Thursday, March 31, 2011
Tuesday, March 29, 2011
Saturday, March 26, 2011
Saturday, March 19, 2011
क्या संदेश देता है होली का त्योहार
होली त्योहार है रंगों का। यह त्योहार है उत्साह व उमंग का। होली त्योहार है रिश्तों में मजबूती लाने का। बुराइयों को भुलाकर अच्छाइयों को याद करने का। इन सब बातों को ध्यान में रखकर जब हम होली का त्योहार मनाएं तो कुछ बातें और भी याद रखें और होली के त्योहार के पीछे छिपे संदेश को भी ग्रहण करें।
होली का उत्सव जीवन के लिए कई संदेश लेकर आता है। हम इनके पीछे छिपे अर्थों को समझें, ये जीवन में परिवर्तन और उत्साह लाता है। होली के दिन से ही वंसत का मौसम भी शुरु होता है। बसंत में पेड़ों पर नई कौंपलें फूटती हैं, पेड़ों पर फूल खिलते हैं, ऐसा लगता है जैसे प्रकृति शृंगार करती है, जब प्रकृति नया रूप धरती है तो मनुष्य भी उत्साहित हो जाता है। बसंत और होलिकोत्सव इन पर्वों में मूलत: प्रकृति के आनंद को महसूस किया जाता है।
होली के साथ केवल लकड़ी या गोबर के उपलों का दहन न करें। विद्वानों का कहना है कि हम होली के साथ नए संकल्प लें, उन्हें जीवन में उतारें और हमारी बुरी आदतों को होली के साथ ही जला दें। अगर हम एक साल में एक बुराई भी होली के साथ जलाते हैं, यानी उसे छोड़ते हैं तो कुछ ही सालों में हम पूर्णत: पवित्र हो सकते हैं।
होली त्योहार है रंगों का। यह त्योहार है उत्साह व उमंग का। होली त्योहार है रिश्तों में मजबूती लाने का। बुराइयों को भुलाकर अच्छाइयों को याद करने का। इन सब बातों को ध्यान में रखकर जब हम होली का त्योहार मनाएं तो कुछ बातें और भी याद रखें और होली के त्योहार के पीछे छिपे संदेश को भी ग्रहण करें।
होली का उत्सव जीवन के लिए कई संदेश लेकर आता है। हम इनके पीछे छिपे अर्थों को समझें, ये जीवन में परिवर्तन और उत्साह लाता है। होली के दिन से ही वंसत का मौसम भी शुरु होता है। बसंत में पेड़ों पर नई कौंपलें फूटती हैं, पेड़ों पर फूल खिलते हैं, ऐसा लगता है जैसे प्रकृति शृंगार करती है, जब प्रकृति नया रूप धरती है तो मनुष्य भी उत्साहित हो जाता है। बसंत और होलिकोत्सव इन पर्वों में मूलत: प्रकृति के आनंद को महसूस किया जाता है।
होली के साथ केवल लकड़ी या गोबर के उपलों का दहन न करें। विद्वानों का कहना है कि हम होली के साथ नए संकल्प लें, उन्हें जीवन में उतारें और हमारी बुरी आदतों को होली के साथ ही जला दें। अगर हम एक साल में एक बुराई भी होली के साथ जलाते हैं, यानी उसे छोड़ते हैं तो कुछ ही सालों में हम पूर्णत: पवित्र हो सकते हैं।
Friday, March 18, 2011
उर्दू मीडिया : औरत और कुदरत की अहमियत
जापान और भारत की अभी एक-सी हालत है। वहां प्राकृतिक आपदाओं ने और यहां एक छात्र की हत्या ने वैचारिक तूफान खड़ा कर रखा है। दोनों मुल्कों में इन घटनाओं की शिद्दत से समीक्षा हो रही है। कुदरत के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ और वक्त के मुताबिक बदलाव नहीं लाने से जुड़ी दोनों स्थितियां समाज की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। आदिम काल से औरत और प्रकृति के प्रति हमारे नजरिये और सोच में खास बदलाव नहीं आया है। दोनों का शोषण जारी है। रोजमर्रा की घटनाएं इसका बेहतर उदाहरण हैं।ऐन महिला दिवस के रोज दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राधिका तंवर की सरेआम हत्या की घटना ऐसी ही मानसिकता की उपज है। उर्दू मीडिया में जापान का सैलाब और छात्र की हत्या से उभरे हालात छाए हुए हैं। औरत और कुदरत की अहमियत बताने-समझाने के लिए लेख और संपादकीय छापने का दौर जारी है। सभी सहमत हैं कि इनकी निगहबानी की जितनी जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की है, उससे कम समाज की नहीं है। अखबार चिंता जता रहे हैं कि औरतों और कुदरत को बचाने के लिए कड़े कानून और सजा के प्रावधान के बावजूद इनका शोषण थमने का नाम नहीं ले रहा। महिलाओं के मामले में उर्दू अखबारों की समझ है कि इन्हें जुल्म-ओ-सितम से बचाना तभी मुमकिन है, जब समाज और विशेषकर पुरुष उनको लेकर अपनी संवेदनशीलता दिखाएं। इस जज्बे की कमी की वजह से ही एक सिरफिरा राधिका को गोली मारकर भागने में सफल रहा।
