Saturday, January 28, 2012

जवानी की रेल चली जाए रे!


आज एक बार फिर से संगीतकार सी रामचंद्र की बात शुरू करने से पहले एक शख्स का ज़िक्र। इस शख्स का नाम है नंदकिशोर। मेरे मित्र हैं और कानपुर में रहते हैं। संगीत की अद्भुत दीवानगी है। इसी दीवानगी में न सिर्फ पूरे हिंदुस्तान में घूमते रहते हैं, बल्कि पाकिस्तान और इंग्लिस्तान तक भी चले जाते हैं। कोई धनी आदमी नहीं हैं, लेकिन जुनून के लिए पैसे की क्या ज़रूरत? सो जगह-जगह से दुर्लभ संगीत, दुर्लभ फिल्में इकट्ठा करते हैं और बिना किसी अपेक्षा के दोस्तों में बांट देते हैं। सी रामचंद्र पर अपनी बातचीत में पिछली बार एक इंटरव्यू से मैंने कुछ कोट किया था।
यह 1981 में बीबीसी पर महेंद्र कौल साहब का लिया हुआ इंटरव्यू है और उसकी डीवीडी मुझे भाई नंदकिशोर ने ही भेजी थी। इससे बड़ी मदद मिली। अब जैसे इस इंटरव्यू में सी रामचंद्र साहब की बातचीत सुनकर इस बात को बख़ूबी समझा जा सकता है कि उनके संगीत में इतनी मस्ती, इतनी बेपरवाही, इतनी उछाल क्यों है। बेपरवाही से मुराद बनी-बनाई लीक पर चलने से बेपरवाही। इसी वजह से सी रामचंद्र का संगीत लीक से हटकर है। इंटरव्यू के दौरान जिस तरह कुर्सी पर वे बैठते हैं। जिस तरह सवाल सुनते-सुनते ज़ोर-ज़ोर से हंसते चले जाते हैं। जिस तरह से बेख़ौफ, बिना किसी बात को छुपाने की कोशिश के, पूरी साफ़गोई से वे बात करते हैं। वो सब उनके और उनके संगीत के चरित्र को समझने में काफ़ी मददगार साबित होता है। अब जैसे ज़रा मिसाल के लिए बातचीत के कुछ और अंश सुनिए : आप किसी ख़ास औरत की वजह से प्रेरित हुए जिसकी वजह से आपने ऐसे गाने, ऐसी धुनें बनाईं? मैं इस पर बिलीव नहीं करता कि किसी से प्रेरित होने से..। मैं तो बच्चे को भी देखता हूं तो प्रेरित होता हूं। मैं भगवान को देखता हूं तो भी प्रेरित होता हूं। मैंने कभी-कभी खाना पेट भर को खाया तो भी प्रेरित होता हूं। कभी अच्छी विस्की पी तो भी प्रेरित होता हूं। अच्छा आप इस बात से इनकार कर सकते हैं कि आप में हवस नहीं है? बहुत है।
किसी लड़की से प्रेरित नहीं हुए? बहुत-बहुत हुए न। एक नहीं है। ऐसी बहुतसी हैं। आपके बारे में सुना है कि आपको किसी और से बहुत ह्रश्वयार था? था न। था बिल्कुल। वो क्या होता है न कि वो लाइफ के एक-एक फेज़ेज़ होते हैं। जब शादी की तो औरत के साथ था। जब तीन साल हो गए तो दूसरे के साथ हो गया। जब पांच साल हो गए तो और दूसरे के साथ हो गया। इससे आपको प्रेरणा मिलती है?
शायद मिलती होगी। मगर ये नहीं समझता कि एक ही चीज़ से ह्रश्वयार करने से प्रेरणा मिलती है। आइ डोंट थिंक।सी रामचंद्र जी, एक निजी बात पूछता हूं। क्या आपने भी कभी किसी मशरिक़ी जिसे पश्चिमी संगीत कहते हैं उसमें कभी चोरी करके किसी संगीत की रचना की है?
हां, हां की है। एक। एक ये गाना, ऐसे तो मैं इंस्पायर्ड हुआ हूं। बहुत-से गाने मेरे ऐसे हैं जो पश्चिमी संगीत से मैं इंस्पायर्ड हुआ हूं। मगर वैसे का वैसे नहीं लिया। पर एक गाना ऐसा है (हंसते हुए) क्योंकि मैं उसके ऊपर इंप्रूव कर ही नहीं सका, इसलिए ले लिया। (फिर हंसते हुए) एक था गाना, वो फ़िल्म ‘सरहद’ में था। वो एक दाग़ लग गया है मेरे ऊपर। मैं वो एक्सेह्रश्वट करने को तैयार हूं। मुझे उसमें कोई वो नहीं होता है। ‘आजा रे, आजा, लागे न मोरा जिया’।
