Saturday, March 31, 2018

NCPUL न हुआ कबाड़खाना हो गया।



मेराज नूरी
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आजकल क़ौमी कौंसिल बराए फरोग ए उर्दू ज़बान यानी NCPUL के ताल्लुक़ से बड़े ही आला पैमाने पर एक बहस छिड़ी हुई है।सब लोग अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक उंगली डाल डाल कर घी निकालने की कोशिशों में मसरूफ दिखाई दे रहे हैं।लोगों की सुन सुन कर और पढ़ पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे ये कौंसिल न हुआ कबाड़खाना हो गया।ऐसा लगता है जैसे कौंसिल नें आलमी उर्दू कांफ्रेंस न किया बल्कि डांस प्रतियोगिता करा डाली जिसमें नचनियों (नाच करने वालों)को बुलाया गया उर्दू वालों (बड़े वाले)को नहीं बुलाया गया।लोग आर्टिकल पर आर्टिकल और बयान पर बयान ठोके जा रहे हैं।ये ना हुआ ये हो गया,उसे बुलाया उसे क्यों नहीं,वो इस लायक नहीं वो उस लायक़ नहीं।हर चंद के कायें कायें का शोर है।गोश्त के टुकड़े नुमा कौंसिल है और ऊपर मंडराते चील कौए।सभी अपनी अपनी (उर्दू का दम भरने वाली) तिरछी नज़र से कौंसिल को उचक लेने की फिराक में है।आज अचानक एक भीड़ को लगने लगा कि कौंसिल में फलां ग़लत हो रहा है,ढिमका ग़लत हो रहा है।बड़े ही शातिराना अंदाज़ में ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि एक खास शख़्श की वजह से ही ये सब हो रहा है।अरे कमाल है।ये नहीं हो रहा वो नहीं हो रहा ।क्या नहीं हो रहा है।सब कुछ तो हो रहा है।छोटी छोटी ग़लतियाँ होती रहती हैं लेकिन इसका ये मतलब थोड़े ही होता है कि आप किसी को सिरे से खारिज कर दो।किसी को महज चंद एक कमी की वजह से कटघरे में खड़ा कर दो।
आजतक तथाकथित उर्दू के खिदमत गुज़ारों पर ही तो मेहरबान थी कौंसिल और है भी।क्या आजतक उर्दू के खादिमों को कुछ नही दिया कौंसिल ने।क्या आज किताबें नही छप रही हैं,क्या किताबों को ग्रांट नही मिल रहा है,क्या सेमिनार नही हो रहे है,क्या कंप्यूटर सेंटर नहीं चल रहे हैं।सब कुछ तो हो ही रहा है।क्या कमी रह गयी भाई।इससे पहले ऐसा क्या था जो अब नहीं है।या जिसे इस डाइरेक्टर ने खत्म कर दिया।क्या ऐसा मिल रहा था जो अचानक बंद हो गया।कमाल है।आजतक इस पैमाने पर उर्दू वाले हज़रात कहीं नहीं दिख रहे थे।अलग अलग मंच से जितने उर्दू वाले अपनी भड़ास निकाल रहे हैं या पर्सनल टारगेट कर रहे हैं उनमें ज़्यादा तर वैसे हैं जिन्होंने पहले खूब मलाई खाई है इसी कौंसिल के सहारे।उर्दू उर्दू करके सबने खूब उड़ाई हैं और पूंजी बनाई हैं।अब अगर नहीं बन पा रहा है तो प्रॉब्लम।खैर होना भी चाहिए।मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा है कि कौंसिल और उसके कर्ता धर्ता को कोसने वाले लोगों में क्या कोई ऐसा नहीं जो उसके गलत फैसले और कारनामे को हुकूमत तक पहुंचा सके ।कोई इस लायक नहीं है क्या।है ।लेकिन वो नही जाएंगे क्योंकि वो भी तो मलाई खा चुके हैं और खा रहे हैं उर्दू का ढोल पिट पिट कर।सवाल ये है कि क्या कोई इस क़दर खुदमोख्तार है कि कुछ भी कर सकता है जैसा कहा जा रहा है।क्या कौंसिल बेलगाम है।क्या उसके डायरेक्टर उसे अपनी प्रॉपर्टी समझ कर इस्तेमाल कर रहे हैं।नहीं,बिल्कुल नहीं।क्योंकि कौंसिल की गवर्निंग बॉडी है,मिनिस्ट्री है,सरकार है उसके ऊपर।क्या सभी अंधे और गूंगे हैं।क्या उन्हें सब कुछ नज़र नही आता।उन्हें सब कुछ नज़र आता है और ज़ाहिर है सब की नज़र भी होगी।अगर वाक़ई कुछ गड़बड़ और ग़लत होता तो कोई न कोई नोटिस ज़रूर लेता।
बात दर असल सिर्फ और सिर्फ """ मैं"""और ""हम""" की है।कुछ लोगों को लगता है कि मैं ही हूँ जो हूँ और हमारे बग़ैर न कोई कौंसिल,न उर्दू ,न फलां ढिमका।खुदा खैर करे।

