Monday, January 30, 2012
चुनावी वादे हैं, वादों का क्या?
विकास के सभी सूचकांकों पर सबसे निचले पायदान पर फिसल गए उत्तर प्रदेश को बीमारू प्रदेशों में लाइलाज सा मान लिया गया है. लेकिन यह जल्दी ही बीते दिनों की बात हो जायेगी. इस बार विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में विकास की बहार और तोहफों की बरसात आनेवाली है. प्रदेश के मतदाताओं के दिन फिरते दिख रहे हैं. कारण यह कि चुनाव के लिए बसपा को छोडकर बाकी तीनों प्रमुख पार्टियों- सपा, भाजपा और कांग्रेस ने अपने घोषणापत्रों में वायदा किया है कि प्रदेश में 24 घंटे बिजली होगी, किसानों को मुफ्त बिजली-पानी मिलेगा, हर छात्र के हाथ में लैपटाप या टैबलेट कंप्यूटर होगा, हर साल 20 लाख बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता मिलेगा और वह सब कुछ जो उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने शायद सपने में भी नहीं सोचा हो. इन चुनावी घोषणापत्रों में क्या नहीं है? केवल स्वर्ग में सीढ़ी लगाने का वायदा रह गया है, अन्यथा शायद ही कोई ऐसा वायदा हो जो रह गया हो. इन घोषणापत्रों में हर वर्ग, जाति-उपजाति-गोत्र, धर्म और क्षेत्र के लिए वायदों और तोहफों की पेशकश की गई है. वायदों के मामले में सपा, भाजपा और कांग्रेस में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ सी मची हुई है. कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता है. इस चक्कर में अगर सपा ने इंटरमीडिएट करनेवाले सभी छात्रों को मुफ्त लैपटाप और हाई स्कूल के छात्रों को टैबलेट कंप्यूटर देने का वायदा किया तो उससे आगे निकलने के लिए भाजपा ने प्राइमरी के छात्रों को टैबलेट और आठवीं के बाद सभी छात्रों को लैपटाप देने के एलान कर दिया है. हालत यह हो गई है कि अब सपा शिकायत कर रही है कि भाजपा ने उसके घोषणापत्र के वायदों को चुरा लिया है. वायदों की बरसात और भीड़-भाड़ के बीच उनमें इतना गड्डमड्ड हो गया है कि तीनों ही पार्टियों के घोषणापत्र लगभग एक से दिखने लगे हैं. उत्तर प्रदेश की विभाजित और प्रतियोगी राजनीति में विविधता में एकता का इससे बढ़िया उदाहरण शायद ही मिले. यही नहीं, सबसे आगे निकलने की कोशिश में भाजपा ने महापुरुषों और भगवान तक से वायदा किया है. इस बार भी भाजपा ने भगवान राम से वायदा किया है कि अगर वह सत्ता में आती है तो उनका भव्य मंदिर बनवाएगी. इसके अलावा उसने कबीर, रैदास, उदा देवी और झलकारी बाई की याद में मूर्तियां लगवाने और मथुरा-वृन्दावन में ‘आध्यात्मिक डिजनीलैंड’ बनवाने का वायदा किया है. कहने का मतलब यह कि चुनावी वायदे करने के मामले में इन पार्टियों ने बेतुकेपन और अनर्गलता (एब्सर्डिटी) की सभी हदें पार कर दी हैं. मतदाताओं को लुभाने के लिए किये गए इन बेतुके और हास्यास्पद वायदों से भरे इन घोषणापत्रों और विजन दस्तावेजों को पढ़ते हुए ग़ालिब बेसाख्ता याद आ रहे हैं: “तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जाना, कि खुशी से मर न जाते, गर एतबार होता.” आश्चर्य नहीं कि उत्तर प्रदेश के मतदाता इन सुनहरे वायदों और लुभावने तोहफों के बावजूद खुशी से मरना तो दूर, चुनावों को लेकर उनमें कोई उत्साह नहीं दिख रहा हैं.