यह घटना उदाहरण मात्र है। लगभग रोज ही देश के किसी न किसी खित्ते में ऐसी घटनाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं। उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं पर जुल्म नहीं थम रहे हैं। अखबारों को ऐसी घटनाओं के दिल्ली में रफ्तार पकड़ने पर भी आश्चर्य है। ‘हमारा मकसद’ कड़े शब्दों में कहता है, ‘दिल्ली पुलिस एक तरफ तो महिलाओं को राजधानी में किसी तरह का खतरा नहीं होने देने का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ सूबे की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित राजधानी में महिलाओं के असुरक्षित होने पर चिंता जता रही हैं।
‘ख्वातीन के लिए महफूज नहीं दिल्ली’ में अखबार कहता है, तलवार दंपति का केस लड़ने वाली वकील की बुजुर्ग मां का कत्ल हो गया और किसी को कानो-कान खबर नहीं लगी। पटना से प्रकाशित ‘कौमी तंजीम’ में आबिद अनवर ने अपने लेख में औरतों के खिलाफ बढ़ते जुल्म पर चिंता जताई है। ‘जदीद खबर’ में सईदिया जीशान लिखती हैं, ‘आज औरतों का जलवा संयुक्त राष्ट्र से लेकर सड़क किनारे लगे होर्डिग तक बिखरा हुआ है। इसके बावजूद आधी दुनिया न तो घर में और न बाहर सुरक्षित है।’ ‘मुंसिफ’ में मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की डॉक्टर मेहरुन्निसा फिक्र जताती हैं, ‘महिलाओं की अहमियत बढ़ने के साथ पूरी दुनिया में इनके विरुद्ध हिंसा बढ़ी है।’ हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि उन्हें अब सगे भाई और रिश्तेदारों तक से खतरा महसूस होने लगा है।
वर्ष 1911 से महिला दिवस मनाने का दौर जारी है। इसका मूल उद्देश्य समाज को स्त्रियों के प्रति जागृत करना और उसे संवेदनशील बनाना है। यह अलग बात है कि इतने वर्षो के प्रयास के बावजूद माहौल में खास तब्दीली नहीं दिखाई दे रही है। ‘इंकलाब’, ‘ये दोहरा मेयार कब तक’ में कहता है कि कथनी और करनी के बीच का फर्क जब तक नहीं मिटेगा, भंवरी देवी, रुचिका और राधिका हिंसा का शिकार होती रहेंगी। इस समय देश की राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और प्रतिपक्ष की नेता महिला हैं। प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स ने यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को दुनिया की प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण सूबों में शासन की मुखिया औरतें हैं, फिर भी माहौल में बदलाव नहीं होना चिंता की बात है।
‘हमारा समाज’ ने बड़े तीखे अंदाज में सवाल उठाया है कि ‘क्या मान लिया जाए कि भ्रूण हत्या की घटनाएं इसलिए काबू में नहीं आ रही हैं, क्योंकि इनकी रोक-थाम का जिम्मा पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है।’ ‘रोजनामा हिन्दुस्तान एक्सप्रेस’ पुलिस के प्रति नरमी और समाज के प्रति गरमी दिखाते हुए लिखता है, ‘संगठित अपराध नहीं रोकने के लिए बेशक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां कठघरे में खड़ी की जा सकती हैं, पर कुंठित मानसिकता पर नजर तो समाज को ही रखना होगा।’ उर्दू अखबारों ने जापान में तबाही के लिए ‘सदी का सबसे बड़ा सैलाब’, ‘जापान में कयामत सागरी’, ‘जापान अब तक झेल चुका 195 बार सुनामी’ जैसे लेखों और रिपोर्टों में प्रकृति के साथ हद से ज्यादा छेड़छाड़ की नासमझी दिखाने को जिम्मेदार ठहराया है।
मलिक असगर हाशमी
लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com
Wednesday, March 16, 2011
मुस्लिम औरतों की दयनीय स्थिति : ज़रूरत है एक बी आपा की.......
