Thursday, August 8, 2013

کل عید ہے

کل یعنی 9 اگست کو عید ہے. عید یعنی خوشی کا دن. وہ خوشی جو 30 روزے کے بعد انسان کو میسر ہوتی ہے. ظاہر ہے اس کا نہ صرف انتظار ہوتا ہے بلکہ اس موقع کو پا کر ہر مسلمان اپنے آپ کو كھشنسيب سمجھتا ہے اور سمجھنا بھی ضروری ہے. لیکن اس کے بر عکس ایک اور برہنہ حقیقت ہے جو نہ صرف تکلیف دینے والی ہے بلکہ ہمیں اپنے گرےبان میں جھاںکنے کی بھی دعوت دیتی ہے. ایماندارانہ طور پر اگر ہم اپنے چرو طرف نظر ڈالیں تو آسانی سے اس کا اندازہ ہو جائے گا کہ یہ عید کا یہ تہوار اور خوشی سب کو برابر میسر ہو رہی ہے کیا؟ یقینا آپ اگر اپنے ایک چھوٹا سا دل رکھتے ہیں تو آپ کو نہ صرف گیلانی محسوس ہوگی بلکہ بہت تکلیف بھی ہوگی کہ جس مجهبے اسلام میں سب يكسا یعنی برابری کا ریکارڈ دیا گیا ہے وہاں یہ کھائی کیوں ہے. ایک طرف دنیا کی ہر چیز قدموں میں اور ایک طرف خوشی ایک لئے ترستا ہوا انسان ایک طرف خوشی کی ریل پیل اور دوسری طرف غم کا پہاڑ. کیا یہ آج کی سچائی نہیں ہے؟

कल ईद है



कल  यानि 9 अगस्त को ईद है।ईद यानि खुशियों का दिन। वो  ख़ुशी जो तिस रोज़े के बाद इन्सान को मयस्सर होती है।  ज़ाहिर है इसका न सिर्फ इंतजार होता है बल्कि इस मौक़ा को पाकर हर मुसलमान अपने आप को खुशनसीब समझता है और समझना भी चाहिए। लेकिन इसके बर  अक्स एक और हकीक़त है जो न सिर्फ तकलीफ देने वाली है बल्कि हमें अपने गरेबान में झाँकने की भी दावत देती है। ईमानदाराना तौर पर अगर हम अपने चरों ओर नज़र डालें तो आसानी से इसका अंदाज़ा हो जायेगा कि ये ईद का ये पर्व और ख़ुशी सब को बराबर मयस्सर हो रही है क्या ?यकीनन आप अगर अपने एक छोटा सा दिल रखते हैं तो आप को न सिर्फ गिलानी महसूस होगी बल्कि बहुत तकलीफ भी होगी कि जिस मजहबे इस्लाम में सबको यकसां यानि बराबरी का दर्ज दिया गया है वहां ये खाई क्यों है। एक तरफ दुनिया की हर चीज़ क़दमों में और एक तरफ खुशियों क लिए तरसता हुआ इन्सान।एक तरफ खुशियों की रेल पेल और दूसरी तरफ ग़म का पहाड़। क्या ये आज की सच्चाई नहीं है?

