Friday, March 18, 2011


उर्दू मीडिया : औरत और कुदरत की अहमियत
जापान और भारत की अभी एक-सी हालत है। वहां प्राकृतिक आपदाओं ने और यहां एक छात्र की हत्या ने वैचारिक तूफान खड़ा कर रखा है। दोनों मुल्कों में इन घटनाओं की शिद्दत से समीक्षा हो रही है। कुदरत के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ और वक्त के मुताबिक बदलाव नहीं लाने से जुड़ी दोनों स्थितियां समाज की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। आदिम काल से औरत और प्रकृति के प्रति हमारे नजरिये और सोच में खास बदलाव नहीं आया है। दोनों का शोषण जारी है। रोजमर्रा की घटनाएं इसका बेहतर उदाहरण हैं।
ऐन महिला दिवस के रोज दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राधिका तंवर की सरेआम हत्या की घटना ऐसी ही मानसिकता की उपज है। उर्दू मीडिया में जापान का सैलाब और छात्र की हत्या से उभरे हालात छाए हुए हैं। औरत और कुदरत की अहमियत बताने-समझाने के लिए लेख और संपादकीय छापने का दौर जारी है। सभी सहमत हैं कि इनकी निगहबानी की जितनी जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की है, उससे कम समाज की नहीं है। अखबार चिंता जता रहे हैं कि औरतों और कुदरत को बचाने के लिए कड़े कानून और सजा के प्रावधान के बावजूद इनका शोषण थमने का नाम नहीं ले रहा। महिलाओं के मामले में उर्दू अखबारों की समझ है कि इन्हें जुल्म-ओ-सितम से बचाना तभी मुमकिन है, जब समाज और विशेषकर पुरुष उनको लेकर अपनी संवेदनशीलता दिखाएं। इस जज्बे की कमी की वजह से ही एक सिरफिरा राधिका को गोली मारकर भागने में सफल रहा।
यह घटना उदाहरण मात्र है। लगभग रोज ही देश के किसी न किसी खित्ते में ऐसी घटनाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं। उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं पर जुल्म नहीं थम रहे हैं। अखबारों को ऐसी घटनाओं के दिल्ली में रफ्तार पकड़ने पर भी आश्चर्य है। ‘हमारा मकसद’ कड़े शब्दों में कहता है, ‘दिल्ली पुलिस एक तरफ तो महिलाओं को राजधानी में किसी तरह का खतरा नहीं होने देने का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ सूबे की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित राजधानी में महिलाओं के  असुरक्षित होने पर चिंता जता रही हैं।
‘ख्वातीन के लिए महफूज नहीं दिल्ली’ में अखबार कहता है, तलवार दंपति का केस लड़ने वाली वकील की बुजुर्ग मां का कत्ल हो गया और किसी को कानो-कान खबर नहीं लगी। पटना से प्रकाशित ‘कौमी तंजीम’ में आबिद अनवर ने अपने लेख में औरतों के खिलाफ बढ़ते जुल्म पर चिंता जताई है। ‘जदीद खबर’ में सईदिया जीशान लिखती हैं, ‘आज औरतों का जलवा संयुक्त राष्ट्र से लेकर सड़क किनारे लगे होर्डिग तक बिखरा हुआ है। इसके बावजूद आधी दुनिया न तो घर में और न बाहर सुरक्षित है।’ ‘मुंसिफ’ में मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की डॉक्टर मेहरुन्निसा फिक्र जताती हैं, ‘महिलाओं की अहमियत बढ़ने के साथ पूरी दुनिया में इनके विरुद्ध हिंसा बढ़ी है।’ हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि उन्हें अब सगे भाई और रिश्तेदारों तक से खतरा महसूस होने लगा है।
वर्ष 1911 से महिला दिवस मनाने का दौर जारी है। इसका मूल उद्देश्य समाज को स्त्रियों के प्रति जागृत करना और उसे संवेदनशील बनाना है। यह अलग बात है कि इतने वर्षो के प्रयास के बावजूद माहौल में खास तब्दीली नहीं दिखाई दे रही है। ‘इंकलाब’, ‘ये दोहरा मेयार कब तक’ में कहता है कि कथनी और करनी के बीच का फर्क जब तक नहीं मिटेगा, भंवरी देवी, रुचिका और राधिका हिंसा का शिकार होती रहेंगी। इस समय देश की राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और प्रतिपक्ष की नेता महिला हैं। प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स ने यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को दुनिया की प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण सूबों में शासन की मुखिया औरतें हैं, फिर भी माहौल में बदलाव नहीं होना चिंता की बात है।
‘हमारा समाज’ ने बड़े तीखे अंदाज में सवाल उठाया है कि ‘क्या मान लिया जाए कि भ्रूण हत्या की घटनाएं इसलिए काबू में नहीं आ रही हैं, क्योंकि इनकी रोक-थाम का जिम्मा पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है।’ ‘रोजनामा हिन्दुस्तान एक्सप्रेस’ पुलिस के प्रति नरमी और समाज के प्रति गरमी दिखाते हुए लिखता है, ‘संगठित अपराध नहीं रोकने के लिए बेशक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां कठघरे में खड़ी की जा सकती हैं, पर कुंठित मानसिकता पर नजर तो समाज को ही रखना होगा।’ उर्दू अखबारों ने जापान में तबाही के लिए ‘सदी का सबसे बड़ा सैलाब’, ‘जापान में कयामत सागरी’, ‘जापान अब तक झेल चुका 195 बार सुनामी’ जैसे लेखों और रिपोर्टों में प्रकृति के साथ हद से ज्यादा छेड़छाड़ की नासमझी दिखाने को जिम्मेदार ठहराया है।  
मलिक असगर हाशमी
लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com

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