Wednesday, March 28, 2018

बिहार दंगे:2019 के लिए भाजपा की शरुआत

मेराज नूरी
कुछ ही दिनों पहले जब ये खबर आई कि बिहार सरकार ने राज्य के नए पुलिस महानिदेशक के तौर पर के एस द्विवेदी का मनोनयन किया है तो उसी वक़्त अंदाज़ हो गया था कि भविष्य में क्या होने वाला है ।भजपानीत नीतीश कुमार के सरकार के इस फैसले की सभी ने आलोचना भी की थी लेकिन संघ और भाजपा के दबाव में नीतीश कुमार  को ये करना पड़ा।दरअसल, 1989 में जब के एस द्विवेदी भागलपुर के एसपी पद पर तैनात थे तब भागलपुर में भीषण दंगा हुआ था। इस दंगे में करीब एक हजार लोगों की जान चली गई थी। तब आरोप लगे थे कि तत्कालीन एसपी के एस द्विवेदी ने न सिर्फ दंगों पर काबू पाने में कोताही बरती थी बल्कि दंगा भड़काने में भी अहम भूमिका निभाई थी।ये बात न किसी से ढकी छुपी है और ना ही कोई इससे इनकार कर सकता है।बताया जाता है कि वे आरएसएस के एजेंट के रूप में काम कर थे और उनके इशारे पर पूरी भागलपुर पुलिस भी हिन्दू-मुसलमान में बंट चुकी थी। इस क्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने के एस द्विवेदी को हटाने का निर्देश दिया। इसका प्रतिरोध भागलपुर में कुछ लोगों ने इस कदर किया कि जब राजीव गांधी दंगे का जायजा लेने पहुंचे तब उन्हें भागलपुर शहर में घुसने तक नहीं दिया गया।इन आरोपों की जांच के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा ने हाईकोर्ट के तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई थी। इस कमेटी के दो सदस्यों ने संयुक्त रिपोर्ट में एसपी द्विवेदी के खिलाफ टिप्पणी की थी।
आज जब वही द्विवेदी बिहार पुलिस के मुखिया बन कर अवतरित हुए तो फिर से बिहार में भागलपुर रूपी तांडव की शरुआत हो चुकी है।आज बिहार में चारों तरफ दंगों का खौफ है।हर जगह दंगाई बेकाबू हैं और एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है।धार्मिक स्थलों,मकानों और दुकानों को आग के हवाले किया जा रहा है।ये सब उन्ही द्विवेदी जी और उनकी पुलिस के सामने बेखौफ हो रहा है और पुलिस ख़ामोश तमाशाई ही नहीं है बल्कि वो उस तांडव में अपनी भूमिका भी निभा रही है।सैंकड़ों तस्वीर और वीडियो इसकी गवाही दे रहे हैं।भागलपुर,समस्तीपुर,औरंगाबाद और गया के अलावे दर्जनों जगह पर दंगाई बेकाबू होकर शासन,सामाजिक तानाबाना और इंसानियत की धज्जियां उड़ा रहे है।
इन सब का एक दूसरा पहलू भी है।वो ये कि ये सब न ही  मात्र संयोग है और न ही अचानक होने वाले कुकृत्य।ये सब एक साजिश और षड्यंत्र के तहत किया जा रहा है।एक प्रचलित मान्यता है कि दंगे आम तौर पर चुनाव के आस-पास भड़कते हैं या भड़काए जाते हैं।ऐसे दंगों के राजनीतिक मायने होते हैं ।समाज में धार्मिक वैमनस्य बढ़ा कर उसे धर्म के आधार पर बांटना ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो सके।राम नवमी के दौरान इस बार जिस तरह से बिहार में दंगे भड़के हैं उससे ये बखूबी अंदाज़ लगाया जा सकता है कि दंगे क्यों हो रहे हैं,कौन करवा रहा है और किसको इसका राजनीतिक लाभ लेना है।
दरअसल संघ और भाजपा को इस बात का बखूबी अंदाजा लग चुका है कि उत्तर भारत खासतौर से बिहार,बंगाल और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में अब उसकी दाल आसानी से गलने वाली नहीं है।2014 के चुनाव में तथाकथित विकास और अच्छे दिन का नारा लगाकर जीत हासिल करने वाली पार्टी को अब वो समर्थन नहीं मिलेगा।इस लिए संघ और भाजपा अपनी पुरानी राह पर अग्रसर है।जिस तरह से 2014 से पहले पश्चमी उत्तरप्रदेश में दंगों का खेल खेला गया था उसी प्रकार से अब बिहार को जलाने की कोशिश शरू हुई है ताकि इस आग में 2019 कई रोटी सेंकी जा सके।