Friday, June 28, 2013

एक मुस्लिम युवक का काल्पनिक पत्र

Chetan Bhagat
 प्रिय भारतीय मुसलमानों के रखवालों (सभी धर्मनिरपेक्ष दलों, कभी-सांप्रदायिक रहे दलों, भ्रमित सहयोगियों, मौलवियों, मुस्लिम कल्याण संगठनों तथा आमतौर पर इन दिनों कोई भी समेत।), आप शायद आश्चर्य कर रहे हों कि मैं हूं कौन? आखिर स्तंभकार का नाम अहमद या सईद या मिर्जा जैसा नहीं है, ऐसा कुछ नहीं जो मुझे स्पष्ट रूप से मुसलमान साबित करे। आप भूल रहे हैं, लेखक काल्पनिक कहानियां भी लिखता है। इसलिए शायद मैं, या जो मैं यहां कह रहा हूं, मनगढ़ंत के अलावा कुछ नहीं है। फिर भी, शायद आप जैसे सभी शुभ चिंतकों के लिए कुछ लाभदायक हो।हर कोई मुसलमानों का ध्यान रखता-सा लगता है, लेकिन असल में उनकी सुनता कोई नहीं है। खासकर हम युवा। मैंने राजनेताओं को देखा, कैसे चिल्लाते हैं वे हमें ऊपर उठाएंगे। मैं नहीं जानता वे हमें उठाने के लिए कैसी योजना बनाते हैं और केवल हमें, बिना देश को ऊपर उठाए। लेकिन तब मैं तो कोई नहीं, भला मैं कैसे जानूं? 
 मैं उन्हें देखता हूं मुस्लिम टोपियां पहने, शायद यह बताने के लिए कि वे असल में हमारी जिंदगियां सुधारना चाहते हैं। फिर भी आपके सिर पर एक टोपी किसी की जिंदगी नहीं बदल सकती। आपके दिमाग में क्या चल रहा उसका उपयोग शायद बदल सकता है, आप नहीं। फिर हम ही क्यों लगातार भारत के सबसे पिछड़े समुदायों में से एक बने हुए हैं?
 ऐसा नहीं है कि हमारे पास मुसलमानों में सफलता पाने वालों की कमी है। भारतीय मुसलमानों ने अच्छा काम किया है। लगभग हर क्षेत्र में मुस्लिम सितारे हैं। इन लोगों ने अपनी उपलब्धियां टोपी पहने किसी राजनेता की मदद के बिना ही हासिल की हैं। इन्होंने ऐसा लगन, कल्पना और कड़ी मेहनत से किया है। उनके पास जीवन में ऊपर उठने के लिए आधुनिक नजरिया था और एक तमन्ना थी। यही है जो हम सबको अपने भीतर चाहिए। हमें एक ऐसा नेता चाहिए, जो यह समझ सके और हमें बेहतर करने के लिए प्रेरणा दे सके। हमें ऐसा नेता चाहिए जो हमें अगले स्तर तक ले जाए। हमें रोजगार चाहिए, हमें अच्छे स्कूल-कॉलेज चाहिए। हमें चाहिए बिजली, पानी के साथ एक अच्छा घर। हमें चाहिए एक शालीन जीवन स्तर ताकि हम अपना जीवन सम्मान के साथ जी सकें। हमें यह खैरात में नहीं चाहिए, हम इसके लिए कड़ी मेहनत करना चाहते हैं। अगर आप कर सको तो बस ऐसा करने के लिए माहौल पैदा कर दो।
 हां, यह वैसा ही है जैसा दूसरे युवा चाहते हैं। आखिर दुनिया में ऐसा क्या है जिससे आपको लगता है कि भारतीय मुस्लिम युवा कुछ अलग चाहते हैं? क्या है जो आपको सोचने पर मजबूर करता है कि नेता को टोपी पहननी ही चाहिए, कुछ खैरात बांटनी चाहिए, शब्दों के ढोल पीटने चाहिए और हमसे एकमुश्त वोटों की उम्मीद करनी चाहिए? हम हैं क्या, भेड़ों का झुंड? क्या यह हिंदुस्तान है? आखिरी बार मैंने सुना था कि हम धार्मिक गणराज्य नहीं हैं, हम लोकतांत्रिक गणराज्य हैं। तो हमसे लोकतंत्र के नागरिकों की तरह ही व्यवहार करो।
 कृपया एक तथ्य अपने मस्तिष्क में सीधे डाल लो। भारतीय मुसलमान दुनिया के बाकी मुसलमानों से अलग हैं। कई इस्लामी देश हैं जहां राजनीति और धर्म पूरी तरह घुले-मिले हैं। उन्हें ज्यादा रूढ़िवादी देश होना ही है। उनके पास हमारे जैसी विचारों की गूंज, व्यक्तिगत आजादी और खुलापन नहीं है। भारत वैसा देश नहीं है। भारतीय अपनी आजादी से प्यार करते हैं। भारतीय नहीं चाहते कि उनके धार्मिक नेता बताएं किसे वोट दें। और हम भी भारतीय हैं। बड़ी संख्या में आधुनिक भारतीय मुसलमान धर्म और राजनीति को अलग रखना चाहते हैं। यहां आप असल में मदद कर सकते हैं। आप जोर दे सकते हैं कि भारत पहले आता है, हमारे समुदाय की कट्टर आवाजों को किनारे कर सकते हैं। लेकिन आपमें से कोई भी ऐसा नहीं कर रहा। आप सभी प्रतिगामी हैं, हमारे साथ झुंड जैसा व्यवहार करते हैं और हमारे रूढ़िवादियों और कट्टरवादियों का पक्ष लेते हैं।
 आप जानते हैं तकलीफ क्या देता है? हमारे पास मजबूत आधुनिक भारतीय मुसलमान आवाज नहीं है। अगर मैं एक भारतीय मुसलमान हूं, महत्वाकांक्षी, वैज्ञानिक सोच, उद्यमशीलता, सशक्तीकरण, प्रगति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास करने वाला, तो मैं कहां जाऊं? कौन-सी पार्टी इसका समर्थन करती है? क्या कोई उस नेता का नाम बता सकता है जो मेरी उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करता हो, और मुझे एक विकलांग जैसा न समझे?
 मैं नहीं बता सकता कितना कुंठित महसूस करता हूं। यह बहुत खराब है कि हम किराये पर मकान भी नहीं ले सकते, पुलिस कुछ ज्यादा ही ध्यान देकर हमारी तलाशी लेती है, जब-तब हम पर फिकरे कसे जाते हैं। असल में बुरा क्या है, इसके बावजूद आप लोग दावा करते हैं कि आप हमारा खास ख्याल रखते हैं, जबकि वास्तव में हमें पिछड़ेपन में धकेलते हैं और वहीं अभिशप्त रहने को मजबूर करते हैं। आपकी वजह से लोग सोचते हैं कि हम एक झुंड में वोट देते हैं और भारत को पिछड़ा बनाए हुए हैं। आप, हमारे रखवालों, लोगों को यह सोचने पर मजबूर करते हो कि हमें सिर्फ धर्म की चिंता है, भ्रष्टाचार और विकास की नहीं। यह सच नहीं है। भ्रष्टाचार चोरी है और चोरी पाप। कोई सच्च मुसलमान या तरक्कीपसंद भारतीय इसका समर्थन नहीं कर सकता।
 शायद मैं कुछ ज्यादा सख्त हो गया, आपमें से कुछ लोग तो सुनियोजित तरीके से ऐसा करते हैं। लेकिन जब आप धर्म के नाम पर हमें अलग करते हैं, हर बार नतीजा भुगतते हैं। हमारे लिए उससे ज्यादा भी कुछ है। अगर आप सच में मदद करना चाहते हैं तो मेरे पास एक विचार है। हमारा भी एक अद्भुत धर्म है। हालांकि अन्य धर्मो की तरह इसकी व्याख्या भी उदार या परंपरावादी के रूप में कर सकते हैं। दुनिया के कई देशों में दैनिक जीवन में यह बेहद सख्त है। भारत ज्यादा उदार है, कई मुस्लिम इसे ऐसा रखना चाहते हैं। क्या आप इसमें सहयोग करेंगे? हमारे जीवन पर हमारे धर्मगुरुओं, सख्त विचारों और कट्टरपंथियों को नियंत्रण मत करने दो क्योंकि यह भारत का सार नहीं है। अगर आप ऐसा कर सकते हो तो हम आपका साथ देंगे।
(साभार दैनिक भास्कर )

