Saturday, January 28, 2012

गर्त में भारतीय क्रिकेट

सफलताओं के शिखर से भारतीय क्रिकेट टीम सीधे दुर्गति के ऐसे गर्त में गिर जाएगी, यह कल्पना से भी बाहर था। विदेश में लगातार सात टेस्ट मैचों में हार के बाद महेंद्र सिंह धोनी की टीम लगभग अपना पूरा गौरव गंवा चुकी है। पिछले वर्ष यह टीम टेस्ट क्रिकेट में नंबर एक और वनडे क्रिकेट के विश्व चैंपियन का ताज पहने इंग्लैंड पहुंची थी, तब आशाएं आसमान पर थीं कि भारत अब क्रिकेट की दुनिया पर वैसे ही राज करेगा, जैसा कभी क्लाइव लॉयड-विव रिचर्डस की वेस्ट इंडीज टीमों और स्टीव वॉ-रिकी पोंटिंग की ऑस्ट्रेलियाई टीमों ने किया। लेकिन वहां चारों टेस्ट में बुरी हार और अब ऑस्ट्रेलिया में लगातार तीन टेस्ट गंवाने के बाद दरपेश सवाल यह है कि क्या इस टीम में विदेशी पिचों पर खेलने की कुव्वत और जज्बा भी बचा है? अपने दिग्गज बल्लेबाज तेज आक्रमण के आगे विभ्रमित हैं और उन्हीं पिचों पर अपनी गेंदबाजी बेदम साबित हुई है। नतीजा है कि क्रिकेट में भारत के स्वर्ण युग का सपना फलीभूत होने से पहले ही चकनाचूर हो गया है। मशहूर खिलाड़ियों ने इन दोनों दौरों पर संघर्ष भावना के नितांत अभाव का परिचय देते हुए जिस तरह घुटने टेके हैं, उसके बाद उन्हें केंद्र में रखकर भविष्य की रणनीति बनाना कठिन महसूस होता है। टेस्ट क्रिकेट में टिकने के लिए जो सब्र और मानसिक कौशल चाहिए, वह धोनी की टीम में कम से कम अब तो नजर नहीं आता। यह अत्यधिक वन डे और टी-20 खेलने का परिणाम है या गैरी कस्र्टन का जाना रणनीति एवं तैयारी के लिहाज से टीम को महंगा पड़ा है अथवा लंबे कॅरियर तथा विश्वकप में जीत जैसी सफलता के बाद भारतीय खिलाड़ियों में यह अहसास समा गया है कि पाने के लिए कोई उपलब्धि अब बची नहीं है, यह आकलन का विषय है। लेकिन नतीजा यह है कि देश के क्रिकेट प्रेमी आज गहरी हताशा में हैं। क्या बीसीसीआई और चयनकर्ताओं के पास भारतीय क्रिकेट को फिर से खड़ा करने का कोई फॉमरूला है? या वे अब भी क्रिकेट के कारोबार में अपनी सफलता पर आत्ममुग्ध हैं?

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