Thursday, December 13, 2012
Saturday, December 8, 2012
माया और मुलायम ने बचाया
देश में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता उस समय साफ हो गया जब विपक्षी पार्टियों का इसके खिलाफ प्रस्ताव राज्य सभा में भी गिर गया.शुक्रवार को हुए मत विभाजन में सरकार के पक्ष में 123 वोट थे जबकि उसके खिलाफ 109 वोट रहे. यानी केवल 109 सदस्यों ने एफडीआई के खिलाफ विपक्ष के प्रस्ताव के हक में मतदान किया.सरकार का काम आसान किया उसकी सहयोगी पार्टियों बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने हालांकि यह दोनों पार्टियां एफडीआई का विरोध करती आई हैं.लोक सभा की तरह राज्य सभा में भी समाजवादी पार्टी ने वॉक आउट किया.वैसे यह गुरुवार को ही लगभग तय हो गया था कि सरकार को इस मत विभाजन में कोई मुश्किल पेश नहीं आएगी.सरकार को उस समय राहत मिली थी जब बसपा प्रमुख मायावती ने एफ़डीआई के मुद्दे पर बहस के दौरान कहा था कि वो सरकार के समर्थन में मतदान करेगी.मायावती ने यह तर्क दिया था कि राज्य सरकारों के पास अधिकार है कि वे इसे लागू करें या ना करें.इससे पहले बुधवार को लोक सभा में भी सरकार ने मतदान जीता था.
Friday, December 7, 2012
21/11 वन्दे मातरम्
Kalpesh Yagnik
यह 21/11 है। वह 26/11 थी। यह सारे राष्ट्र, सभी भारतीयों की आंखों में चमक का दिन है। वह मुंबई से आरंभ हो, सारे देश की आंखों में रोष या आंसू का दिन था। यह आतंक के विरुद्ध युद्ध की विजय का पल है। वह मानवता के विरुद्ध कलुषित कृत्य था। यह 'स्टेट पावर’ यानी सरकार, हम लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार की ताकत और इच्छाशक्ति के खुलकर सामने आने का प्रतीक है। वह सरकारी तंत्र की नाकामी और आपराधिक लापरवाही का लहूलुहान करने वाला परिणाम था।यह न्याय का उजला दिन है। वह अन्याय की काली रात थी। अर्थात् सबकुछ एकदम पूरी तरह अलग। उल्टा। दिनरात, धरती-आसमान जैसा अंतर। जबकि : यह भी कांग्रेस-आधारित यूपीए की सरकार है। वह भी यही थी। प्रधानमंत्री भी यही, डॉ. मनमोहन सिंह थे। 21/11 को दृढ़ता दिखाई। 26/11 को कमजोरी सामने आई। तो क्या अब इस तरह के रुदन का समय है?नहीं। समय यह ढूंढऩे का भी नहीं है कि कांग्रेस ने यह चुनावी फायदे के लिए किया। गुजरात चुनाव को ध्यान में रखकर तत्काल किया। या मध्यावधि चुनाव हो जाएं, इसलिए भ्रष्टाचार का मुद्दा दबाने के लिए किया। यह तो नया समय है। नई सोच का समय। नए लक्ष्य का समय। यह गर्व का समय चार साल बाद आया। बहुत अधिक है। बहुत ही। इसलिए नहीं कि हमारी न्याय व्यवस्था लंबी है। जटिल है। किन्तु इसलिए कि हमारा लक्ष्य स्पष्ट नहीं है।