Saturday, June 15, 2013

MEDIA HALCHAL


اخبارات کی دنےا

معراج نوری
بی جے پی کا سےاسی ڈرامہ آخر کار لال کرشن اڈوانی کے استعفی واپس لےنے 
کے ساتھ ہی ختم ہو گےا۔ےہ اےک اےسی خبر تھی جس کی پل پل کی اطلاع کو مےڈےا نے کو ر کےا اور عوام کے سامنے پےش کےا۔آئےے اےک نظر ڈالتے ہےں کہ ملک کے مشہور ومعروف اخبارات نے اس خبر کو کس طرح اور کس انداز مےں پےش کےا:
ہندی روزنامہ ’دےنک بھاسکر ‘ ن
ے لال کرشن اڈوانی کی بے بسی کو اےک جملہ مےں اس طرح بےان کےا ہے ’مودی کو مان گئے اڈوانی ‘۔اخبارنے اسی خبر کے ساتھ اےک باکس مےں تحرےر کےا ہے کہ لگتا ہے خود اڈوانی کی ہی اےماں پر قابل احترام واپسی کا ےہ ناٹک رچا گےا۔اڈوانی کے اس حال سے جے ڈی ےو سکتے مےں آجائے گا ۔ہوسکتا ہے مودی کا ساتھ دےنے مےں خود شرد ےادو ثالثی کرےں۔کےونکہ ان کے پاس اب کام ہی کےا بچا ہے ؟سماجواد کے سارے نعرے تو کانگرےس پہلے ہی چرُا چکی ہے۔
ہندی روزنامہ ’پربھات خبر‘ لکھتا ہے کہ اپنے سینئر لیڈر کے استعفی کے بعد بے چین بی جے پی نے منگل کو چین کی سانس لی۔ ایک طرف سنگھ کی مداخلت کے بعد خفا اڈوانی جہاں مان گئے، وہیں پارٹی میں’مودی دور‘ کا باقاعدہ آغاز بھی ہوا کیونکہ اعلی قیادت نے اپنے سینئر رہنما سے اشاروں میں ہی واضح کر دیا تھا کہ آپ کی ضرورت ہے، لیکن تبدیلی بھی کم ضروری نہیں۔ روٹھنے منانے کے اس کھیل میں جیت کس کو ملی، ہارا کون ؟ےہ راز ابھی پوشیدہ ہے لےکن زلزلہ کے بعد ملی یہ راحت کتنی پائیدار ہے، یہ تو مشن -2014 ہی بتائے گا۔ 
روزنامہ ’راشٹر ےہ سہارا ‘ نے اس موضوع کو اپنی دوسری اہم خبر بنائی ہے او ر اس کا عنوان دےا ہے ’بھاجپا مےں فی الحال ’ےدھ (جنگ بندی)‘وِےرام‘۔اخبار لکھتا ہے کہ بی جے پی کے سینئر لیڈر لال کرشن اڈوانی اور نریندر مودی کے حق میں کھڑے رہنماو ¿ں کے درمیان منگل کو فی الحال جنگ بندی ہو گئی۔ جنگ بندی کے بعد لگتا ہے اب سرد جنگ چلتی رہے گی۔ بی جے پی صدر راج ناتھ سنگھ اور آر ایس ایس کے سربراہ موہن بھاگوت نے نریندر مودی کو سونپی گئی مرکزی انتخابی مہم کمیٹی کے صدر کے عہدہ کی ذمہ داری پر کسی طرح کے سمجھوتے سے صاف طور پر انکار کر دیا۔ بس اڈوانی کی عزت رکھنے کے لئے مستقبل کے وزیر اعظم کے امیدوار کا نام طے کرنے کے لئے اجتماعی غوروفکر کرنے کی یقین دہانی کرائی گئی۔خاص بات یہ ہے کہ یہ سارے دعوے بی جے پی صدر راج ناتھ اور دوسرے لیڈروں نے کئے ہیں۔ اڈوانی کی طرف سے کوئی بےان نہیں آیا ہے۔ 
ہندی روزنامہ ’دےنک جاگرن‘ نے بھی اپنے ادارےہ مےں اس معاملے کو جگہ دی ہے اور ’نقصان کی بھرپائی ‘کے عنوان سے لکھا ہے کہ سینئر بی جے پی لیڈر لال کرشن اڈوانی جس طرح اپنا استعفی واپس لینے کے لئے راضی ہو گئے اس کے بعد پارٹی راحت کی سانس لے سکتی ہے، لیکن استعفی کی وجہ سے پیدا ہوئے سوالات اب بھی جواب طلب ہےں۔ سچ تو یہ ہے کہ جس طرح یہ استعفی واپس لےا گےا اس سے بھی کئی سوال کھڑے ہو گئے ہیں، کیونکہ بی جے پی کی طرف سے یہ بتایا گیا کہ ان کی تشویشات پر توجہ دی جائے گی۔ کیا اس کا مطلب یہ ہے کہ اڈوانی نے اپنے چھوٹے سے خط میں جو بڑے سے سوال کھڑے کئے تھے وہ سب کے سب صحیح تھے؟ کیا بی جے پی درست سمت میں نہیں جا رہی تھی؟ کیا کچھ پارٹی لیڈر حقیقت میں اپنے ذاتی ایجنڈے کو آگے بڑھا رہے تھے؟ کیا آج بی جے پی میں ویسے رہنما نہیں ہیں جو ملک اور لوگوں کی فکر کر سکیں؟ دراصل یہ ایسے سوالات ہیں جو بی جے پی کو بھی گھےرے گی اور خود اڈوانی کو بھی۔ ان سب سے الگ ایک سوال یہ بھی اٹھے گا کہ آخر 24 گھنٹے میں ایسا کیا ہو گیا کہ اڈوانی نرم پڑ گئے، کیونکہ پارٹی نے ان کے استعفی کے ساتھ ہی یہ بھی صاف کر دیا تھا کہ گوا ایگزیکٹیو میں جو فیصلے لئے جا چکے ہیں ان سے پیچھے نہیں ہٹا جائے گا اور نریندر مودی کے حوالے سے لئے گئے فیصلہ سے تو بالکل ہی پیچھے نہیں ہٹا جائے گا۔ اڈوانی کے مطمئن ہو جانے اور اپنا استعفی واپس لینے کے لئے تیار ہونے کی اطلاع دیتے ہوئے بی جے پی صدر راج ناتھ سنگھ نے جس طرح یہ کہا کہ ان کے خدشات کا مناسب وقت پرازالہ کیا جائے گا تو اس سے تو یہی لگتا ہے کہ انہیں ایک باعزت راستہ دیا گیا ۔چونکہ اڈوانی نے اپنے استعفی میں اپنی شکایات کو واضح نہیں کیا تھا اس لئے یہ بھی مانا جا رہا تھا کہ شاید ان کی ناراضگی نریندر مودی کو انتخابی مہم کمیٹی کے چیئرمین بنائے جانے سے نہیں بلکہ آر ایس ایس کی مبینہ مداخلت سے تھی۔ اگر یہی سچ ہے تو پھر ان کے استعفی کی واپسی سنگھ کے دخل دےنے کے بعد ہونے کا کیا مطلب؟ کیا یہ نہیں لگتا کہ کسی طرح معاملہ کو رفع دفع کرنے کی کوشش کی گئی ہے۔ اس کوشش کے چلتے بی جے پی میں ظاہری طور پر سب کچھ معمول پرہو سکتا ہے، لیکن اندرونی طور پر اٹھاپٹخ تھمنے میں کچھ وقت لگ سکتا ہے۔