(आशा भोसले)
इस सारी बातचीत के दौरान कमोबेश हर दूसरे तीसरे ल़ ज़ के बाद हंसी-ठहाके इस क़दर शामिल हैं कि यहां उन्हें पूरी तरह दर्ज कर पाना ज़रा मुश्किल काम है, लिहाज़ा आप इस बात से अंदाज़ लगाकर ख़ुद ही जोड़ लें।दूसरी बात। कौल साहब जिस महिला के साथ सी रामचंद्र के रिश्तों पर ज़ोर देना चाहते थे, उनका इशारा लता मंगेशकर की ओर है।
कहते हैं न - जैसे को तैसा मिला। सो साहब सी रामचंद्र थे - खाओ-पीयो करो आनंद और बाक़ी भुगते परमानंद टाइप के इंसान। सो उनको दोस्त भी मिले तो भगवान दादा, पीएल संतोषी, राजेंद्र कृष्ण, ओम प्रकाश जैसे मौला लोग। सो सब मिलके ऐसी धमाल लाईफ़ जीते थे कि इधर बताना शुरू करूं तो कमब़क्त अखा लाईफ इधर ही खलास हो जाएंगा। मतलब कहने की बात है, ऐसा होता थोड़े ही है। सो बेहतर है कि वापस पटरी पर आ जाएं।
‘सुखी जीवन’ हिट साबित हुई तो काम भी चल निकला। निर्माता-निदेशक जयंत देसाई के साथ लगातार तीन फ़िल्में ‘भक्त राज’ (1943), ‘मनोरमा’ (44) और ‘सम्राट चंद्रगुह्रश्वत’ (45) सिल्वर जुबिली हिट साबित हुईं। इस सफलता ने सी रामचंद्र के अंदर एक अजब-सा अहंकार का भाव भर दिया। हर सफलता के साथ वे दुर्भाग्यवश आत्ममुग्धता से भरते चले गए। भगवान दादा ने ‘सुखी जीवन’ के निर्माता से झगड़ा होने के बाद से ही बाहर की फ़िल्मों का निर्देशन बंद कर दिया था और सिर्फ़ अपनी ही फ़िल्मों का डायरेक्शन करने लगे थे। ये पूरी तरह स्टंट फ़िल्में होती थीं। इन फ़िल्मों में मास्टर भगवान, बाबूराव पहलवान और वसंतराव पहलवान की तिकड़ी होती थी, जो दर्शकों के बीच ज़बरदस्त लोकप्रिय थी। सी रामचंद्र का भगवान से याराना अटूट था तो अपनी सफलता से भी बहुत ह्रश्वयार था, सो वे इन स्टंट फ़िल्मों में अपना नाम बचाकर अण्णा साहेब के नाम से संगीत देते थे। एक दिन चर्चगेट के एक शराबख़ाने में दारू पीते हुए सी रामचंद्र ने कहा - देखो भग्गू, अब सोशल फ़िल्मों में मेरा काफ़ी नाम हो गया है। मेरे नाम पर, मेरे संगीत पर फ़िल्में बिकने लगी हैं। लेकिन मैं तुम्हें इस बात का लाभ नहीं दे पाता।’ यह अलग बात है कि इसी बात से प्रेरित होकर भगवान दादा ने फ़िल्म ‘अलबेला’ का निर्माण किया और एक इतिहास रच दिया, लेकिन इसी बात से सी रामचंद्र के चरित्र का एक पहलू भी उजागर होता है। सफलता का दंभ।
इसी दंभ के कारण आगे चलकर उन्हें अपने बहुत से दोस्त खोने पड़े और फिर संगीत में अपना मक़ाम भी खोना पड़ा। जीवन के लगभग अंतिम दस वर्ष उन्होंने बिना काम ख़ाली बैठकर शराब के सहारे ही गुज़ारे। और उसी तरह चले भी गए। ख़ैर, ये तो मैं बहुत आगे ही चला गया। अभी तो यह बताना था कि जयंत देसाई केएल सहगल को लेकर एक फ़िल्म बना रहे थे, तब सी रामचंद्र ने अपनी एक हज़ार रुपए करने की मांग की। देसाई उनकी तन ़वाह तीन सौ रुपए से बढ़ाकर छह सौ रुपए करने को तैयार हो गए और साथ ही प्रलोभन भी दिया कि सहगल के साथ काम करने का मौक़ा मिलेगा। अहंकार में डूबे अण्णा ने फरमाया - अगर सहगल,सहगल है तो मैं भी सी रामचंद्र हूं। ऐसे में सिवाय इसके हो ही क्या सकता था कि वे कंपनी से बाहर हो जाते। सो हो ही गए। इस अवसर पर गीतकार कवि प्रदीप ने उनका हाथ थामा और अपने साथ फ़िल्मिस्तान ले गए। फ़िल्मिस्तान में सितारा और भी चमका। फ़िल्में और गाने पहले से भी ज्यादा हिट होने लगे। बल्कि आज भी हिट हैं।