कारण यह कि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को चुनावी घोषणापत्रों के जन्नत की हकीकत अच्छी तरह से पता है. वे जानते हैं कि चुनावी वादे, वादे हैं और वादों का क्या? जैसे रात गई, बात गई. वैसे ही चुनाव गए, वादे गए. वायदों की जगह बहाने होंगे. कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाताओं के ऐसा सोचने के पीछे उनका अपना पुराना अनुभव है. वे इतनी बार छले जा चुके हैं कि उनका इन घोषणापत्रों में रत्ती भर भी विश्वास नहीं है. उन्हें यह एक मजाक की तरह लगता है. लेकिन इसके लिए और कोई नहीं, खुद ये राजनीतिक दल और उनके नेता जिम्मेदार हैं. वे खुद अपने घोषणापत्रों/विजन दस्तावेजों को लेकर गंभीर नहीं हैं.सच यह है कि अगर ये पार्टियां अपने चुनावी घोषणापत्रों को लेकर ईमानदार और गंभीर होतीं तो मतदाताओं से चाँद-सितारों के वायदे करने से पहले सौ बार सोचतीं. यही नहीं, इन घोषणापत्रों से इन पार्टियों की वैचारिक और राजनीतिक दरिद्रता का पता चलता है. इन घोषणापत्रों से लगता नहीं है कि उत्तर प्रदेश में वर्षों तक राज कर चुकी इन पार्टियों के पास प्रदेश की जमीनी समस्याओं और जरूरतों का कोई वास्तविक समाधान है. समाधान तो दूर, कड़वा सच यह है कि उन्हें उत्तर प्रदेश की वास्तविक समस्याओं और जमीनी जरूरतों का इल्म भी नहीं है. इससे पता चलता है कि ये पार्टियां वास्तविकता से कितनी कट चुकी हैं. असल में, लुभावने वायदे करके वे अपनी इसी दरिद्रता और हवाई चरित्र को छुपाने की कोशिश कर रही हैं. उनके विजन दस्तावेजों में दृष्टि (विजन) के अलावा सब कुछ है. अगर ऐसा नहीं होता तो प्राइमरी से लेकर यूनिवर्सिटी तक के छात्रों को मुफ्त में लैपटाप और टैबलेट कंप्यूटर बांटने का वायदा कर रही पार्टियां प्रदेश में सबसे पहले शिक्षा की बदतर स्थिति और स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों की बदहाल हालत को सुधारने का प्रस्ताव करतीं. यह किस से छुपा है कि प्रदेश में प्राइमरी से लेकर यूनिवर्सिटी तक की शिक्षा का क्या हाल है?लेकिन एक मायने में ये घोषणापत्र/विजन दस्तावेज और वायदे प्रदेश की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन की ओर भी इशारा कर रहे हैं. उस प्रदेश में जहां राजनीति जाति और धर्म के संकीर्ण अस्मितावादी दायरे में सिमट गई थी, जहां वोट के लिए लोगों की धार्मिक और जातीय अस्मिता का आह्वान काफी होता था, वहां सत्ता की दावेदार सभी पार्टियों को संकीर्ण अस्मितावादी दायरे से बाहर जाकर वायदे करने पड़ रहे हैं और घोषणापत्र/विजन दस्तावेज पेश करना पड़ रहा है.यह इस बात का संकेत है कि संकीर्ण अस्मितावादी राजनीति अपनी चमक खोने लगी है. लोगों की आकांक्षाएं और अपेक्षाएं जग चुकी हैं. राजनीतिक दलों को इसका अहसास है और उनपर इसका दबाव भी है.ये चुनावी वायदे उसी का नतीजा हैं. इन वायदों में कोई बुराई नहीं है. लेकिन असल सवाल यह है कि इन वायदों का वास्तविकता से कितना सम्बन्ध है, पार्टियां इन्हें लेकर कितना ईमानदार और गंभीर हैं और उन्हें लागू/पूरा करने के लिए उनके पास क्या योजना है? अफसोस की बात यह है कि इन सवालों के उत्तर में सिर्फ चुनावी शोर-शराबा है और मतदाताओं को एक बार और बेवकूफ बनाने की मंशा है.