Thursday, May 30, 2013

نوجوانوں کے لیے موبائل فون کتنا ضروری؟

موبائل فون کی ضرورت اور اہمیت سے ہم سب بخوبی واقف ہیں۔ موبائل فون جو کبھی تعیش کے زمرے میں آتا تھا آج ہماری ضروریات ِزندگی کا ایک حصہ بن چکا ہے۔ لیکن موبائل فون نوجوانوں میں کتنا مقبول ہے اس بات کا اندازہ ایک سروے رپورٹ سے لگایا جا سکتا ہے۔ ایک برطانوی موبائل انشورنس کمپنی کی جانب سے حال میں لیے جانے والےسروے میں نوجوانوں سے موبائل فون کے استعمال اور اس کی ضرو
رت اور اہمیت کے بارے میں سوالات پوچھے گئے۔ویب سائٹ وی او اے ڈاٹ کام کے مطابق اس سروے میں 18 سے 30 برس کے 2570 افراد کو شامل کیا گیا جن میں سے دو تہائی افراد نے کہا کہ وہ موبائل فون کے بغیر جینے کا تصور بھی نہیں کر سکتے ہیں۔کمپنی کی جانب سے سوال کیا گیا کہ اگر انھیں ایک ہفتے کے لیے موبائل فون رکھنے کی شرط پر اپنی کسی چیز کو چھوڑنا پڑے تو وہ کون سی چیز ہو گی؟اس سوال کے بڑے دلچسپ جوابات دئیے گئے 62 فیصد نوجوانوں نے کہا کہ وہ ایک ہفتہ اپنے دوستوں کے بغیر گزار سکتے ہیں لیکن ایک ہفتے کے لیے موبائل فون نہیں دے سکتے۔ 45 فیصد کا جواب تھا کہ وہ بغیر کھائے پیئے تو گزارا کر سکتے ہیں لیکن موبائل فون کے بغیر بالکل نہیں رہ سکتے ہیں۔71 فیصد کے مطابق وہ اپنی پیاری سواری کار یا بائیک کو بھی موبائل فون رکھنے کی شرط پر ایک ہفتے کے لیے چھوڑنے کے لیے تیار ہیں۔اسی طرح 81 فیصد نے کہا کہ وہ اپنے پسندیدہ ٹی وی شوز یا فلم نہیں دیکھیں گے جبکہ 55 فیصد کے لیے اپنا بیڈروم ایک ہفتے کے چھوڑنا آسان ہے لیکن انھیں اپنا موبائل فون اپنے سرہانے ہی چاہیے۔ سروے میں پوچھا گیا کہ وہ موبائل فون کا کتنا استعمال کرتے ہیں؟ 53 فیصد افراد نے بتایا کہ وہ اپنے موبائل فون کے شیدا ہیں اور ہر وقت اپنے موبائل فون کے ساتھ مصروف رہتے ہیں۔ 27 فیصد کے مطابق وہ موبائل فون بہت زیادہ استعمال کرتے ہیں لیکن حد سے زیادہ بھی استعمال نہیں کرتے ہیں۔ 10 فیصد نے کہا کہ وہ اسے صرف ضرورت کے تحت ہی استعمال کرتے ہیں جبکہ 9 فیصد نوجوانوں نے کہا کہ وہ کبھی کبھار ہی موبائل فون استعمال کرتے ہیں۔
 جب ان نوجوانوں سے سوال کیا گیا کہ موبائل فون ان کے لیے کیا معنی رکھتا ہے؟نوجوانوں کی 65 فیصد تعداد نے اس بات سے اتفاق کیا کہ موبائل فون کا ان کے روزمرہ معاملات میں اس قدر عمل دخل بڑھ چکا ہے کہ اب وہ اس کے بغیر زندگی گزارنے کا تصور بھی نہیں کر سکتے ہیں۔ 22 فیصد کی رائے میں وہ اپنے موبائل فون پرضرورت سے زیادہ انحصار کرتے ہیں۔10 فیصد کے مطابق ان کے لیے موبائل فون کی کوئی خاص اہمیت نہیں ہے وہ اسے رکھ بھی سکتے ہیں اور چھوڑ بھی سکتے ہیں۔1 فیصد نے کہا کہ وہ اسے صرف ایک ضرورت کی چیز سمجھتے ہیں جبکہ 1 فیصد نوجوانوں نے کہا کہ وہ موبائل فون کے بغیر باآسانی رہ سکتے ہیں۔


تاریخی نالندہ یونیورسٹی کی یاد میں

یورپ کی آکسفورڈ اور کیمبرج یونیورسٹی سے بھی کئی صدی قبل بھارت کی شمال مشرقی ریاست بہار کی نالندہ یونیورسٹی تعلیم و تعلم کا ایک اہم اور عالمی مرکز ہوا کرتی تھی۔پانچویں صدی میں قائم ہونے والی اس یونیورسٹی میں ایشیا کے اکثر علاقوں سے لوگ پڑھنے کے لیے آتے تھے لیکن 1193ء میں یہ بیرونی حملوں کا شکار ہو گئی۔اب 21 ویں صدی میں بعض دانشوروں نے اس قدیم یونیورسٹی کے وقار کو از سر نو بحال کرنے کی منصوبہ بندی کی ہے۔
دانشوروں کے اس گروپ کی قیادت نوبل انعام یافتہ پروفیسر امرتیہ سین کر رہے ہیں۔امرتیہ سین اور ان کے ساتھی اس قدیم یونیورسٹی کے کھنڈرات سے ملحق ایک عالمی سطح کی یونیورسٹی قائم کرنا چاہتے ہیں۔اس نئی یونیورسٹی میں تمام جدید مضامین کی تعلیم فراہم کرنے کے لیے منصوبہ بندی کی گئی ہے لیکن بہار جیسی غریب اور پسماندہ ریاست میں ایک عالمی سطح کی یونیورسٹی بنانا بہت مشکل کام ہے۔
امریکہ کے بوسٹن کالج کے پروفیسر فلپ آلٹ بیک اس طرف اشارہ کرتے ہوئے کہتے ہیں،’کیا اعلیٰ سطح کے طالب علم اور اساتذہ دیہی بہار کی طرف متوجہ ہوں گے؟‘لیکن نالندہ یونیورسٹی کے چانسلر امرتیہ سین ان سب قیاس آرائیوں کو مسترد کرتے ہوئے کہتے ہیں ’ہمارا کام نئی یونیورسٹی قائم کرنا اور پڑھائی شروع کر دینا ہے۔ یہ ایک شروعات ہے۔ قدیم یونیورسٹی تقریبا 200 سال میں اپنی شہرت کی بلندیوں پر پہنچی تھی۔ ہم لوگوں کو شاید 200 سال نہیں لگیں گے لیکن کچھ دہائیاں تو لگ جائیں گی۔‘
بھارت، چین، سنگاپور، جاپان اور تھائی لینڈ نے سنہ 2006 میں قدیم نالندہ یونیورسٹی کو دوبارہ شروع کرنے کی منصوبہ بندی کا اعلان کیا، جس کے بعدامریکہ اور روس جیسے ممالک نے بھی اس کی حمایت کی۔نئی یونیورسٹی کو راجگیر میں بنایا جا رہا ہے جو قدیم یونیورسٹی سے تقریبا 10 کلومیٹر کے فاصلے پر ہے۔ یہاں سب سے پہلے تاریخ اور ماحولیات کی تعلیم شروع ہوگی جس کے لیے دنیا بھر میں اشتہار دیا جا چکا ہے۔
یونیورسٹی میں پہلا بیچ سال 2014 سے شروع ہوگا۔یونیورسٹی کے لیے زمین بہار حکومت نے دی ہے جبکہ باقی اخراجات کے لیے مرکزی حکومت اور کئی دوسرے ممالک امداد کر رہے ہیں۔پروفیسر سین کے مطابق یونیورسٹی کی دھیرے دھیرے تعمیر ہوتی رہے گی اور دریں اثنا پڑھائی بھی جاری رہے گی۔
پروفیسر سین کا کہنا ہے کہ نئی یونیورسٹی کی ترغیب ایشیائی ریاستوں سے ملی ہے لیکن تعلیم، موضوع اور ماہرین کے معاملے میں یہ عالمی سطح کی ہوگی۔
پانچویں صدی میں قائم نالندہ یونیورسٹی میں ایک وقت ایسا بھی تھا جب وہاں تقریباً 10 ہزار طلبہ ہوا کرتے تھے۔ طلبہ میں زیادہ تر چین، جاپان، کوریا اور دوسرے ایشیائی ممالک سے آنے والے بدھ مت کے پیروکار ہوا کرتے تھے۔
 چینی راہب سیاح ہوین سانگ نے ساتویں صدی میں نالندہ میں تعلیم حاصل کی تھی اور انہوں نے اپنی کتاب میں یونیورسٹی کی خوبصورتی کا ذکر کیا ہے۔ انھوں نے اپنی کتاب میں نو منزلہ لائبریری کا ذکر بھی کیا ہے۔جنوری 2013 میں جے پور ادبی میلے میں تبتیوں کے مذہبی گرو دلائی لامہ نے کہا تھا کہ ’بدھ مت کے تمام علم کا ذریعہ نالندہ یونیورسٹی تھی۔‘
دنیا بھر کی بہترین یونیورسٹیوں کے ماہر تصور کیے جانے والے پروفیسر آلٹ بیک کو اس نئی یونیورسٹی کے عالمی مقام حاصل کرنے پر شک ہے۔ان کا کہنا ہے؛ ’نالندہ کچھ بڑے ماہرین اور دانشوروں کو ضرور اپنی طرف متوجہ کر سکتا ہے لیکن اساتذہ اسی جگہ رہنا چاہتے ہیں جہاں اعلیٰ سطح کا بنیادی ڈھانچہ ہو۔ وہ کالج کے احاطے کے باہر بھی دانشوروں کا ماحول چاہتے ہیں۔‘دوسری جانب نالندہ یونیورسٹی کی انتظامیہ کے رکن اور بھارتی پارلیمان کے رہنما نند کشور سنگھ کہتے ہیں کہ نالندہ یونیورسٹی کی وجہ سے اس علاقے کو ترقی ملےگی۔

