मेराज नूरी
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आजकल क़ौमी कौंसिल बराए फरोग ए उर्दू ज़बान यानी NCPUL के ताल्लुक़ से बड़े ही आला पैमाने पर एक बहस छिड़ी हुई है।सब लोग अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक उंगली डाल डाल कर घी निकालने की कोशिशों में मसरूफ दिखाई दे रहे हैं।लोगों की सुन सुन कर और पढ़ पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे ये कौंसिल न हुआ कबाड़खाना हो गया।ऐसा लगता है जैसे कौंसिल नें आलमी उर्दू कांफ्रेंस न किया बल्कि डांस प्रतियोगिता करा डाली जिसमें नचनियों (नाच करने वालों)को बुलाया गया उर्दू वालों (बड़े वाले)को नहीं बुलाया गया।लोग आर्टिकल पर आर्टिकल और बयान पर बयान ठोके जा रहे हैं।ये ना हुआ ये हो गया,उसे बुलाया उसे क्यों नहीं,वो इस लायक नहीं वो उस लायक़ नहीं।हर चंद के कायें कायें का शोर है।गोश्त के टुकड़े नुमा कौंसिल है और ऊपर मंडराते चील कौए।सभी अपनी अपनी (उर्दू का दम भरने वाली) तिरछी नज़र से कौंसिल को उचक लेने की फिराक में है।आज अचानक एक भीड़ को लगने लगा कि कौंसिल में फलां ग़लत हो रहा है,ढिमका ग़लत हो रहा है।बड़े ही शातिराना अंदाज़ में ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि एक खास शख़्श की वजह से ही ये सब हो रहा है।अरे कमाल है।ये नहीं हो रहा वो नहीं हो रहा ।क्या नहीं हो रहा है।सब कुछ तो हो रहा है।छोटी छोटी ग़लतियाँ होती रहती हैं लेकिन इसका ये मतलब थोड़े ही होता है कि आप किसी को सिरे से खारिज कर दो।किसी को महज चंद एक कमी की वजह से कटघरे में खड़ा कर दो।
आजतक तथाकथित उर्दू के खिदमत गुज़ारों पर ही तो मेहरबान थी कौंसिल और है भी।क्या आजतक उर्दू के खादिमों को कुछ नही दिया कौंसिल ने।क्या आज किताबें नही छप रही हैं,क्या किताबों को ग्रांट नही मिल रहा है,क्या सेमिनार नही हो रहे है,क्या कंप्यूटर सेंटर नहीं चल रहे हैं।सब कुछ तो हो ही रहा है।क्या कमी रह गयी भाई।इससे पहले ऐसा क्या था जो अब नहीं है।या जिसे इस डाइरेक्टर ने खत्म कर दिया।क्या ऐसा मिल रहा था जो अचानक बंद हो गया।कमाल है।आजतक इस पैमाने पर उर्दू वाले हज़रात कहीं नहीं दिख रहे थे।अलग अलग मंच से जितने उर्दू वाले अपनी भड़ास निकाल रहे हैं या पर्सनल टारगेट कर रहे हैं उनमें ज़्यादा तर वैसे हैं जिन्होंने पहले खूब मलाई खाई है इसी कौंसिल के सहारे।उर्दू उर्दू करके सबने खूब उड़ाई हैं और पूंजी बनाई हैं।अब अगर नहीं बन पा रहा है तो प्रॉब्लम।खैर होना भी चाहिए।मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा है कि कौंसिल और उसके कर्ता धर्ता को कोसने वाले लोगों में क्या कोई ऐसा नहीं जो उसके गलत फैसले और कारनामे को हुकूमत तक पहुंचा सके ।कोई इस लायक नहीं है क्या।है ।लेकिन वो नही जाएंगे क्योंकि वो भी तो मलाई खा चुके हैं और खा रहे हैं उर्दू का ढोल पिट पिट कर।सवाल ये है कि क्या कोई इस क़दर खुदमोख्तार है कि कुछ भी कर सकता है जैसा कहा जा रहा है।क्या कौंसिल बेलगाम है।क्या उसके डायरेक्टर उसे अपनी प्रॉपर्टी समझ कर इस्तेमाल कर रहे हैं।नहीं,बिल्कुल नहीं।क्योंकि कौंसिल की गवर्निंग बॉडी है,मिनिस्ट्री है,सरकार है उसके ऊपर।क्या सभी अंधे और गूंगे हैं।क्या उन्हें सब कुछ नज़र नही आता।उन्हें सब कुछ नज़र आता है और ज़ाहिर है सब की नज़र भी होगी।अगर वाक़ई कुछ गड़बड़ और ग़लत होता तो कोई न कोई नोटिस ज़रूर लेता।
बात दर असल सिर्फ और सिर्फ """ मैं"""और ""हम""" की है।कुछ लोगों को लगता है कि मैं ही हूँ जो हूँ और हमारे बग़ैर न कोई कौंसिल,न उर्दू ,न फलां ढिमका।खुदा खैर करे।


