Sunday, February 18, 2018

मिल्लत फ़रोशी और मुस्लिम पर्सनल लॉ

मेराज नूरी
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दरअसल इस मज़मून को लिखने का न तो मैं अहल हूँ और न ही मुझे ऐसी कोई ज़रूरत थी कि मैं इस जैसे मसले पर लिख कर 'मिल्लत के कुछ एक लोग' की शान में गुस्ताखी करूँ लेकिन जैसा कि मैंने कहाँ 'मिल्लत के कुछ एक लोग' को छोड़ कर जब औरों की करतूत देखता हूँ,सुनता हूँ और पढ़ता हूँ तो अक्सर ज़ेहन में आता है कि सोशल मीडिया पर ही सही अपनी भड़ास उड़ेल दूँ ताकि कम से कम नींद तो सुकून से आ जाये।में ये भी जानता हूँ कि हम जैसे कई पड़े हैं जो लिख लिख कर थक हार चुके हैं लेकिन अशरफुल मख़लूक़ात में शुमार हमारी ये क़ौम यानी मुस्लिम क़ौम अभी सोई है और ये क़ौम उस वक़्त अंगराई लेती है या जागती है जब वक़्त निकल चुका होता है।जैसे तीन तलाक़ का ही मामला ले लीजिए।शाहबानो मामले के उठने के बाद से आज तक ये क़ौम ख़्वाब ए ख़रगोश में रही ।उसकी नींद कब खुली जब मौजूदा हुकूमत ने उसे अपने राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए उसके पर्सनल लॉ को ही दरकिनार कर दिया।क़ौम की और उसके आकाओं की बेग़ैरती देखिए।अब जहां तहां जलसे जुलूस निकाल कर सीना चौड़ा किया जा रहा है।हद दर्जे की बेहूदगी देखिए कि अब ये क़ौम अपनी माँ बहनों को भी सड़कों पर ला खड़ी करके अपने जुलूस और जलसे को कामयाब बनाने का ढिंढोरा पिटती है।कहती है आज फलां जगह दो लाख ख्वातीन नें अपनी हक़ की लड़ाई सड़कों पर आकर लड़ी,हक़ की सदा बुलंद की फलां ढिमकां।
खैर,बात शुरू हुई या हमने की है ''चंद एक लोग ''को छोड़ कर ''बाकी के मिल्लत फरोशों और ज़मीर फरोशों'' के करतूतों से बाख़बर होने की तो आइए आप को लिए चलते उस जानिब।
रात के आधे पहर जब मैं सोशल मीडिया की ख़ाक छानने में मशगूल था तो मेरी नज़र हमारे एक फेसबुक फ्रेंड की एक फोटो पर पड़ी जिसे उन्होंने शेयर करते हुए मौजूदा वक़्त के सबसे हॉट प्लेटफार्म (मीडिया की नज़रों में)आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से चंद सवाल पूछे है।उस फ़ोटो में यूँ तो दो और जुब्बे वाले शख़्स नज़र आरहे हैं लेकिन उसी फ़ोटो में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक रुक्न यानी मेम्बर और इस्लामी लिबास में मलबुस मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी बंद कमरे में हुई मीटिंग के बाद शायद प्रेस को बयान जारी करने की खातिर फ़ोटो सेशन के दौरान ग्रुप पोज़ में उन लोगों के साथ खड़े है या यूं कहें कि उन लोगों के साथ फ़ोटो खिंचवाकर फ़ख्र महसूस कर रहे हैं जो न तो ज़ाहिरी तौर पर और ना ही बातनि तौर पर इस लायक़ हैं कि उनको अपने शाना ब शाना खड़ा किया जाए।ये हैं बाबरी बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर की पैरवी करने वाले डबल श्री रविशंकर और उसके चेले चपाटी।ये तस्वीर श्री श्री रविशंकर के खास लोगों में शुमार पंडित अमरनाथ मिश्र ने 06 अक्टूबर 2017 को फेसबुक पर पोस्ट की है।ये वही अमर नाथ मिश्र हैं जिन्होंने मौलाना सलमान नदवी पर बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर बनवाने की पैरवी और कोशिश की खातिर 5000 करोड़ रुपये और भाजपा नीत सरकार से राज्यसभा के टिकट लेने का इल्जाम लगा कर सनसनी फैलाई है।