Saturday, April 20, 2013

गिरफ्त में दरिंदा, 'गुड़िया' की जंग जारी


नई दिल्ली: बिहार के मुजफ्फरपुर से पकड़े गये गुड़िया के आरोपी दरिंदे मनोज शाह को बिहार से दिल्ली लाने के बाद पुलिस पूछताछ कर रही है। पटना एयरपोर्ट में आरोपी को पुलिस जैसे ही लाई वहां गुस्साए लोगों ने उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। पुलिस ने किसी तरह लोगों के गुस्से को शांत करने की कोशिश की।एम्स की ओर से जारी शनिवार शाम को गुड़िया के दूसरे मेडिकल बुलेटिन में बताया गया कि गुड़िया को लगी अंदरूनी चोटों की सर्जिकल ड्रेसिंग की गई है। गुड़िया अब पूरी तरह से होश में है, अलर्ट है और अपने परिजनों से बातचीत कर रही है। गुड़िया की अगली सर्जिकल ड्रेसिंग अब कल की जाएगी। एम्स के 8 डॉक्टरों की टीम गुड़िया का इलाज कर रही है। गुड़िया की सेहत में सुधार हो रहा है लेकिन फिर भी उन्हें आईसीयू में रखा गया है। बच्ची की हालत स्थिर है, लेकिन रिकवरी अच्छी है। बच्ची के सभी अंग सामान्य तौर पर काम कर रहे हैं। 