साभार- तीसरा रास्ता Sunday, January 29, 2012
‘खास’ महिलाओं की कुछ ‘खास’ तस्वीरें...
इन दिनों अहमदाबाद में स्पेशल फोटोग्राफी का एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। बीएनपी पारीबाज द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी मंे प्रसिद्ध फोटोग्राफर्स द्वारा उतारी गई देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं नामी-अनामी महिलाओं की कई अद्भुत तस्वीरें शामिल हैं।24 जनवरी से 5 फरवरी तक चलने वाली ‘विमेन चैंजिंग इंडिया’ नामक इस प्रदर्शनी में कच्छ में हस्तकलाओं में पारंगत महिलाओं से लेकर मायानगर मुंबई में जीवन-निर्वाह के लिए जद्दोजहद कर रही महिलाओं की तस्वीरें हैं।
Saturday, January 28, 2012
गर्त में भारतीय क्रिकेट
सफलताओं के शिखर से भारतीय क्रिकेट टीम सीधे दुर्गति के ऐसे गर्त में गिर जाएगी, यह कल्पना से भी बाहर था। विदेश में लगातार सात टेस्ट मैचों में हार के बाद महेंद्र सिंह धोनी की टीम लगभग अपना पूरा गौरव गंवा चुकी है। पिछले वर्ष यह टीम टेस्ट क्रिकेट में नंबर एक और वनडे क्रिकेट के विश्व चैंपियन का ताज पहने इंग्लैंड पहुंची थी, तब आशाएं आसमान पर थीं कि भारत अब क्रिकेट की दुनिया पर वैसे ही राज करेगा, जैसा कभी क्लाइव लॉयड-विव रिचर्डस की वेस्ट इंडीज टीमों और स्टीव वॉ-रिकी पोंटिंग की ऑस्ट्रेलियाई टीमों ने किया। लेकिन वहां चारों टेस्ट में बुरी हार और अब ऑस्ट्रेलिया में लगातार तीन टेस्ट गंवाने के बाद दरपेश सवाल यह है कि क्या इस टीम में विदेशी पिचों पर खेलने की कुव्वत और जज्बा भी बचा है? अपने दिग्गज बल्लेबाज तेज आक्रमण के आगे विभ्रमित हैं और उन्हीं पिचों पर अपनी गेंदबाजी बेदम साबित हुई है। नतीजा है कि क्रिकेट में भारत के स्वर्ण युग का सपना फलीभूत होने से पहले ही चकनाचूर हो गया है। मशहूर खिलाड़ियों ने इन दोनों दौरों पर संघर्ष भावना के नितांत अभाव का परिचय देते हुए जिस तरह घुटने टेके हैं, उसके बाद उन्हें केंद्र में रखकर भविष्य की रणनीति बनाना कठिन महसूस होता है। टेस्ट क्रिकेट में टिकने के लिए जो सब्र और मानसिक कौशल चाहिए, वह धोनी की टीम में कम से कम अब तो नजर नहीं आता। यह अत्यधिक वन डे और टी-20 खेलने का परिणाम है या गैरी कस्र्टन का जाना रणनीति एवं तैयारी के लिहाज से टीम को महंगा पड़ा है अथवा लंबे कॅरियर तथा विश्वकप में जीत जैसी सफलता के बाद भारतीय खिलाड़ियों में यह अहसास समा गया है कि पाने के लिए कोई उपलब्धि अब बची नहीं है, यह आकलन का विषय है। लेकिन नतीजा यह है कि देश के क्रिकेट प्रेमी आज गहरी हताशा में हैं। क्या बीसीसीआई और चयनकर्ताओं के पास भारतीय क्रिकेट को फिर से खड़ा करने का कोई फॉमरूला है? या वे अब भी क्रिकेट के कारोबार में अपनी सफलता पर आत्ममुग्ध हैं?
जवानी की रेल चली जाए रे!