महिलाएं चाहे जिस वर्ग, वर्ण, समाज की हों, सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, दमित हैं, पीड़ित हैं।
इनके उत्थान के लिए बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत की थी।
महात्मा गांधी ने देश के उत्थान को नारी के उत्थान के साथ जोड़ा था। मुस्लिम औरतों की स्थिति सबसे बदतर है।
पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाज-सेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में मकाम-बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं।
लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल इक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है,इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81
मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।
पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने ऐसा कहा था :
तुमने अगर इक मर्द को पढाया तो मात्र इक व्यक्ति को पढ़ाया। लेकिन अगर इक औरत को पढाया तो इक खानदान को और इक नस्ल को पढ़ाया।
लेकिन हुज़ूर का दामन नहीं छोड़ेंगे का दंभ भरने वाले अपने प्यारे महबूब के इस क़ौल पर कितना अमल करते हैं।
मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन की वजह हमेशा इस्लाम में ढूंढने की कोशिश की जाती रही है। इस्लाम कहता है , पिता या पति की सम्पति की उत्तराधिकारी वो भी है। वो अपनी से शादी कर सकती है. हां, मां-बाप की सहमति को शुभ माना गया है। उसे तलाक़ लेने का भी अधिकार है. विधवा महिला भी विवाह कर सकती है.अगर मुस्लिम महिला नौकरी या व्यवसाय करती है तो उसकी आय या जायदाद में उसके पिता, पति, पुत्र या भाई का कोई वैधानिक अधिकार हासिल नहीं रहता। साथ ही उसके भरण-पोषण का ज़िम्मा परिवार के पुरूष सदस्यों पर ही कायम रहता है। इसके अतिरिक्त भी कई सुविधाएं और अधिकार इस्लाम ने महिलाओं को दिए हैं जो इस बात के गवाह हैं कि उनके अनपढ़ रहने या पिछड़ेपन के लिए धर्म के नियम-कानून बाधक नहीं हैं।
इसके बावजूद उनकी हालत संतोषजनक कतई नहीं है. इसका मूल कारण पुरूष सत्तावादी समाज मुस्लिम महिलाओं के पिछड़ेपन की वाहिद वजह उनके बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार का न होना है। हर दौर में अनपढ़ को बेवकूफ बनाया गया है। असग़र अली जैसे चिंतक लिखते हैं] यह बहुत दुर्भाग्यजनक है कि हमारे उलेमा हर नई चीज का कटु विरोध करते हैं और बाद में अपने खुद के लाभ के लिए उसे स्वीकार कर लेते हैं. हम समय के साथ नहीं चलते और फिर समय हमें अपने साथ चलने के लिए मजबूर करता है, परंतु इस बीच हम अपनी जड़ता की कीमत चुका चुके होते हैं.
अनपढ़ रहकर जीना कितना मुहाल है, ये अनपढ़ ही जानते हैं। पढ़े-लिखों के बीच उठने-बैठने में, उनसे सामंजस्य स्थापित करने में बहुत कठिनाई दरपेश रहती है। मुस्लिम औरतों का इस वजह्कर चौतरफा विकास नहीं हो पाता। वो हर क्षेत्र में पिछड़ जाती हैं। प्राय:कम उम्र में उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद शरू होता है, घर-ग्रहस्ती का जंजाल। फिर तो पढ़ाई का सवाल ही नहीं। ग़लत नहीं कहा गया है कि पहली शिक्षक मां होती है। लेकिन इन मुस्लिम औरतों कि बदकिस्मती है कि वोह चाह कर भी अपने बच्चों को क ख ग या अलिफ़ बे से पहचान नहीं करा पातीं।