Monday, April 15, 2013

تا رےک رہ گزرکا مسا فر ” سنجے دت “



  • 12ما رچ 1993 کوممبئی مےں سلسلے وار 12مقا ما ت پر13ش دھما کے ہوئے تھے۔ اس مےں 257افراد ہلا ک ہوئے تھے جبکہ 713افراد مجرو ح ہو ئے تھے۔ ممبئی اسٹاک اےکسچےنج کی 28منزلہ عما رت کے بےسمےنٹ مےں دو پہر 1:30بجے دھما کہ ہوا تھا جس مےں 50افراد ہلاک ہوئے تھے۔ نصف گھنٹہ بعد اےک کا رمےں دھما کہ ہوا اور اگلے دو گھنٹہ سے بھی کم وقت مےں کل 13دھما کے ہو چکے تھے۔ ان دھماکوں مےں تقرےباً 27کرو ڑ رروپے کی املاک کا نقصا ن ہوا تھا۔ 
  • ےہی وہ دور تھا جب سنجے دت کی دنےا بدل گئی ۔ بم دھماکوں مےں اس کا نام آتے ہی بالی ووڈ سے لےکر سےا سی گلےوں مےں افرا تفری مچ گئی ۔ اےک زلزلہ سا آگےا ۔ تب سنجے ما ر ےشش مےں فلم آتش کی شو ٹنگ مےں مصروف تھا جسے روک کرر اسے تفتےش کےلئے ممبئی بلاےا گےا۔ 19اپرےل 1993 کو جےسے ہی ممبئی کے سہا را ےئر پور ٹ پر ہو ائی جہا ز سے اترا اسے گر فتار کر لےا گےا ۔ تفتےش کے دو ران 26اپرےل 1993کو سنجے دت نے مبےنہ طور پر قبول کےا تھا کہ جنوری 1993مےں انڈر ورلڈ ڈان ابو سلےم ، مےگنم وےڈ ےو کمپنی کے مالک سمےر ہنگو را اور حنےف کڑا والا ان کے گھر مےں اے کے 56رائفل لے کر آئے تھے۔ ےہ تےنوں ما فےا ڈ ان دا و ¿د ابراہےم کے دست راست تھے۔اور اسی کے بعد اسے ممبئی کے آر تھر رو ڈ جےل بھےج دےا گےا ۔ بعد مےں مقد مہ کی سما عت کے دوران سنجے اپنے اقبالےہ بےان سے منحرف ہو گےا ۔ اور اسے 3مئی 1993کو ضما نت پر رہا کر دےا گےا تھا۔ اس نے مبےنہ طور پر قبول کےا تھا کہ اس نے اپنے کنبہ کی حفا ظت کےلئے اےک اے کے 56رائفل لےا تھا ۔ سنجے کا کہنا تھا کہ ممبئی فساد کے بعد اس کے کنبہ کو با رہا دھمکےاں مل رہی تھےں۔ سنجے نے مبےنہ طور پر ےہ بھی مانا تھا کہ جب ممبئی بم دھماکے ہوئے تو ہ ملک سے باہر تھا اور اس نے اپنے دوست ےوسف نل والا سے اس رائفل کو تبا ہ کر نے کو کہا تھا ۔ اس کے بعد 4جو لائی 1994کو اس کی ضما نت خا رج کر دی گئی ۔ اس پرٹا ڈا قا نون کے تحت دھماکوں کی سا زش رچنے اور ابوسلےم سے ہتھےار لےنے کا مقدمہ چلایا گےا اور اس دوران سنجے دت کو6جولائی 1994سے اگلے اٹھا رہ ما ہ پو نے کے یر ودا جےل مےں گزار نے پڑے تھے۔ والد سنےل دت کو اس کی ضما نت کےلئے شےو سےنا کے چےف آنجہانی بالا صا حب ٹھا کر ے سے مدد لےنی پڑی تب جا کر کہےں 16اکتو بر 199ءکو ضمانت ہوسکی تھی ۔ 19اپرےل 1995ءکو ممبئی کی ٹا ڈا عدالت مےں اس معاملہ کی سما عت شروع ہوئی یہ وہ دو ر تھا جب سنجے دت کا شما ر با لی ووڈ کے ٹاپ سپر اسٹار مےں ہو تا تھا ۔ ضما نت پر رہا ہونے کے بعد اس نے اےک با ر پھر اپنے کےر ےئر پر دھےان دےا اور’ منا بھائی اےم بی بی اےس‘ جےسی کئی کامےاب فلمےں دےں۔ اسے اےک بڑی راحت نو مبر 2006مےں تب ملی جب ممبئی دھماکہ معا ملہ کی سما عت کررہی ٹا ڈا عدا لت نے کہا کہ سنجے دت کو ئی دہشت گرد نہےںہے۔ اس نے اپنے گھر مےں غےر قا نونی طور پر رائفل اپنی او راپنے کنبہ کی حفا ظت کے لئے رکھی تھی ۔ اس کے بعد اس پر سے ٹا ڈا کے الزاما ت ختم کر دئے گئے مگر دےگر دفعات مےں مقد مہ چلتا رہا ۔ جولا ئی 2007مےں ٹا ڈا کو رٹ نے سنجے کو غےر قا نونی اسلحہ رکھنے کا قصور وار ما نتے ہوئے دےگر کئی سنگےن معاملا ت مےں بر ی کر دےا۔ اور 6سال کی سزا سنائی ۔ 2اگست 2007 ءکو عد الت عظمیٰ نے سنجے دت کو ضما نت دے دی اور مقدمہ التوا مےں رہا۔ ےکم نو مبر 2011 ءکو عدا لت عظمیٰ مےں اس معا ملہ کی سما عت شرو ع ہوئی جو تقرےباً دس ماہ تک چلی ۔ اگست 2012ءمےں عدا لت عظمیٰ نے اپنا فےصلہ محفو ظ رکھا اور 21ما رچ 2013ءکو فےصلہ سنا دےا گےا ۔ 
  • سنجے کو اتنی راحت ضرو ر دی گئی کہ ٹا ڈا کور ٹ کے ذرےعہ دی گئی 6سال کی سزا کو کم کر کے پانچ سال کر دےا گےا ۔ جس مےں وہ اٹھا رہ ماہ جےل مےں گزار چکے ہےں با قی سا ڑھے تےن سال انہےں جےل مےں گز ار نے ہو ں گے۔ 
  • عد الت عظمیٰ نے واضح طو ر پر کہا ہے کہ حالات اور جرائم اتنے سنگےن ہےں کہ سنجے دت کو پرو بےشن پر رہا ئی نہےں مل سکتی ٹا ڈا کو رٹ نے ثبو توں کے بنےاد پر ہی فےصلہ سنا ےا تھا جو درست اور صحےح تھا “ 
  • نر گس اور سنےل دت کا لا ڈلہ سنجے آج سے تےن دہائی قبل جب ’راکی ‘ بن کر پر دے پر آےا تھا کسی نے ےہ نہےں سو چا تھا کہ ’ کھل نا ئک ‘ کی نمائش کے بعد اسے سچ مچ ’ کھل نائک ‘ ( ولن ) سمجھا جائے گا ۔ اےک بار پھر عد الت عظمیٰ نے اس کی اےسی شبےہہ کےلئے اسے پا نچ سال کی سزا سنا دی ہے ۔ جےسے ہی عدا لت عظمیٰ نے اس کی سزا بحال رکھنے کا فےصلہ کےاتو ممبئی کے پا لی ہل بنگلے پر بہن پر ےہ دت کا فو ن آتے ہی سنجے اپنی بےوی ما نےتہ دت کی طر ف دےکھ کر بولا ” اِٹس وےری پےن فل “ ( its very painfull) ، تبھی پاس مےں کھڑے اس کے دوست بنٹی والےا نے اس کے کندھے پرہا تھ رکھا ۔ سنجے دت ےہ بات جا نتا ہے کہ آج کےر ئےر کے جس مو ڑ پر وہ کھڑا ہے وہا ں اگر اسے ساڑھے تےن سال جےل مےں گزار نے پڑے تو اس کا کےر ئےر چو پٹ ہوجائے گا اور مستقبل تا رےک ۔ اس کی دو بارہ گر فتار ی کو لے کر اس کے فلمسا زوں پر بھی لر زہ طا ری ہے او روہ گھبرائے ہوئے ہےں۔ اس وقت اس کی فلموں پر فلمسا زوں کے تقرےباً 250کرو ڑ روپے لگے ہوئے ہےںاگرو ہ دو با رہ جےل جا تا ہے تو فلمسا زوں کے ےہ پےسے ڈوب سکتے ہےں۔ سب سے زےادہ متا ثر ’ منا بھا ئی ‘ کا سےکو ئےل ہو گا جبکہ ’ زنجےر ‘ ری مےک ‘ ’ پی کے ‘ اور پو لس گےری پر بھی گہرا اثر پڑے گا ۔ زنجےر ری میک میںسنجے دت شےر خان ( پرانی فلم مےں پران ) کا کر دارادا کر ہا ہے ، جس کی شو ٹنگ 95فےصد مکمل ہو چکی ہے ۔ جبکہ عامر خان کے مر کزی کر دار والی فلم ’ پی کے ‘ مےں سنجے دت کا چھو ٹا سا کےمےو ہے ۔ ٹی پی اگر وال کی فلم ’پو لےس گےری ’صرف دس پند رہ دنوں کی شو ٹنگ باقی ہے ۔ وےسے تو کئی اور فلمےں اس نے سائن کی ہےں لےکن ےہ سب کی سب سال کے آخر مےں شروع ہو نے والی ہےں۔ ’نام ‘ اور ’ سڑک ‘ جےسی فلموں سے سنجے دت کا کےر ئےر بنا نے وا لے مشہور فلمسا زو ہد اےت کا ر مہےش بھٹ صد مے مےںہےں۔ سنجے کے تئےں ان کا درد ہونٹوں تک آہی گےا۔ انہوں نے سنجے کی سزا پر افسوس ظا ہر کر تے ہوئے کہا کہ آج بےس سال بعد بھی 1993کے بم دھماکوں کے اصلی گنہگاروں کو پکڑنے مےں پولس ناکام رہی ہے۔ اس دھما کے مےں جتنے بھی بڑے ہاتھی تھے وہ اب بھی قا نون کے دائرہ سے با ہر ہےں۔ شو مےن سبھاش گھئی نے کہا کہ ” مےں عدالت کے فےصلے کی قدر کر تا ہوں ، قا نون کے مطابق قصو رواروں کو سزا ملنی چا ہےے لےکن جہا ں تک ’دت خاندا ن ‘ کا سوال ہے تو ےہ لوگ با لی ووڈ کے معز زو محترم لو گ ہےں۔ فلم سماج او رملک کے تئےں ان کا بےش قےمتی تعا ون رہا ہے۔“ مہا را شٹر اسمبلی کے رکن اور سماج وادی پا رٹی کےے رےا ستی صدر ابو عا صم اعظمی نے کہا کہ ” سنجے دت نے غلطی ےا بے وقو فی جو بھی کی ہو مگر وہ دہشت گر د نہےںہے ۔ مےں بھی اسی معا ملہ مےں اےک سا ل بھر اندر تھا“ ۔