आज एक बार फिर से संगीतकार सी रामचंद्र की बात शुरू करने से पहले एक शख्स का ज़िक्र। इस शख्स का नाम है नंदकिशोर। मेरे मित्र हैं और कानपुर में रहते हैं। संगीत की अद्भुत दीवानगी है। इसी दीवानगी में न सिर्फ पूरे हिंदुस्तान में घूमते रहते हैं, बल्कि पाकिस्तान और इंग्लिस्तान तक भी चले जाते हैं। कोई धनी आदमी नहीं हैं, लेकिन जुनून के लिए पैसे की क्या ज़रूरत? सो जगह-जगह से दुर्लभ संगीत, दुर्लभ फिल्में इकट्ठा करते हैं और बिना किसी अपेक्षा के दोस्तों में बांट देते हैं। सी रामचंद्र पर अपनी बातचीत में पिछली बार एक इंटरव्यू से मैंने कुछ कोट किया था।
यह 1981 में बीबीसी पर महेंद्र कौल साहब का लिया हुआ इंटरव्यू है और उसकी डीवीडी मुझे भाई नंदकिशोर ने ही भेजी थी। इससे बड़ी मदद मिली। अब जैसे इस इंटरव्यू में सी रामचंद्र साहब की बातचीत सुनकर इस बात को बख़ूबी समझा जा सकता है कि उनके संगीत में इतनी मस्ती, इतनी बेपरवाही, इतनी उछाल क्यों है। बेपरवाही से मुराद बनी-बनाई लीक पर चलने से बेपरवाही। इसी वजह से सी रामचंद्र का संगीत लीक से हटकर है। इंटरव्यू के दौरान जिस तरह कुर्सी पर वे बैठते हैं। जिस तरह सवाल सुनते-सुनते ज़ोर-ज़ोर से हंसते चले जाते हैं। जिस तरह से बेख़ौफ, बिना किसी बात को छुपाने की कोशिश के, पूरी साफ़गोई से वे बात करते हैं। वो सब उनके और उनके संगीत के चरित्र को समझने में काफ़ी मददगार साबित होता है। अब जैसे ज़रा मिसाल के लिए बातचीत के कुछ और अंश सुनिए : आप किसी ख़ास औरत की वजह से प्रेरित हुए जिसकी वजह से आपने ऐसे गाने, ऐसी धुनें बनाईं? मैं इस पर बिलीव नहीं करता कि किसी से प्रेरित होने से..। मैं तो बच्चे को भी देखता हूं तो प्रेरित होता हूं। मैं भगवान को देखता हूं तो भी प्रेरित होता हूं। मैंने कभी-कभी खाना पेट भर को खाया तो भी प्रेरित होता हूं। कभी अच्छी विस्की पी तो भी प्रेरित होता हूं। अच्छा आप इस बात से इनकार कर सकते हैं कि आप में हवस नहीं है? बहुत है।
किसी लड़की से प्रेरित नहीं हुए? बहुत-बहुत हुए न। एक नहीं है। ऐसी बहुतसी हैं। आपके बारे में सुना है कि आपको किसी और से बहुत ह्रश्वयार था? था न। था बिल्कुल। वो क्या होता है न कि वो लाइफ के एक-एक फेज़ेज़ होते हैं। जब शादी की तो औरत के साथ था। जब तीन साल हो गए तो दूसरे के साथ हो गया। जब पांच साल हो गए तो और दूसरे के साथ हो गया। इससे आपको प्रेरणा मिलती है?
शायद मिलती होगी। मगर ये नहीं समझता कि एक ही चीज़ से ह्रश्वयार करने से प्रेरणा मिलती है। आइ डोंट थिंक।सी रामचंद्र जी, एक निजी बात पूछता हूं। क्या आपने भी कभी किसी मशरिक़ी जिसे पश्चिमी संगीत कहते हैं उसमें कभी चोरी करके किसी संगीत की रचना की है?
