कल यानि 9 अगस्त को ईद है।ईद यानि खुशियों का दिन। वो ख़ुशी जो तिस रोज़े के बाद इन्सान को मयस्सर होती है। ज़ाहिर है इसका न सिर्फ इंतजार होता है बल्कि इस मौक़ा को पाकर हर मुसलमान अपने आप को खुशनसीब समझता है और समझना भी चाहिए। लेकिन इसके बर अक्स एक और हकीक़त है जो न सिर्फ तकलीफ देने वाली है बल्कि हमें अपने गरेबान में झाँकने की भी दावत देती है। ईमानदाराना तौर पर अगर हम अपने चरों ओर नज़र डालें तो आसानी से इसका अंदाज़ा हो जायेगा कि ये ईद का ये पर्व और ख़ुशी सब को बराबर मयस्सर हो रही है क्या ?यकीनन आप अगर अपने एक छोटा सा दिल रखते हैं तो आप को न सिर्फ गिलानी महसूस होगी बल्कि बहुत तकलीफ भी होगी कि जिस मजहबे इस्लाम में सबको यकसां यानि बराबरी का दर्ज दिया गया है वहां ये खाई क्यों है। एक तरफ दुनिया की हर चीज़ क़दमों में और एक तरफ खुशियों क लिए तरसता हुआ इन्सान।एक तरफ खुशियों की रेल पेल और दूसरी तरफ ग़म का पहाड़। क्या ये आज की सच्चाई नहीं है?

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