सरकार का लक्ष्य कुछ और। कानून के रखवालों का कुछ और। खुफिया तंत्र तो मानो बना ही विफल रहने के लिए है। बच जाती हैं आतंकी हमलों और उसके बाद उपजी शंका के आतंक से उठने वाली निर्दोष आहें। उन परिवारों की जिन्होंने न जाने किस पाकिस्तानी कोने में ली गई किसी कायराना कसम के बदले अनजाने में अपनी जिंदगी के महकते हिस्से खो दिए। इसलिए कर कानूनी कार्रवाई में बहुत तेजी आनी चाहिए।न्याय प्रक्रिया नहीं, हमारा नेतृत्व लचर है। हमें लाचार बना देता है। किन्तु आज अवसर है। विध्वंस के विरुद्ध, आगे बढक़र युद्ध छेडऩे का। क्योंकि कुछ अवसर ही ऐसे होते हैं जो न केवल एक इतिहास बना जाते हैं, वरन एक नया इतिहास बनाने की झलक भी दिखला जाते हैं। बशर्ते हम उस अवसर को पहचान लें। थाम लें। हृदय में उतार लें।21/11 आगे आने वाली पीढिय़ों के लिए ऐसा ही एक ऐतिहासिक अध्याय है। 26/11 को हुए भयावह रक्तपात के बाद जब हर कानूनी कार्रवाई, हर अदालत को पार कर सुप्रीम कोर्ट तक की मुहर लग गई, तब भी समूचा देश यह मानने को राजी नहीं था कि आतंक के इस जीवित आकार को कभी फांसी वास्तव में दी जा सकेगी। यह दयनीय स्थिति है। यानी हमारा, हमारी पुलिस, अदालत और हर तरह की व्यवस्था में अविश्वास इस कदर बढ़ चुका है कि हम सामान्य बात भी नहीं मानते। जब सुप्रीम कोर्ट ने फांसी दी है तो होगी ही। इसमें इतने गर्व, इतना आश्चर्य और इतनी प्रशंसा की बात ही क्या है? निश्चित है। इसलिए है कि एक अफजल गुरु सामने है। जिंदा। खूब जिंदा। अफजल को ही क्यों लें, राजीव गांधी के हत्यारे देखें। तीनों बने हुए हैं।
(नेशनल एडिटर दैनिक भास्कर समूह)
'खिलाड़ी 786'
बहुत दिनों से अक्षय कुमार एक हिट फिल्म की स्क्रिप्ट की तलाश में थे, पर किस्मत उनका साथ नहीं दे रही थी.यूं भी बढ़ती उम्र की वजह से अब वो रोमांटिक किरदारों के लिए तो अनफिट होते ही जा रहे हैं क्योंकि उम्र का असर उन पर दिखने लगा है.फिर दबंग, सिंघम, बॉडीगार्ड और राउडी राठौर जैसी एक्शन फिल्मों की कामयाबी के बाद उन्हें अपनी सोई हुई 'खिलाड़ी सीरीज़' को फिर से जगाने का ख़्याल आया. और ऐसे शुरू हुई 'खिलाड़ी 786' की तैयारी.फिल्म में खिलाड़ी अक्षय कुमार की वापसी के साथ-साथ एक और शख़्स की वापसी हुई है. और वो हैं बतौर कलाकार हिमेश रेशमिया.जी हां, फिल्म में कहानीकार, संगीतकार और सह-निर्माता की भूमिका निभाने के साथ-साथ वो एक ख़ास भूमिका में भी है.जैसा कि हाल के कुछ समय में रिलीज़ हुई 100 करोड़ रुपए कमाने वाली फिल्मों में तर्क को किनारे पर रखकर बेसिर-पैर की कहानी परोसी गई है, कुछ वैसा ही प्रयास इस फिल्म में दिखता है.कहानी के नाम पर बस जैसे-तैसे करके ताना-बाना बुन दिया गया है.