हां, हां की है। एक। एक ये गाना, ऐसे तो मैं इंस्पायर्ड हुआ हूं। बहुत-से गाने मेरे ऐसे हैं जो पश्चिमी संगीत से मैं इंस्पायर्ड हुआ हूं। मगर वैसे का वैसे नहीं लिया। पर एक गाना ऐसा है (हंसते हुए) क्योंकि मैं उसके ऊपर इंप्रूव कर ही नहीं सका, इसलिए ले लिया। (फिर हंसते हुए) एक था गाना, वो फ़िल्म ‘सरहद’ में था। वो एक दाग़ लग गया है मेरे ऊपर। मैं वो एक्सेह्रश्वट करने को तैयार हूं। मुझे उसमें कोई वो नहीं होता है। ‘आजा रे, आजा, लागे न मोरा जिया’।
(आशा भोसले)
इस सारी बातचीत के दौरान कमोबेश हर दूसरे तीसरे ल़ ज़ के बाद हंसी-ठहाके इस क़दर शामिल हैं कि यहां उन्हें पूरी तरह दर्ज कर पाना ज़रा मुश्किल काम है, लिहाज़ा आप इस बात से अंदाज़ लगाकर ख़ुद ही जोड़ लें।दूसरी बात। कौल साहब जिस महिला के साथ सी रामचंद्र के रिश्तों पर ज़ोर देना चाहते थे, उनका इशारा लता मंगेशकर की ओर है।
कहते हैं न - जैसे को तैसा मिला। सो साहब सी रामचंद्र थे - खाओ-पीयो करो आनंद और बाक़ी भुगते परमानंद टाइप के इंसान। सो उनको दोस्त भी मिले तो भगवान दादा, पीएल संतोषी, राजेंद्र कृष्ण, ओम प्रकाश जैसे मौला लोग। सो सब मिलके ऐसी धमाल लाईफ़ जीते थे कि इधर बताना शुरू करूं तो कमब़क्त अखा लाईफ इधर ही खलास हो जाएंगा। मतलब कहने की बात है, ऐसा होता थोड़े ही है। सो बेहतर है कि वापस पटरी पर आ जाएं।
‘सुखी जीवन’ हिट साबित हुई तो काम भी चल निकला। निर्माता-निदेशक जयंत देसाई के साथ लगातार तीन फ़िल्में ‘भक्त राज’ (1943), ‘मनोरमा’ (44) और ‘सम्राट चंद्रगुह्रश्वत’ (45) सिल्वर जुबिली हिट साबित हुईं। इस सफलता ने सी रामचंद्र के अंदर एक अजब-सा अहंकार का भाव भर दिया। हर सफलता के साथ वे दुर्भाग्यवश आत्ममुग्धता से भरते चले गए। भगवान दादा ने ‘सुखी जीवन’ के निर्माता से झगड़ा होने के बाद से ही बाहर की फ़िल्मों का निर्देशन बंद कर दिया था और सिर्फ़ अपनी ही फ़िल्मों का डायरेक्शन करने लगे थे। ये पूरी तरह स्टंट फ़िल्में होती थीं। इन फ़िल्मों में मास्टर भगवान, बाबूराव पहलवान और वसंतराव पहलवान की तिकड़ी होती थी, जो दर्शकों के बीच ज़बरदस्त लोकप्रिय थी। सी रामचंद्र का भगवान से याराना अटूट था तो अपनी सफलता से भी बहुत ह्रश्वयार था, सो वे इन स्टंट फ़िल्मों में अपना नाम बचाकर अण्णा साहेब के नाम से संगीत देते थे। एक दिन चर्चगेट के एक शराबख़ाने में दारू पीते हुए सी रामचंद्र ने कहा - देखो भग्गू, अब सोशल फ़िल्मों में मेरा काफ़ी नाम हो गया है। मेरे नाम पर, मेरे संगीत पर फ़िल्में बिकने लगी हैं। लेकिन मैं तुम्हें इस बात का लाभ नहीं दे पाता।’ यह अलग बात है कि इसी बात से प्रेरित होकर भगवान दादा ने फ़िल्म ‘अलबेला’ का निर्माण किया और एक इतिहास रच दिया, लेकिन इसी बात से सी रामचंद्र के चरित्र का एक पहलू भी उजागर होता है। सफलता का दंभ।