हालांकि पहली नज़र में मुझे न ही इस फोटो पर कोई ऐतराज़ था न ही उसमें मौजूद लोगों के फ़ख्रिया अन्दाज़ ए पेशकश पर।होना भी नही चाहिए क्योंकि हर एक के अपने अपने निजी मामलात होते है और उसमें दखल अंदाज़ी की मुझको क्या किसी को भी इजाज़त नहीं।लेकिन बात जब रहबर होने और समझने तक जाती है तो कुछ ताक झांक लाज़मी है।ताकि ये जाना जाए कि आखिर किस हद तक हमारे रहबर हमारी कम अपनी फिक्र में ज़्यादा मुब्तला हैं और मिल्लत फ़रोशी की कौन सी आला तेजारत करने में मशगूल हैं।
कुछ एक मौके पर मौलाना एजाज़ अरशद क़ासमी से मेरी मुलाकात है और प्रोफेशनल बातचीत भी ।मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी लिखते है अपने आपको।ये अलग बात है कि फेसबुक पर जो पेज बना रखा है उसमें मुफ़्ती गायब है ।खैर ये उनका निजी मामला है No Comments.बात चूंकि मिल्लत की तर्जुमानी और रहबरी करने वाली तंज़ीम आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की है तो जाहिर है ये तस्वीर एक अदना से मुसलमान को भी खटकेगी।वजह भी है।मौजूदा हालात में क़ौम की तर्जुमानी करने वाली और तीन तलाक़ से लेकर बाबरी मस्जिद जैसे हस्सास और संवेदनशील मामले पर ये जमात आखरी मरहले तक लड़ाई लड़ने में मशगूल है ।इसलिए इस वक़्त उसके एक एक मेम्बर और उससे जुड़े सभी लोगों पर लोगों की न सिर्फ नज़र है बल्कि उनसे मिल्लत को बहुत सी उम्मीदें हैं।ऐसे वक्त में ये सवाल भी लाज़मी है कि आया बोर्ड के एक मेंबर मौलाना सलमान हुसैनी नदवी की गैर जिम्मेदाराना हरकत और बयान बाज़ी से मिल्लत को पहुंचने वाले नुकसान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अज़मत की जो पामाली हुई है उसके जितने ज़िम्मेदार मौलाना सलमान नदवी है उतने ही मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी भी।
फ़ोटो हालांकि अभी सामने आयी है या यूँ कहें कि लोगों का ध्यान अभी इस ओर गया है लेकिन मुलाक़ात की दिन तारीख के हिसाब से उधर वाले श्री श्री और हमारे वाले हज़रत हज़रत के दरमियान खिचड़ी काफी दिनों से पक रही थी जिसकी या तो हो सकता है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खबर न हो या फिर वो भी इसमें शामिल हो ।दोनों सूरत चिंता जनक है।अगर बोर्ड को इसकी भनक तक नही हुई तो फिर आखिर ये कैसा इदारा या संगठन है जिसके मेंबर उस प्लेटफार्म से हट कर अकेले अकेले खिचड़ी पकाता है और फिर दुश्मनों को परोसकर हम पर ही यलगार करने का मौका फ़राहम कराता है।और अगर इस खिचड़ी में बोर्ड भी शामिल है तो बंद कर देनी चाहिए ऐसी दुकान जो ज़मीर फ़रोशी और मिल्लत फ़रोशी करके अपनी तिजोरी भर रही हो।ये सवाल भी है कि आखिर पर्सनल लॉ बोर्ड किस राह पर है।क़ौम की खातिर या क़ौम के खात्मे की खातिर।आज के हालात में जबकि मौलाना सलमान नदवी को बयानबाज़ी और कुकृत्यों की खातिर बोर्ड से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है अब ज़रूरत इस बात की है मुफ़्ती एजाज़ अरशद क़ासमी जैसे लोगों के लिए भी वही तरीका अख्तियार किया जाए।वरना कल को क्या पता मौलाना सलमान नदवी टाइप का फार्मूला या उससे मिलता जुलता नया फार्मूला ये भी पेश कर दें या इनसे पेश करा दिया जाए। अब देखने वाली बात ये है कि आया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने पैमाने पर कहाँ तक खरा उतरता है।

बेग़ैरत समाज


मेराज नूरी