अक्षय कुमार फिल्म में लूट-मार करते हैं लेकिन उनका किरदार कुछ रॉबिन हुड सरीखा है. क्योंकि वो लूटा हुआ माल ग़रीबों में बांट देता था. वो लात घूंसे मारकर गुंडों को हवा में उड़ाता है और भला आदमी बनकर लोगों का दिल जीत लेता है.क्या आप अभी से जम्हाई लेने लगे हैं. ज़रा ठहरिए. यहां पर एंट्री होती है इंदु (असिन) जो एक गैंग लीडर टीटी भाई (मिथुन चक्रवर्ती) की बहन है और अपने प्रेमी (राहुल सिंह) की चाहत में हर अच्छा रिश्ता ठुकराती जाती है.कहानी में पदार्पण होता है मैरिज एजेंट मनसुख लाल (हिमेश रेशमिया) का जो टीटी भाई की बहन यानी इंदू की शादी बहत्तर सिंह यानी खिलाड़ी 786 (अक्षय कुमार) से कराने की ठान लेता है.वो एक चाल चलता है जिसमें टीटी भाई, बहत्तर सिंह, उसके पिता सत्तर सिंह (राज बब्बर) और चाचा इकहत्तर सिंह ( मुकेश ऋषि) को फंसाता है.अगर आप फिल्म के टाइटल में 'खिलाड़ी' शब्द सुनकर पुराने अक्षय कुमार की खोज में जा रहे हैं तो ये 'खिलाड़ी 786' आपको बुरी तरह से निराश करेगी.इसमें पुराने 'खिलाड़ी कुमार' की कोई झलक नहीं है. फिल्म में एक्शन दृश्य ज़रूर अच्छे हैं, लेकिन आजकल तो हर दूसरी फिल्म में एक्शन बेमिसाल होता है.फिल्म के कई गीत ज़रूर इसकी रिलीज़ से पहले ही चर्चित हो चुके थे, जैसे हुक्का, बलमा, लोनली और लॉन्ग ड्राइव.फिल्म में कई किरदार जैसे राहुल सिंह या राजेश खट्टर, भारती सिंह के बेहद अटपटे किरदार हैं जो बेकार में हंसाने की कोशिश करते हुए नज़र आते हैं.रहे अक्षय कुमार. क्या उनमें 'ख़ान पावर' है. जवाब है नहीं. ना तो उनके पास सलमान ख़ान जैसी ज़बरदस्त फैन फॉलोइंग है ना ही शाहरुख जैसा करिश्मा. ऐसे में 'खिलाड़ी 786' कितनी कामयाब हो पाएगी, ये बड़ा सवाल है.(साभार बी बी सी डॉट कॉम )
پانچویں عالمی اردو کانفرنس کا افتتاح
جمرات کو کراچی آرٹس کونسل پاکستان کے زیر اہتمام پانچویں عالمی اردو کانفرنس شروع ہوئی۔ اس چار روزہ کانفرنس کے افتتاحی اجلاس میں ہندستان سے آنے والے مندوب ممتاز نقاد ڈاکٹر شمیم حنفی نے ’ہندوستان میں اردو ادب کا اجمالی جائزہ، اور ممتاز فکشن نگار انتظار حسین نے ’پاکستان میں اردو ادب کا اجمالی جائزہ‘ کے عنوانوں سے بات کی۔ جب کے آرٹس کونسل کے صدر محمد احمد شاہ نے استقبالیہ اور کونسل کے سیکریٹری نے مندوبین اور شرکا کا شکریہ ادا کیا۔افتتاحی اجلاس کی مجلس صدارت ڈاکٹر شمیم حنفی ، فاطمہ ثریا بجیا، ڈاکٹر اسلم فرخی، انتظار حسین، حمایت علی شاعر، ڈاکٹر پیر زادہ قاسم، محمد علی صدیقی، ڈاکٹر مبارک علی، کشور ناہید، مسعود اشعر، امینہ سید، ڈاکٹر انور سجاد، درمش بلگر، سعید نقوی اور محمد حسین سید پر مشتمل تھی۔پہلے روز کے دوسرے سیشن میں دوسرے اور تیسرے سیشن کو ملا کر ایک کر دیا گیا۔ یہ سیشن نیشنل اکیڈمی آف پرفارمنگ آرٹس، ناپا سے شائع ہونے والی کتابوں، ضیا محی الدین کی ’تھیٹرکس‘، شکیسپئر کے دو کھیل ترجمہ خالد احمد، دو یونانی کلاسیکی ڈرامے ترجمہ عقیل روبی کے اجرا کے حوالے سے تھا۔ جبکہ دوسرا سیشن ’ضیا محی الدین اعترافِ کمال‘ کے عنوان سے تھا۔ اس سیشن کی مجلسِ صدارت شمیم حنفی، انتظار حسین، راحت کاظمی، آصف فرخی اور احمد شاہ پر مشتمل تھی۔ اس سیشن میں شمیم حنفی، انتظار حسین، راحت کاظمی اور آصف فرخی نے خطاب کیا۔ نظامت ارشد محمود نے کی اور آخر میں خود ضیا محی الدین نے الف لیلٰی پر انتظار حسین کا پیش لفظ، مشتاق یوسفی، ابنِ انشا کی تحریریں اور میرا جی کی نظم سمندر کا بلاوا پڑھی۔
Monday, December 3, 2012
عام آدمیپارٹی
نئی دہلی۔03 دسمبر(پی ایس آئی) ہندستان میں کرپشن کے بارے میں عوامی تشویش میں اضافہ ہو رہا ہے اور اس کے ساتھ ہی ایک ممتاز شخصیت نے کرپشن کے خلاف ایک ایسی سیاسی پارٹی تشکیل دی ہے جس نے حکومت کو کرپشن سے پاک کرنے کا عہد کیا ہے۔اگرچہ اس پارٹی کے سیاسی مستقبل کے بارے میں ابھی کچھ کہنا مشکل ہے، لیکن نئی پارٹی سے سرکاری سیاسی حلقوں میں ہلچل مچ گئی ہے اور رشوت ستانی کا مسئلہ عوامی توجہ کا مرکز بن گیا ہے۔
اس نئی سیاسی پارٹی کا نام عام آدمی ہے۔ اس کے کرتا دھرتا شعلہ بیان 44 سالہ سابق ٹیکس افسر اروند کجری وال ہیں جو کرپشن کے خلاف ایک ملک گیر مہم میں پیش پیش تھے۔ جب یہ مہم جو ایک طاقتور اور با اختیار محتسب کے قیام کے لیے چلائی گئی تھی، دم توڑ گئی، تو کجری وال نے عہد کیا کہ وہ معاشرے میں پھیلے ہوئے کرپشن کے خلاف جنگ کے لیے سیاسی طریقہ کار اختیار کریں گے۔
کجری وال کہتے ہیں کہ ان کا مقصد ہندستان کے رشوت اور بد عنوانی سے بھر پور سیاسی نظام کو جڑ سے اکھاڑ پھینکنا ہے۔ ان کا کہنا ہے کہ ”ہم ان ضابطوں کے تحت انتخابات نہیں لڑیں گے۔ ہم ان ضابطوں کو تبدیل کرنا چاہتے ہیں۔ انتخابات پیسے اور دھونس دھاندلی کے زور پر، ذات پات اور مذہب کی بنیاد پر لڑے جاتے ہیں۔ ہم ایسا نہیں کریں گے۔“
عام لوگوں میں بے تحاشا رشوت کے خلاف سخت غم و غصہ موجود ہے۔ ڈرائیونگ لائسنس اور گیس کے کنیکشن جیسے چھوٹے چھوٹے کاموں سے لے کر اربوں ڈالر کے اسکینڈلز تک جن میں اعلیٰ سرکاری افسر ملوث ہوتے ہیں، ہر طرف رشوت کا بازار گرم ہے۔ گذشتہ دو برسوں میں کرپشن کے بعض بڑے بڑے اسکینڈل منظرِ عام پر آئے ہیں، اور لوگوں میں ناراضگی عروج پر پہنچ گئی ہے۔نئی دہلی کے سیاسی مبصر یوگندر یادو جو نئی پارٹی کے ایک اہم رکن ہیں، کہتے ہیں کہ وقت آ گیا ہے کہ کرپشن کے خلاف سیاسی سطح پر تحریک چلائی جائے۔ ان کے مطابق ”پورے سیاسی نظام کے بارے میں شدید بے اطمینانی پائی جاتی ہے، اور یہ ایک غیر معمولی، بلکہ تاریخی موقع ہے کہ ہم ایک مختلف قسم کی سیاست کا آغاز کریں۔ ہمارا منصوبہ ہے کہ ہم ایسا ہی کریں گے۔“
