Wednesday, May 30, 2018

प्रणब मुखर्जी:एक ब्राह्मण के लिए जनेऊ सर्वपरि होता है।

प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवत
मेराज नूरी
आजकल भारतीय राजनीति खास तौर से धर्मनिरपेक्ष राजनीति में मानो भूचाल सा आया हुआ है।इस भूचाल का कारण न तो कोई घपला या घोटाला है ना ही कोई साम्प्रदायिक दंगे या फिर संवैधानिक संकट।दरअसल इस भूचाल के पीछे एक निमंत्रण है जिसे भारत के बंगाली ब्राह्मण और बाद में कांग्रेस नेता और फिर बाद में भारत के राष्ट्रपति रहे प्रणव मुखर्जी ने स्वीकार किया है।ये न्योता किसी आम ने नहीं बल्कि भारत के सबसे शक्तिशाली संगठन और ब्राह्मणवाद की करता धर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आर एस एस ने दिया है।ये न्योता आर एस एस के "संघ शिक्षण वर्ग "को संबोधित करने के लिए दिया गया है।ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी देता है  साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देता है। यानी प्रणव मुखर्जी संघ के मुख्यालय में समाज,राष्ट्र और धर्म का ज्ञान बाटेंगे।वो संघ जिसका मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और वह सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की ही बात करता है जबकि उसके विपरीत उसके आलोचकों का यह आरोप है कि ऐसे विचारों के प्रचार से भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होती है। संघ की मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि व पितृ-भूमि मानता है (अर्थात्‌ जहाँ उसके पूर्वज रहते आये हैं) तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है (अर्थात्‌ जहां उसके देवी देवताओं का वास है); हिन्दू है। संघ की यह भी मान्यता है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है तो इसका कारण भी केवल यह है कि यहां हिन्दू बहुमत में हैं। संघ मनुस्मृति का भी पुरज़ोर समर्थक है और उसी पथ पर भारत को अग्रसर देखना चाहता है।
अब सवाल ये है कि आखिर राजनीतिक तौर पर विचारों के टकराव के बावजूद प्रणव मुखर्जी संघ की दावत पर नागपुर क्यों जा रहे हैं।क्या वो कांग्रेस और धर्म निरपेक्षता का त्याग कर चुके हैं।जवाब है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।ना वो राजनीतिक से दूर हो रहे हैं ना ही धर्मनिरपेक्षता के पथ से बल्कि वो सिर्फ और अपना धर्म निभा रहे हैं जो प्रत्येक मनुष्य के लिए सर्वपरि होता है।अर्थात जिसके लिए उसका जन्म हुआ है।जिस पथ पर चल कर वो पाप और पुण्य ,स्वर्ग और नर्क का भागी बनता है।ये धर्म का बल और आकर्षण शक्ति है जो प्रणब मुखर्जी को संघ की शरण में जाने को मजबूर करती है।हालांकि राजनीतिक तौर पर प्रणब दा का अपना अलग किरदार है जिसे बताने और लिखने की आवश्यकता नहीं लेकिन प्रणब मुखर्जी सर्वप्रथम हिन्दू हैं और वो भी ब्राह्मण।जनेऊधारी।अर्थात ब्रह्म में रमण करने वाला। ऋग्वेद के अनुसार ब्रह्म अर्थात ईश्वर को रमण करने वाला ब्राहमण होता है।कहा जाता है कि ब्राह्मण अपनी धारणाओं से अधिक धर्माचरण को महत्व देते हैं।
ऐसे में प्रणब मुखर्जी का संघ के एक प्रशिक्षण शिविर अर्थात संघ शिक्षण वर्ग को संबोधित  करने जाना महज इत्तेफ़ाक़ नहीं बल्कि उनका धार्मिक कर्तव्य है।वैसे भी कहा जाता है कि मनुष्य अपने आखिरी समय में धर्म कर्म पर ज़्यादा ध्यान देता है सो प्रणब मुखर्जी भी उसी पथ पर अग्रसर हैं।क्योंकि आज की तारीख में आर एस एस हिंदुओं की धार्मिक आस्था और उसके पूर्णोद्धार के क्षेत्र में काम करने वाली सबसे सर्वोच्च और अद्वितीय संस्था है।इसलिए इस यात्रा को राजनीतिक चश्मे से ना देखकर धार्मिक चश्मे से देखा जाए तो बेहतर है।कुल मिलाकर ये कहा जाए कि राजनीति के द्वारा दुनिया की मोह माया का भोग करने वाले प्रणब मुखर्जी को मोक्ष की प्राप्ति धर्म में निहित दिखती है तोे इसमें  कोई बुराई भी नहीं है।वैसे भी कहा जाता है कि एक ब्राह्मण कभी भी मनुस्मृति के विपरीत नहीं जा सकता और एक ब्राह्मण के लिए जनेऊ राजनीतिक विचारधारा से कहीं ज़्यादा सर्वपरि होता है।

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