  • سپریم کورٹ کے ریٹائرڈ جج مسٹر سوڈھی نے کہا کہ سنجے کے لیے ابھی ایک کھڑکی کھلی ہے وہ ہیں گورنروصدر۔اسی بات کو مدنظر رکھتے ہوئے سپریم کورٹ کے سابق جج وپریس کونسل آف انڈیا کے چیئر مین جسٹس مارکنڈے کاٹجو نے گورنر مہارشٹر سے اپیل کی ہے کہ سنجے کو عام معافی دے دی جائے۔فلم اداکار وبی جے پی رکن پارلیمنٹ شتروگھن سنہا نے بھی کہا مسٹر کاٹجو کی حمایت کرتے ہوئے سنجے کے معافی کی اپیل کی ہے۔
  • فلم ادا کا رہ ورکن پا رلےمنٹ جےہ پر دا اپنے درد کا اظہار کر تی ہوئی کہتی ہےں کہ مےں عد التی فےصلے کی قدر کر تی ہوں ، سنجے معصوم ہےں ، اٹھا رہ ماہ جےل بھگتنے کے بعد پھر سے انہےں سزا ملنا تکلےف دہ ہے “ بہن پر ےہ دت بھلے ہی کو رٹ کے فےصلے کے بعد کچھ نہےں کہہ سکےں لےکن ان کے رخسا ر پر ڈھلکے ہوئے موتی بہت کچھ کہہ گئے ۔ پچھلی بار جب کو رٹ مےں سزا سنائی گئی تو پر ےہ دت نے کہا تھا ” کا ش ! سنجے دت صرف سنجے دت ہو تا ، وہ سنےل دت کا بےٹا نہےں ہو تا تو مجھے نہےں لگتا کہ ےہ سب ہو تا “ پہلی بار جب سنجے دت ضما نت پر چھو ٹ کر آےا تھا اس نے کہا تھا کہ مےں بے قصور ہوں ، وطن پر ست ہو ں، مےں بھارت سے پےا ر کرتا ہوں کےو نکہ ےہ مےری ’ ما تر بھو می ‘ ہے اس نے کہا تھا کہ مےں بے حد حسا س انسان ہوں، مےری زند گی کچھ اےسی ہو گئی ہے جےسے طلو ع آفتاب سے قبل زمےن پر گہری تا رےکی چھا جا تی ہے۔ مےر ی زندگی پر بھی انہےں تا رےکےوں کا سا ےہ آن پڑا ہے۔ سنجے دت نے کہا کہ ” زندگی مےں پہلی بار وہ سماجی خد ما ت انجام دےنے کےلئے مجبور ہوا جب ممبئی کے فساد نے اسے بری طر ح بے چےن کےا تھا اور اس نے فسا د زدہ لو گوں کی امداد کےلئے آگے قدم بڑھا ےا تھا تب کچھ لوگوں نے اسے اس کام کےلئے بھی قصو ر وار ٹھہر ا ےا تھا کہ وہ صرف اےک طبقہ کے لوگوں کی ہی مد د کررہا ہے کےو نکہ اس کی ماں مسلمان تھی جبکہ اصلےت مےں اس کی نظر مےں فساد متا ثرےن کا کوئی مذہب نہےں تھا وہ صرف دکھی انسان تھے ۔ اس کے بعد اس کے خاندان کو لگا تار دھمکےاں ملنے کی وجہ سے اسے ےہی قدم اٹھا نا منا سب لگا ۔ وہ ےہ ما نتا ہے کہ پا پا کا امن و شا نتی کےلئے پےد ل ےا ترا پر نکلنا بھی کچھ لو گوں کی آنکھوں مےں چبھ گےا تھا ۔ شاےد پا پا کے سےا ست مےں ہو نے کی وجہ سے اسے ےہ قےمت چکا نی پڑی ہو ۔ وہ کہتا ہے کہ اس کا زور چلتا تو وہ اپنے پا پا کو سےا ست سے باکل دور رکھتا ۔ وہ بہت سےد ھے سا دھے تھے اور سےا ست سےدھے سا دے لوگوں کےلئے نہےں ہو تی اس وقت ا س نے ےہ بھی کہا تھا کہ دےر سوےر اس کی زندگی کی تا رےک رہگزر پر امےد کی کرن ضرور چمکے گی۔ لےکن آج عدا لت عظمیٰ نے اسے اےک با ر پھر سے طلوع آفتاب سے قبل آنے والی تارےکی مےں لا کر کھڑا کردےا ہے اور وہ پھر سے تارےک رہگزر کا مسا فر بن گےا ہے ۔ اس فےصلے کے بعد سنجے دت کے بنگلہ پر آنے والے اس کے دوست مصنف و ہدا ےت کا ر رومی جعفری ےہ ما نتے ہےں کہ سنجے دت سے جو غلطی ہو ئی وہ نا دا نی تھی او راس وقت جو بھی ہو ا ہے وہ تکلےف دہ ہے ۔ سنجے دت کے ساتھ کئی فلموں مےں کام کر چکے سنجے گپتا کہتے ہےں کہ ”چھو ٹی سے نا دا نی و غلطی کےلئے وہ ڈ ےڑھ سال سے زےادہ کی سزا کا ٹ چکا ہے ، سنجے نا دان ہے عا دی مجرم نہےں “ 
  • شروع مےں اس پر ملک سے بغا وت کے الزاما ت لگائے گئے لےکن کو ئی الزام ثابت نہےں ہو ا۔ جب سنجے دت پہلی بار بم دھماکہ معا ملے مےں گر فتار ہو ا تو سنےل دت نے کہا تھا کہ ” مےں نے خو د اسے پو لس کے حو الے کےا تھا لےکن اےر پو رٹ پر جس طر ح کے پو لس انتظا مات تھے، اےسا لگ رہاتھا کہ جےسے مےرا بےٹا بہت بڑا مجرم ہو ، جو اس معاملے کے مجرم تھے اور جنہےں پکڑنا چاہےے تھا وہ تو نکل گئے ، ہمارے ملک مےں اس اےجنسی کے با رے مےں کو ئی سوال نہےں اٹھتا جس کا کام ملک کی حفا ظت کر نا ہے ، ان کے بارے مےں کوئی کچھ نہےں کہتا کہ ملک مےں دہشت پھےلا نے والے بغےر کسی رو ک ٹوک کے آتے ہےں اور چلے جا تے ہےں۔“ 
  • سنجے دت کی تےن دہائےوں والی فلمی زند گی ہمےشہ حالا ت کے پےچ و خم مےں الجھی رہی ۔ والد ہ نر گس کے انتقا ل کے بعد سنجو با با کے دل پر بے حد گہرااثر پڑا اور 1981مےں پہلی فلم ’ راکی ‘ کی کامےا بی کے بعد بری صحبت مےں ڈر گس کی لت لگ گئی ۔ سنےل دت نے اس کے ڈر گس کی لت کوچھڑ انے مےں کوئی کسر نہےں چھو ڑی اور اسے علاج کےلئے امرےکہ لے گئے ۔ جس کے بعد سنجے دت نے ڈر گس کو ہمےشہ کےلئے تر ک کر دےااور پھر سے اپنے کےر ئےر کی شر و عات کی۔ کچھ دنو ںکے بعد فلم اد اکا رہ رےچا شرما سے اس نے شا د ی کر لی لےکن سنجے دت کی زند گی مےں اس وقت زلزلہ آگےا جب بےٹی تر شلا دت کے پےدا ہونے کے کچھ ہی دن بعد بےوی رےچا شرما کو برےن کےنسر ہو گےا اور امرےکہ مےں دو ران علا ج اس کی موت ہوگئی ۔ بہت دنوں تک سنجے اپنی بےٹی کو پا لتے رہے اور جب وہ کچھ بڑی ہو گئی تو سنجو نے اےک حےدرآبادی خا تون سے شا دی کرلی جسے ما نےتہ دت کانام دےا ۔ دوسری بےوی سے سنجو کے دو بچے ہےں۔ ابھی حال ہی مےں نمائش کی گئی اس کی فلم ’ضلع غا زی آباد ‘ ہر جگہ کامےا بی کے جھنڈے گا ڑ رہی ہے ۔ ’ نام ‘ ’ودھا تا ‘ ’ قبضہ ‘ ’ ساجن ‘’ سڑک ‘ ’ کھل نا ئک ‘ ’ با رڈر ‘ ’ منا بھا ئی اےم بی اےس اےس ‘ ’لگے رہو منا بھا ئی اور ضلع غا زی آباد جےسی اےک سے بڑھ کر اےک کا مےاب فلمےں دےنے والا ادا کا ر و رکن پا رلےمنٹ آنجہا نی سنےل دت و نر گس کا بےٹا و موجودہ رکن پا رلےمنٹ پر ےہ دت کا بھائی سنجے دت اپنی چھو ٹی سی نا دانی کی وجہ سے زندگی کی تا رےک رہگزر کا مسا فر بن چکا ہے ۔ کورےو گرا فر فرح خان کے ساتھ ہماری بھی دعاءہے کہ” اللہ تعا لیٰ اسے صعو بتےں اٹھا نے کی ہمت و طا قت دے ۔ 



