरतों) ने ज़बरदस्त मुज़ाहेरा (प्रदर्शन)करके हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई,अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं,फलां ढिमका वगैरा वगैरा।सवाल ये है कि जिस क़ौम और मज़हब में औरतों को घर की ज़ीनत समझ गया,जिसकी इज़्ज़त व हुरमत की रखवाली और निगहबानी(सुरक्षा)की सख्त हिदायत है आज उस क़ौम के ठेकेदार उसी ख्वातीन को सड़कों पर लाकर किस मज़हब और रवायत को बचाना चाहते हैं ।ये समझ से परे है।क्या ये औरतों को बेइज़्ज़त और बेआबरू करना नही की जब जहां देखो धरणो,मोज़ाहरों के नाम पर घर की इज़्ज़त को सरे बाज़ार लाकर खड़ा कर दिया जाता हो।मज़हब की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने वाली जमातें और उसके कर्ताधर्ता क्या अब नामर्द और नपुंसक हो चले हैं कि जिसकी(ख्वातीन) निगहबानी के लिए वो पैदा किये गए वही(औरतें)अब उसके लिए ढाल बन कर मैदान में आने को मजबूर हैं या मजबूर की जा रही है।1400 साल से दुनिया में इस्लाम के खिलाफ कहीं न कहीं कोई न कोई फितना पनपता रहा है।ये ना तो कोई नई बात है और न ही गैर मामूली।इस्लाम अपने वजूद से ही ग़ैरों की आंखों में खटकता रहा है।अरब से लेकर मिस्र,इराक,ईरान,शाम,फिलिस्तीन से लेकर भारत,पाकिस्तान,अफग्गनिस्तान वगैरा वगैरा तमाम जगह वक़्त बे वक़्त किसी न किसी बहाने इस्लाम के खिलाफ कोई न कोई साज़िश होती रही है और उसका मुहतोड़ जवाब भी दिया जाता रहा है।लेकिन हालिया दिनों में जिस तरह बे सर पैर की हरकतें हो रही हैं वो न सिर्फ चिंता जनक हैं बल्कि इस्लाम की रूह के भी मुनाफी(विपरीत )है।
इस्लाम की समझ रखने वाला और एक आम सा मुसलमान भी ये जानता है की हमारे पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो एलैहे वसल्लम जब इस दुनिया में तशरीफ़ लाये और इस्लाम को फैलाना शुरू किया तो उनके खिलाफ क्या क्या न हुआ।उस वक़्त भी इस्लाम को ज़ेर(नीचा दिखाने)करने और मिटा देने की खातिर क्या क्या न किया गया।मक्का से लेकर मदीना तक साज़िशों की भरमार रही लेकिन इसके बावजूद इस्लाम फैला और सारी दुनिया में सुर्खरू हुआ।
हमारे नबी और उनके बाद के लोगों ने भी इस्लाम को वो ताक़त और रूह बख्शी की जिस की मिसाल नहीं।हम उनके एहसान मंद हैं कि उन्होंने अपनी कुर्बानियां देकर हमें वो दीन और मज़हब अता किया कि जिसके रहते तक ही इस दुनिया का वजूद है।जिस दिन इस्लाम और उसके मानने वाले नही होंगे उस दिन ये बाज़ीगर दुनिया खुद ब खुद मिट जाएगी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि उस दीन और उसकी तालीमात(शिक्षा) पर अमल पैरा होकर उसके बताए उसूलों पर चल कर ज़िन्दगी बसर किया जाए लेकिन आज उसके उलट हो रहा है।जिस दीन को बचाने की खातिर मर्दों को मैदान में आना चाहिए वहां पहली क़तार में औरतें खड़ी कर दी जाती हैं।
अब मालेगाँव में हुए इस प्रदर्शन को ही ले लीजिए।ये प्रदर्शन भारत सरकार के उस क़ानून के खिलाफ हुआ जिसके तहत तीन तलाक़ एक बार में दिया जाना अपराध माना गया है।ये बिल लोक सभा से पास हो चुका है और राज्यसभा से पारित होना बाकी है।ये कोई बड़ी बात भी नही।ये एक सोंची समझी साजिश के तहत किया गया कार्य है जिसका मकसद मुसलमानों और इस्लाम को नुकसान पहुंचाना या यूं कहें उनके पर्सनल लॉ में दखलंदाज़ी करके अपना उल्लू सीधा करना और एक विशेष समुदाय को खुश करना है।ये महज़ वोट बैंक की सियासत है उसके अलावा कुछ नहीं।और फिर ये कोई नया मामला भी नही।ये मामला तो राजीव गांधी के ज़माने में ही सामने आया था ।शाहबानो मामले के तौर पर तब उसने सुर्खिया बटोरी थीं और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उस वक़्त अपने हिसाब से इसे हैंडिल किया था।तब से लेकर आज तक न तो हमारे उलमा और ना ही क़ौम के ठेकेदार ये समझ पाए कि आया इस ताल्लुक़ से क़ौम में बेदारी लायी जाए ताकि आगे चलकर कोई बड़ा इशू न खड़ा हो।क़ौम सोती रही और क़ौम की ठेकेदारी करने वाले अपनी जेबें भरते रहे।इन सालों में अगर ईमानदाराना तौर पर कोशिश की जाती तो यकीन मानिए आज जो ये बावेला मचा है वो हरगिज़ नही होता।
इन सालों में विपक्षियों ने इस ताल्लुक़ से भ्रामक और दुष्प्रचार करके एक तरफ तो बहुसंख्यक समुदाय को खुश करके वोट हासिल किया तो दूसरी तरफ मुस्लिम मां बहनों को इंसाफ दिलाने के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ करना शुरू किया जिसका नतीजा हुआ कि आज ये स्थिति पैदा हुई।
हाँ, तो बात मालेगाँव की।यानी जिस चीज़ के खिलाफ 5 करोड़ लोगों का हस्ताक्षर लिया जा चुका हो और हुकूमत को गला फाड़ फाड़ कर बताया जा चुका हो कि भारत की मुस्लिम महिलाएं इस कानून के खिलाफ हैं अगर उसके बावजूद सरकार वो काम कर रही हो तो अब ये महज़ दिखावे का विरोध क्यों।और वो भी अपनी मां बहनों की इज़्ज़त और उनकी हुरमत की कीमत पर।आखिर क्यों।क्या हमारी मां बहनों के यूँ सरे आम सड़कों पर आ जाने से मसले का हल मुमकिन है?क्या इससे या इस जैसे प्रदर्शनों से नफरत की आग में जलने वाली हुकूमत अपना नापाक इरादा तर्क कर देगी ?क्या ये हुजूम सरकार को मजबूर करके उसे अपने कदम वापस करने को मजबूर कर देगा।हरगिज़ नहीं।हरगिज़ नहीं।हरगिज़ नहीं।
अगर आप कुछ करना ही चाहते हैं तो खुद लड़ाई लड़िये।आखिर अपनी इज़्ज़त को सरे आम यूँ नीलाम करके क्या हासिल कि जिसके लिए अल्लाह की अदालत में भी क़सूरवार होंगे।क्या हम मर्द इतने ज़लील और रुसवा हो चले हैं कि औरतों को उसका हक भी ना दिला सकें।क्या हम मर्द इतने बेग़ैरत हो चले हैं कि औरतें अपने होक़ूक़ के लिए खुद ही मैदान में आएं या उनको मैदान में आने के लिए मजबूर किया जाए।सोंचिये।आखिर हम कहाँ जा रहे हैं और क्या हासिल करना चाहते हैं।

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