‘कहके भी न आए तुम, अब छुपने लगे तारे’ (रफ़ी), ‘कभी याद करके, गली पार करके, चली आना हमारे अंगना’(बीनापानी मुखर्जी-चिल्लाकर ) जैसे गीतों के साथ फ़िल्मिस्तान की ‘सफ़र’ (1946) जब सिल्वर जुबिली हिट साबित हुई तो सी रामचंद्र ने उस दौर में अपने रुतबे के मुताबिक़शेवर्लेट कार ख़रीद ली।अगले साल फ़िल्मिस्तान की ‘शहनाई’(1947) में ह्रश्वयारेलाल संतोषी का साथ हुआ तो एक से एक हिट गीत निकलकर आए। ‘आना मेरी जान संडे के संडे, ‘जवानी की रेल चली जाए रे’(लता, गीता, चिल्लाकर ), ‘मार कटारी मर जाना, रे अखियां किसी से मिलाना ना’ (अमीर बाई) और ‘हमारे अंगना, बाजे शहनाई’ (अमीरबाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम)।
इस फ़िल्म के बाद से एक तिकड़ी बन गई। चिल्लाकर, संतोषी और लता की। लता मंगेशकर ने पहली बार सी रामचंद्र के लिए ‘शहनाई’ में ही गाया और उसके बाद सी रामचंद्र ने बाक़ी सबको भुलाकर सिर्फ़ लता की आवाज़ को ध्यान में रखकर ही संगीत रचने पर ज़ोर देना शुरू कर दिया। एक दूसरे के हुनर की क़द्रदानी के साथ-साथ दोनों के बीच एक बहुप्रचारित प्रेम-प्रसंग भी शुरू हुआ। ख़ूब चला और एक दिन सी रामचंद्र की ज़बान ने दिलों के रिश्ते को तोड़ भी दिया।वो क़िस्सा यूं है कि उस ज़माने में एक रिकॉर्डिस्ट होते थे जनाब बी एन शर्मा। मौसूफ़ की पहचान उनकी रिकॉर्डिग की क़ाबिलियत से भी ज्यादा उनकी गाली- गलौज वाली हरकत थी। चलते-फिरते हर गायक को ट्यूं-ट्यूं कर देते थे। और अपने मरहूम दोस्त नवीन सागर के अंदाज़ में कहूं तो सी रामचंद्र भी ‘टाकिंग तो लूज ही टाकिंग’ वाले ही थे।सो एक दिन ऐसा हुआ कि रिकार्डिग के बाद शर्मा और अण्णा बैठ गए दारू पीने। साथ में एक साजि़दा। फिर क्या, शर्मा का अस य उवाच आरंभ हुआ तो उसमें लता पर भी दस-पांच जड़ दीं। ख़ुमारी में डूबे अण्णा ने भी उसी सुर में औल-फौल बक डाला। दो के बीच तीसरा हो तो बात छुपती नहीं सो यहां भी नहीं छुपी। लता ने अण्णा को तो कुछ न कहा, सिर्फ फोन करके इतना भर कहा कि अब से वो शर्मा के साथ रिकॉर्डिग नहीं करेंगी। लिहाज़ा अगली कोई भी रिकॉर्डिग हो तो वे इस बात का ख़याल रखें।अब अण्णा तो अंग्रेज़ी वाला ‘.. बड़ा ईगो’ लेकर जीते थे। सो कह दिया - न को। अपुन का रिकॉर्डिग तो शर्मा के इधरीच होएंगा। सो बस हो गई कुट्टी। इस कुट्टी से अण्णा का बहुत नुक़सान हुआ। देखा, एक बार फिर कूद-फांद के आगे निकल आया। कितने करोड़ ख़ूबसूरत गानों की बात करनी थी और आ गया सीधे झगड़े पे। वंस मोर, एक्सयूज़ मी ह्रश्वलीज़। अगली बार, आज का छूटा सब कुछ बोलूंगा। मतलब द एंड तक की स्टोरी।

No comments:

Post a Comment

सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...