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ये तस्वीर जो आपको नज़र आ रही है वो है महाराष्ट्र के मालेगाँव की।ये तस्वीर है मुस्लिम माँ बहनों की जो बज़ाहिर तो नक़ाब में नज़र आ रही है और अपने हक़ के लिए लड़ती हुई दिखाई और पेश की जा रही हैं लेकिन शायद इस तस्वीर और हुजूम के पीछे की घटिया और नापाक हरकत किसी को नज़र नही आ रही है।अखबारात में बड़ी बड़ी तस्वीरें छपेंगी।चैनलों पर बहसें होंगी।
इन तस्वीरों के सहारे क़ौम के ठेकेदार अपना सीना चौड़ा करके ये कहते और सुनते मिलेंगे की आज फलां जगह ख्वातीन(औरतों) ने ज़बरदस्त मुज़ाहेरा (प्रदर्शन)करके हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई,अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं,फलां ढिमका वगैरा वगैरा।सवाल ये है कि जिस क़ौम और मज़हब में औरतों को घर की ज़ीनत समझ गया,जिसकी इज़्ज़त व हुरमत की रखवाली और निगहबानी(सुरक्षा)की सख्त हिदायत है आज उस क़ौम के ठेकेदार उसी ख्वातीन को सड़कों पर लाकर किस मज़हब और रवायत को बचाना चाहते हैं ।ये समझ से परे है।क्या ये औरतों को बेइज़्ज़त और बेआबरू करना नही की जब जहां देखो धरणो,मोज़ाहरों के नाम पर घर की इज़्ज़त को सरे बाज़ार लाकर खड़ा कर दिया जाता हो।मज़हब की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने वाली जमातें और उसके कर्ताधर्ता क्या अब नामर्द और नपुंसक हो चले हैं कि जिसकी(ख्वातीन) निगहबानी के लिए वो पैदा किये गए वही(औरतें)अब उसके लिए ढाल बन कर मैदान में आने को मजबूर हैं या मजबूर की जा रही है।1400 साल से दुनिया में इस्लाम के खिलाफ कहीं न कहीं कोई न कोई फितना पनपता रहा है।ये ना तो कोई नई बात है और न ही गैर मामूली।इस्लाम अपने वजूद से ही ग़ैरों की आंखों में खटकता रहा है।अरब से लेकर मिस्र,इराक,ईरान,शाम,फिलिस्तीन से लेकर भारत,पाकिस्तान,अफग्गनिस्तान वगैरा वगैरा तमाम जगह वक़्त बे वक़्त किसी न किसी बहाने इस्लाम के खिलाफ कोई न कोई साज़िश होती रही है और उसका मुहतोड़ जवाब भी दिया जाता रहा है।लेकिन हालिया दिनों में जिस तरह बे सर पैर की हरकतें हो रही हैं वो न सिर्फ चिंता जनक हैं बल्कि इस्लाम की रूह के भी मुनाफी(विपरीत )है।
इस्लाम की समझ रखने वाला और एक आम सा मुसलमान भी ये जानता है की हमारे पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो एलैहे वसल्लम जब इस दुनिया में तशरीफ़ लाये और इस्लाम को फैलाना शुरू किया तो उनके खिलाफ क्या क्या न हुआ।उस वक़्त भी इस्लाम को ज़ेर(नीचा दिखाने)करने और मिटा देने की खातिर क्या क्या न किया गया।मक्का से लेकर मदीना तक साज़िशों की भरमार रही लेकिन इसके बावजूद इस्लाम फैला और सारी दुनिया में सुर्खरू हुआ।
हमारे नबी और उनके बाद के लोगों ने भी इस्लाम को वो ताक़त और रूह बख्शी की जिस की मिसाल नहीं।हम उनके एहसान मंद हैं कि उन्होंने अपनी कुर्बानियां देकर हमें वो दीन और मज़हब अता किया कि जिसके रहते तक ही इस दुनिया का वजूद है।जिस दिन इस्लाम और उसके मानने वाले नही होंगे उस दिन ये बाज़ीगर दुनिया खुद ब खुद मिट जाएगी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि उस दीन और उसकी तालीमात(शिक्षा) पर अमल पैरा होकर उसके बताए उसूलों पर चल कर ज़िन्दगी बसर किया जाए लेकिन आज उसके उलट हो रहा है।जिस दीन को बचाने की खातिर मर्दों को मैदान में आना चाहिए वहां पहली क़तार में औरतें खड़ी कर दी जाती हैं।