इसी दंभ के कारण आगे चलकर उन्हें अपने बहुत से दोस्त खोने पड़े और फिर संगीत में अपना मक़ाम भी खोना पड़ा। जीवन के लगभग अंतिम दस वर्ष उन्होंने बिना काम ख़ाली बैठकर शराब के सहारे ही गुज़ारे। और उसी तरह चले भी गए। ख़ैर, ये तो मैं बहुत आगे ही चला गया। अभी तो यह बताना था कि जयंत देसाई केएल सहगल को लेकर एक फ़िल्म बना रहे थे, तब सी रामचंद्र ने अपनी एक हज़ार रुपए करने की मांग की। देसाई उनकी तन ़वाह तीन सौ रुपए से बढ़ाकर छह सौ रुपए करने को तैयार हो गए और साथ ही प्रलोभन भी दिया कि सहगल के साथ काम करने का मौक़ा मिलेगा। अहंकार में डूबे अण्णा ने फरमाया - अगर सहगल,सहगल है तो मैं भी सी रामचंद्र हूं। ऐसे में सिवाय इसके हो ही क्या सकता था कि वे कंपनी से बाहर हो जाते। सो हो ही गए। इस अवसर पर गीतकार कवि प्रदीप ने उनका हाथ थामा और अपने साथ फ़िल्मिस्तान ले गए। फ़िल्मिस्तान में सितारा और भी चमका। फ़िल्में और गाने पहले से भी ज्यादा हिट होने लगे। बल्कि आज भी हिट हैं।‘कहके भी न आए तुम, अब छुपने लगे तारे’ (रफ़ी), ‘कभी याद करके, गली पार करके, चली आना हमारे अंगना’(बीनापानी मुखर्जी-चिल्लाकर ) जैसे गीतों के साथ फ़िल्मिस्तान की ‘सफ़र’ (1946) जब सिल्वर जुबिली हिट साबित हुई तो सी रामचंद्र ने उस दौर में अपने रुतबे के मुताबिक़शेवर्लेट कार ख़रीद ली।अगले साल फ़िल्मिस्तान की ‘शहनाई’(1947) में ह्रश्वयारेलाल संतोषी का साथ हुआ तो एक से एक हिट गीत निकलकर आए। ‘आना मेरी जान संडे के संडे, ‘जवानी की रेल चली जाए रे’(लता, गीता, चिल्लाकर ), ‘मार कटारी मर जाना, रे अखियां किसी से मिलाना ना’ (अमीर बाई) और ‘हमारे अंगना, बाजे शहनाई’ (अमीरबाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम)।
इस फ़िल्म के बाद से एक तिकड़ी बन गई। चिल्लाकर, संतोषी और लता की। लता मंगेशकर ने पहली बार सी रामचंद्र के लिए ‘शहनाई’ में ही गाया और उसके बाद सी रामचंद्र ने बाक़ी सबको भुलाकर सिर्फ़ लता की आवाज़ को ध्यान में रखकर ही संगीत रचने पर ज़ोर देना शुरू कर दिया। एक दूसरे के हुनर की क़द्रदानी के साथ-साथ दोनों के बीच एक बहुप्रचारित प्रेम-प्रसंग भी शुरू हुआ। ख़ूब चला और एक दिन सी रामचंद्र की ज़बान ने दिलों के रिश्ते को तोड़ भी दिया।वो क़िस्सा यूं है कि उस ज़माने में एक रिकॉर्डिस्ट होते थे जनाब बी एन शर्मा। मौसूफ़ की पहचान उनकी रिकॉर्डिग की क़ाबिलियत से भी ज्यादा उनकी गाली- गलौज वाली हरकत थी। चलते-फिरते हर गायक को ट्यूं-ट्यूं कर देते थे। और अपने मरहूम दोस्त नवीन सागर के अंदाज़ में कहूं तो सी रामचंद्र भी ‘टाकिंग तो लूज ही टाकिंग’ वाले ही थे।