Monday, February 11, 2013

कसमें-वादे निभायेंगे हम....


आज प्यार के इस सफ्ताह यानी कि वैलेंनटाइन वीक का पांचवा दिन है। 'रोज डे', 'प्रपोज डे' , 'चॉकलेट डे', 'टेडी बियर डे 'के बाद आज बारी है वादों की मतलब की आज है 'प्रॉमिस डे' यानी कि कसमें-वादों का दिन। एक-दूसरे के साथ पूरी जिंदगी को साथ जीने का और साथ निभाने के लिए शपथ लेने का दिन। जाहिर है जब आप किसी से मोहब्बत करते हैं तो उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। अपनी हर खुशी उसके साथ बांटना चाहते हैं, उसके हर गम को अपनाना चाहते हैं, जिसको जताने के लिए आज से अच्छा दिन हो ही नहीं सकता है। आज के दिन प्रेमी जोड़े अपने दिल की वो बात जुबां पर ला सकते हैं जो इतने दिन से वो कह नहीं पा रहे थे। आईलवयू कहना तो बहुत आसान है लेकिन उसे निभा पाना बहुत मुश्किल जिसको लेकर हमेशा लड़कियां आशंकित रहती हैं।लड़कियों के लिए कहना बहुत आसान होता है कि वो जिससे प्रेम करती हैं उस पर अपना सबकुछ न्यौछावर कर सकती हैं। लेकिन लड़कों के लिए यह जताना थोड़ा मुश्किल होता है कि वो अपने प्रेम से कह सके कि वो उसके बिना अधूरे हैं। इसलिए शायद प्यार करने वालों ने आज के दिन को 'प्रॉमिस डे' नाम दिया है। आज आप सभी अपने आप से वादा कीजिये कि आप अपने प्यार के साथ हमेशा हर पाल साथ रहेंगे। अपने प्यार की बगिया इतनी सुंदर बनायेंगे जहां कोई भी आप दोनों के सिवा घुस न पाये। जो भी वादा आप आजके दिन करें उसे पूरी शिद्दत से निभाने की कोशिश करें। क्योंकि दोस्तों किसी का साथ पाना तो आसान है निभाना बहुत मुश्किल लेकिन अगर दिल में उसके प्रति अनुराग है तो आप आसानी से अपने सारे वादों और कसमों को निभा पायेंगे। कहा भी गया है कि "किसी की मुहब्बत तभी पूरी होती है जब तक उसमें शर्ते नहीं होती.. एहसास और ख्याल तब तक मुक्कमल नहीं होते जब तक उसमें वादें और कसमें नहीं होतीं।" हैप्पी प्रॉमिस डे...साभार one india.com 

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...