अब मालेगाँव में हुए इस प्रदर्शन को ही ले लीजिए।ये प्रदर्शन भारत सरकार के उस क़ानून के खिलाफ हुआ जिसके तहत तीन तलाक़ एक बार में दिया जाना अपराध माना गया है।ये बिल लोक सभा से पास हो चुका है और राज्यसभा से पारित होना बाकी है।ये कोई बड़ी बात भी नही।ये एक सोंची समझी साजिश के तहत किया गया कार्य है जिसका मकसद मुसलमानों और इस्लाम को नुकसान पहुंचाना या यूं कहें उनके पर्सनल लॉ में दखलंदाज़ी करके अपना उल्लू सीधा करना और एक विशेष समुदाय को खुश करना है।ये महज़ वोट बैंक की सियासत है उसके अलावा कुछ नहीं।और फिर ये कोई नया मामला भी नही।ये मामला तो राजीव गांधी के ज़माने में ही सामने आया था ।शाहबानो मामले के तौर पर तब उसने सुर्खिया बटोरी थीं और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उस वक़्त अपने हिसाब से इसे हैंडिल किया था।तब से लेकर आज तक न तो हमारे उलमा और ना ही क़ौम के ठेकेदार ये समझ पाए कि आया इस ताल्लुक़ से क़ौम में बेदारी लायी जाए ताकि आगे चलकर कोई बड़ा इशू न खड़ा हो।क़ौम सोती रही और क़ौम की ठेकेदारी करने वाले अपनी जेबें भरते रहे।इन सालों में अगर ईमानदाराना तौर पर कोशिश की जाती तो यकीन मानिए आज जो ये बावेला मचा है वो हरगिज़ नही होता।
इन सालों में विपक्षियों ने इस ताल्लुक़ से भ्रामक और दुष्प्रचार करके एक तरफ तो बहुसंख्यक समुदाय को खुश करके वोट हासिल किया तो दूसरी तरफ मुस्लिम मां बहनों को इंसाफ दिलाने के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ करना शुरू किया जिसका नतीजा हुआ कि आज ये स्थिति पैदा हुई।
दूसरी तरफ आज जिस मुस्तैदी और दिखावे का मुज़ाहेरा किया जा रहा है अगर ये मुस्तैदी पहले दिखाई जाती तो शायद ये दिन देखने को नही मिलते।हम आखिर ये बात कयूँ नही समझ पा रहे हैं कि हमारा मज़हब,हमारा दीन तालीमात नबवी और बेदारी के ज़रिए फला फुला है ना कि धरना,प्रदर्शन और रैलियों के ज़रिए।
हाँ, तो बात मालेगाँव की।यानी जिस चीज़ के खिलाफ 5 करोड़ लोगों का हस्ताक्षर लिया जा चुका हो और हुकूमत को गला फाड़ फाड़ कर बताया जा चुका हो कि भारत की मुस्लिम महिलाएं इस कानून के खिलाफ हैं अगर उसके बावजूद सरकार वो काम कर रही हो तो अब ये महज़ दिखावे का विरोध क्यों।और वो भी अपनी मां बहनों की इज़्ज़त और उनकी हुरमत की कीमत पर।आखिर क्यों।क्या हमारी मां बहनों के यूँ सरे आम सड़कों पर आ जाने से मसले का हल मुमकिन है?क्या इससे या इस जैसे प्रदर्शनों से नफरत की आग में जलने वाली हुकूमत अपना नापाक इरादा तर्क कर देगी ?क्या ये हुजूम सरकार को मजबूर करके उसे अपने कदम वापस करने को मजबूर कर देगा।हरगिज़ नहीं।हरगिज़ नहीं।हरगिज़ नहीं।
अगर आप कुछ करना ही चाहते हैं तो खुद लड़ाई लड़िये।आखिर अपनी इज़्ज़त को सरे आम यूँ नीलाम करके क्या हासिल कि जिसके लिए अल्लाह की अदालत में भी क़सूरवार होंगे।क्या हम मर्द इतने ज़लील और रुसवा हो चले हैं कि औरतों को उसका हक भी ना दिला सकें।क्या हम मर्द इतने बेग़ैरत हो चले हैं कि औरतें अपने होक़ूक़ के लिए खुद ही मैदान में आएं या उनको मैदान में आने के लिए मजबूर किया जाए।सोंचिये।आखिर हम कहाँ जा रहे हैं और क्या हासिल करना चाहते हैं।

सुशासन की त्रासदी

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