کجری وال نے حکمران کانگریس پارٹی اور حزبِ اختلاف کی بھارتیہ جنتا پارٹی دونوں پر بد عنوانی پر مبنی نظام کے فروغ کے لیے گٹھ جوڑ کا الزام عائد کیا ہے۔ انھوں نے کھلے عام ہندستان کے بعض انتہائی با اثر لوگوں کا نام لیا ہے جو اس ہیر پھیر میں ملوث ہیں۔ان میں سب سے بڑا نام رابرٹ وادرا کا ہے جو کانگریس پارٹی کی سربراہ سونیا گاندھی کے داماد ہیں۔ کجری وال نے ان پر الزام لگایا ہے کہ انھوں نے ہندستان کے بعض سب سے بڑے پراپرٹی ڈیلرز کے ساتھ ساز باز کی ہے اور زمین کے سودوں میں دھوکے بازی سے بڑی مقدار میں دولت اکٹھی کر لی ہے۔ وزیرِ خارجہ، حزبِ اختلاف کی بڑی پارٹی کے سربراہ، اور ملک کا سب سے بڑا کاروباری ادارہ، ریلائنس بھی ان کی تنقید کا نشانہ بنا ہے۔ ان سب نے الزامات کی صحت سے انکار کیا ہے۔
میڈیا میں کجری وال کی تعریف ہوئی ہے اور ان پر تنقید بھی کی گئی ہے۔ کچھ لوگوں کا خیال ہے کہ وہ کرپشن کے خلاف لڑ رہے ہیں جب کہ بعض دوسرے لوگ انہیں سیاسی موقع پرست کہتے ہیں جو ایک مسئلے سے فائدہ اٹھا رہے ہیں جو بہت سے ہندستانیوں کے لیے پریشان کن ہے۔
نئی دہلی کی جواہر لال یونیورسٹی میں سیاسیات کی پروفیسر، زویا حسن کہتی ہیں کہ اس نئی پارٹی نے کرپشن کو ہندستانی سیاست کا مرکزی مسئلہ بنا دیا ہے۔ انھوں نے کہا کہ”یہ لوگ سیاست اور بزنس کے درمیان گٹھ جوڑ کو بے نقاب کرنے میں کامیاب ہوگئے ہیں۔ اس کا کچھ اثر ہو سکتا ہے کیوں کہ متوسط طبقے کے لوگ اور میڈیا میں کرپشن کے بارے میں تشویش موجود ہے۔ ممکن ہے کہ اس کی وجہ سے کرپشن کے خلاف قانون سازی کی رفتار تیز ہو جائے، اور میرا خیال ہے کہ حکومت اور بیوروکریسی دونوں میں کرپشن کے مسئلے کے شعور میں اضافہ ہو گا۔“
حکمران کانگریس پارٹی تسلیم کرتی ہے کہ کرپشن کو جڑ سے اکھاڑنا ضروری ہے، اور وہ ایسا کرنے کی پابند ہے۔ لیکن اس نے نئی سیاسی پارٹی کو شعبدہ بازی کہہ کر مسترد کر دیا ہے۔کئی سیاسی تجزیہ کاروں نے یہ بھی کہا ہے کہ اگرچہ کجری وال میڈیا میں سرخیوں کی زینت بن رہے ہیں، لیکن ہندستان میں کرپشن کے خلاف جنگ لڑنا ایک چھوٹی سی نئی پارٹی کے بس کی بات نہیں جس کی سرگرمیاں ملک کے شمالی حصے تک محدود ہیں۔اس پارٹی کی اصل آزمائش اس وقت ہوگی جب یہ اگلے سال ہندستان کے دارالحکومت میں مقامی انتخاب میں، اور 2014ء میں عام انتخابات میں حصہ لے گی۔زویا حسن کہتی ہیں کہ عام آدمی نامی پارٹی کا محدود ایجنڈا ایک بڑا مسئلہ ہے۔ اس نے سیاست میں ہلچل تو مچا دی ہے، لیکن اس بات کا امکان بہت کم ہے کہ اس کی وجہ سے انتخابی سیاست میں کوئی بڑا فرق پڑے گا۔
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