सो एक दिन ऐसा हुआ कि रिकार्डिग के बाद शर्मा और अण्णा बैठ गए दारू पीने। साथ में एक साजि़दा। फिर क्या, शर्मा का अस य उवाच आरंभ हुआ तो उसमें लता पर भी दस-पांच जड़ दीं। ख़ुमारी में डूबे अण्णा ने भी उसी सुर में औल-फौल बक डाला। दो के बीच तीसरा हो तो बात छुपती नहीं सो यहां भी नहीं छुपी। लता ने अण्णा को तो कुछ न कहा, सिर्फ फोन करके इतना भर कहा कि अब से वो शर्मा के साथ रिकॉर्डिग नहीं करेंगी। लिहाज़ा अगली कोई भी रिकॉर्डिग हो तो वे इस बात का ख़याल रखें।अब अण्णा तो अंग्रेज़ी वाला ‘.. बड़ा ईगो’ लेकर जीते थे। सो कह दिया - न को। अपुन का रिकॉर्डिग तो शर्मा के इधरीच होएंगा। सो बस हो गई कुट्टी। इस कुट्टी से अण्णा का बहुत नुक़सान हुआ। देखा, एक बार फिर कूद-फांद के आगे निकल आया। कितने करोड़ ख़ूबसूरत गानों की बात करनी थी और आ गया सीधे झगड़े पे। वंस मोर, एक्सयूज़ मी ह्रश्वलीज़। अगली बार, आज का छूटा सब कुछ बोलूंगा। मतलब द एंड तक की स्टोरी।
कैटरीना कैफ इन दिनों बॉलीवुड में लगातार सफलता अर्जित करती जा रही हैं| हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म 'अग्निपथ' में उनपर फिल्माए गए आईटम सॉन्ग चिकनी चमेली... ने हर तरफ धूम मचा दी है| वह हर अवार्ड फंक्शन में इस गाने पर थिरककर चर्चा बटोर रही हैं|इसके अलावा इस साल उनकी कई बड़े सितारों के साथ फिल्में रिलीज़ होंगी| कैट ने बॉलीवुड में यह मुकाम यूं ही नहीं हासिल किया है| उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत की| कैट को ग्लैमर वर्ल्ड से बहुत लगाव था इसलिए उन्होंने 16 साल की उम्र में ही मॉडलिंग शुरू कर दी थी| आज हम लेकर आये हैं उनके उसी दौरान की कुछ अनदेखी तस्वीरें|यह तस्वीरें तब की हैं जब कैट की उम्र पंद्रह-सोलह साल रही होगी| वह तब भी उतनी ही खूबसूरत लगती थीं जितनी आज लगती हैं|
Friday, January 27, 2012
इनकम टैक्स बचाने के 10 तरीके
इनकम टैक्स बचाने की प्लानिंग अगर आपने अभी तक नहीं की है तो अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। अब टैक्स प्लानिंग कर ही लें। इसके लिए कुछ निवेश करना होगा और अगर आप चाहें तो दान भी कर सकते हैं।
इनकम टैक्स कानून के मुताबकि टैक्स बचाने के लिए कुल निवेश एक लाख रुपए तक ही हो सकता है। यानी आप कितनी भी रकम कहीं भी लगाएं, टैक्स में छूट एक लाख रुपए तक के निवेश पर ही मिलेगी। याद रखिए भारत में हर इनकम के लिए टैक्स के स्लैब हैं और इनके अनुसार ही टैक्स लगता है लेकिन टैक्स में विभिन्न निवेशों के जरिये छूट की सीमा एक ही है। धारा 80 सी के तहत निवेशइनकम टैक्स कानून की धारा 80 सी के तहत छूट एक लाख रुपए तक के निवेश पर ही है।