परदा-प्रथा इनके अनपढ़ रहने के कारणों में अहम है. ये कहना काफ़ी हद तक सही है. उसे घरेलु शिक्षा-दीक्षा तक सीमित कर दिया गया है.और ये शिक्षा-दीक्षा भी सभी को नसीब नहीं. पढ़ने ने के लिए महिलाओं को बाहर भेजना मुस्लिम अपनी तौहीन समझते हैं और इसे धर्म-सम्मत भी मानते हैं. हर मामले में धर्म को घसीट लाना कहां की अक्लमंदी है, जबकि इस्लाम के शुरूआती समय में भी औरतें घर-बहार हर क्षेत्र में सक्रीय रही हैं. इस्लाम में महिलाओं पर परदा जायज़ करार दिया तो है लेकिन इसका अर्थ कतई ये नहीं है कि चौबीस घंटे वो बुर्के में ढकी-छुपी रहें. बुर्का या नकाब का चलन तो बहुत बाद में आया. इस्लाम कहता है कि ऐसे लिबास न पहनो। जिससे शरीर का कोई भाग नज़र आ जाए या ऐसे चुस्त कपड़े मत पहनो जिससे बदन का आकार-रूप स्पष्ट हो अर्थात अश्लीलता न टपके। इसलिए पैगम्बर हज़रत मोहम्मद के समय औरतें सर पर चादर ओढ़ लिया करती थीं. कुरान में दर्ज है , पैगम्बर (हज़रत मोहम्मद) अपनी बीबियों, लड़कियों और औरतों से कह दो कि घर से बाहर निकलते वक्त अपने सर पर चादरें डाल लिया करें।
ईरान के चर्चित शासक इमाम खुमैनी ने भी बुर्का-प्रथा का अंत कर औरतों को चादर की ताकीद की थी.पैगम्बर के समय मुस्लिम औरतें जंग के मैदान तक सक्रीय थीं. लेकिन कालांतर में पुरूष-वर्चस्व ने उसे किचन तक प्रतिबंधित करने कि कोशिश की और काफ़ी हद तक कामयाबी भी हासिल कर ली। कई मुस्लिम देश ऐसे हैं जहां महिलाएं हर क्षेत्र में सक्रीय हैं. लेकिन विश्व कि सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले धर्म-निरपेक्ष तथा गणतंत्र भारत में उसकी स्थिति पिंजडे में बंद परिंदे की क्यों?
इसका जिम्मेदार मुल्ला-मौलवी और पुरूष प्रधान समाज ही नहीं स्वयं महिलाएं भी हैं जो साहस और एकजुटता का परिचय नहीं देतीं।
ज़रूरत है इक बी आपा की जिन्होंने अलीगढ में स्कूल कालेज की स्थापना की थी।
Star News Agency Se Liya Gaya Ye Important Article
भारतीय तिरंगे का इतिहास
"सभी राष्ट्रों के लिए एक ध्वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्ट करना पाप होगा। ध्वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान करता है।"
"हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, ज्यूस, पारसी और अन्य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्वज को मान्यता दें और इसके लिए मर मिटें।
- महात्मा गांधी
बिखरे पन्ने
हाँ वो बिखरे पन्ने
वो टुकड़े-टुकड़े
वो कतरे-कतरे
अहसासों के
जज्बातों के
उम्मीदों के
एक सपने से
फटे-पुराने
उजड़े-उजड़े
सोंधी सी खुशबू
से निखरे
बिखरे
पन्ने
हाँ वो बिखरे पन्ने
वो टुकड़े-टुकड़े
वो कतरे-कतरे
बिन मंजिल की राहों के
मुस्काती उन आहों के
जीवन भरी निगाहों के
भंवर फंसी सहराओं के
डूबे-डूबे
उलझे-उलझे
रेत से फिसले
दर्द से संवरे
यादों के चिंदे
बिखरे
पन्ने
हाँ वो बिखरे पन्ने
वो टुकड़े- टुकड़े
वो कतरे-कतरे
वो बिखरे पन्ने
हाँ वो बिखरे पन्ने
वो टुकड़े-टुकड़े
वो कतरे-कतरे
अहसासों के
जज्बातों के
उम्मीदों के
एक सपने से
फटे-पुराने
उजड़े-उजड़े
सोंधी सी खुशबू
से निखरे
बिखरे
पन्ने
हाँ वो बिखरे पन्ने
वो टुकड़े-टुकड़े
वो कतरे-कतरे
बिन मंजिल की राहों के
मुस्काती उन आहों के
जीवन भरी निगाहों के
भंवर फंसी सहराओं के
डूबे-डूबे
उलझे-उलझे
रेत से फिसले
दर्द से संवरे
यादों के चिंदे
बिखरे
पन्ने
हाँ वो बिखरे पन्ने
वो टुकड़े- टुकड़े
वो कतरे-कतरे
वो बिखरे पन्ने
Tuesday, March 15, 2011
Monday, March 14, 2011
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