Thursday, March 1, 2018

होली का गंगा जमुनी पैग़ाम।

मेराज नूरी
ऐसे माहौल में जबकि आज भारत में चारों तरफ एक संकीर्ण सोच और निर्लज अंतरात्मा के सहारे यहां की गंगा जमुनी तहजीब को खण्ड विखंड करने की कोशिशें जारी हैं होली का ये पर्व यक़ीनन इस माहौल में अमन और शांति,भाईचारा और सद्भाव को साकार करने में मददगार साबित होगा।
ज़ाहिरी तौर पर इसे एक धर्म विशेष के पर्व के तौर पर देखा जाता है और मनाया जाता है लेकिन इतिहास और भाईचारे की किताब पलटने के बाद ये मिथक न सिर्फ टूट जाता है बल्कि इस पर्व के सर्वधर्म स्वीकार और हर्षोल्लाश के साथ मनाए जाने की परंपरा का ऐसा ज्ञान प्राप्त होता है कि जिससे भारत के संवैधानिक चरित्र यथा हिन्दू,मुस्लिम,सिख और ईसाई के परस्पर प्रेमपूर्वक रहने की गाथा को बल प्रदान होता है।
कहते है कि राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक  है।राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।
इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
इन सब के इतर सूफी संतों के इस देश में ये भी इतिहास में दर्ज है कि जिस शिद्दत और जोश व जज़्बे से हमारे हिन्दू भी इस पर्व को मनाते हैं या मनाते आए हैं उसी जोश और जज़्बे से यह के मुसलमानों ने भी इस में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है।सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।
अतीत में सूफी और भक्ति आंदोलनों ने भी दोनों समुदायों के बीच मेलजोल को बढ़ावा दिया था।अपनी बहुचर्चित और सर्वधर्म में प्रेम और भाईचारे का दीप जलाने वाली किताब ""आलम में इंतिखाब: दिल्ली ""में समाज सेवा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1972 में पद्म भूषण से सम्मानित महेश्वर दयाल लिखते हैं:‘होली एक पुराना हिंदुस्तानी त्यौहार है जो हर कोई खेलता है चाहे वह पुरुष हो या महिला. चाहे वह किसी भी धर्म और जाति का हो।भारत में आने के बाद मुसलमान भी जोश से होली खेलने लगे चाहे वह कोई बादशाह हो या फकीर।'
13वीं सदी में हुए अमीर खुसरो (1253-1325) ने होली के त्यौहार पर कई छंद लिखे हैं:
खेलूंगी होली, ख्वाजा घर आए
धन धन भाग हमारे सजनी
ख्वाजा आए आंगन मेरे
मुगल सम्राट अकबर ने भी सांस्कृतिक मेल-जोल और सहिष्णुता को बढ़ावा दिया था ।अकबर के राज में सभी त्यौहार उत्साह के साथ मनाए जाते थे और यह परंपरा आने वाले शहंशाहों के समय भी जारी रही।
16वीं सदी में इब्राहिम रसखान (1548-1603) ने लिखा:
आज होरी रे मोहन होरी
कल हमरे आंगन गारी दे आयो सो कोरी
अब क्यों दूर बैठे मैय्या ढ़िंग, निकसो कुंज बिहारी
तुजुक-ए-जहांगीर में जहांगीर (1569-1627) ने लिखा है:उनका (हिंदुओं का) जो होली का दिन है, उसे वे साल का आखिरी दिन मानते हैं ।इसके एक दिन पहले शाम को हर गली-कूचे में होली जलाई जाती है। दिन में वे एक दूसरे के सिर और चेहरे पर अबीर लगाते हैं।
इतिहास में दर्ज है कि रात को लाल किले में होली का बड़ा जश्न होता था।रात भर नाच-गाना चलता ।देश के अलग-अलग हिस्सों से मशहूर तवायफों का भी इस मौके पर आना होता था ।इस मौके पर स्वांग करने वालों के झुंड शाहजहांबाद में जगह-जगह घूमते और दरबारियों और अमीरों के घरों में जाकर उनका मनोरंजन करते।रात को शहर मे महफिलें सजती थीं। क्या सामंत, क्या दरबारी और क्या कारोबारी, सभी इनमें जुटते और खूब जश्न मनाते थे।
कुल मिलाकर कर ये कहा जा सकता है की ये पर्व न सिर्फ रंगों की अठखेलियों के सहारे जश्न मनाने का नाम है अपितु आपसी सौहार्द और भाईचारे को बढ़ावा देने और मुहब्बत को आम करने का एक सर्वमान्य मौक़ा है।ज़रूरत इस बात की है कि इस पर्व के गर्भ में समाए मोहब्बत और भाईचारे के पैग़ाम को सार्थक करके आज की द्वेषपूर्ण और नफरत को बढ़ावा देने वाली तथाकथित मुठ्ठीभर ताक़तों को एक ऐसा पैग़ाम दिया जाए कि उनकी चंद एक बेमानी हरकत इस देश की सदियों पुरानी परंपरा और तहज़ीब को नुकसान नहीं पहुंचा सकती। हमारा देश अपनी सदियों पुरानी सर्वधर्म स्वीकार्य वाली सभ्यता को जिंदा रखने में कामयाब रहे बस यही दुआ है।देश वासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
(merajmn@gmail.com)


सुशासन की त्रासदी

मेराज नूरी -------------- बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और...