टैक्स छूट के लिए निवेश का बेहतर तरीका हैपब्लिक प्रॉविडेंट फंड यानी पीपीएफ। भारत सरकार के सभी निवेश विकल्पों में यह सबसे अच्छा माना जाता है और इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि आपको पैसे निकलते समय टैक्स नहीं देना पड़ता है। इसमें ब्याज की दर बहुत बढ़िया है यानी 8.6 प्रतिशत और इसमें पूरे एक लाख रुपए तक निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा जीवन बीमा यानी लाइफ इंश्योरेंस के लिए भी दिए गए पैसे भी एक लाख रुपए की सीमा तक टैक्स छूट के हकदार हैं। पेंशन प्लानों के लिए दी गई रकम भी छूट की हकदार है। कर्मचारियों के लिए बनाई गई राष्ट्रीय पेंशन योजना में भी निवेश करके आप छूट के हकदार हो सकते हैं। म्युचुअल फंडों के इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम यानी ईएलएसएस में निवेश भी टैक्स में छूट दिला सकते हैं। इसमें 3 साल का लॉक इन पीरियड होता है और यह डायरेक्ट टैक्स कोड लागू होने के बाद खत्म हो जाएगा। राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र यानी नेशनल सेविंग्स स्कीम में भी निवेश करके आप टैक्स में छूट पा सकते हैं।
बैंकों मेंफिक्स्ड डिपॉजिटयानी एफडी के जरिये भी निवेश करके आप टैक्स में छूट पा सकते हैं। लेकिन याद रखिए यह एफडी कम से कम पांच साल की अवधि के लिए होनी चाहिए। हाउसिंग लोनको चुकाने में दिए गए मूल धन पर भी टैक्स में छूट मिलेगा। अगर आपने मकान की रजिस्ट्री कराई है तो उसमें भी टैक्स छूट है। बच्चों कीशिक्षा और ट्यूशन फी पर दी गई रकम भी आपको टैक्स से बचाती है। लेकिन यह सिर्फ दो बच्चों तक ही लागू होती है।
पोस्ट ऑफिस के जितने भी सेविंग्स स्कीमहैं उन सभी में पैसे लगाकर आप छूट के हकदार हो सकते हैं। धारा 80सीसीएफयह धारा कहती है कि अगर आपने मान्यता प्राप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर बांडों में निवेश किया है तो आपको अधिकतम 30,000 रुपए तक इनकम टैक्स में छूट मिलेगी। धारा 80 डी, के तहत मेडिकल इंश्योरेंस प्रीमियम पर खर्च की गई 35,000 रुपए तक की रकम टैक्स में छूट की पात्र होगी। लेकिन यहां एक पेंच है। अपने आप पर खर्च की गई रकम में सिर्फ 15,000 रुपए पर ही टैक्स में छूट मिलेगी जबकि सीनियर सिटिजन्स के मेडीक्लेम के लिए दिए गए प्रीमियम पर 20,000 रुपए तक की छूट है। यानी अगर आप अपने माता-पिता का मेडिकल इंश्योरेंस कराते हैं तो उस रकम पर भी छूट मिलेगी।
मकान बनाने वालों को टैक्स छूट हाउसिंग के लिए लोन पर दिए गए ब्याज पर भी टैक्स में छूट है और आप इस मद में डेढ़ लाख रुपए तक की छूट पा सकते हैं। यह सभी तरह की छूट के अतिरिक्त है।अगर आप इससे भी ज्यादा छूट चाहते हैं तो वह भी संभव है। यह संभव होगा ट्रस्ट या इस तरह की संस्थाओं को दान देकर। यानी अगर आप किसी धार्मिक संस्थान मसलन इस्कॉन या चैरिटेबल संस्थान जैसे रामकृष्ण आश्रम को दान देते हैं तो इस पर भी आपको छूट मिलेगी। इसके अलावा गंभीर रोगों के इलाज में खर्च पर इनकम टैक्स में छूट मिलती है। इसी तरह विकलांग व्यक्तियों को भी टैक्स में छूट मिलती है। इसके अलावा खिलाडियों, संगीतज्ञों, लेखकों वगैरह को भी इनकम टैक्स में छूट उपलब्ध है।
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